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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

हिन्दू धर्म में कुछ संख्याओं का विशेष महत्व

 पूरा जरूर पड़े अतिमहत्वपूर्ण जानकारी

हिन्दू धर्म में कुछ संख्याओं का विशेष महत्व


एक ओम्कार् 👉 ॐ 


दो लिंग👉 नर और नारी ।


दो पक्ष👉 शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।


दो पूजा👉 वैदिकी और तांत्रिकी।


दो अयन 👉 उत्तरायन और दक्षिणायन।


तीन देव👉 ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।


तीन देवियाँ👉 सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती।


तीन लोक 👉 पृथ्वी, आकाश, पाताल।


तीन गुण👉 सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।


तीन स्थिति👉 ठोस, द्रव, गैस।


तीन स्तर👉 प्रारंभ, मध्य, अंत।


तीन पड़ाव👉 बचपन, जवानी, बुढ़ापा।


तीन रचनाएँ 👉 देव, दानव, मानव।


तीन अवस्था👉 जागृत, मृत, बेहोशी।


तीन काल👉 भूत, भविष्य, वर्तमान।


तीन नाड़ी👉 इडा, पिंगला, सुषुम्ना।


तीन संध्या👉 प्रात:, मध्याह्न, सायं।


तीन शक्ति👉 इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।


चार धाम👉 बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।


चार मुनि👉 सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।


चार वर्ण👉 ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।


चार निति👉 साम, दाम, दंड, भेद।


चार वेद👉 सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।


चार स्त्री👉 माता, पत्नी, बहन, पुत्री।


चार युग👉 सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।


चार समय👉 सुबह, शाम, दिन, रात।


चार अप्सरा👉 उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।


चार गुरु👉 माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।


चार प्राणी👉 जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।


चार जीव 👉 अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।


चार वाणी👉 ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।


चार आश्रम👉 ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।


चार भोज्य👉 खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।


चार पुरुषार्थ👉 धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।


चार वाद्य👉 तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।


पाँच तत्व👉 पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।


पाँच देवता👉 गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।


पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ👉 आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।


पाँच कर्म👉 रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।


पाँच उंगलियां👉 अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।


पाँच पूजा उपचार👉 गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।


पाँच अमृत👉 दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।


पाँच प्रेत👉 भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।


पाँच स्वाद👉 मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।


पाँच वायु👉 प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।


पाँच इन्द्रियाँ👉 आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।


पाँच वटवृक्ष👉 सिद्धवट (उज्जैन), 

अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।


पाँच पत्ते👉 आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।


पाँच कन्या :👉 अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।


छ: ॠतु👉 शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।


छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।


छ: कर्म👉 देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।


छ: दोष :👉 काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।


सात छंद 👉 गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।


सात स्वर👉 सा, रे, ग, म, प, ध, नि।


सात सुर👉 षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।


सात चक्र👉 सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।


सात वार 👉 रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।


सात मिट्टी👉 गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।


सात महाद्वीप👉 जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।


सात ॠषि👉 वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।


सात ॠषि 👉 वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।

सात धातु (शारीरिक)👉 रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।


सात रंग👉 बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।


सात पाताल👉 अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।


सात पुरी👉 मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।

सात धान्य👉 उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।


आठ मातृका👉 ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।


आठ लक्ष्मी👉 आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।


आठ वसु👉 अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।

आठ सिद्धि👉 अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।


आठ धातु👉 सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।


नवदुर्गा👉 शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।


नवग्रह👉 सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।


नवरत्न👉 हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।


नवनिधि👉 पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।


दस महाविद्या👉 काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।


दस दिशाएँ👉 पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।


दस दिक्पाल👉 इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।


दस अवतार (विष्णुजी)👉 मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।


दस सति 👉 सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।


उक्त जानकारी वेदों के आधार पर है।

मंगलवार, 11 जुलाई 2023

पैर छूने की परंपरा और नियम

 *🚩पैर छूने की परंपरा: सनातन धर्म, संस्कृति और परंपरा में संतों के और बड़ों बुजुर्गों के पैर छूने की परंपरा है, परंतु क्या आप जानते हैं कि कुछ लोगों से पैर छुआना वर्जित है या यह कहें कि कुछ लोगों को पैर नहीं छूना चाहिए।*
 *सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार :* 
*🚩कुंवारी कन्या :-* कुंवारी कन्याओं को किसी के पैर नहीं छूना चाहिए या यदि कोई कुंवारी कन्या आपके पैर छूने का प्रयास करें तो उसे रोक दें अन्यथा आपको पाप लगेगा। छोटी बच्चियों और कन्याओं के तो पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
 
*🚩बेटियां :-* किसी भी पिता को अपनी बेटियों से पैर नहीं छुआना चाहिए। बेटियों को भी चाहिए कि वह पिता के पैर नहीं छुए अन्यथा पिता को पाप लगता है। बेटियों को देवी का रूप माना जाता है इसलिए उनसे चरण नहीं छुआना चाहिए।
*🚩बहुएं :-* कुछ समाज में बहुएं अपनी सास के पैर छू सकती है, परंतु श्वसुर के नहीं क्योंकि बहुएं घर की लक्ष्मी होती हैं।
 
*🚩मंदिर में :-* यदि आप मंदिर में हैं और आपको वहां पर कोई बड़ा-बुजुर्ग या सम्मानीय व्यक्ति मिल जाता है तो आप पहले भगवान को प्रणाम करें  क्योंकि मंदिर में भगवान से बड़ा कोई नहीं होता। भगवान के सामने किसी के पैर छूना मंदिर और भगवान का अपमान माना जाता है।
 
*🚩पूजा कर रहे व्यक्ति के पैर छूना :-* यदि कोई व्यक्ति मंदिर या घर में पूजा कर रहा है उस दौरान उसके पैर छूना उचित नहीं है। ऐसे में दोनों को ही पाप लगता है। दूसरी बात इससे पूजा में बाधा उत्पन्न होती है।
 
*🚩सोये हुए व्यक्ति के पैर छूना :-* यदि कोई व्यक्ति सो रहा है या लेटा हुआ है तो उस समय उसके पैर नहीं छूना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे लेटे हुए व्यक्ति की उम्र घटती है। केवल मरे हुए व्यक्ति के ही पैर छुए जाते हैं।
 
*🚩श्मशान से लौटे व्यक्ति के पैर छूना :-* यदि कोई  सम्‍मानित व्‍यक्ति या बड़े-बुजुर्ग श्‍मशान घाट से लौट रहे हैं तो उन्हें देखकर कई लोग उनके पैर छूने लगते हैं जो कि गलत है। अंतिम संस्कार से लौटने पर व्यक्ति अशुद्ध हो जाता है ऐसे में उसके पैर छूना वर्जित है। स्नान करने के बाद ही उसके पैर छू सकते हैं। इसी प्रकार श्मशान में भी किसी के पैर नहीं छूना चाहिए।
 
*🚩अशुद्ध व्यक्ति :-* यदि आप किसी कारण से अशुद्ध हो गए हैं या जिसके आप पैर छूना चाहते हैं वह अशुद्ध है तो दोनों ही स्थिति में पैर नहीं छूना चाहिए। इसे दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ सकता है।
 
*🚩भांजा भांजी :-* यदि आप किसी के भांजे हैं तो आपको मामा मामी के पैर नही छूना चाहिए क्योंकि भांजा या भांजी पूजनीय होते हैं। मामा मामी को पाप लगता है।
 
*🚩पत्नी :-* पति पत्नी का रिश्ता बहुत ही पवित्र रिश्ता होता है और यह सांझेदारी का रिश्ता होता है।
 परंतु पति को कभी भी अपनी पत्नी के पैर नहीं छूना चाहिए क्योंकि इससे पत्नी को पाप लगता है।
🙏जय सियाराम🙏
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सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

कलयुग के प्रभावी होने के लक्षण

  
कलयुग के प्रभावी होने के लक्षण


1= कुटुम्ब कम हुआ

2=सम्बंध कम हुए

3= नींद कम हुई

4= बात कम हुए

5=प्रेम कम हुआ

6=कपड़े कम हुए

7=सरम कम हुई

8=लाज लज्जा कम हुई

9=मर्यादा कम हुई

10=बच्चे कम हुए

11=घर में खाना कम हुआ

12=पुस्तक वाचन कम हुआ

13=भाई भाई प्रेम कम हुआ

15=चलना कम हुआ

16=खुराक कम हुआ

17=घी, मक्खन कम हुआ

18=तांबे, पीतल के बर्तन    कम हुए

19=सुख चैन कम हुआ

20=मेहमान कम हुए

21=सत्य कम हुआ

22=सभ्यता कम हुई

23=मन मिलाप कम हुआ

24=समर्पण कम हुआ

🌹🙏

1=परिवार से ज्यादा ससुराल अच्छा लगने लगा

2=बहन से अच्छी साली लगने लगी

3=भाई से ज्यादा साले अच्छे लगने लगे

4=मां से अच्छी सास लगने लगी

5=मोज शौक के लिए समय मिलने लगा

6=होटल का खाना अच्छा लगने लगा

7=फिल्मे, घूमने, का समय है मिलमिलाप का समय नहीं

8=बीमारियां बड़ी

9=टेंशन बड़ा

10= पैसे है पर शारीरिक सुख नहीं

11=बडापन बड़ा

12=दिखावा बड़ा

13=भद्दापन बड़ा

14=वृद्धा आश्रम बड़े

15=जूठ बड़ा

16=पाप बड़ा

17=हल्का पन बड़ा

18=झगड़े बड़े

19=नंगा पन बड़ा

20=राग, द्वेष बड़ा

21=ईर्ष्या बड़ी

22= छोटा पन बड़ा

23= छोटी सोच बड़ी

24= लालच बड़ा

वास्तविकता आज की  🌹🙏

आप सभी इन बातों पर  ध्यान दें ताकि हम सभी कलयुग के प्रभाव को कम कर सकें !

पोस्ट अच्छी लगी हो पोस्ट अच्छी लगे हो तो कृपया दूसरे के साथ शेयर करें ताकि लोगों को कलयुग के बारे में पता चल सके!

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

घड़ी का सुंदर प्रयोग एक-दो के स्थान पर ज्योतिष मूल्यांकन


 अतीव सुन्दर 💞


12:00 बजने के स्थान पर आदित्य लिखा हुआ है जिसका अर्थ यह है कि सूर्य 12 प्रकार के होते हैं।


1:00 बजने के स्थान पर ईश्वर लिखा हुआ है इसका अर्थ यह है कि ईश्वर एक ही प्रकार का होता है। एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति।


2:00 बजने की स्थान पर पक्ष लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि पक्ष दो होते हैं 1 कृष्ण पक्ष औऱ दूसरा शुक्ल पक्ष।


3:00 बजने के स्थान पर अनादि तत्व लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि अनादि तत्व 3 हैं। परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति ये तीनों तत्व अनादि है ,


4:00 बजने के स्थान पर वेद लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं -- ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।


5:00 बजने के स्थान पर महाभूत लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य है कि महाभूत पांच प्रकार के होते हैं। पांच महाभूत हैं - सत्वगुण, रजगुण, कर्म, काल, स्वभाव


6:00 बजने के स्थान पर दर्शन लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि दर्शन 6 प्रकार के होते हैं । छः दर्शन  सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के नाम से विदित है।


7:00 बजे के स्थान पर धातु लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि धातु 7 हैं। सात धातुओं के नाम

रस : प्लाज्मा

रक्त : खून (ब्लड)

मांस : मांसपेशियां

मेद : वसा (फैट)

अस्थि : हड्डियाँ

मज्जा : बोनमैरो

शुक्र : प्रजनन संबंधी ऊतक 


8:00 बजने के स्थान पर अष्टांग योग लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि योग के आठ प्रकार होते है। योग के ये आठ अंग हैं: 1) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि


9:00 बजने के स्थान पर अंक लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि अंक 9 प्रकार के होते हैं। 1 2 3 4 5 6 7 8 9


10:00 बजने के स्थान पर दिशाएं लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है।


11:00 बजने के स्थान पर उपनिषद लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि उपनिषद 11 प्रकार के होते हैं।


बुधवार, 14 दिसंबर 2022

शबरी के मर्यादा पुरुषोत्तम राम

                        शबरी के मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  

 शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।


शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।


महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।"


अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..?


महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।


 आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए।ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???


महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

महर्षि मतंग बोले- 

पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ।

अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

उनका कौशल्या से विवाह होगा।फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।फिर प्रतीक्षा..


फिर उनका विवाह कैकई से होगा।फिर प्रतीक्षा.. 


फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा।फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे।तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।


शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।


वह फिर अधीर होकर पूछने लगी- "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???"


महर्षि मतंग बोले- "वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे।यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे "अवश्य"...!


जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। इसलिए प्रतीक्षा करना।वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।"


शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी।वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 


हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।


कभी भी आ सकतें हैं।

हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई।लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।


और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।


गुरु का कथन सत्य हुआ।भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।


ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-


"कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..?"


राम मुस्कुराए- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..?"


"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।


राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।”


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...!” (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...।" (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुराकर रह गए!!


भीलनी ने पुनः कहा- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?”


राम गम्भीर हुए और कहा-


भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने आया है..?”


रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।


राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।”


"जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"


राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि "शासन/प्रशासन और सत्ता" जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है।”

(अंत्योदय)


राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!


माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा-


राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।”


"राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।”


"राम निकला है, ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।”


और


"राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।”


शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा-  "बेर खाओगे राम..?”


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु..?” 


"यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”


सबरी मुस्कुराईं, बोली-   "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"


मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन


🙏🏻💐जय श्री सीताराम💐🙏

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

इन मंत्रों हर सनातनी को सीखना चाहिए।

 *यह मंत्र जो हर सनातनी को सीखना चाहिए।


1. श्री महादेव जी

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् 

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्!!


2. श्री गणेश जी


वक्रतुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ 

निर्विघ्नम कुरू मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा!!


3. श्री हरी विष्णु जी


मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।

मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥


4. श्री ब्रह्मा जी


ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा नमस्ते परमात्ने।

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सदुयाय नमो नम:।।


5. श्री कृष्ण जी


वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।।


6. श्री राम जी


श्री रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नमः !


7. मां दुर्गा जी


ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते


8. मां महालक्ष्मी जी


ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धन धान्यः सुतान्वितः मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॐ ।।


9. मां सरस्वती


ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।

विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।।


10. मां महाकाली


ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हलीं ह्रीं खं स्फोटय क्रीं 

क्रीं क्रीं फट !!


11. श्री हनुमान जी


मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठ।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥


12. श्री शनिदेव जी


ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||


13. श्री कार्तिकेय


ॐ शारवाना-भावाया नम: ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा वल्लीईकल्याणा सुंदरा, देवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते


14. काल भैरव


ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा


15. गायत्री मंत्र


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ 

🙏🙏🙏सनातन धर्म ही सत्य है

कमर दर्द, गठिया और जोड़ों के दर्द से परेशान तो करें सेवन

 कमर दर्द, गठिया और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं तो ठंड में मैथी के लड्डू का करें सेवन, पढ़ें सरल विधि 

 

सामग्री :

500 ग्राम मोटा पिसा गेहूं का आटा, 500 ग्राम मैथी दाना, 100 ग्राम खाने वाला गोंद बारीक किया हुआ, एक किलो गुड़, 250 ग्राम शकर का बूरा (पिसी शकर), 100 ग्राम पिसी छनी बारीक सोंठ, 1 किलो के करीब शुद्ध घी, 100 ग्राम खसखस, 250 ग्राम बारीक कटा मेवा, 10 ग्राम इलायची पावडर।


विधि :


सबसे पहले मैथी दाने को साफ करके दो दिन पानी बदलकर भिगोएं। ताजे पानी से धोकर बारीक पीस लें। मोटे तले की फ्राइंगपेन में एक बड़ा चम्मच घी डालकर धीमी आंच में भूनें। घी की जरूरत लगने पर थोड़ा-थोड़ा डालकर चलाते हुए भूनते रहें। ब्राउन होने और खुशबू आने पर उतार लें। आटे को छानकर घी के साथ अलग से इसी तरह भून लें।


गोंद को घी में फुलाकर हल्का-सा कुचल लें। कम गरम घी में सोंठ और खसखस को डालकर निकाल लें। गुड़ को बारीक करके घी के साथ चलाएं। जब गुड़ घी में अच्छी तरह से मिल जाए तो उतार लें। इसमें तैयार की हुई सारी सामग्री, कटे मेवे, इलायची पावडर मिला दें। आधा बूरा भी मिला दें।

घी कम लगे तो इसमें आवश्यकता नुसार गरम घी मिला लें। अब थोड़ा गरम रहते ही मिश्रण को हथेलियों से रगड़ें और एक साइज के लड्डू बना लें।


सर्दी के दिनों में सुबह नाश्ते में यह लड्डू खाने से कमर दर्द, गठिया तथा जोड़ों का दर्द और वात रोग में लाभ मिलता है तथा स्फूर्ति बनी रहती है। ठंड के दिनों में इन लड्‍डुओं का सेवन करने से आप कई तरह की बीमारियों से बचे रहेंगे।