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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

3 अप्रैल,सांस्कृतिक प्रेरणा पुरुष लालचन्द प्रार्थी,फील्ड मार्शल मानेकशा, शुभचिन्तक त्रयम्बकराव जुमड़े

 3 अप्रैल/जन्म-दिवस


सांस्कृतिक प्रेरणा पुरुष लालचन्द प्रार्थी 


हिमाचल प्रदेश के गौरव श्री लालचन्द ‘प्रार्थी’ उन साहित्यकारों में थे, जो हिन्दी साहित्याकाश में आज भी ‘चाँद कुल्लुवी’ के नाम से चमक रहे हैं। कुल्लू से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में उनके दो स्तम्भ ‘लूहरी से लिंघटी तक’ तथा ‘प्रार्थी के खड़प्के’ छपते थे। ये स्तम्भ पाठकों में अत्यधिक लोकप्रिय थे। दुर्भाग्यवश संग्रह न होने के कारण वे खड़प्के आज उपलब्ध नहीं हैं।


प्रार्थी जी का जन्म कुल्लू जिले के नग्गर गाँव में 3 अप्रैल, 1916 को हुआ था। वे उच्च कोटि के साहित्यकार, राजनेता, हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी और उर्दू के प्रकांड विद्वान थे। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था और अपने धाराप्रवाह भाषण से श्रोताओं को घंटों तक बाँधे रखते थे। 


वे एक प्रामाणिक विधायक और मन्त्री रहे। मैट्रिक की शिक्षा अपने क्षेत्र से पाकर वे लाहौर चले गये और वहाँ से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्राप्त की। लाहौर में रहते हुए वे ‘डोगरा सन्देश’ और ‘कांगड़ा समाचार’ के लिए नियमित रूप से लिखने लगेे। इसके साथ ही उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रों का नेतृत्व किया और स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गये। 


1940 के दशक में उनका गीत ‘हे भगवान, दो वरदान, काम देश के आऊँ मैं’ बहुत लोकप्रिय था। इसे गाते हुए बच्चे और बड़े गली-कूचों में घूमते थे। इसी समय उन्होंने ग्राम्य सुधार पर एक पुस्तक भी लिखी। यह गीत उस पुस्तक में ही छपा था। लेखन के साथ ही उनकी प्रतिभा नृत्य और संगीत में भी थी। वे पाँव में घुँघरू बाँधकर हारमोनियम बजाते हुए महफिलों में समाँ बाँध देते थे। उन्हें शास्त्रीय गीत, संगीत और नृत्य की बारीकियों का अच्छा ज्ञान था। 


लाहौर में निर्मित फिल्म ‘कारवाँ’ में उन्होंने अभिनय भी किया था। इसके अतिरिक्त भी उनमें अनेक गुण थे, जिनका वर्णन देवप्रस्थ साहित्य संगम, कुल्लू द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘प्रार्थी के बिखरे फूल’ में विस्तार से किया गया है।


लालचन्द प्रार्थी ने हिमाचल प्रदेश की संस्कृति के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। एक समय ऐसा भी था, जब हिमाचल के लोगों में अपनी भाषा, बोली और संस्कृति के प्रति हीनता की भावना पैदा हो गयी थी। वे विदेशी और विधर्मी संस्कृति को श्रेष्ठ मानने लगे थे। ऐसे समय में प्रार्थी जी ने सांस्कृतिक रूप से प्रदेश का नेतृत्व किया। इससे युवाओं का पलायन रुका और लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना जाग्रत हुई।


हिमाचल प्रदेश में भाषा-संस्कृति विभाग और अकादमी की स्थापना, कुल्लू के प्रसिद्ध दशहरा मेले को अन्तरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करना तथा कुल्लू में मुक्ताकाश कला केन्द्र की स्थापना उनके ही प्रयास से हुई। प्रार्थी जी ने अनेक भाषाओं में साहित्य रचा; पर उनकी पहचान मुख्यतः उर्दू शायरी से बनी। उनके काव्य को ‘वजूद ओ अदम’ नाम से उनके देहान्त के बाद 1983 में भाषा, कला और संस्कृति अकादमी ने प्रकाशित किया। 


उन्होंने एक बार अपनी कविता में कहा था -


खुश्क धरती की दरारों ने किया याद अगर

उनकी आशाओं का बादल हूँ, बरस जाऊँगा।

कौन समझेगा कि फिर शोर में तनहाई के

अपनी आवाज भी सुनने को तरस जाऊँगा।।


11 दिसम्बर, 1982 को हिमाचल का यह चाँद छिप गया और लोग सचमुच उनकी आवाज सुनने को तरस गये।

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3 अप्रैल/जन्म-दिवस


फील्ड मार्शल मानेकशा


20वीं शती के प्रख्यात सेनापति फील्ड मार्शल सैमजी होरमुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशा का जन्म 3 अपै्रल 1914 को एक पारसी परिवार में अमृतसर में हुआ था। उनके पिता जी वहां चिकित्सक थे। पारसी परम्परा में अपने नाम के बाद पिता, दादा और परदादा का नाम भी जोड़ा जाता है; पर वे अपने मित्रों में अंत तक सैम बहादुर के नाम से प्रसिद्ध रहे।


सैम मानेकशा का सपना बचपन से ही सेना में जाने का था। 1942 में उन्होंने मेजर के नाते द्वितीय विश्व युद्ध में गोरखा रेजिमेंट के साथ बर्मा के मोर्चे पर जापान के विरुद्ध युद्ध किया। वहां उनके पेट और फेफड़ों में मशीनगन की नौ गोलियां लगीं। शत्रु ने उन्हें मृत समझ लिया; पर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर वे बच गये। इतना ही नहीं, वह मोर्चा भी उन्होंने जीत लिया। उनकी इस वीरता पर शासन ने उन्हें ‘मिलट्री क्रास’ से सम्मानित किया।


1971 में पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारों के कारण पूर्वी पाकिस्तान के लोग बड़ी संख्या में भारत आ रहे थे। उनके कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ रहा था तथा वातावरण भी खराब हो रहा था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपै्रल में उनसे कहा कि वे सीमा पार कर चढ़ाई कर दें। मानेकशा ने दो टूक कहा कि कुछ समय बाद उधर वर्षा होने वाली है। ऐसे में हमारी सेनाएं वहां फंस जाएंगी। इसलिए युद्ध करना है, तो सर्दियों की प्रतीक्षा करनी होगी। 


प्रधानमंत्री के सामने ऐसा उत्तर देना आसान नहीं था। मानेकशा ने यह भी कहा कि यदि आप चाहें तो मेरा त्यागपत्र ले लें; पर युद्ध तो पूरी तैयारी के साथ जीतने के लिए होगा। इसमें थल के साथ नभ और वायुसेना की भी भागीदारी होगी। इसलिए इसकी तैयारी के लिए हमें समय चाहिए।


इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली और फिर इसका परिणाम सारी दुनिया ने देखा कि केवल 14 दिन के युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने  अपने सेनापति जनरल नियाजी के नेतृत्व में समर्पण कर दिया। इतना ही नहीं, तो विश्व पटल पर एक नये बांग्लादेश का उदय हुआ। इसके बाद भी जनरल मानेकशा इतने विनम्र थे कि उन्होंने इसका श्रेय जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को देकर समर्पण कार्यक्रम में उन्हें ही भेजा। 


जनरल मानेकशा बहुत हंसमुख स्वभाव के थे; पर हर काम को वे पूरी निष्ठा से करते थे। देश की स्वतंत्रता के समय वे सेना संचालन निदेशालय में लेफ्टिनेंट कर्नल थे। 1948 में उन्हें इस पद के साथ ही ब्रिगेडियर भी बना दिया गया। 1957 में वे मेजर जनरल और 1962 में लेफ्टिनेंट जनरल बने। 


8 जून 1969 को उन्हें थल सेनाध्यक्ष बनाया गया। 1971 में पाकिस्तान पर अभूतपूर्व विजय पाने के बाद उन्हें फील्ड मार्शल के पद पर विभूषित किया गया। 1973 में उन्होंने सेना के सक्रिय जीवन से अवकाश लिया।


जिन दिनों देश में घोर अव्यवस्था चल रही थी, तो इंदिरा गांधी ने परेशान होकर उन्हें सत्ता संभालने को कहा। जनरल मानेकशा ने हंसकर कहा कि मेरी नाक लम्बी जरूर है; पर मैं उसे ऐसे मामलों में नहीं घुसेड़ता। सेना का काम राजनीति करना नहीं है। इंदिरा गांधी उनका मुंह देखती रह गयीं।


26 जून, 2008 को 94 वर्ष की सुदीर्घ आयु में तमिलनाडु के एक सैनिक अस्पताल में उनका देहांत हुआ। यह कितने शर्म की बात है कि फील्ड मार्शल होते हुए भी श्री मानेकशा के अंतिम संस्कार में भारत सरकार का कोई बड़ा अधिकारी शामिल नहीं हुआ।

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3 अप्रैल/पुण्य-तिथि


खदान मजदूरों के शुभचिन्तक त्रयम्बकराव जुमड़े


भारत में कोयला तथा अन्य खनिजों का भरपूर भंडार है। इन खदानों के मालिक और ठेकेदार तो मालामाल हो जाते हैं; पर जो मजदूर अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में इन खदानों में काम करते हैं, वे निर्धन ही रहते हैं। ‘भारतीय मजदूर संघ’ के माध्यम से इन खदान मजदूरों का सबल संगठन खड़ा कर, उनके जीवन में सुधार लाने वाले श्री त्रयम्बकराव जुमड़े संघ के वरिष्ठ प्रचारक थे। 


त्रयम्बकराव जुमड़े का जन्म 1915 में सिन्दी (जिला वर्धा, महाराष्ट्र) के एक निर्धन परिवार में हुआ था। सिन्दी का संघ के इतिहास में विशेष स्थान है। यहां डा0 हेडगेवार की उपस्थिति में हुई एक बैठक में संघ की कार्यप्रणाली, प्रार्थना, आज्ञा, गणवेश आदि के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय हुए थे।


त्रयम्बकराव ने मिडिल तक की शिक्षा सिन्दी के मिडिल स्कूल में ही पाई। इसके बाद वे वर्धा आ गये। 1932 तक वहां रहकर उन्होंने मैट्रिक की शिक्षा पूर्ण की। 1926 में जब संघ के संस्थापक डा0 हेडगेवार सिन्दी आये, तो वहां शाखा प्रारम्भ हुई। उसमें त्रयम्बकराव भी बाल स्वयंसेवक के रूप में नियमित रूप से आने लगे। इस प्रकार वे शिशु अवस्था से ही संघ से जुड़ गये। 


आगे चलकर अप्पा जी जोशी के सान्निध्य में उन्होंने 1932, 33 और 34 में संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण वर्गों में भाग लिया। इसके बाद संघ के कार्य में उनकी सक्रियता तथा समर्पण क्रमशः बढ़ता चला गया।


आगामी शिक्षा हेतु महाविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद भी उनका अधिकांश समय संघ शाखाओं के विस्तार में ही लगता था। 1939 में उन्हें अमरावती और फिर 1942 में खंडवा जिले में संघ कार्य करने के लिए भेजा गया। उन दिनों यातायात के साधनों का अभाव था। अतः वे पैदल, साइकिल या बैलगाड़ी से प्रवास करते थे। उनके प्रयत्नों से वहां शाखाओं की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई। नगरों के साथ ही कई छोटे गांवों में भी शाखाएं खुल गयीं। 


1948 में गांधी जी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तो वे भी कारागृह में रहे। प्रतिबंध समाप्ति के बाद 1963 तक मुख्यतः उन्होंने महाकोशल प्रान्त में संघ के विभिन्न दायित्वों पर कार्य किया। 1967 में उन्हें भारतीय मजदूर संघ में मध्य प्रदेश का संगठन मंत्री बनाया गया। कुछ समय बाद उन्हें खदान मजदूरों के बीच संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी दी गयी।


कोयले की खदानें म0प्र0 के साथ ही छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा आदि में भी हैं। यहां काम करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों की समस्याओं का गहन अध्ययन किया तथा फिर उनका सर्वसम्मत समाधान भी निकाला। उनके प्रयास से भारतीय मजदूर संघ की प्रतिष्ठा बढ़ी और देश भर में लाखों लोग इससे जुड़े। उनकी हिसाब-किताब इतना पारदर्शी रहता था कि केवल मजदूर ही नहीं, तो अन्य सब लोग भी उनका सम्मान करते थे।


वृद्धावस्था में उन्हें कई रोगों ने घेर लिया। खदान मालिकों ने कई बार दवा का खर्च और अस्पताल के लिए वाहन की व्यवस्था करने का प्रस्ताव दिया; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक इसे अस्वीकार कर दिया। 1992 में ‘अखिल भारतीय खदान महासंघ’ के अधिवेशन में उन्हें ‘विश्वकर्मा सम्मान’ दिया गया। 14 मार्च, 1997 को कांगे्रस के मजदूर संगठन ‘इंटक’ ने भी उन्हें सम्मानित किया। 


तीन अप्रैल, 1997 को नागपुर के एक चिकित्सालय में वरिष्ठ प्रचारक तथा खदान मजदूरों के सच्चे मित्र त्रयम्बकराव का देहांत हुआ। भारतीय मजदूर संघ आज भारत का सबसे बड़ा मजदूर संगठन है। इसका श्रेय जिन कार्यकर्ताओं को है, उनमें त्रयम्बकराव का नाम भी आदर से लिया जाता है। 


(संदर्भ : साप्ताहिक विवेक, मुंबई द्वारा प्रकाशित संघ गंगोत्री)

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