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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

1 जनवरी कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि

 कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि


*01 जनवरी 2022 शनिवार को मासिक शिवरात्रि है।*

🙏🏻  *हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते- करते ये 17 मंत्र बोलें, जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो, वो शिवजी के मंदिर में जाकर दिया जलाकर ये 17 मंत्र बोले।इससे कर्जा से मुक्ति मिलेगी*

🌷 *1).ॐ शिवाय नम:*

🌷 *2).ॐ सर्वात्मने नम:* 

🌷 *3).ॐ त्रिनेत्राय नम:*

🌷 *4).ॐ हराय नम:*

🌷 *5).ॐ इन्द्र्मुखाय नम:*

🌷 *6).ॐ श्रीकंठाय नम:*

🌷 *7).ॐ सद्योजाताय नम:*

🌷 *8).ॐ वामदेवाय नम:* 

🌷 *9).ॐ अघोरह्र्द्याय नम:* 

🌷 *10).ॐ तत्पुरुषाय नम:*

🌷 *11).ॐ ईशानाय नम:*

🌷 *12).ॐ अनंतधर्माय नम:*

🌷 *13).ॐ ज्ञानभूताय नम:*

🌷 *14). ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:*

🌷 *15).ॐ प्रधानाय नम:* 

🌷 *16).ॐ व्योमात्मने नम:* 

🌷 *17).ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:*

 🙏🏻 *आर्थिक परेशानी से बचने हेतु* 🙏🏻

👉🏻 *हर महिने में शिवरात्रि (मासिक शिवरात्रि - कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी) को आती है | तो उस दिन जिसके घर में आर्थिक कष्ट रहते हैं वो शाम के समय या संध्या के समय जप-प्रार्थना करें एवं शिवमंदिर में दीप-दान करें ।*

👉🏻 *और रात को जब 12 बज जायें तो थोड़ी देर जागकर जप और एक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें।तो आर्थिक परेशानी दूर हो जायेगी।*

🙏🏻  *प्रति वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महिने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। उस दिन शाम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना |बैठ कर भगवान शिवजी के नाम का जप करना प्रार्थना करना, | इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जल्दी उतरता है, आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है ।*


गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

1 जनवरी का सच जान लेंगे तो नववर्ष बनाना भूल जाएंगे

1 जनवरी का इतिहास जान लेंगे आप तो छोड़ देंगे नववर्ष मनाना !


🚩विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में राज करने के लिए सबसे पहले भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात किया जिससे हम अपनी महान दिव्य संस्कृति भूल जाएं और उनकी पाश्चात्य संस्कृति अपना लें जिसके कारण वे भारत में राज कर सकें।


*🚩अपनी संस्कृति का ज्ञान न होने के कारण आज हिन्दू भी 31 दिसंबर की रात्रि में एक-दूसरे को हैपी न्यू इयर कहते हुए नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं ।*


🚩नववर्ष उत्सव 4000 वर्ष पहले से बेबीलोन में मनाया जाता था। लेकिन उस समय नए वर्ष का ये त्यौहार 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि (हिन्दुओं का नववर्ष ) भी मानी जाती थी। प्राचीन रोम में भी ये तिथि नव वर्षोत्सव के लिए चुनी गई थी लेकिन रोम के तानाशाह जूलियस सीजर को भारतीय नववर्ष मनाना पसन्द नही आ रहा था इसलिए उसने ईसा पूर्व 45वें वर्ष में जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को पिछला वर्ष, यानि, ईसापूर्व 46 ईस्वी को 445 दिनों का करना पड़ा था । उसके बाद भारतीय नववर्ष के अनुसार छोड़कर ईसाई समुदाय उनके देशों में 1 जनवरी से नववर्ष मनाने लगे ।


🚩भारत देश में अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की 1757 में  स्थापना की । उसके बाद भारत को 190 साल तक गुलाम बनाकर रखा गया। इसमें वो लोग लगे हुए थे जो भारत की ऋषि-मुनियों की प्राचीन सनातन संस्कृति को मिटाने में कार्यरत थे। लॉड मैकाले ने सबसे पहले भारत का इतिहास बदलने का प्रयास किया जिसमें गुरुकुलों में हमारी वैदिक शिक्षण पद्धति को बदला गया ।


*🚩भारत का प्राचीन इतिहास बदला गया जिसमें भारतीय अपने मूल इतिहास को भूल गये और अंग्रेजों का गुलाम बनाने वाले इतिहास याद रह गया और आज कई भोले-भाले भारतवासी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष नही मनाकर 1 जनवरी को ही नववर्ष मनाने लगे ।*


🚩हद तो तब हो जाती है जब एक दूसरे को नववर्ष की बधाई भी देने लग जाते हैं। क्या किसी भी ईसाई देशों में हिन्दुओं को हिन्दू नववर्ष की बधाई दी जाती है..??? किसी भी ईसाई देश में हिन्दू नववर्ष नहीं मनाया जाता है फिर भोले भारतवासी उनका नववर्ष क्यों मनाते हैं?


*🚩इस साल आने वाला नया वर्ष 2022 अंग्रेजों अर्थात ईसाई धर्म का नया साल है।*


🚩हिन्दू धर्म का इस समय विक्रम संवत 2078 चल रहा है। जो चैत्र में शुरू होगा!


*_🚩इससे सिद्ध हो गया कि सनातन धर्म ही सबसे पुराना धर्म है ।_*


*🚩इस विक्रम संवत से 5000 साल पहले इस धरती पर भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए । उनसे पहले भगवान राम, और अन्य अवतार हुए यानि जबसे पृथ्वी का प्रारम्भ हुआ तबसे सनातन (हिन्दू) धर्म है।*


🚩कहाँ करोड़ों वर्ष पुराना हमारा सनातन धर्म और कहाँ भारतीय अपनी गरिमा से गिर 2000 साल पुराना नववर्ष मना रहे हैं!


*🚩जरा सोचिए....!!!*


*🚩सीधे-सीधे शब्दों में सनातन धर्म ही सब धर्मों की जननी है। यहाँ किसी धर्म का विरोध नहीं है परन्तु सभी भारतवासियों को बताना चाहते हैं कि इंग्लिश कैलेंडर के बदलने से हिन्दू वर्ष नहीं बदलता!*


🚩जब बच्चा पैदा होता है तो पंडित जी द्वारा उसका नामकरण कैलेंडर से नहीं हिन्दू पंचांग से किया जाता है । ग्रहदोष भी हिन्दू पंचाग से देखे जाते हैं और विवाह,जन्मकुंडली आदि का मिलान भी हिन्दू पंचाग से ही होता है । सभी व्रत, त्यौहार हिन्दू पंचाग से आते हैं। मरने के बाद तेरहवाँ भी हिन्दू पंचाग से ही देखा जाता है। मकान का उद्घाटन, जन्मपत्री, स्वास्थ्य रोग और अन्य सभी समस्याओं का निराकरण भी हिन्दू कैलेंडर {पंचाग} से ही होता है।


*🚩आप जानते हैं कि रामनवमी, जन्माष्टमी, होली, दीपावली, राखी, भाई दूज, करवा चौथ, एकादशी, शिवरात्री, नवरात्रि, दुर्गापूजा सभी विक्रमी संवत कैलेंडर से ही निर्धारित होते हैं  | इंग्लिश कैलेंडर में इनका कोई स्थान नहीं होता।*


🚩सोचिये! आपके इस सनातन धर्म के जीवन में इंग्लिश नववर्ष या कैलेंडर का स्थान है कहाँ ?


*_🚩1 जनवरी को क्या नया हो रहा है..????_*


🚩न ऋतु बदली... न मौसम...न कक्षा बदली...न सत्र....न फसल बदली...न खेती.....न पेड़ पौधों की रंगत...न सूर्य चाँद सितारों की दिशा.... ना ही नक्षत्र...


*🚩हाँ, नए साल के नाम पर करोड़ो /अरबों जीवों की हत्या व करोड़ों /अरबों गैलन शराब का पान व रात पर फूहणता अवश्य होगी।*


🚩भारतीय संस्कृति का नव संवत्  ही नया साल है.... जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चाँद की  दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तियां, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते हैं जो विज्ञान आधारित है और चैत्र नवरात्रि का पहला दिन होने के कारण घर, मन्दिर, गली, दुकान सभी जगह पूजा-पाठ व भक्ति का पवित्र वातावरण होता है ।


*🚩अतः हिन्दुस्तानी अपनी मानसिकता को बदले, विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने और चैत्री शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन ही नूतन वर्ष मनाये।*

🌷🙏🏻

गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

तुलसी को पानी अर्पण से पुण्य,25दिसम्बर


🌷 *तुलसी को पानी अर्पण से पुण्य* 🌷

🌿 *अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए उसकी हवा से भी बहुत लाभ होते हैं और तुलसी को एक ग्लास पानी अर्पण करने से सवा मासा सुवर्ण दान का फल मिलता है।*

🌷 *तुलसी पूजन विधि व तुलसी – नामाष्टक* 🌷

🌿 *तुलसी पूजन विधि* 🌿

🙏🏻 *25 दिसम्बर को सुबह स्नानादि के बाद घर के स्वच्छ स्थान पर तुलसी के गमले को जमीन से कुछ ऊँचे स्थान पर रखें | उसमें यह मंत्र बोलते हुए जल चढायें :*


 *महाप्रसाद जननी सर्वसौभाग्यवर्धिनी*

*आधि व्याधि हरा नित्यम् तुलसी त्वाम् नमोस्तुते*


🌿 *फिर ‘तुलस्यै नम:’ मंत्र बोलते हुए तिलक करें, अक्षत (चावल) व पुष्प अर्पित करें तथा वस्त्र व कुछ प्रसाद चढायें | दीपक जलाकर आरती करें और तुलसीजी की ७, ११, २१,५१ व १०८ परिक्रमा करें | उस शुद्ध वातावरण में शांत हो के भगवत्प्रार्थना एवं भगवन्नाम या गुरुमंत्र का जप करें | तुलसी के पास बैठकर प्राणायाम करने से बल, बुद्धि और ओज की वृद्धि होती है |*

🌿 *तुलसी – पत्ते डालकर प्रसाद वितरित करें | तुलसी के समीप रात्रि १२ बजे तक जागरण कर भजन, कीर्तन, सत्संग-श्रवण व जप करके भगवद-विश्रांति पायें | तुलसी – नामाष्टक का पाठ भी पुण्यदायक है | तुलसी – पूजन अपने नजदीकी आश्रम या तुलसी वन में अथवा यथा–अनुकूल किसी भी पवित्र स्थान में कर सकते हैं |* 

🌷 *तुलसी – नामाष्टक* 🌷

*वृन्दां वृन्दावनीं विश्वपावनी विश्वपूजिताम् |*

*पुष्पसारां नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनीम् ||*

*एतन्नामाष्टकं चैतत्स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् |*

*य: पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ||*


🌿 *भगवान नारायण देवर्षि नारदजी से कहते हैं : “वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नंदिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी – ये तुलसी देवी के आठ नाम हैं | यह सार्थक नामावली स्तोत्र के रूप में परिणत है |*

🌿 *जो पुरुष तुलसी की पूजा करके इस नामाष्टक का पाठ करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।*


गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

संस्कृत, संस्कृत की उत्पत्ति महत्व

 संस्कृत, संस्कृत की उत्पत्ति महत्व

          

संस्कृत में 1700धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है।

संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे #प्राचीनभाषा है और सबसे वैज्ञानिकभाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। #भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।


ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।


*तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?*

शब्दों का आधार #ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है #शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था।

प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर संस्कृत के *36*#स्वर बने और इन *36* रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72प्रकार की #ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की #वर्णमाला आधारित है। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। अतः प्राचीनतम #आर्यभाषा जो #ब्रह्मांडीय_संगीत थी उसका नाम “संस्कृत” पड़ा। संस्कृत – संस् + कृत् अर्थात


*श्वासोंसेनिर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर संपर्क से अभिव्यक्त हुई*।



             *जयतु संस्कृतं*।।

            

रविवार, 5 दिसंबर 2021

कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि : प्रदोष व्रत



🌷 *कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि* 🌷

👉🏻 *02 दिसम्बर 2021 गुरुवार को मासिक शिवरात्रि है।*

🙏🏻  *हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते- करते ये 17 मंत्र बोलें, जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो, वो शिवजी के मंदिर में जाकर दिया जलाकर ये 17 मंत्र बोले।इससे कर्जा से मुक्ति मिलेगी*

🌷 *1).ॐ शिवाय नम:*

🌷 *2).ॐ सर्वात्मने नम:* 

🌷 *3).ॐ त्रिनेत्राय नम:*

🌷 *4).ॐ हराय नम:*

🌷 *5).ॐ इन्द्र्मुखाय नम:*

🌷 *6).ॐ श्रीकंठाय नम:*

🌷 *7).ॐ सद्योजाताय नम:*

🌷 *8).ॐ वामदेवाय नम:* 

🌷 *9).ॐ अघोरह्र्द्याय नम:* 

🌷 *10).ॐ तत्पुरुषाय नम:*

🌷 *11).ॐ ईशानाय नम:*

🌷 *12).ॐ अनंतधर्माय नम:*

🌷 *13).ॐ ज्ञानभूताय नम:*

🌷 *14). ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:*

🌷 *15).ॐ प्रधानाय नम:* 

🌷 *16).ॐ व्योमात्मने नम:* 

🌷 *17).ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:*

 🙏🏻 *आर्थिक परेशानी से बचने हेतु* 🙏🏻

👉🏻 *हर महीने में शिवरात्रि (मासिक शिवरात्रि - कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी) को आती है | तो उस दिन जिसके घर में आर्थिक कष्ट रहते हैं वो शाम के समय या संध्या के समय जप-प्रार्थना करें एवं शिवमंदिर में दीप-दान करें ।*

👉🏻 *और रात को जब 12 बज जायें तो थोड़ी देर जाग कर जप और एक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें।तो आर्थिक परेशानी दूर हो जायेगी।*

🙏🏻  *प्रति वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। उस दिन शाम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना |बैठ कर भगवान शिवजी के नाम का जप करना प्रार्थना करना, | इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जल्दी उतरता है, आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है।*

🌷 *प्रदोष व्रत* 🌷

🙏🏻 *हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महिने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत किया जाता है। ये व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इस बार  02 दिसम्बर, गुरुवार को प्रदोष व्रत है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। प्रदोष पर व्रत व पूजा कैसे करें और इस दिन क्या उपाय करने से आपका भाग्योदय हो सकता है, जानिए…*

 👉🏻 *ऐसे करें व्रत व पूजा*

🙏🏻 *- प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं।*

🙏🏻 *- इसके बाद बेल पत्र, गंध, चावल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान को चढ़ाएं।*

🙏🏻 *- पूरे दिन निराहार (संभव न हो तो एक समय फलाहार) कर सकते हैं) रहें और शाम को दुबारा इसी तरह से शिव परिवार की पूजा करें।*

🙏🏻 *- भगवान शिवजी को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं।*

🙏🏻 *- भगवान शिवजी  की आरती करें। भगवान को प्रसाद चढ़ाएं और उसीसे अपना व्रत भी तोड़ें।उस दिन  ब्रह्मचर्य का पालन करें।*

 👉🏻 *ये उपाय करें*

*सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्ध्य देें। पानी में आकड़े के फूल जरूर मिलाएं। आंकड़े के फूल भगवान शिवजी  को विशेष प्रिय हैं । ये उपाय करने से सूर्यदेव सहित भगवान शिवजी  की कृपा भी बनी रहती है और भाग्योदय भी हो सकता है।*


बुधवार, 1 दिसंबर 2021

ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित और अमर माने जाते हैं



*ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित  और अमर माने जाते हैं*


1. महावीर हनुमान – अंजनी पुत्र हनुमान जी को अजर और अमर रहने के वरदान मिला है तथा इन की मौजूदगी रामायण और महाभारत दोनों जगह पर पाई गई है.रामायण में हनुमान जी ने प्रभु राम की सीता माता को रावण के कैद से छुड़वाने में मदद की थी और महाभारत में उन्होंने भीम के घमंड को तोडा था. सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की वे सदेव अजर-अमर रहेंगे. अजर-अमर का अर्थ है की उनकी कभी मृत्यु नही होगी और नही वे कभी बूढ़े होंगे. माना जाता है की हनुमान जी इस धरती पर आज भी विचरण करते है.


2. अश्वत्थामा – अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र है तथा उनके मष्तक में अमरमणि विध्यमान है. अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या करी थी जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापो के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था. हरियाणा के करुक्षेत्र और अन्य तीर्थ में उनके दिखाई दिए जाने के दावे किये जाते है तथा मध्यप्रदेश के बुराहनपुर में उनके दिखाई दिए जाने की घटना प्रचलित है.


3. ऋषि मार्कण्डेय – ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त है. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को सिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए.


4. भगवान परशुराम -परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था. परशुराम का पहले नाम राम था परन्तु इस शिव के परम भक्त थे. उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा.


5. कृपाचार्य -कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र हैं। वन में शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया. कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा हैं, उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया.


6. विभीषण – विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया. राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था.


7. वेद व्यास – ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना की है. उनके द्वारा समस्त वेदो एवं पुराणो की रचना हुई. वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र है. ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में सम्लित है.


8. राजा बलि – राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है. उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया. राजा बलि प्रह्लाद के वंशज है

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा


*_उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा_*

*_मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी_*


सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी। वही मैं तुमसे कहता हूँ।


एक समय यु‍धिष्ठिर ने भगवान से पूछा था ‍कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है। उपवास के दिन जो क्रिया की जाती है आप कृपा करके मुझसे कहिए। यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ। सुनो।


सर्वप्रथम हेमंत ऋ‍तु में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है। दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश मुँह में रह न जाए। रात्रि को भोजन कदापि न करें, न अधिक बोलें। एकादशी के दिन प्रात: 4 बजे उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। व्रत करने वाला चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात न करे।




स्नान के पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें। रात्रि में सोना या प्रसंग नहीं करना चाहिए। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए। जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा माँगनी चाहिए। धर्मात्मा पुरुषों को कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए।



जो मनुष्य ऊपर लिखी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है। व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल होता है। संक्रांति से चार लाख गुना तथा सूर्य-चंद्र ग्रहण में स्नान-दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एकादशी के दिन व्रत करने से मिलता है।


अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना तथा एक लाख तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों अथवा सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना पुण्य भूमिदान करने से होता है। उससे हजार गुना पुण्य कन्यादान से प्राप्त होता है। इससे भी दस गुना पुण्य विद्यादान करने से होता है। विद्यादान से दस गुना पुण्य भूखे को भोजन कराने से होता है। अन्नदान के समान इस संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जिससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हों परंतु एकादशी के व्रत का पुण्य सबसे अधिक होता है।


हजार यज्ञों से भी ‍अधिक इसका फल होता है। इस व्रत का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ है। रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है और दिन में एक बार भोजन करने वाले को भी आधा ही फल प्राप्त होता है। जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।


युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए।


भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। वह बड़ा बलवान और भयानक था। उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं। तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ।


वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे। वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे‍कि हे देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है। आप हमारी रक्षा करें। दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं।


आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता और संहार करने वाले हैं। सबको शांति प्रदान करने वाले हैं। आकाश और पाताल भी आप ही हैं। सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं। आप सर्वव्यापक हैं। आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है।


हे भगवन्! दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम सब देवता इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें।


इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताअओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? यह सब मुझसे कहो।


भगवान के ऐसे वचन सुनकर इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस थ उसके महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ। उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है।


सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है। स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है। हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए।


यह वचन सुनकर भगवान ने कहा- हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूंगा। तुम चंद्रावती नगरी जाओ। इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था। उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे। जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े।

 

भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से बींध डाला। बहुत-से दैत्य मारे गए। केवल मुर बचा रहा। वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा। भगवान जो-जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता। उसका शरीर छिन्न‍-भिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा। दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ।

 

10 हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा। थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए। वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए। यह गुफा 12 योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था। विष्णु भगवान वहां योगनिद्रा की गोद में सो गए।

 

मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया। 

 

श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे, तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं।


सोमवार, 29 नवंबर 2021

कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय

.......... ✦•••  *_जय श्री हरि_*  •••✦ ........

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📜 *_कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय_*


*_वैसे तो ज्योतिष विद्या में कई तरह के योग और कुंडली के दोष की चर्चा की गई है, परंतु कुछ दोष ऐसे हैं जिस पर अधिक चर्चा होती है और जिसके निवारण पर जोर दिया जाता है। क्योंकि मान्यता के अनुसार इन दोषों के कारण जिंदगी लगभग बर्बाद हो जाती है। आओ जानते हैं इन दोषों में से 6 खास दोषों के बारे में और उनके निवारण के बारे में।_*

 

🔸 *_1. कालसर्प दोष_*

🔸 *_2. मंगल दोष_*

🔸 *_3. पितृ दोष_*

🔸 *_4. गुरु चांडाल दोष_*

🔸 *_5. विष दोष_*

🔸 *_6. केन्द्राधिपति दोष_*

 

🐍 *_1. कालसर्प दोष : जन्म के समय ग्रहों की दशा में जब राहु-केतु आमने-सामने होते हैं और सारे ग्रह एक तरफ रहते हैं, तो उस काल को सर्पयोग कहा जाता है। इस आधार पर कालसर्प के 12 प्रकार भी बताए गए हैं। कुछ ने तो 250 के लगभग प्रकार बताए हैं।_*

 

☠️ *_निवारण :_*

🔹 *_1. खाना रसोईघर में बैठकर खाएं।_*

🔹 *_2. दीवारों को साफ रखें।_*

🔹 *_3. टॉयलेट व बाथरूम की सफाई रखें।_*

🔹 *_4. ससुराल से संबंध अच्छे रखें।_*

🔹 *_5. पागलों को खाने को दें।_*

🔹 *_6. धर्मस्थान की सीढ़ियों पर 10 दिन तक पोंछा लगाएं।_*

🔹 *_7. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं।_*

🔹 *_8. घर में ठोस चांदी का हाथी रख सकते हैं।_*

🔹 *_9. सरस्वती की आराधना करें।_*

🔹 *_10. लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर मंगल या गुरु का उपाय करें।_*

 

🎯 *_2. मंगल दोष : किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में से किसी भी एक भाव में है तो यह 'मांगलिक दोष' कहलाता है।_*

 

▪️ *_1.प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए।_*

▪️ *_2.सफेद सुरमा 43 दिन तक लगाना चाहिए।_*

▪️ *_3.नीम के पेड़ की पूजा करना चाहिए।_*

▪️ *_4.गुड़ खाना और खिलाना चाहिए।_*

▪️ *_5.क्रोध पर काबू और चरित्र को उत्तम रखना चाहिए।_*

▪️ *_6.मांस और मदिरा से दूर रहें।_*

▪️ *_7.भाई-बहन और पत्नी से संबंध अच्छे रखें।_*

▪️ *_8.पेट और खून को साफ रखें।_*

▪️ *_9.मंगलनाथ उज्जैन में भात पूजा कराएं।_*

▪️ *_10.विवाह नहीं हुआ है तो पहले कुंभ विवाह करें।_*


💁🏻‍♂️ *_3. पितृ दोष : कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है। कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। गुरु का शापित होना पितृदोष का कारण है। सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष माना जाता है। लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है। पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं। जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।_*

 

✍🏼 *_निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। पूर्वजों के धर्म में विश्वास रखना, कुलदेवी और कुलदेव की पूजा करना और श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना। त्र्यंबकेश्वर में जाकर पितृदोष की शंति कराएं।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_4. गुरु चांडाल दोष : कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति के साथ राहु बैठा है तो इसे गुरु चांडाल योग कहते हैं।_*

 

🧞‍♀️ *_चांडाल योग का निवारण :_*

👉🏼 *_1. माथे पर नित्य केसर, हल्दी या चंदन का तिलक लगाएं।_*

 

👉🏼 *_2. सुबह तालाब जाकर मछलियों को काला साबुत मूंग या उड़द खिलाएं।_*

 

👉🏼 *_3. प्रति गुरुवार को पूर्ण व्रत रखें। रात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।_*

 

👉🏼 *_4. उत्तम चरित्र रखकर पीली वस्तुओं का दान करें और पीले वस्त्र ही पहनें।_*

 

👉🏼 *_5. गुरुवार को पड़ने वाले राहु के नक्षत्र में रात्रि में बृहस्पति और राहु के मंत्र का जाप करना चाहिए या शांति करवाएं। राहु के नक्षत्र हैं आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा।_*

 

👉🏼 *_5. विष दोष : चंद्र और शनि किसी भी भाव में इकट्ठा बैठे हो तो विष योग बनता है।_*

 

☝🏼 *_दोष निवारण :_*

🤷🏻‍♀️ *_1. पंचमी को उपवास रखें। खासकर नागपंचमी को कड़ा उपवास रखें।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_2. नागदेव की विधिवत पूजा करें। 'ऊं कुरु कुल्ले फट् स्वाहा' का जाप करते हुए घर में सभी जगह जल छिड़कें।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_3. श्रीसर्प सूक्त का पाठ करें। श्रीमद भागवत पुराण और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाएं।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_4. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। घर में चारों दिशाओं में कर्पूर जलाएं। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है।_*

 

🌪️ *_6. केन्द्राधिपति दोष : केंद्र भाव पहला, चौथा, सातवां, और दसवां भाव होता है। मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यदि बृहस्पति पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो, धनु और मीन लग्न की कुंडली में बुध पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो तो केन्द्राधिपति दोष का निर्माण होता है। दरअसल, बृहस्पति, बुध, शुक्र, और चंद्रमा के कारण यह दोष बनता है।_*

 

👉🏼 *_1. नित्य भगवान शिव की पूजा करें।_*

👉🏼 *_2. नित्य 21 बार ॐ नमो नारायण का जाप करें।_*

👉🏼 *_3. नित्य 11 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।_*


     

रविवार, 28 नवंबर 2021

जगत की रीत

 जगत की रीत 


एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी,  वहीं थोड़ी दूरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था, जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो, किसी ने कहा कि, क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें, अतः सभी संत के पास पहुंचे !


जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो, पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है, मन भी नहीं होता, पानी पीने को।


संत ने पुछा- हुआ क्या ? 

पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?


लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, उसी मर गये , अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?


संत ने कहा - 'एक काम करो , उसमें गंगाजल डलवाओ, तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया !फिर भी समस्या जस की तस।

लोग फिर से संत के पास पहुंचे, अब संत ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।


लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस।

लोग फिर संत के पास पहुंचे। अब संत ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।

सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात।

लोग फिर संत के पास, अब संत खुद चलकर आये ।

लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं।


अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला।

तो संत ने पुछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?


लोग बोले - उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया, वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।


संत बोले - जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।


बात यह है कि, हमारे आपके जीवन की यह कहानी है, इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं, इन्हीं की सारी बदबू है।


हम उपाय पूछते हैं तो, लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा वह करलों, थोड़ी पूजा करो, थोड़ा पाठ करलों !

सब कुछ करते हैं, परन्तु बदबू नहीं जाती, बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है , तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें, तभी बदबू  जाएगी और जीवन उपयोगी होगा, समझेंl


शनिवार, 27 नवंबर 2021

भोजन के लिए उपयोगी कौन -सा वर्तन

 *आइये जानते है कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है*


*सोना*


सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।



चाँदी

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।


*कांसा*


काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल 3 प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


*तांबा*


तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।


*पीतल*


पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल 7 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


*लोहा*


लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।


*स्टील*


स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।


*एलुमिनियम*


एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।


*मिट्टी*


मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे 100 प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।


*पानी पीने के पात्र के विषय में 'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा है*


जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।

पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।

काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।

(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)


अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।


शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

चाय पीने के फायदा और नुकसान


*_आप चाय पीते हैं तो जरूर पढ़ें, फायदा करता है कि नुकसान?_*



_🚩दो सौ वर्ष पहले भारतीय घरों में चाय नहीं होती थी। पहले घर पर अतिथि आते थे तो देशी गाय का दूध-लस्सी आदि दिया जाता था लेकिन आज कोई भी घर आये अतिथि को पहले चाय पूछते हैं। ये बदलाव अंग्रेजों की देन है। कई लोग घर, दुकान, ऑफिस या यात्रा के दौरान दिन में कई बार चाय लेते रहते हैं, यहाँ तक कि उपवास में भी चाय लेते हैं! किसी भी डॉक्टर के पास जायेंगे तो वो शराब-सिगरेट-तम्बाखू छोड़ने को कहेगा, पर चाय नहीं, क्योंकि यह उसे पढ़ाया नहीं गया और वह भी खुद चाय का गुलाम है। परन्तु किसी अच्छे वैद्य के पास जायेंगे तो वह पहली सलाह देगा- चाय ना पियें।_


*🚩चाय और कॉफी में दस प्रकार के जहर होते हैं*


*★'टैनिन':*  यह विष 18 प्रतिशत होता है। यह पेट में छिद्र और वायु उत्पन्न करता है।


*★‘थिन’:* यह विष 3 प्रतिशत होता है। इसके कारण मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं तथा यह विष फेफड़ों और मस्तिष्क में जड़ता को निर्मित करता है।


*★‘कैफिन’:* यह विष 2.75 प्रतिशत होता है। यह गुर्दों (किडनियों) को दुर्बल बनाता है।


*★‘वॉलाटाइल’:* यह विष आंतों को हानि पहुंचाता है।


*★‘कार्बोनिक अम्ल’:* अम्लपित्त (एसिडिटी) बढ़ाता है।


*★‘पैमिन’:* पाचनशक्ति को दुर्बल करता है।


*★‘एरोमोलीक’:* आँतों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।


*★‘सायनोजन’:* अनिद्रा और पक्षाघात जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करता है।


*★‘ऑक्सेलिक अम्ल’:* शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक होता है।


*★‘स्टिनॉयल’:* रक्तविकार और नपुंसकता उत्पन्न करता है।


इसीलिए चाय अथवा कॉफी का सेवन कभी नहीं करना चाहिए।


*🚩चाय कितना नुकसान पहुंचाता है?*


🚩हमारे गर्म देश में चाय, और गर्मी बढ़ाती है, पित्त बढ़ाती है। चाय के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं। इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है। चाय का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।


🚩●चाय से भूख मर जाती है, दिमाग सूखने लगता है, गुदा और वीर्याशय ढीले पड़ जाते हैं। डायबिटीज़ जैसे रोग होते हैं। दिमाग सूखने से उड़ जाने वाली नींद के कारण आभासित कृत्रिम स्फूर्ति को स्फूर्ति मान लेना, यह बड़ी गलती है। चाय-कॉफी के विनाशकारी व्यसन में फँसे हुए लोग स्फूर्ति का बहाना बनाकर हारे हुए जुआरी की तरह व्यसन में अधिकाधिक गहरे डूबते जाते हैं। वे लोग शरीर, मन, दिमाग और पसीने की कमाई को व्यर्थ गँवा देते हैं और भयंकर व्याधियों के शिकार बन जाते हैं।


🚩●चाय का सेवन रक्त आदि की वास्तविक ऊष्मा को नष्ट करने में भारी भूमिका निभाता है।


🚩●चाय में उपलब्ध कैफीन हृदय पर बुरा प्रभाव डालती है, अत: चाय का अधिक सेवन प्राय: हृदय के रोग को उत्पन्न करने में सहायक होता है।


🚩●जो लोग चाय बहुत पीते हैं उनकी आंतें जवाब दे जाती हैं, कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है। चाय पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है।


🚩●चाय पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है, न्यूरोलॉजिकल गड़बड़ियां आ जाती हैं। चाय में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप चाय का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अधिक चाय पीने से खुश्की आ जाती है और दांत भी खराब होते हैं।


*🚩यह सावधानी अवश्य रखें*


🚩रेलवे स्टेशनों या टी-स्टॉलों पर बिकने वाली चाय का सेवन यदि न करें तो बेहतर होगा क्योंकि ये बरतन को साफ किये बिना कई बार इसी में चाय बनाते रहते हैं जिस कारण कई बार चाय विषैली हो जाती है। चाय को कभी भी दोबारा गर्म करके न पिएं तो बेहतर होगा। बाज़ार की चाय अक्सर अल्युमीनियम के भगोने में खदका (उबाल) कर बनाई जाती है जो बहुत नुकसान करता है। कुछ जगह पर तो दूध भी कलर से बनाकर उसकी चाय बनाई जाती है जो शरीर को अत्यंत नुकसान पहुँचाती है।


🚩कई बार हम लोग बची हुई चाय को थरमस में डालकर रख देते हैं लेकिन भूलकर भी ज्यादा देर तक थरमस में रखी चाय का सेवन न करें। जितना हो सके चायपत्ती को कम उबालें तथा एक बार चाय बन जाने पर इस्तेमाल की गई चायपत्ती को फेंक दें।


🚩चाय-कॉफी को हमेशा के लिए त्याग दें क्योंकि चाय के हर कप के साथ एक चम्मच या उससे अधिक शक्कर ली जाती है जो वजन बढ़ाती है और अनेक बीमारियां बुलाती है। अगर पीनी ही पड़ी तो गुड़, नींबू मिलाकर काली चाय पीएं, शक्कर और दूध नहीं मिलाएं। चाय के साथ नमकीन, खारे बिस्कुट, पकौड़ी आदि लेते हैं, यह विरुद्ध आहार है; इससे त्वचा रोग होते हैं।


*🚩चाय का विकल्प*


🚩संकल्प कर लें कि चाय नहीं पियेंगे।  दो दिन से एक हफ्ते तक याद आएगी ; फिर सोचेंगे अच्छा हुआ छोड़ दी। एक दो दिन सिर दर्द हो सकता है।


🚩सुबह ताजगी के लिए गर्म पानी लें, चाहे तो उसमें आंवले के टुकड़े मिला दें तो और स्फूर्ति आ जाएगी।


🚩तुलसी पत्ते, गुड़ और नींबू मिलाकर चाय बनाकर पियें तो चाय की लत भी छूट जाएगी और शरीर निरोग होने लगेगा।


🚩चाय की जगह देशी गाय के दूध का उपयोग करना चाहिए इससे स्वास्थ्य में चार चांद लग जायेंगे और सभी बीमारियां भाग जाएंगी।


शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

महारानी लक्ष्मीबाई



*शत कोटि नमन महारानी लक्ष्मीबाई 19 नवम्बर, 1835/ जयंती*

            महारानी लक्ष्मीबाई

      *खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थीं.*


                   भारतीय वसुंधरा  को  गौरवान्वित  करने वाली झांसी की  रानी  वीरांगना  लक्ष्मीबाई  वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं।सच्चा वीर कभी आपत्तियों से  नहीं  घबराता  है। प्रलोभन  उसे  कर्तव्य  पालन  से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार  और  उच्च होता  है। उसका  चरित्र  अनुकरणीय  होता  है।  अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति  के  लिए  वह  सदैव  धर्मनिष्ठ, आत्म विश्वासी, कर्तव्य परायण और स्वाभिमानी  होता है। ऐसी ही थीं वीरांगना लक्ष्मीबाई।

                  महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में19 नवंबर सन्1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इन की माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मी बाई अपने बाल्यकाल में मनुबाई के नाम से जानी जाती थीं।

                   इधर सन्‌1838 में गंगाधरराव को झांसी का राजा घोषित किया गया। वे विधुर थे।सन्‌1850 में मनुबाई से उनका विवाह हुआ। सन्‌ 1851 में  उन  को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। झांसी के कोने-कोने में  आनंद की लहर प्रवाहित  हुई, लेकिन  चार  माह  पश्चात  उस बालक का निधन हो गया।

                   सारी झांसी शोक सागर में निमग्न हो गई। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा  कि वे फिर स्वस्थ न हो सके  और  21 नवम्बर 1,853  को चल बसे।

                  यद्यपि महाराजा का  निधन  महारानी  के लिए असहनीय था, लेकिन  फिर  भी  वे  घबराई  नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर  राव  ने  अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज़ी सरकार को सूचना दे दी थी। परन्तु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

                    27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत  दत्तक  पुत्र  दामोदर राव  की  गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेज़ी  राज्य  में मिलाने  की  घोषणा   कर   दी।  पोलेटिकल  एजेंट  की सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित  हो गया, *'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'।*  7 मार्च 1854 को झांसी पर अंग्रेज़ों का अधिकार हुआ। झांसी की रानी ने पेंशन अस्वीकृत कर दी व नगर के राज महल में निवास करने लगीं।

                   यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ।  अंग्रेज़ों की राज्य लिप्सा की नीति  से  उत्तरी  भारत  के  नवाब  और  राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में  विद्रोह  की  आग  भभक उठी।रानी लक्ष्मीबाई ने इसको स्वर्ण अवसर माना और क्रांति की ज्वालाओं को अधिक सुलगाया तथा अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। 

                   भारत की जनता  में  विद्रोह  की  ज्वाला भभक गई।समस्त देश में सुसंगठित और सुदृढ रूप से क्रांति को कार्यान्वित करने की तिथि 31मई सन्1857 निश्चित की गई, लेकिन इससे पूर्व ही क्रांति की  ज्वाला प्रज्ज्वलित हो गई और 7 मई 1857 को मेरठ में  तथा 4 जून सन् 1857 को कानपुर  में, भीषण  विप्लव  हो गए। कानपुर तो 28 जून सन्1857 को पूर्ण स्वतंत्र हो गया।अंग्रेज़ों के कमांडर सर ह्यूरोज ने अपनी सेना को सुसंगठित कर विद्रोह दबाने का प्रयत्न किया।

                   उन्होंने सागर,गढ़कोटा,शाहगढ़, मदनपुर, मडखेड़ा, वानपुर और  तालबेहट  पर  अधिकार  किया और नृशंसतापूर्ण अत्याचार किए। फिर झांसी की ओर अपना कदम बढ़ाया और अपना मोर्चा कैमासन पहाड़ी के मैदान में पूर्व और दक्षिण के मध्य लगा लिया।

                   लक्ष्मीबाई पहले से  ही  सतर्क  थीं  और वानपुर के राजा मर्दनसिंह से भी इस  युद्ध  की  सूचना तथा उन के आगमन की सूचना प्राप्त हो चुकी थी। 23 मार्च सन् 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ। कुशल तोपची गुलाम गौस खां ने झांसी की रानी के आदेशानुसार तोपों के लक्ष्य साधकर ऐसे गोले फेंके कि पहली बार में ही अंग्रेज़ी सेना के छक्के छूट गए।

                   रानी   लक्ष्मी   बाई   ने   सात  दिन  तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेज़ों का बड़ी  बहादुरी  से  मुकाबला किया। रानी ने खुलेरूप से शत्रु का सामना किया  और युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया।

                    वे   अकेले   ही  अपनी  पीठ   के  पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार  हो, अंग्रेज़ों से युद्ध करती रहीं। बहुत  दिन  तक  युद्ध  का  क्रम  इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं।

                   उन्होंने   नानासाहब  और   उनके  योग्य सेनापति  तात्या  टोपे  से  सम्पर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श  किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा  अंग्रेज़  मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी  का  घोड़ा  बुरी तरह घायल हो गया और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुआ,लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया।

                   कालपी में महारानी और  तात्या  टोपे  ने योजना बनाई  और  अंत  में  नाना  साहब, शाहगढ़  के राजा,वानपुर के राजा मर्दनसिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया  और वहां के किले पर अधिकार कर लिया।विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा  लेकिन  रानी  इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय का नहीं था, अपनी शक्ति को सुसंगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था।

                    इधर सेनापति सर ह्यूरोज  अपनी  सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता रहा और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने  ग्वालियर का किला  घमासान  युद्ध  करके  अपने  कब्जे  में  ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 

                  18 जून 1858 को ग्वालियर का अन्तिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी  सेना  का  कुशल  नेतृत्व किया। वे घायल हो  गईं  और  अंततः  उन्होंने  वीरगति प्राप्त की।

बुधवार, 17 नवंबर 2021

भोजन करने के नियम: शास्त्रो व् धर्म के अनुसार


*🚩भोजन करने के नियम*

*शास्त्रो व् धर्म के अनुसार*:🚩


*01. खाने से पूर्व अन्नपूर्णा माता की स्तुति करके उनका धन्यवाद देते हुए, तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इर्श्वर से ऐसी प्रार्थना करके भोजन करना चाहिए ।*

*02. गृहस्थ के लिए प्रातः और सायं (दो समय) ही भोजन का विधान है ।*

*03. दोनो हाथ, दोनो पैर और मुख, इन पाँच अंगो को धोकर भोजन करने वाला दीर्घजीवी होता है।*

*04. भींगे पैर खाने से आयु की वृद्धि होती है।*

*05. सुखे पैर, जुते पहने हुए, खड़े होकर, सोते हुए, चलते फिरते, बिछावन पर बैठकर, गोद मे रखकर, हाथ मे लेकर, फुटे हुए बर्तन मे, बाये हाथ से, मंदिर मे, संध्या के समय, मध्य रात्रि या अंधेरे मे भोजन नही करना चाहिए।*

*06. रात्री मे भरपेट भोजन नही करना चाहिए ।*

*07. रात्री के समय दही, सत्तु एव तिल का सेवन नही करना चाहिए ।*

*08. हँसते हुए, रोते हुए, बोलते हुए, बिना ईच्छा के, सुर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन नही करना चाहिए।*

*09. पूर्व की ओर मुख करके खाना खाने से आयु बढ़ती है।*

*10. उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से आयु तथा धन की प्राप्ति होती है।*

*11. दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से प्रेतत्व की प्राप्ति होती है।*

*12. पश्चिम की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति रोगी होता है।*

*13. भोजन सदा एकान्त मे ही करना चाहिए।*

*14. यदि पत्नि भोजन कर रही हो, तो उसे नही देखना चाहिए।*

*15. बालक और वृद्ध को भोजन करने के बाद स्वंय भोजन ग्रहण करे।*

*16. बिना स्नान, पुजन, हवन किए बिना भोजन न करें।*

*17. बिना स्नान ईख, जल, दुध, फल एवं औषध का सेवन कर सकते है।*

*18. किसी के साथ एक बर्तन मे भोजन न करे। ( पत्नि के साथ कदापि नही) अपना जुठा किसी को ना दे, ना स्वंय किसी का जुठा खाये।*

*19. काँसे के बर्तन मे भोजन करने से (रविवार छोड़कर) आयु, बुद्धि, यश और बल की वृद्धि होती है।*

*20. परोसे हुए अन्न की निन्दा न करे, वह जैसा भी हो, प्रेम से भोजन कर लेना चाहिए। सत्कारपुर्वक खाये गये अन्न से बल और तेज की वृद्धि होती है।*

*21. ईष्या, भय, क्रोध, लोभ, राग और द्वेष के समय किया गया भोजन शरीर मे विकार उत्पन्न कर रोग को आमंत्रित करता है।*

*22. भोजन मे पहले मीठा, बीच मे नमकीन एवं खट्टी तथा अंत मे कड़वे पदार्थ ग्रहण करे।*

*23. कोई भी मिष्ठान्न पदार्थ जैसे हलवा, खीर, मालपूआ इत्यादि देवताओ एवं पितरों को अर्पण करके ही खाना चाहिए।*

*24. जल, शहद, दुध, दही, घी, खीर और सत्तु को छोड़कर कोई भी पदार्थ सम्पुर्ण रूप से नही खाना चाहिए। (अर्थात बिल्कुल थोड़ा सा थाली मे छोड़ देना चाहिए )*

*25. जिससे प्रेम न हो उसके यहाँ भोजन कदापि न करे।*

*26. मल मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वट वृक्ष के नीचे, भोजन नहीं करना चाहिए ।*

*27. आधा खाया हुआ फल, मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ।*

*28. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए ।*

*29. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा नही खाना चाहिए ।*

*30. थोडा खाने वाले को आरोग्य, आयु, बल, सुख, सुन्दर संतान, और सौंदर्य प्राप्त होता है ।*

*31. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए।*

*32. कुत्ते का छुआ, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुह से फूक मरकर ठंडा किया, बाल गिरा हुआ भोजन, अनादर युक्त, अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ।*

*33. कंजूस का, राजा का, चरित्रहीन के हाथ का, शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए।*

*34. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय, कुत्ता, और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये |*


शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बातें

यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बातें

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👺 *_यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बाते_*


💩 *_गोवर्धन पूजा के अगले दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है। दीपावली के 5 दिनी उत्सव में भाई दूज एक ऐसा त्योहार है जो संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। भाईदूज का त्योहार 6 नंबर 2021 शनिवार को मनाया जाएगा।_*

 

👉🏼 *_1. भाई दूज के कितने नाम : भाई दूज को भैया दूज, भाई टीका, यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया आदि नामों से मनाया जाता है। भाई दूज को संस्कृत में भागिनी हस्ता भोजना कहते हैं। कर्नाटक में इसे सौदरा बिदिगे के नाम से जानते हैं तो वहीं बंगाल में भाई दूज को भाई फोटा के नाम से जाना जाता है। गुजरात में भौ या भै-बीज, महाराष्ट्र में भाऊ बीज कहते हैं तो अधिकतर प्रांतों में भाई दूज। भारत के बाहर नेपाल में इसे भाई टीका कहते हैं। मिथिला में इसे यम द्वितीया के नाम से ही मनाया जाता है।_*


💁🏻‍♀️ *_2. भाई दूज पर भाई को तिलक लगाना है महत्वपूर्ण : भाई दूज के दिन बहनें अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक लगाकर उसकी आरती उतारकर उसे भोजन खिलाती है। भाई दूज पर भाई को भोजन के बाद भाई को पान खिलाने का ज्यादा महत्व माना जाता है। मान्यता है कि पान भेंट करने से बहनों का सौभाग्य अखण्ड रहता है।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_3. यम और यमुना : भाई दूज का त्योहार यमराज के कारण हुआ था, इसीलिए इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज पर यम और यमुना की कथा सुनने का प्रचलन है। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन यमुना अपने भाई भगवान यमराज को अपने घर आमंत्रित करके उन्हें तिलक लगाकर अपने हाथ से स्वादिष्ट भोजन कराती है। जिससे यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी बहन यमुना से वरदान मांगने को कहा। इस पर यमुना ने अपने भाई यम से कहा कि आज के दिन जो बहनें अपने भाई को निमंत्रित कर अपने घर बुलाकर उन्हें भोजन कराएंगी और उनके माथे पर तिलक लगाएंगी तो उन्हें यम का भय ना हो। यमरान ने ऐसा सुनकर कहा, तथास्तु। तभी से कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को बहनों द्वारा अपने भाई को भोजन कराकर तिलक लगाया जाता है। यम के निमित्त धन तेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज पांचों दिन दीपक लगाना चाहिए। कहते हैं कि यमराज के निमित्त जहां दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती हैं।_*


👉🏼 *_4. श्रीकृष्‍ण और सुभद्रा : कहा जाता है कि नरकासुर का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने इसी दिन उनके घर पहुंचे थे। सुभद्रा ने उनका स्वागत करके अपने हाथों से उन्हें भोजन कराकर तिलक लगाया था।_*

 

💁🏻‍♀️ *_5. चित्रगुप्त की पूजा : इस दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा का भी प्रचलन है। कहते हैं कि इसी दिन से चित्रगुप्त लिखते हैं लोगों के जीवन का बहीखाता। चित्रगुप्त की पूजा के साथ-साथ लेखनी, दवात तथा पुस्तकों की भी पूजा भी की जाती है।_*

 

👉🏼 *_6. यमुना में स्नान : कहते हैं कि इस दिन जो भाई-बहन इस रस्म को निभाकर यमुनाजी में स्नान करते हैं, उनको यमराजजी यमलोक की यातना नहीं देते हैं। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना का पूजन किया जाता है।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_7. नवीन वर्ष : वणिक वर्ग के लिए यह नवीन वर्ष का प्रारंभिक दिन कहलाता है। इस दिन नवीन बहियों पर 'श्री' लिखकर कार्य प्रारंभ किया जाता है।_*


बुधवार, 3 नवंबर 2021

दीपावली पर महालक्ष्मी का महत्व, पूजा

 दीपावली पर महालक्ष्मी का महत्व, पूजा 

# दीपावली - महालक्ष्मी


*🙏 _सभी लोग  इस सन्देश को अवस्य पढें, समझें अनुशरण करें और शेयर कर जन जन तक पहुँचायें_*


*🪔*दीपावली के दिन जो पूजा होती है उसे लक्ष्मी पूजन कहा जाता है। आज ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि लक्ष्मी का अर्थ है धन की देवी।*⚜️🔱🚩


*🪔ये लक्ष्मी शब्द का बहुत संकुचित अर्थ हो गया। वास्तव में इस शब्द का अर्थ बहुत विशाल है। लक्ष्मी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की लक्ष धातु से हुई है।*


*🪔लक्ष का शाब्दिक अर्थ है ध्यान लगाना, ध्येय बनाना, ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना इत्यादि। इसका अर्थ ये है कि जब हम एकाग्रचित्त होकर कोई कार्य या साधना करते हैं तो उसका जो फल प्राप्त होता है उसे लक्ष्मी कहते हैं।*


*🪔हमारे प्राचीन ॠषियों का प्रत्येक कार्य तप, ध्यान इत्यादि का उद्देश्य हमेशा शुभ एवं आध्यात्मिक समृद्धि के लिए होता था।तब लक्ष्मी का अर्थ जीवन के चार आयामों धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के समन्वय से जीवन को दिव्यता के मार्ग पर ले जाना था।*


*🪔हमारी सबसे प्राचीन पुस्तक ॠग्वेद में भी लक्ष्मी देवी का उल्लेख आता है परंतु वहां लक्ष्मी का अर्थ धन की देवी नहीं, शुभता एवं सौभाग्य की देवी है।*


*🪔धन की उपयोगिता सीमित है।इस संसार में आप धन से सब कुछ नहीं प्राप्त कर सकते। न धन से आप माता-पिता खरीद सकते हैं, न दोस्त, न ज्ञान। ऐसा बहुत कुछ है जो धन से नहीं खरीदा जा सकता। परंतु सौभाग्य से आप जो चाहें वो प्राप्त कर सकते हैं।*


*🪔अथर्ववेद में भी लक्ष्मी को शुभता, सौभाग्य, संपत्ति, समृद्धि, सफलता एवं सुख का समन्वय बताया गया है।*


*🪔पुराणों में लक्ष्मी के आठ प्रकार बताए गए हैं ये हैं ....*

_*आदिलक्ष्मी,*_

_*धान्यलक्ष्मी,*_

_*धैर्यलक्ष्मी,*_

_*गजलक्ष्मी,*_

_*संतानलक्ष्मी,*_

_*विजयलक्ष्मी,*_

_*विद्यालक्ष्मी,*_

_*एवं धनलक्ष्मी।*_


*🪔इससे स्पष्ट होता है कि लक्ष्मी का प्रभाव क्षेत्र केवल धन तक ही सीमित नहीं है। लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय मानी गई है। विभिन्न देवताओं की भिन्न-भिन्न शक्तियों का मूल स्त्रोत भी माता लक्ष्मी ही हैं।*


*🪔पुराणों के अनुसार माता लक्ष्मी ने अग्निदेव को अन्न का वरदान दिया, वरूण देव को विशाल साम्राज्य का, सरस्वती को पोषण का, इन्द्र को बल का, बृहस्पति को पांडित्य का* *इत्यादि-इत्यादि। इससे सिद्ध होता है कि माता लक्ष्मी की कृपा जिसपर भी हो जाए उसे नाना प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। माता लक्ष्मी के हाथ में कमल है।शास्त्रों में कमल को ज्ञान, आत्म साक्षात्कार एवं मुक्ति का प्रतीक माना गया है।*


*🪔हमारा दर्शन हमें जलकमलवत् रहने की शिक्षा देता है। इसका अर्थ है कि समस्त ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी मन को निर्लिप्त रखना। माता के दोनों ओर दो गज शक्ति का हैं। माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू है जो अँधेरे में भली-भाँति देखने में सक्षम है।*


*🪔इसका अर्थ है कि जब चहुँ ओर दुख का अँधकार छाया हो तो माता की कृपा से हम हमारी दृष्टि सम्यक रहती है एवं हम अपना मार्ग सरलता से ढूँढ सकते हैं।*


*🪔माता लक्ष्मी के हाथ से हमेशा धनवर्षा होती रहती है जो इस बात की सूचक है कि हमें केवल धन का संग्रह ही करना है परंतु वंचितों को उनकी आवश्यकतानुसार दान भी करना है। माता लक्ष्मी ने भगवान् विष्णु को पति रूप में वरण किया है जो सर्वश्रेष्ठ हैं।*


*🪔माता सदा उनके चरणों में रहती हैं। यह इस बात का द्योतक है कि धन आदि ऐश्वर्य सदा उत्तम पुरूषों के पास ही टिकता है। अधम पुरूषों को इसकी प्राप्ति नहीं होती*

*यदि संयोगवश प्राप्ति हो भी जाए तो वो टिकती नहीं है। कलियुग में लक्ष्मी का वास नारी में कहा गया है।*


*🪔इसीलिए कन्या के जन्म पर कहा जाता है कि लक्ष्मी जी पधारी हैं ,परंतु विद्वानों का ये भी कहना है कि।यदि हम कन्या के अवतरण पर निराश हो जाते हैं तो लक्ष्मी उल्टे पाँव लौट जाती है। जिस घर में नारी का आदर होता है वहाँ।माता लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है एवं जहां नारी का अनादर होता है वहाँ से लक्ष्मी का पलायन हो जाता है।*


*🪔माता लक्ष्मी की कृपादृष्टि हेतु समस्त नारी जाति का सम्मान करना अत्यावश्यक है।चूंकि माता लक्ष्मी समस्त प्रकार के ऐश्वर्य की प्रदात्री हैं इसलिए माता लक्ष्मी को केवल धन की देवी मानने की भूल न करें।*


*🚩जय लक्ष्मी माता🚩*


शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

2021 में कब रखा जाएगा करवा चौथ का व्रत? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, चांद निकलने का समय और सामग्री सूची

         ....... ✦•••  *_जय श्री हरि_*  •••✦ ........

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👉🏼 *_2021 में कब रखा जाएगा करवा चौथ का व्रत? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, चांद निकलने का समय और सामग्री सूची_*


🌐 *_प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन सुहागिन महिलाएं करवा चौथ व्रत रखती है। इस वर्ष करवा चौथ 2021 व्रत 24 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा। यह सौभाग्यवती स्त्रियों का सुन्दर सुहाग पर्व है। इस व्रत में सास अपनी बहू को सरगी देती है। इस सरगी को लेकर बहुएं अपने व्रत की शुरुआत करती हैं। यह व्रत सूर्योदय से पहले शुरू होता है जिसे चांद निकलने तक रखा जाता है। सुहागन स्त्रियों इस दिन निर्जला व्रत रखकर, रात में चांद देखने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। पति की दीर्घायु, यश-कीर्ति और सौभाग्य में वृद्धि के लिए इस व्रत को विशेष फलदायी माना गया है।_*


 🧾 *_हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ पर्व मनाया जाता है। करवा चौथ का व्रत सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत खास होता है। मान्यतानुसार इस दिन अगर सुहागिन महिलाएं व्रत-उपवास रखें तो उनके पति की आयु लंबी होती है और गृहस्थ जीवन सुखी रहता है। चांद निकलने के बाद महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और अपने पति के हाथ से पानी पीकर व्रत को संपन्न करती हैं। इस व्रत में सायंकाल के समय शुभ मुहूर्त में चांद निकलने से पहले पूरे शिव परिवार की पूजा की जाती है।_*

 

💮 *_पूजा विधि-_*

 

*_सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाएं। सरगी के रूप में मिला हुआ भोजन करें पानी पीएं और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।_*

 

*_करवा चौथ में महिलाएं पूरे दिन जल-अन्न कुछ ग्रहण नहीं करतीं फिर शाम के समय चांद को देखने के बाद दर्शन कर व्रत खोलती हैं।_*

 

*_पूजा के लिए शाम के समय एक मिट्टी की वेदी पर सभी देवताओं की स्थापना कर इसमें करवे रखें।_*

 

*_एक थाली में धूप, दीप, चंदन, रोली, सिन्दूर रखें और घी का दीपक जलाएं।_*

 

*_पूजा चांद निकलने के एक घंटे पहले शुरू कर देनी चाहिए। इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं।_*

 

*_पूजन के समय करवा चौथ कथा जरूर सुनें या सुनाएं।_*

 

*_चांद को छलनी से देखने के बाद अर्घ्य देकर चंद्रमा की पूजा करनी चाहिए।_*

 

*_चांद को देखने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलना चाहिए।_*

 

*_इस दिन बहुएं अपनी सास को थाली में मिठाई, फल, मेवे, रुपए आदि देकर उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद लेती हैं।_*


🌙 *_चंद्रमा को अर्घ्य देने का मंत्र-_*

 

*_करकं क्षीरसंपूर्णा तोयपूर्णमयापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥_*

*_इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे। सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।।_*

*_एवं व्रतंया कुरूते नारी सौभाग्य काम्यया। सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभते सुस्थिरां श्रियम्।।_*


🏉 *_करवा चौथ 2021 पूजन के शुभ मुहूर्त-_*

 

*_इस बार करवा चौथ 24 अक्टूबर, दिन रविवार को सुबह 03.01 मिनट से चतुर्थी तिथि प्रारंभ होकर सोमवार, 25 अक्टूबर 2021 को सुबह 05.43 मिनट पर चतुर्थी तिथि समाप्त होगी। इस दिन करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त 24 अक्टूबर को शाम 5.43 मिनट से 6.59 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को बेहद शुभ माना जाता है और इस वर्ष शुभ संयोग बन रहा है क्योंकि करवा चौथ का चांद रोहिणी नक्षत्र में निकलेगा।_*

 

🙏 *_करवा चौथ व्रत पारण और चंद्रोदय टाइम- अलग-अलग शहरों में चांद निकलने के समय में बदलाव हो सकता है। इस दिन 08.07 मिनट पर चांद के दर्शन हो सकते हैं। उसके बाद करवा चौथ व्रत का पारण किया जाएगा।_*

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि

 सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि 


सोलह सोमवार व्रत विशेष रूप से विवाहित जीवन में परेशानियों का सामना करने वाले लोगों के लिए है। यह व्रत अच्छे एवं मनोवांछित जीवन साथी को पाने के लिए भी किया जाता है। सोलह सोमवार व्रत का प्रारम्भ करने वाली माँ पार्वती स्वयं हैं। एक बार जब उन्होंने इस धरती पर अवतार लिया था तो वह एक बार पुनः भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए सोमवार व्रत की कठिन तपस्या और शिव पूजन का आयोजन किया।


सोलह सोमवार व्रत को सम्भव हो सके तो , श्रावण मास से ही शुरू करना चाहिए और लगातार 16 सोमवार तक इस व्रत को करते है। सोमवार के दिन प्रात:काल उठकर नित्य-क्रम कर स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को स्वच्छ कर शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर लें। शिव भगवान की प्रतिमा के सामने आसन पर बैठ जायें।


सोलह सोमवार व्रत पूजा सामग्री 


शिव जी की मूर्ति, भांग, बेलपत्र, जल,  धूप, दीप, गंगाजल, धतूरा, इत्र, सफेद चंदन, रोली, अष्टगंध, सफेद वस्त्र, नैवेद्य जिसे आधा सेर गेहूं के आँटे को घी में भून कर गुड़ मिला कर बना लें।


व्रत पूजा संकल्प 


किसी भी पूजा या व्रत को आरम्भ करने के लिये सर्व प्रथम संकल्प करना चाहिये। व्रत के पहले दिन संकल्प किया जाता है। उसके बाद आप नियमित पूजा और व्रत करें। सबसे पहले हाथ में जल, अक्षत, पान का पत्ता, सुपारी और कुछ सिक्के लेकर निम्न मंत्र के साथ संकल्प करें।


ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं अमुक कार्यसिद्धियार्थ सोलह सोमवार व्रत प्रारम्भ करिष्ये ।


सभी वस्तुएँ श्री शिव भगवान के पास छोड़ दें। अब दोनों हाथ जोड़कर शिव भगवान का ध्यान करें....


आवाहन 


हाथ में अक्षत तथा फूल लेकर दोनों हाथ जोड़ लें और भगवान शिव का आवाहन करें। 


ऊँ शिवशंकरमीशानं द्वादशार्द्धं त्रिलोचनम्।

उमासहितं देवं शिवं आवाहयाम्यहम्॥


• हाथ में लिये हुए फूल और अक्षत शिव भगवान को समर्पित करें।

• सबसे पहले भगवान शिव पर जल समर्पित करें।

• जल के बाद सफेद वस्त्र समर्पित करें।

• सफेद चंदन से भगवान को तिलक लगायें एवं तिलक पर अक्षत लगायें।

• सफेद पुष्प, धतुरा, बेल-पत्र, भांग एवं पुष्पमाला अर्पित करें।

• अष्टगंध, धूप अर्पित कर, दीप दिखायें।

• भगवान को भोग के रूप में ऋतु फल या बेल और नैवेद्य अर्पित करें।


इसके बाद सोमवार व्रत कथा को पढ़े अथवा सुने। ध्यान रखें कम-से-कम एक व्यक्ति इस कथा को अवश्य सुने। कथा सुनने वाला भी शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल के पास बैठे। तत्पश्चात शिव जी की आरती करें। दीप आरती के बाद कर्पूर जलाकर कर्पूरगौरं मंत्र से भी आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें और स्वयं भी आरती लें। इस दिन भगवान की महिमा का गुणगान सुनना और सुनाना अत्यंत लाभदायक है इसलिये सामर्थ्य अनुसार शिव स्टीटर चालीसा, शिवपुराण आदि का पाठ करें। सोलह सोमवार के दिन भक्तिपूर्वक व्रत करें। आधा सेर गेहूं का आटा को घी में भून कर गुड़ मिला कर अंगा बना लें । इसे तीन भाग में बाँट लें। अब दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करें। एक अंगा भगवान शिव को अर्पण करें। दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें, और स्वयं भी ग्रहण करें। सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर, घी और गुड़ बनाकर चूरमा बनायें. भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें।


सोलह सोमवार व्रत कथा


एक बार शिवजी और माता पार्वती मृत्यु लोक पर घूम रहे थे। घूमते घूमते वो विदर्भ देश के अमरावती नामक नगर में आये। उस नगर में एक सुंदर शिव मन्दिर था इसलिए महादेवजी  पार्वतीजी के साथ वहा रहने लग गये। एक दिन बातों बातोंं में पार्वतीजी ने शिवजी को चौसर खेलने को कहा। शिवजी राजी हो गये और चौसर खेलने लग गये।


उसी समय मंदिर का पुजारी दैनिक आरती के लिए आया पार्वती ने पुजारी से पूछा “बताओ हम दोनों में चौसर में कौन जीतेगा ” वो पुजारी भगवान शिव का भक्त था और उसके मुह से तुरन्त निकल पड़ा “महादेव जी जीतेंगे”। चौसर का खेल खत्म होने पर पार्वती जी जीत गयी और शिवजी हार गये। पार्वती जी ने क्रोधित होकर उस पुजारी को श्राप देना चाहा तभी शिवजी ने उन्हें रोक दिया और कहा कि ये तो भाग्य का खेल है उसकी कोई गलती नही है फिर भी माता पार्वती ने उस कोढ़ी होने का श्राप दे दिया और उसे कोढ़ हो गया। काफी समय तक वो कोढ़ से पीड़ित रहा। एक दिन एक अप्सरा उस मंदिर में शिवजी की आराधना के लिए आयी और उसने उस पुजारी के कोढ को देखा। अप्सरा ने उस पुजारी को कोढ़ का कारण पूछा तो उसने सारी घटना उसे सुना दी। अप्सरा ने उस पुजारी को कहा “तुम्हे इस कोढ़ से मुक्ति पाने के लिए सोलह सोमवार व्रत करना चाहिए ” उस पुजारी ने व्रत करने की विधि पूछी। अप्सरा ने बताया “सोमवार के दिन नहा धोकर साफ़ कपड़े पहन लेना और आधा किलो आटे से पंजीरी बना देना, उस पंजीरी के तीन भाग करना, प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करना, इस पंजीरी के एक तिहाई हिस्से को आरती में आने वाले लोगो को प्रसाद के रूप में देना, इस तरह सोलह सोमवार तक यही विधि अपनाना, 17 वे सोमवार को एक चौथाई गेहू के आटे से चूरमा बना देना और शिवजी को अर्पित कर लोगो में बाट देना, इससे तुम्हारा कोढ़ दूर हो जायेगा। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने से उसका कोढ़ दूर हो गया और वो खुशी खुशी रहने लगा।


एक दिन शिवजी और पार्वती जी दुबारा उस मंदिर में लौटे और उस पुजारी को एकदम स्वस्थ देखा। पार्वती जी ने उस पुजारी से स्वास्थ्य लाभ होने का राज पूछा। उस पुजारी ने कहा उसने 16 सोमवार व्रत किये जिससे उसका कोढ़ दूर हो गया। पार्वती जी इस व्रत के बारे में सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने भी ये व्रत किया और इससे उनका पुत्र वापस घर लौट आया और आज्ञाकारी बन गया। कार्तिकेय ने अपनी माता से उनके मानसिक परविर्तन का कारण पूछा जिससे वो वापस घर लौट आये पार्वती ने उन्हें इन सब के पीछे सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया कार्तिकेय यह सुनकर बहुत खुश हुए।


कार्तिकेय ने अपने विदेश गये ब्राह्मण मित्र से मिलने के लिए उस व्रत को किया और सोलह सोमवार होने पर उनका मित्र उनसे मिलने विदेश से वापस लौट आया। उनके मित्र ने इस राज का कारण पूछा तो कार्तिकेय ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई यह सुनकर उस ब्राह्मण मित्र ने भी विवाह के लिए सोलह सोमवार व्रत रखने के लिए विचार किया। एक दिन राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था। कई राजकुमार राजा की पुत्री से विवाह करने के लिए आये। राजा ने एक शर्त रखी कि जिस भी व्यक्ति के गले में हथिनी वरमाला डालेगी उसके साथ ही उसकी पुत्री का विवाह होगा। वो ब्राह्मण भी वही था और भाग्य से उस हथिनी ने उस ब्राह्मण के गले में वरमाला डाल दी और शर्त के अनुसार राजा ने उस ब्राह्मण से अपनी पुत्री का विवाह करा दिया।


एक दिन राजकुमारी ने ब्राह्मण से पूछा आपने ऐसा क्या पुण्य किया जो हथिनी ने दुसरे सभी राजकुमारों को छोडकर आपके गले में वरमाला डाली। उसने कहा “प्रिये मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के कहने पर सोलह सोमवार व्रत किये थे उसी के परिणामस्वरुप तुम लक्ष्मी जैसी दुल्हन मुझे मिली ” राजकुमारी यह सुनकर बहुत प्रभावित हुई और उसने भी पुत्र प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार व्रत रखा फलस्वरूप उसके एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और जब पुत्र बड़ा हुआ तो पुत्र ने पूछा “माँ आपने ऐसा क्या किया जो आपको मेरे जैसा पुत्र मिला ” उसने भी पुत्र को सोलह सोमवार व्रत की महिमा बतायी।


यह सुनकर उसने भी राजपाट की इच्छा के लिए ये व्रत रखा। उसी समय एक राजा अपनी पुत्री के विवाह के लिए वर तलाश कर रहा था तो लोगो ने उस बालक को विवाह के लिए उचित बताया। राजा को इसकी सूचना मिलते ही उसने अपनी पुत्री का विवाह उस बालक के साथ कर दिया। कुछ सालो बाद जब राजा की मृत्यु हुयी तो वो राजा बन गया क्योंकि उस राजा के कोई पुत्र नही था।राजपाट मिलने के बाद भी वो सोमवार व्रत करता रहा। एक दिन 17 वे सोमवार व्रत पर उसकी पत्नी को भी पूजा के लिए शिव मंदिर आने को कहा लेकिन उसने खुद आने के बजाय दासी को भेज दिया। ब्राह्मण पुत्र के पूजा खत्म होने के बाद आकाशवाणी हुयी “तुम अपनी पत्नी को अपने महल से दूर रखो, वरना तुम्हारा विनाश हो जाएगा ” ब्राह्मण पुत्र ये सुनकर बहुत आश्चर्यचकित हुआ।


महल वापस लौटने पर उसने अपने दरबारियों को भी ये बात बताई तो दरबारियों ने कहा कि जिसकी वजह से ही उसे राजपाट मिला है वो उसी को महल से बाहर निकालेगा। लेकिन उस ब्राह्मण पुत्र ने उसे महल से बाहर निकल दिया। वो राजकुमारी भूखी प्यासी एक अनजान नगर में आयी। वहा पर एक बुढी औरत धागा बेचने बाजार जा रही थी। जैसे ही उसने राजकुमारी को देखा तो उसने उसकी मदद करते हुए उसके साथ व्यापार में मदद करने को कहा।राजकुमारी ने भी एक टोकरी अपने सर पर रख ली। कुछ दूरी पर चलने के बाद एक तूफान आया और वो टोकरी उडकर चली गयी अब वो बुढी औरत रोने लग गयी और उसने राजकुमारी को मनहूस मानते हुए चले जाने को कहा।


उसके बाद वो एक तेली के घर पहुची उसके वहा पहुचते ही सारे तेल के घड़े फूट गये और तेल बहने लग गया। उस तेली ने भी उसे मनहूस मानकर उसको वहा से भगा दिया। उसके बाद वो एक सुंदर तालाब के पास पहुची और जैसे ही पानी पीने लगी उस पानी में कीड़े चलने लगे और सारा पानी धुंधला हो गया। अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए उसने गंदा पानी पी लिया और पेड़ के नीचे सो गयी जैसे ही वो पेड़ के नीचे सोयी उस पेड़ की सारी पत्तियाँ झड़ गयी। अब वो जिस पेड़ के पास जाती उसकी पत्तियाँँ गिर जाती थी।


ऐसा देखकर वहाँ के लोग मंदिर के पुजारी के पास गये। उस पुजारी ने उस राजकुमारी का दर्द समझते हुए उससे कहा - बेटी तुम मेरे परिवार के साथ रहो, मै तुम्हे अपनी बेटी की तरह रखूंगा, तुम्हे मेरे आश्रम में कोई तकलीफ नही होगी ।” इस तरह वह आश्रम में रहने लग गयी अब वो जो भी खाना बनाती या पानी लाती उसमे कीड़े पड़ जाते। ऐसा देखकर वो पुजारी आश्चर्यचकित होकर उससे बोला “बेटी तुम पर ये कैसा कोप है जो तुम्हारी ऐसी हालत है ” उसने वही शिवपूजा में ना जाने वाली कहानी सुनाई।उस पुजारी ने शिवजी की आराधना की और उसको सोलह सोमवार व्रत करने को कहा जिससे उसे जरुर राहत मिलेगी।


उसने सोलह सोमवार व्रत किया और 17 वे सोमवार पर ब्राह्मण पुत्र उसके बारे में सोचने लगा “वह कहाँ होगी, मुझे उसकी तलाश करनी चाहिये ।” इसलिए उसने अपने आदमी भेजकर अपनी पत्नी को ढूंढने को कहा उसके आदमी ढूंढते ढूंढते उस पुजारी के घर पहुच गये और उन्हें वहा राजकुमारी का पता चल गया। उन्होंने पुजारी से राजकुमारी को घर ले जाने को कहा लेकिन पुजारी ने मना करते हुए कहा “अपने राजा को कहो कि खुद आकर इसे ले जाए ।” राजा खुद वहाँ पर आया और राजकुमारी को वापस अपने महल लेकर आया। इस तरह जो भी यह सोलह सोमवार व्रत करता है उसकी सभी मनोकामनाए पूरी होती हैं।



16 सोमवार व्रत उद्यापन विधि 


उद्यापन 16 सोमवार व्रत की संख्या पूरी होने पर 17 वें सोमवार को किया जाता है। श्रावण मास के प्रथम या तृतीय सोमवार को करना सबसे अच्छा माना जाता है। वैसे कार्तिक, श्रावण, ज्येष्ठ, वैशाख या मार्गशीर्ष मास के किसी भी सोमवार को व्रत का उद्यापन कर सकते हैं। सोमवार व्रत के उद्यापन में उमा-महेश और चन्द्रदेव का संयुक्त रूप से पूजन और हवन किया जाता है।


इस व्रत के उद्यापन के लिए सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें, और आराधना हेतु चार द्वारो का मंडप तैयार करें। वेदी बनाकर देवताओ का आह्वान करें, और कलश की स्थापना करें।


इसके बाद उसमे पानी से भरे हुए पात्र को रखें। पंचाक्षर मंत्र (ऊँ नमः शिवाय) से भगवान् शिव जी को वहाँ स्थापित करें। गंध, पुष्प, धप, नैवेद्य, फल, दक्षिणा, ताम्बूल, फूल, दर्पण, आदि देवताओ को अर्पित करें। इसके बाद आप शिव जी को पञ्च तत्वो से स्नान कराएं, और हवन आरम्भ करें। हवन की समाप्ति पर दक्षिणा, और भूषण देकर आचार्य को गो का दान दें। पूजा का सभी सामान भी उन्हें दें और बाद में उन्हें अच्छे से भोजन कराकर भेजे और आप भी भोजन ग्रहण करें।


महादेव जी की आरती


ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।

त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर...॥


कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।


गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥

कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।


रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर...॥


तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।

तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥


क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्‌।


इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्‌ ॥ हर...॥


बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।

किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥


धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।

क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर...॥


रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।


चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥


तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।

अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर...॥


कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्‌।

त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्‌॥


सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्‌।

डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्‌ ॥ हर...॥


मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्‌।


वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्‌॥


सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्‌।

इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर...॥


शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।

नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥


अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।


अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर...॥

ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।


रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥

संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।


शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर...॥



त्रिदेवो की आरती


ॐ जय शिव ओंकारा....

एकानन चतुरानन पंचांनन राजे।

हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें।

तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी।

चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा....

श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें।

सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें।।

ॐ जय शिव ओंकारा...

कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता।

जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी।

नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें|

कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा।


रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र


जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥


जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥


धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥


जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥


सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥


ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥


कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥


नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ 


प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥


अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥


जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥


दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥


कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥


प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥


पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥


॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥ 



धनदायक शिव कुबेर मंत्र


मन्त्र :- ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम :


इस मन्त्र का प्रयोग व्रत के दिन सुविधा अनुसार समय निकालकर करना चाहिये सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहर्त में करना अधिक फलप्रद है। इस प्रयोग से पूर्व व्यक्ति स्नान आदि करे एवं स्वच्छ वस्त्र पहन कर ही मंदिर में प्रवेश करे। भगवान शिव के मंदिर में इस मन्त्र का उच्चारण करे। यदि यह प्रयोग आप बिल्व वृक्ष के जड़ो के समीप बैठकर करे तो यह मन्त्र और अधिक शीघ्र प्रभाव में आता है. इस मन्त्र का एक हजार जप व्यक्ति को हर आर्थिक समस्याओ से मुक्ति दिला देगा तथा व्यक्ति के घर की सभी दरिद्रता चली जायेगी व व्यक्ति को शीघ्र अपार धन की प्राप्ति होगी।


एक और आवश्यक बात जब भी आप इन मंत्रो का जाप करे तो भगवान शिव को अपने ध्यान में रखे। ऐसा इसलिए क्योकि कुबेर देव भगवान शिव को अपना गुरु मानते थे । शास्त्रो के अनुसार कुबेर देव को प्रसन्न करने के लिए अनेक उपाय बतलाये गए है जिनमे मन्त्र साधना द्वारा एक ऐसा उपाय है जिससे कुबेर देव अति शीघ्र प्रसन्न होता है।