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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

1 मार्च/बलिदान-दिवस, क्रान्तिवीर गोपीमोहन साहा

 1 मार्च/बलिदान-दिवस


                   क्रान्तिवीर गोपीमोहन साहा


पुलिस अधिकारी टेगार्ट ने अपनी रणनीति से बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन को भारी नुकसान पहुँचाया। प्रमुख क्रान्तिकारी या तो फाँसी पर चढ़ा दिये गये थे या जेलों में सड़ रहे थे। उनमें से कई को तो कालेपानी भेज दिया गया था। ऐसे समय में भी बंगाल की वीरभूमि पर गोपीमोहन साहा नामक एक क्रान्तिवीर का जन्म हुआ, जिसने टेगार्ट से बदला लेने का प्रयास किया। यद्यपि दुर्भाग्यवश उसका यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।


टेगार्ट को यमलोक भेजने का निश्चय करते ही गोपीमोहन ने निशाना लगाने का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया। वह चाहता था कि उसकी एक गोली में ही उसका काम तमाम हो जाये। उसने टेगार्ट को कई बार देखा, जिससे मारते समय किसी प्रकार का भ्रम न हो। अब वह मौके की तलाश में रहने लगा।


दो जनवरी, 1924 को प्रातः सात बजे का समय था। सर्दी के कारण कोलकाता में भीषण कोहरा था। दूर से किसी को पहचानना कठिन था। ऐसे में भी गोपीमोहन अपनी धुन में टेगार्ट की तलाश में घूम रहा था। चैरंगी रोड और पार्क स्ट्रीट के चैराहे के पास उसने बिल्कुल टेगार्ट जैसा एक आदमी देखा। उसे लगा कि इतने समय से वह जिस संकल्प को मन में सँजोये है, उसके पूरा होने का समय आ गया है। उसने आव देखा न ताव, उस आदमी पर गोली चला दी; पर यह गोली चूक गयी। वह व्यक्ति मुड़कर गोपीमोहन की ओर झपटा। यह देखकर गोपी ने दूसरी गोली चलायी। यह गोली उस आदमी के सिर पर लगी। 


वह वहीं धराशायी हो गया। गोपी ने सावधानीवश तीन गोली और चलायी और वहाँ फिर से भाग निकला। उसने एक टैक्सी को हाथ दिया; पर टैक्सी वाला रुका नहीं। यह देखकर गोपीमोहन ने उस पर भी गोली चला दी। गोलियों की आवाज और एक अंगे्रज को सड़क पर मरा देखकर भीड़ ने गोपीमोहन का पीछा करना शुरू कर दिया। गोपी ने फिर गोलियाँ चलायीं, इससे तीन लोग घायल हो गये; लेकिन अन्ततः वह पकड़ा गया। 


पकड़े जाने पर उसे पता लगा कि उसने जिस अंग्रेज को मारा है, वह टेगार्ट नहीं अपितु उसकी शक्ल से मिलता हुआ एक व्यापारिक कम्पनी का प्रतिनिधि है। इससे गोपी को बहुत दुख हुआ कि उसके हाथ से एक निरपराध की हत्या हो गयी; पर अब कुछ नहीं हो सकता था।


न्यायालय में अपना बयान देते समय उसने टेगार्ट को व्यंग्य से कहा कि आप स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं; पर यह न भूलें कि जो काम मैं नहीं कर सका, उसे मेरा कोई भाई शीघ्र ही पूरा करेगा। उस पर अनेक आपराधिक धाराएँ थोपीं गयीं। इस पर उसने न्यायाधीश से कहा कि कंजूसी क्यों करते हैं, दो-चार धाराएँ और लगा दीजिये। 


16 फरवरी, 1924 को उसे फाँसी की सजा सुना दी गयी। सजा सुनकर उसने गर्व से कहा, ‘‘मेरी कामना है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूँद भारत के हर घर में आजादी के बीज बोये। जब तक जलियाँवाला बाग और चाँदपुर जैसे काण्ड होंगे, तब तक हमारा संघर्ष भी चलता रहेगा। एक दिन ब्रिटिश शासन को अपने किये का फल अवश्य मिलेगा।’’


एक मार्च, 1924 भारत माँ के अमर सपूत गोपीमोहन साहा ने फाँसी के फन्दे को चूम लिया। मृत्यु का कोई भय न होने के कारण उस समय तक उसका वजन दो किलो बढ़ चुका था। फाँसी के बाद उसके शव को लेने के लिए गोपी के भाई के साथ नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी जेल गये थे।


भक्ति आंदोलन के उन्नायक सन्त दादू

 28 फरवरी/जन्म-दिवस


            भक्ति आंदोलन के उन्नायक सन्त दादू


भारत सदा से सन्तों की भूमि रही है। जब-जब धर्म पर संकट आया, तब-तब सन्तों ने अवतार लेकर भक्ति के माध्यम से समाज को सही दिशा दी। ऐसे ही एक महान् सन्त थे दादू दयाल।


दादू का जन्म गुजरात प्रान्त के कर्णावती (अमदाबाद) नगर में 28 फरवरी, 1601 ई0 (फाल्गुन पूर्णिमा) को हुआ था; पर किसी अज्ञात कारण से इनकी माता ने नवजात शिशु को लकड़ी की एक पेटी में बन्दकर साबरमती नदी में प्रवाहित कर दिया। 


कहते हैं कि लोदीराम नागर नामक एक ब्राह्मण ने उस पेटी को देखा, तो उसे खोलकर बालक को अपने घर ले आया। बालक में बालसुलभ चंचलता के स्थान पर प्राणिमात्र के लिए करुणा और दया भरी थी। इसी से सब लोग इन्हें दादू दयाल कहने लगे।


विवाहोपरान्त इनके घर में दो पुत्र और दो पुत्रियों का जन्म हुआ। इसके बाद इनका मन घर-गृहस्थी से उचट गया और ये जयपुर के पास रहने लगे। यहाँ सत्संग और साधु-सेवा में इनका समय बीतने लगा; पर घर वाले इन्हें वापस बुला ले गये। अब दादू जीवनयापन के लिए रुई धुनने लगे। 


इसी के साथ उनकी भजन साधना भी चलती रहती थी। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि फैलने लगी। केवल हिन्दू ही नहीं, तो अनेक मुस्लिम भी उनके शिष्य बन गये। यह देखकर एक काजी ने इन्हें दण्ड देना चाहा; पर कुछ समय बाद काजी की ही मृत्यु हो गयी। तबसे सब इन्हें अलौकिक पुरुष मानने लगे।


दादू धर्म में व्याप्त पाखण्ड के बहुत विरोधी थी। कबीर की भाँति वे भी पण्डितों और मौलवियों को खरी-खरी सुनाते थे। उनका कहना था कि भगवान की प्राप्ति के लिए कपड़े रंगने या घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। वे सबसे निराकार भगवान् की पूजा करने तथा सद्गुणों को अपनाने का आग्रह करते थे। 


आगे चलकर उनके विचारों को लोगों ने ‘दादू पन्थ’ का नाम दे दिया। इनके मुस्लिम अनुयायियों को ‘नागी’ कहा जाता था, जबकि हिन्दुओं में वैष्णव, विरक्त, नागा और साधु नामक चार श्रेणियाँ थीं। दादू की शिक्षाओं को वाणी कहा जाता है। वे कहते थे -


दादू कोई दौड़े द्वारका, कोई कासी जाहि

कोई मथुरा को चले, साहिब घर ही माहि।।


जीव हिंसा का विरोध करते हुए दादू कहते हैं -


कोई काहू जीव की, करै आतमा घात

साँच कहूँ सन्सा नहीं, सो प्राणी दोजख जात।।


दादू दयाल जी कबीर, नानक और तुलसी जैसे सन्तों के समकालीन थे। जयपुर से 61 किलोमीटर दूर स्थित ‘नरेना’ उनका प्रमुख तीर्थ है। यहाँ इस पन्थ के स्वर्णिम और गरिमामय इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है। 


यहाँ के संग्रहालय में दादू महाराज के साथ-साथ गरीबदास जी की वाणी, इसी पन्थ के दूसरे सन्तों के हस्तलिखित ग्रन्थ, चित्रकारी, नक्काशी, रथ, पालकी, बग्घी, हाथियों के हौदे और दादू की खड़ाऊँ आदि संग्रहित हैं। यहाँ मुख्य उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा को होता है। इस अवसर पर लाखों लोग जुटते हैं, जो बिना किसी भेदभाव के एक पंगत में भोजन करते हैं।


निर्गुण भक्ति के माध्यम से समाज को दिशा देने वाले श्रेष्ठ समाज सुधारक और परम सन्त दादू दयाल इस जगत में साठ वर्ष बिताकर 1660 ई0 में अपने परमधाम को चले गये।

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रमेश बाबू,अभियन्ता सुजाता रंगराजन

 28 फरवरी/बलिदान-दिवस


            सम्बलपुर का क्रांतिवीर सुरेन्द्र साय


भारत में जब से ब्रिटिश लोगों ने आकर अपनी सत्ता स्थापित की, तब से ही उनका विरोध हर प्रान्त में होने लगा था। 1857 में यह संगठित रूप से प्रकट हुआ; पर इससे पूर्व अनेक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम किये रखा। वीर सुरेन्द्र साय ऐसे ही एक क्रान्तिवीर थे।


सुरेन्द्र साय का जन्म ग्राम खिण्डा (सम्बलपुर, उड़ीसा) के चौहान राजवंश में 23 जनवरी, 1809 को हुआ था। इनका गाँव सम्बलपुर से 30 कि.मी की दूरी पर था। युवावस्था में उनका विवाह हटीबाड़ी के जमींदार की पुत्री से हुआ, जो उस समय गंगापुर राज्य के प्रमुख थे। आगे चलकर सुरेन्द्र के घर में एक पुत्र मित्रभानु और एक पुत्री ने जन्म लिया। 


1827 में सम्बलपुर के राजा का निःसन्तान अवस्था में देहान्त हो गया। राजवंश का होने के कारण राजगद्दी पर अब सुरेन्द्र साय का हक था; पर अंग्रेज जानते थे कि सुरेन्द्र उनका हस्तक बन कर नहीं रहेगा। इसलिए उन्होंने राजा की पत्नी मोहन कुमारी को ही राज्य का प्रशासक बना दिया। मोहन कुमारी बहुत सरल महिला थीं। उन्हें राजकाज की कुछ जानकारी नहीं थी। अतः अंग्रेज उन्हें कठपुतली की तरह अपनी उँगलियों पर नचाने लगे। 


लेकिन अंग्रेजों की इस धूर्तता से उस राज्य के सब जमींदार नाराज हो गये। उन्होंने मिलकर इसका सशस्त्र विरोध करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने सुरेन्द्र साय को नेता बनाया। धीरे-धीरे इनके संघर्ष एवं प्रतिरोध की गति बढ़ने लगी। इससे अंग्रेज अधिकारी परेशान हो गये। 


1837 में सुरेन्द्र साय, उदन्त साय, बलराम सिंह तथा लखनपुर के जमींदार बलभद्र देव मिलकर डेब्रीगढ़ में कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे कि अंग्रेजों ने वहाँ अचानक धावा बोल दिया। उन्होंने बलभद्र देव की वहीं निर्ममता से हत्या कर दी; पर शेष तीनों लोग बचने में सफल हो गये।


इस हमले के बाद भी इनकी गतिविधियाँ चलती रहीं। अंग्रेज भी इनके पीछे लगे रहे। उन्होंने कुछ जासूस भी इनको पकड़ने के लिए लगा रखे थे। ऐसे ही देशद्रोहियों की सूचना पर 1840 में सुरेन्द्र साय, उदन्त साय तथा बलराम सिंह अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गये। तीनों को आजन्म कारावास का दण्ड देकर हजारीबाग जेल में डाल दिया गया। ये तीनों परस्पर रिश्तेदार भी थे।


पर इनके साथी शान्त नहीं बैठे। 30 जुलाई, 1857 को सैकड़ों क्रान्तिवीरों ने हजारीबाग जेल पर धावा बोला और सुरेन्द्र साय को 32 साथियों सहित छुड़ा कर ले गये। सुरेन्द्र साय ने सम्बलपुर पहुँचकर फिर से अपने राज्य को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए सशस्त्र संग्राम शुरू कर दिया। 


अंग्रेज पुलिस और सुरेन्द्र साय के सैनिकों में परस्पर झड़प होती ही रहती थी। कभी एक का पलड़ा भारी रहता, तो कभी दूसरे का; पर सुरेन्द्र साय और उनके साथियों ने अंग्रेजों को चैन की नींद नहीं सोने दिया।


23 जनवरी, 1864 को जब सुरेन्द्र साय अपने परिवार के साथ सो रहे थे, तब अंग्रेज पुलिस ने छापा मारकर उन्हें पकड़ लिया। रात में ही उन्हें सपरिवार रायपुर ले जाया गया और फिर अगले दिन नागपुर की असीरगढ़ जेल में बन्द कर दिया। जेल में भरपूर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के बाद भी सुरेन्द्र ने विदेशी शासन के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया।


अपने जीवन के 37 साल जेल में बिताने वाले उस वीर ने 28 फरवरी, 1884 को असीरगढ़ किले की जेल में ही अन्तिम साँस ली।

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28 फरवरी/पुण्य-तिथि


            कलाकार अभियन्ता सुजाता रंगराजन


क्या भारत के चुनावों में प्रयोग की जाने वाली मशीन और दक्षिण के प्रसिद्ध अभिनेता रजनीकान्त की फिल्म ‘शिवाजी’ में कोई सम्बन्ध हो सकता है ? सुनने में यह आश्चर्यजनक लग सकता है; पर यह सम्बन्ध था सुजाता रंगराजन के रूप में। शिक्षा और पेशे से अभियन्ता सुजाता हृदय से बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे। उन्होंने इन दोनों ही क्षेत्रों में अविस्मरणीय कार्य किया।


भारत इलैक्ट्रोनिक्स में अपने कार्यकाल में उन्होंने इन मशीनों का विकास करने वाले दल का नेतृत्व किया था। मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ टैक्नॉलॉजी से इलैक्ट्रोनिक्स परास्नातक कर सुजाता ने पहले नागरिक उड्डयन विभाग में काम किया। फिर वे भारत इलैक्ट्रोनिक्स  बंगलौर में जनरल मैनेजर (शोध एवं विकास) के पद पर आ गये। 


1952-54 में तिरुचिरापल्ली में स्नातक की पढ़ाई के समय वे प्रसिद्ध वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डा0 कलाम के सहपाठी थे। वे भी डा0 कलाम की तरह समय से आगे की सोचते थे। वोटिंग मशीन से बहुत पहले उन्होंने कम्प्यूटर में लिखने (टाइपिंग) की सुविधा देने वाले शब्द संसाधक (वर्ड प्रोसेसर) सॉफ्टवेयर के विकास में भी विशिष्ट योगदान दिया। 


तकनीक के क्षेत्र में अपने काम के लिए 1993 में उन्हें राष्ट्रीय विज्ञान और टैक्नॉलॉजी परिषद ने पुरस्कृत किया। पुरस्कार उन्हें साहित्य और फिल्मों के क्षेत्र में भी पर्याप्त मिले। वे तमिल साहित्य में आधुनिकता की धारा बहाने वाले तथा विज्ञान-कथाओं के प्रामाणिक लेखक थे। तमिल सिनेमा में सफलता के कीर्तिमान बनाने वाली ‘शिवाजी’ और ‘दशावतारम्’ जैसी कई फिल्मों की पटकथा सुजाता रंगराजन की लेखनी से ही निकली। 


साहित्यकार के रूप में उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकाशित करने वाली पत्रिका का नाम भी ‘शिवाजी‘ ही था। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने एक कहानी इस पत्रिका को भेजी थी। बाद में प्रसिद्ध ‘कुमुदम्‘ पत्रिका में उनकी पहली लघुकथा छपी। उन्होंने मणिरत्नम की मशहूर फिल्म ‘रोजा‘ के संवाद भी लिखे। 


मणिरत्नम से उनका सम्बन्ध काफी घनिष्ठ था। उनकी इरुवर, कन्नाथिल मुथामित्तल, आयिथा एझुत्थु आदि कई फिल्मों के लिए सुजाता ने पटकथा या संवाद लिखे। दो फिल्में ‘ए पेक ऑफ द चीक’ और ‘फ्रॉम दि हार्ट’ पुरस्कृत भी हुईं। फिल्म निर्देशक शंकर की कई फिल्मों को भी उन्होंने अपनी लेखनी से समृद्ध किया, जिनमें बॉय्ज  अन्नियान, इण्डियन, मुधालवन के नाम उल्लेखनीय हैं।  


एक रोचक तथ्य यह भी है कि ‘रंग दे बसन्ती‘ फिल्म से प्रसिद्ध हुए अभिनेता सिद्धार्थ के जीवन में भी सुजाता का विशिष्ट योगदान है। उन्होंने सिद्धार्थ को शंकर की तमिल फिल्म ‘बॉय्ज‘ में काम दिलवाया। 


सुजाता ने अमर तमिल कवि सुब्रह्मण्य भारती के बारे में एक फिल्म भी बनाई, जो काफी सराही गई। 100 से अधिक उपन्यास, 250 से अधिक  लघुकथाएँ, दस विज्ञान-कथा पुस्तकें, दस नाटक और एक कविता संकलन के रचयिता सुजाता रंगराजन को तमिल साहित्य के सर्वोत्कृष्ट लेखकों में गिना जाता है। 


सुजाता रंगराजन की हमारे लोकतन्त्र, साहित्य, तकनीक और सिनेमा जगत को अविस्मरणीय देन है। 72 साल की आयु में 28 फरवरी, 2008 को चेन्नई में उनका निधन हुआ। भले ही वे अब नहीं हैं; पर वोटिंग मशीन के रूप में विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतन्त्र की नींव को सबल बनाने वाला उनका योगदान सदा याद किया जाएगा।

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28 फरवरी/जन्म-तिथि  


       कर्मक्षेत्र में प्राणार्पण करने वाले रमेश बाबू


श्री रमेश बाबू एक युवा प्रचारक थे, जिन्होंने श्रीलंका में कार्य करते हुए एक दुर्घटना में अपना प्राण गंवा दिये। उनकी माता श्रीमती अम्बिका तथा पिता श्री नमः शिवाय पिल्लई नागरकोइल (जिला कन्याकुमारी, तमिलनाडु) के निवासी हैं। वहीं 28 फरवरी 1970 को रमेश बाबू का जन्म हुआ। 


उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद विद्युत उपकरणों का संचालन व मरम्मत सीखी और उसका डिप्लोमा (आई.टी.आई.) भी किया। संघ के प्रचारक बनने पर वे काफी समय तक तमिलनाडु में तहसील प्रचारक रहेे। 


उनकी योग्यता तथा नये क्षेत्रों में सम्पर्क कर शीघ्र काम फैलाने की सामर्थ्य देखकर उन्हें श्रीलंका भेजा गया। वे शांत भाव से काम करना पसंद करते थे। उन्हें चुनौतीपूर्ण काम करने में बहुत आनंद आता था, अतः उन्होंने सहर्ष इस कार्य को स्वीकार किया।


श्रीलंका की स्थिति बहुत कठिन थी। सब ओर लिट्टे का आतंक रहता था। ऐसे में शाखा चलाना कितना जटिल होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है; पर रमेश बाबू ने अपने मधुर स्वभाव तथा परिश्रमशीलता से काम की जड़ें जमा दीं। वे सादगी को पसंद करते थे, अतः मितव्ययी भी थे। 


प्रभावी वक्ता होने के कारण अपने विषय को ठीक से श्रोताओं के सामने रख पाते थे। उनके पांच साल के कार्यकाल में श्रीलंका में 50 नयी शाखाएं खड़ी हुईं। उन शाखाओं के कारण 15 कार्यकर्ता भारत में संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण प्राप्त करने आये। पांच प्रचारक और कई विस्तारक बने। 


वहां काम करने वाले कार्यकर्ता को संघ के साथ ही अनेक अन्य कामों में भी समय लगाना पड़ता है। संघ के साथ ही राष्ट्र सेविका समिति की भी अनेक महिला कार्यकर्ता भारत में प्रशिक्षण के लिए आयीं। समिति की कई विस्तारिका भी बनीं। विश्व संघ शिविर में भी अनेक कार्यकर्ता आये। 


संघ, राष्ट्र सेविका समिति या विश्व हिन्दू परिषद आदि के कार्यकर्ता भारत से जब प्रवास पर आते थे, तो वे उनके साथ जाकर उनके कार्यक्रमों को सफल बनाते थे। इस प्रकार उन्होंने हर क्षेत्र में कार्य के नये आयाम स्थापित किये।


सुनामी आपदा का कहर दक्षिण भारत के साथ ही श्रीलंका पर भी टूटा था। उस समय उनके साथ सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में सहायता सामग्री एकत्र कर बांटी। इसके बाद अनेक पीड़ितों को मकान बनाकर भी दिये गये। 


यह सब तब था, जबकि युद्धग्रस्त श्रीलंका में कोई कार्यालय नहीं था, यातायात का कोई उचित प्रबन्ध नहीं था। भोजन व विश्राम का कोई ठिकाना नहीं रहता था। उस समय उनका अथक परिश्रम देखकर कार्यकर्ता चकित रह जाते थे। वे कब खाते और कब सोते थे, यह पता ही नहीं लगता था।


पांच अपै्रल, 2009 (रविवार) को वे एक शिविर के लिए कुछ सामग्री लेकर एक वाहन से कैंडी जा रहे थे। उनके साथ समिति की एक कार्यकर्ता भी थी; पर वह वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। समिति की कार्यकर्ता को अधिक चोट आयी। अतः उन्होंने एक अन्य वाहन का प्रबन्ध कर उन्हें अस्पताल के लिए भेज दिया। वे स्वयं पीछे आ रहे सेना के एक अन्य वाहन में बैठ गये। 


वे जल्दी से जल्दी अस्पताल पहुंचना चाहते थे; पर दुर्भाग्यवश सेना का वह वाहन भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस बार दुर्घटना इतनी भीषण थी कि रमेश बाबू तथा उस वाहन में सवार अन्य कई लोगों की वहीं मृत्यु हो गयी। इस प्रकार एक युवा कर्मयोगी अपने कर्मक्षेत्र में असमय ही काल-कवलित हो गया। वे जीवित रहते, तो उनकी अन्य प्रतिभाएं भी प्रकट होतीं; पर विधाता ने उनके लिए शायद इतना ही समय निर्धारित किया था।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

कवि, समाज-सुधारक संत रविदास

 

  कवि, समाज-सुधारक संत रविदास

रविदास भारत में 15वीं शताब्दी के एक महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाज-सुधारक और ईश्वर के अनुयायी थे। वो निर्गुण संप्रदाय अर्थात् संत परंपरा में एक चमकते नेतृत्वकर्ता और प्रसिद्ध व्यक्ति थे तथा उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन को नेतृत्व देते थे। ईश्वर के प्रति अपने असीम प्यार और अपने चाहने वाले, अनुयायी, सामुदायिक और सामाजिक लोगों में सुधार के लिये अपने महान कविता लेखनों के जरिये संत रविदास ने विविध प्रकार की आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश दिये।

वो लोगों की नजर में उनकी सामाजिक और आध्यात्मिक जरुरतों को पूरा करने वाले मसीहा के रुप में थे। आध्यात्मिक रुप से समृद्ध रविदास को लोगों द्वारा पूजा जाता था। हर दिन और रात, रविदास के जन्म दिवस के अवसर पर तथा किसी धार्मिक कार्यक्रम के उत्सव पर लोग उनके महान गीतों आदि को सुनते या पढ़ते है। उन्हें पूरे विश्व में प्यार और सम्मान दिया जाता है हालाँकि उन्हें सबसे अधिक सम्मान उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्रा में अपने भक्ति आंदोलन और धार्मिक गीतों के लिये मिलता था।

पूरे भारत में खुशी और बड़े उत्साह के साथ माघ महीने के पूर्ण चन्द्रमा दिन पर माघ पूर्णिमा पर हर साल संत रविदास की जयंती या जन्म दिवस को मनाया जाता है। जबकि; वाराणसी में लोग इसे किसी उत्सव या त्योहार की तरह मनाते है।

इस खास दिन पर आरती कार्यक्रम के दौरान मंत्रों के रागों के साथ लोगों द्वारा एक नगर कीर्तन जुलूस निकालने की प्रथा है जिसमें गीत-संगीत, गाना और दोहा आदि सड़कों पर बने मंदिरों में गाया जाता है। रविदास के अनुयायी और भक्त उनके जन्म दिवस पर गंगा- स्नान करने भी जाते है तथा घर या मंदिर में बनी छवि की पूजा-अर्चना करते है। इस पर्व को प्रतीक बनाने के लिये वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर के श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर के बेहद प्रसिद्ध स्थान पर हर साल वाराणसी में लोगों के द्वारा इसे बेहद भव्य तरीके से मनाया जाता है। संत रविदास के भक्त और दूसरे अन्य लोग पूरे विश्व से इस उत्सव में सक्रिय रुप से भाग लेने के लिये वाराणसी आते है।

जन्म: 1377 एडी में (अर्थात् विक्रम संवत-माघ सुदी 15, 1433, हालाँकि कुछ लोगों का मानना है कि ये 1440 एडी था) सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी, यूपी।

पिता: श्री संतोक दास जी

माता: श्रीमती कालसा देवी जी

पत्नी: श्रीमती लोनाजी

पुत्र: विजय दास जी

मृत्यु: वाराणसी में 1540 एडी में।

संत रविदास का जन्म भारत के यूपी के वाराणसी शहर में माता कालसा देवी और बाबा संतोख दास जी के घर 15 वीं शताब्दी में हुआ था। हालाँकि, उनके जन्म की तारीख को लेकर विवाद भी है क्योंकि कुछ का मानना है कि ये 1376, 1377 और कुछ का कहना है कि ये 1399 सीइ में हुआ था। कुछ अध्येता के आँकड़ों के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया गया था कि रविदास का पूरा जीवन काल 15वीं से 16वीं शताब्दी सीइ में 1450 से 1520 के बीच तक रहा।

रविदास के पिता मल साम्राज्य के राजा नगर के सरपंच थे और खुद जूतों का व्यापार और उसकी मरम्मत का कार्य करते थे। अपने बचपन से ही रविदास बेहद बहादुर और ईश्वर के बहुत बड़े भक्त थे लेकिन बाद में उन्हें उच्च जाति के द्वारा उत्पन्न भेदभाव की वजह से बहुत संघर्ष करना पड़ा जिसका उन्होंने सामना किया और अपने लेखन के द्वारा रविदास ने लोगों को जीवन के इस तथ्य से अवगत करवाया। उन्होंने हमेशा लोगों को सिखाया कि अपने पड़ोसियों को बिना भेद-भेदभाव के प्यार करो।

पूरी दुनिया में भाईचारा और शांति की स्थापना के साथ ही उनके अनुयायीयों को दी गयी महान शिक्षा को याद करने के लिये भी संत रविदास का जन्म दिवस का मनाया जाता है। अपने अध्यापन के आरंभिक दिनों में काशी में रहने वाले रुढ़ीवादी ब्राह्मणों के द्वारा उनकी प्रसिद्धि को हमेशा रोका जाता था क्योंकि संत रविदास अस्पृश्यता के भी गुरु थे। सामाजिक व्यवस्था को खराब करने के लिये राजा के सामने लोगों द्वारा उनकी शिकायत की गयी थी। रविदास को भगवान के बारे में बात करने से, साथ ही उनका अनुसरण करने वाले लोगों को अध्यापन और सलाह देने के लिये भी प्रतिबंधित किया गया था।

रविदास की प्रारंभिक शिक्षा

बचपन में संत रविदास अपने गुरु पंडित शारदा नंद के पाठशाला गये जिनको बाद में कुछ उच्च जाति के लोगों द्वारा रोका किया गया था वहाँ दाखिला लेने से। हालाँकि पंडित शारदा ने यह महसूस किया कि रविदास कोई सामान्य बालक न होकर एक ईश्वर के द्वारा भेजी गयी संतान है अत: पंडित शारदानंद ने रविदास को अपनी पाठशाला में दाखिला दिया और उनकी शिक्षा की शुरुआत हुयी। वो बहुत ही तेज और होनहार थे और अपने गुरु के सिखाने से ज्यादा प्राप्त करते थे। पंडित शारदा नंद उनसे और उनके व्यवहार से बहुत प्रभावित रहते थे उनका विचार था कि एक दिन रविदास आध्यात्मिक रुप से प्रबुद्ध और महान सामाजिक सुधारक के रुप में जाने जायेंगे।

पाठशाला में पढ़ने के दौरान रविदास पंडित शारदानंद के पुत्र के मित्र बन गये। एक दिन दोनों लोग एक साथ लुका-छिपी खेल रहे थे, पहली बार रविदास जी जीते और दूसरी बार उनके मित्र की जीत हुयी। अगली बार, रविदास जी की बारी थी लेकिन अंधेरा होने की वजह से वो लोग खेल को पूरा नहीं कर सके उसके बाद दोनों ने खेल को अगले दिन सुबह जारी रखने का फैसला किया। अगली सुबह रविदास जी तो आये लेकिन उनके मित्र नहीं आये। वो लंबे समय तक इंतजार करने के बाद अपने उसी मित्र के घर गये और देखा कि उनके मित्र के माता-पिता और पड़ोसी रो रहे थे।

उन्होंने उन्हीं में से एक से इसका कारण पूछा और अपने मित्र की मौत की खबर सुनकर हक्का-बक्का रह गये। उसके बाद उनके गुरु ने संत रविदास को अपने बेटे के लाश के स्थान पर पहुँचाया, वहाँ पहुँचने पर रविदास ने अपने मित्र से कहा कि उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त, ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है। जैसै कि जन्म से ही गुरु रविदास दैवीय शक्तियों से समृद्ध थे, रविदास के ये शब्द सुनते ही उनके मित्र फिर से जी उठे। इस आश्चर्यजनक पल को देखने के बाद उनके माता-पिता और पड़ोसी चकित रह गये।

वैवाहिक जीवन

भगवान के प्रति उनके प्यार और भक्ति की वजह से वो अपने पेशेवर पारिवारिक व्यवसाय से नहीं जुड़ पा रहे थे और ये उनके माता-पिता की चिंता का बड़ा कारण था। अपने पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ने के लिये इनके माता-पिता ने इनका विवाह काफी कम उम्र में ही श्रीमती लोना देवी से कर दिया जिसके बाद रविदास को पुत्र रत्न की प्रति हुयी जिसका नाम विजयदास पड़ा।

शादी के बाद भी संत रविदास सांसारिक मोह की वजह से पूरी तरह से अपने पारिवारिक व्यवसाय के ऊपर ध्यान नहीं दे पा रहे थे। उनके इस व्यवहार से क्षुब्द होकर उनके पिता ने सांसारिक जीवन को निभाने के लिये बिना किसी मदद के उनको खुद से और पारिवारिक संपत्ति से अलग कर दिया। इस घटना के बाद रविदास अपने ही घर के पीछे रहने लगे और पूरी तरह से अपनी सामाजिक मामलों से जुड़ गये।

बाद का जीवन

बाद में रविदास जी भगवान राम के विभिन्न स्वरुप राम, रघुनाथ, राजा राम चन्द्र, कृष्णा, गोविन्द आदि के नामों का इस्तेमाल अपनी भावनाओं को उजागर करने के लिये करने लगे और उनके महान अनुयायी बन गये।

बेगमपुरा शहर से उनके संबंध

बिना किसी दुख के शांति और इंसानियत के साथ एक शहर के रुप में गुरु रविदास जी द्वारा बेगमपुरा शहर को बसाया गया। अपनी कविताओं को लिखने के दौरान रविदास जी द्वारा बेगमपुरा शहर को एक आदर्श के रुप में प्रस्तुत किया गया था जहाँ पर उन्होंने बताया कि एक ऐसा शहर जो बिना किसी दुख, दर्द या डर के और एक जमीन है जहाँ सभी लोग बिना किसी भेदभाव, गराबी और जाति अपमान के रहते है। एक ऐसी जगह जहाँ कोई शुल्क नहीं देता, कोई भय, चिंता या प्रताड़ना नहीं हो।

मीरा बाई से उनका जुड़ाव

संत रविदास जी को मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु के रुप में माना जाता है जो कि राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी थी। वो संत रविदास के अध्यापन से बेहद प्रभावित थी और उनकी बहुत बड़ी अनुयायी बनी। अपने गुरु के सम्मान में मीरा बाई ने कुछ पंक्तियाँ लिखी है-

“गुरु मिलीया रविदास जी-”।

वो अपने माता-पिता की एक मात्र संतान थी जो बाद में चितौड़ की रानी बनी। मीरा बाई ने बचपन में ही अपनी माँ को खो दिया जिसके बाद वो अपने दादा जी के संरक्षण में आ गयी जो कि रविदास जी के अनुयायी थे। वो अपने दादा जी के साथ कई बार गुरु रविदास से मिली और उनसे काफी प्रभावित हुयी। अपने विवाह के बाद, उन्हें और उनके पति को गुरु जी से आशीर्वाद प्राप्त हुआ। बाद में मीराबाई ने अपने पति और ससुराल पक्ष के लोगों की सहमति से गुरु जी को अपने वास्तविक गुरु के रुप में स्वीकार किया। इसके बाद उन्होंने गुरु जी के सभी धर्मों के उपदेशों को सुनना शुरु कर दिया जिसने उनके ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा और वो प्रभु भक्ति की ओर आकर्षित हो गयी। कृष्ण प्रेम में डूबी मीराबाई भक्ति गीत गाने लगी और दैवीय शक्ति का गुणगान करने लगी।

अपने गीतों में वो कुछ इस तरह कहती थी:

“गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी,

चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी”।

दिनों-दिन वो ध्यान की ओर आकर्षित हो रही थी और वो अब संतों के साथ रहने लगी थी। उनके पति की मृत्यु के बाद उनके देवर और ससुराल के लोग उन्हें देखने आये लेकिन वो उन लोगों के सामने बिल्कुल भी व्यग्र और नरम नहीं पड़ी। बल्कि उन्हें तो आधी रात को उन लोगों के द्वारा गंभीरी नदी में फेंक दिया गया था लेकिन गुरु रविदास जी के आशीर्वाद से वो बच गयी।

एक बार अपने देवर के द्वारा दिये गये जहरीले दूध को गुरु जी द्वारा अमृत मान कर पी गयी और खुद को धन्य समझा। उन्होंने कहा कि:

“विष को प्याला राना जी मिलाय द्यो

मेरथानी ने पाये

कर चरणामित् पी गयी रे,

गुण गोविन्द गाये”।

संत रविदास के जीवन की कुछ महत्वपूर्णं घटनाएँ

एक बार गुरु जी के कुछ विद्यार्थी और अनुयायी ने पवित्र नदी गंगा में स्नान के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना किया कि उन्होंने पहले से ही अपने एक ग्राहक को जूता देने का वादा कर दिया है तो अब वही उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। रविदास जी के एक विद्यार्थी ने उनसे दुबारा निवेदन किया तब उन्होंने कहा उनका मानना है कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा” मतलब शरीर को आत्मा से पवित्र होने की जरुरत है ना कि किसी पवित्र नदी में नहाने से, अगर हमारी आत्मा और ह्दय शुद्ध है तो हम पूरी तरह से पवित्र है चाहे हम घर में ही क्यों न नहाये।

एक बार उन्होंने अपने एक ब्राहमण मित्र की रक्षा एक भूखे शेर से की थी जिसके बाद वो दोनों गहरे साथी बन गये। हालाँकि दूसरे ब्राहमण लोग इस दोस्ती से जलते थे सो उन्होंने इस बात की शिकायत राजा से कर दी। रविदास जी के उस ब्राहमण मित्र को राजा ने अपने दरबार में बुलाया और भूखे शेर द्वारा मार डालने का हुक्म दिया। शेर जल्दी से उस ब्राहमण लड़के को मारने के लिये आया लेकिन गुरु रविदास को उस लड़के को बचाने के लिये खड़े देख शेर थोड़ा शांत हुआ। शेर वहाँ से चला गया और गुरु रविदास अपने मित्र को अपने घर ले गये। इस बात से राजा और ब्राह्मण लोग बेहद शर्मिंदा हुये और वो सभी गुरु रविदास के अनुयायी बन गये।

सामाजिक मुद्दों में गुरु रविदास की सहभागिता

वास्तविक धर्म को बचाने के लिये रविदास जी को ईश्वर द्वारा धरती पर भेजा गया था क्योंकि उस समय सामाजिक और धार्मिक स्वरुप बेहद दु:खद था। क्योंकि इंसानों द्वारा ही इंसानों के लिये ही रंग, जाति, धर्म तथा सामाजिक मान्यताओं का भेदभाव किया जा चुका था। वो बहुत ही बहादुरी के साथ सभी भेदभाव को स्वीकार करते और लोगों को वास्तविक मान्यताओं और जाति के बारे में बताते। वो लोगों को सिखाते कि कोई भी अपने जाति या धर्म के लिये नहीं जाना जाता, इंसान अपने कर्म से पहचाना जाता है। गुरु रविदास जी समाज में अस्पृश्यता के खिलाफ भी लड़े जो उच्च जाति द्वारा निम्न जाति के लोगों के साथ किया जाता था।

उनके समय में निम्न जाति के लोगों की उपेक्षा होती थी, वो समाज में उच्च जाति के लोगों की तरह दिन में कहीं भी आ-जा नहीं सकते थे, उनके बच्चे स्कूलों में पढ़ नहीं सकते थे, मंदिरों में नहीं जा सकते थे, उन्हें पक्के मकान के बजाय सिर्फ झोपड़ियों में ही रहने की आजादी थी और भी ऐसे कई प्रतिबंध थे जो बिल्कुल अनुचित थे। इस तरह की सामाजिक समयस्याओं को देखकर गुरु जी ने निम्न जाति के लोगों की बुरी परिस्थिति को हमेशा के लिये दूर करने के लिये हर एक को आध्यात्मिक संदेश देना शुरु कर दिया।

उन्होंने लोगों को संदेश दिया कि “ईश्वर ने इंसान बनाया है ना कि इंसान ने ईश्वर बनाया है” अर्थात इस धरती पर सभी को भगवान ने बनाया है और सभी के अधिकार समान है। इस सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में, संत गुरु रविदास जी ने लोगों को वैश्विक भाईचारा और सहिष्णुता का ज्ञान दिया। गुरुजी के अध्यापन से प्रभावित होकर चितौड़ साम्राज्य के राजा और रानी उनके अनुयायी बन गये।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

27 फरवरी/बलिदान-दिवस,


27 फरवरी/बलिदान-दिवस   

   चन्द्रशेखर आजाद, जो सदा आजाद रहे




भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों में चन्द्रशेखर आजाद का नाम सदा अग्रणी रहेगा। उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को ग्राम माबरा (झाबुआ, मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनके पूर्वज गाँव बदरका (जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश) के निवासी थे; पर अकाल के कारण इनके पिता श्री सीताराम तिवारी माबरा में आकर बस गये थे। 


बचपन से ही चन्द्रशेखर का मन अंग्रेजों के अत्याचार देखकर सुलगता रहता था। किशोरावस्था में वे भागकर अपनी बुआ के पास बनारस आ गये और संस्कृत विद्यापीठ में पढ़ने लगे। 


बनारस में ही वे पहली बार विदेशी सामान बेचने वाली एक दुकान के सामने धरना देते हुए पकड़े गये। थाने में हुई पूछताछ में उन्होंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतन्त्रता और घर का पता जेलखाना बताया। इस पर बौखलाकर थानेदार ने इन्हें 15 बेंतों की सजा दी। हर बेंत पर ये ‘भारत माता की जय’ बोलते थे। तब से ही इनका नाम 'आजाद' प्रचलित हो गया।


आगे चलकर आजाद ने सशस्त्र क्रान्ति के माध्यम से देश को आजाद कराने वाले युवकों का एक दल बना लिया। भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल, अशफाक, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ सान्याल, जयदेव आदि उनके सहयोगी थे। 


आजाद तथा उनके सहयोगियों ने नौ अगस्त, 1925 को लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली रेल को काकोरी स्टेशन के पास रोककर सरकारी खजाना लूट लिया। यह अंग्रेज शासन को खुली चुनौती थी, अतः सरकार ने क्रान्तिकारियों को पकड़ने में पूरी ताकत झोंक दी।


पर आजाद को पकड़ना इतना आसान नहीं था। वे वेष बदलकर क्रान्तिकारियों के संगठन में लगे रहे। ग्वालियर में रहकर इन्होंने गाड़ी चलाना और उसकी मरम्मत करना भी सीखा। 


17 दिसम्बर, 1928 को इनकी प्रेरणा से ही भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि ने लाहौर में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के ठीक सामने सांडर्स को यमलोक पहुँचा दिया। अब तो पुलिस बौखला गयी; पर क्रान्तिवीर अपने काम में लगे रहे।


कुछ समय बाद क्रान्तिकारियों ने लाहौर विधानभवन में बम फेंका। यद्यपि उसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं था। बम फेंककर भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके वीरतापूर्ण वक्तव्यों सेे जनता में क्रान्तिकारियों के प्रति फैलाये जा रहे भ्रम दूर हुए। दूसरी ओर अनेक क्रान्तिकारी पकड़े भी गये। उनमें से कुछ पुलिस के अत्याचार न सह पाये और मुखबिरी कर बैठे। इससे क्रान्तिकारी आन्दोलन कमजोर पड़ गया। 


वह 27 फरवरी, 1931 का दिन था। पुलिस को किसी मुखबिर से समाचार मिला कि आज प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आजाद किसी से मिलने वाले हैं। पुलिस नेे समय गँवाये बिना पार्क को घेर लिया। आजाद एक पेड़ के नीचे बैठकर अपने साथी की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही उनकी निगाह पुलिस पर पड़ी, वे पिस्तौल निकालकर पेड़ के पीछे छिप गये। 


कुछ ही देर में दोनों ओर से गोली चलनेे लगी। इधर चन्द्रशेखर आजाद अकेले थे और उधर कई जवान। जब आजाद की पिस्तौल में एक गोली रह गयी, तो उन्होंने देश की मिट्टी अपने माथे से लगायी और उस अन्तिम गोली को अपनी कनपटी में मार लिया। उनका संकल्प था कि वे आजाद ही जन्मे हैं और मरते दम तक आजाद ही रहेंगे। उन्होंने इस प्रकार अपना संकल्प निभाया और जीते जी पुलिस के हाथ नहीं आये।

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27 फरवरी/जन्म-दिवस


संकीर्तन द्वारा धर्म बचाने वाले चैतन्य महाप्रभु


अपने संकीर्तन द्वारा पूर्वोत्तर में धर्म बचाने वाले निमाई (चैतन्य महाप्रभु) का जन्म विक्रमी सम्वत् 1542 की फागुन पूर्णिमा (27 फरवरी, 1486) को बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षा-केन्द्र नदिया (नवद्वीप) में हुआ था। इनके पिता पण्डित जगन्नाथ मिश्र तथा माता शची देवी थीं। 


बालपन से ही आँगन में नीम के नीचे वे कृष्णलीला करते रहते थे। इसी से इनका नाम निमाई हुआ। देहान्त के बाद इसी पेड़ की लकड़ी से इनकी मूर्ति बनाकर वहाँ स्थापित की गयी। 


एक बार बाग में खेलते समय इनके सम्मुख एक नाग आ गया। निमाई ने श्रीकृष्ण की तरह उसके मस्तक पर अपना पैर रख दिया। बच्चे शोर करते हुए घर की ओर भागे। माँ ने यह देखा, तो वे घबरा गयीं; पर थोड़ी देर में नाग चला गया। तब से सब लोग इन्हें चमत्कारी बालक मानने लगे। 


16 वर्ष की अवस्था में उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान् वासुदेव सार्वभौम के पास जाकर न्यायशास्त्र का अध्ययन कर नदिया में अपनी पाठशाला स्थापित कर ली। कुछ समय में ही उनके शिक्षण की सर्वत्र चर्चा होने लगी।


इनका विवाह सूरदास के गुरु श्री वल्लभाचार्य की पुत्री लक्ष्मी से हुआ; पर कुछ समय बाद ही सर्पदंश से वह चल बसी। सबके आग्रह पर उन्होंने विष्णुप्रिया से पुनर्विवाह किया। पिता के देहान्त के बाद उनका श्राद्ध करने वे गया गये। वहाँ उनकी भेंट स्वामी ईश्वरपुरी से हुई। इससे उनका जीवन बदल गया। अब वे दिन रात श्रीकृष्ण-भक्ति में डूबे रहने लगे। 


उन्होंने पाठशाला बन्द कर दी और 24 वर्ष की अवस्था में मकर संक्रान्ति पर स्वामी केशवानन्द भारती से संन्यास की दीक्षा ले ली। उन्हें श्रीकृष्ण चैतन्य नाम दिया गया। कुछ समय बाद लोग उन्हें चैतन्य महाप्रभु कहने लगे।


अब वे कुछ भक्तों के साथ वृन्दावन की ओर निकल पड़े। वहाँ उनकी भेंट बंगाल के ही एक युवा संन्यासी निताई से हुई। आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आन्दोलन में निताई का विशेष योगदान रहा। निताई के बाद नित्यानन्द, अद्वैत, हरिदास, श्रीधर, मुरारी, मुकुन्द, श्रीवास आदि विविध जाति एवं वंश के भक्त इनके साथ जुड़ गये। इनके संकीर्तन से भक्ति की धूम मच गयी। जहाँ भी वे जाते, लोग कीर्तन करते हुए इनके पीछे चल देते।


उन दिनों बंगाल में मुस्लिम नवाबों का बहुत आतंक था; पर इनके प्रभाव से अनेक का स्वभाव बदल गया। धीरे-धीरे निमाई को लगा कि प्रभुनाम के प्रचार के लिए घर छोड़ना होगा। अतः वे जगन्नाथपुरी जाकर रहने लगे। वहाँ वे कीर्तन एवं भक्ति के आवेश में बेसुध हो जाते थे। 


कुछ समय बाद वे यात्रा पर निकले। सब स्थानों पर इनके कीर्तन से सुप्त और भयभीत हिन्दुओं में चेतना आयी। धर्म छोड़ने जा रहे लोग रुक गये। दो वर्ष तक दक्षिण और पश्चिम के तीर्थों की यात्रा कर वे फिर पुरी आ गये। 


विक्रम सम्वत् 1590 की आषाढ़ सप्तमी वाले दिन ये जगन्नाथ मन्दिर में भक्ति के आवेश में मूर्ति से लिपट गये। कहते हैं कि इनके अन्दर जाते ही मन्दिर के द्वार स्वयमेव बन्द हो गये। बाद में द्वार खोलने पर वहाँ कोई नहीं मिला। इनके भक्तों की मान्यता है कि ये मूर्ति में ही समाहित हो गये। कुछ लोग इनके देहान्त का कारण आवेशवस्था में समुद्र में डूबना बताते हैं।


संकीर्तन के माध्यम से भी धर्म की रक्षा हो सकती है, यह चैतन्य महाप्रभु ने सिद्ध कर दिखाया। आज भी जब वैष्णव भक्त संकीर्तन करते हैं, तो एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो जाता है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

हिन्दी प्रेमी वीर सावरकर

 26 फरवरी/पुण्य-तिथि                                   


          हिन्दी और हिन्दुत्व प्रेमी वीर सावरकर



वीर विनायक दामोदर सावरकर दो आजन्म कारावास की सजा पाकर कालेपानी नामक कुख्यात अन्दमान की सेल्युलर जेल में बन्द थे। वहाँ पूरे भारत से तरह-तरह के अपराधों में सजा पाकर आये बन्दी भी थे। सावरकर उनमें सर्वाधिक शिक्षित थे। वे कोल्हू पेरना, नारियल की रस्सी बँटना जैसे सभी कठोर कार्य करते थे। इसके बाद भी उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं।

भारत की एकात्मता के लिए हिन्दी की उपयोगिता समझकर उन्होंने खाली समय में बन्दियों को हिन्दी पढ़ाना प्रारम्भ किया। उन्होंने अधिकांश बन्दियों को एक ईश्वर, एक आत्मा, एक देश तथा एक सम्पर्क भाषा के लिए सहमत कर लिया। उनके प्रयास से अधिकांश बन्दियों ने प्राथमिक हिन्दी सीख ली और वे छोटी-छोटी पुस्तकें पढ़ने लगे। 

अब सावरकर जी ने उन्हें रामायण, महाभारत, गीता जैसे बड़े धर्मग्रन्थ पढ़ने को प्रेरित किया। उनके प्रयत्नों से जेल में एक छोटा पुस्तकालय भी स्थापित हो गया। इसके लिए बन्दियों ने ही अपनी जेब से पैसा देकर ‘पुस्तक कोष’ बनाया था।

जेल में बन्दियों द्वारा निकाले गये तेल, उसकी खली-बिनौले तथा नारियल की रस्सी आदि की बिक्री की जाती थी। इसके लिए जेल में एक विक्रय भण्डार बना था। जब सावरकर जी को जेल में रहते काफी समय हो गया, तो उनके अनुभव, शिक्षा और व्यवहार कुशलता को देखकर उन्हें इस भण्डार का प्रमुख बना दिया गया। इससे उनका सम्पर्क अन्दमान के व्यापारियों और सामान खरीदने के लिए आने वाले उनके नौकरों से होने लगा।

वीर सावरकर ने उन सबको भी हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी। वे उन्हें पुस्तकालय की हिन्दी पुस्तकें और उनके सरल अनुवाद भी देने लगे। इस प्रकार बन्दियों के साथ-साथ जेल कर्मचारी, स्थानीय व्यापारी तथा उनके परिजन हिन्दी सीख गये। अतः सब ओर हिन्दी का व्यापक प्रचलन हो गया। 

सावरकर जी के छूटने के बाद भी यह क्रम चलता रहा। यही कारण है कि आज भी केन्द्र शासित अन्दमान-निकोबार द्वीपसमूह में हिन्दी बोलने वाले सर्वाधिक हैं और वहाँ की अधिकृत राजभाषा भी हिन्दी ही है।

अन्दमान में हिन्दू बन्दियों की देखरेख के लिए अंग्रेज अधिकारियों की शह पर तीन मुसलमान पहरेदार रखे गये थे। वे हिन्दुओं को अनेक तरह से परेशान करते थे। गालियाँ देना, डण्डे मारना तथा देवी-देवताओं को अपमानित करना सामान्य बात थी। 

वे उनके भोजन को छू लेते थे। इस पर अनेक हिन्दू उसे अपवित्र मानकर नहीं खाते थे। उन्हें भूखा देखकर वे मुस्लिम पहरेदार बहुत खुश होते थे। सावरकर जी ने हिन्दू कैदियों को समझाया कि राम-नाम में सब अपवित्रताओं को समाप्त करने की शक्ति है। इससे हिन्दू बन्दी श्रीराम का नाम लेकर भोजन करने लगे; पर इससे मुसलमान पहरेदार चिढ़ गये। 

एक बार एक पहरेदार ने हिन्दू बन्दी को कहा - काफिर, तेरी चोटी उखाड़ लूँगा। हिन्दू बन्दियों का आत्मविश्वास इतना बढ़ चुका था कि वह यह सुनकर पहरेदार की छाती पर चढ़ गया और दोनों हाथों से उसे इतने मुक्के मारे कि पहरेदार बेहोश हो गया। 

इस घटना से भयभीत होकर उन पहरेदारों ने हिन्दू बन्दियों से छेड़छाड़ बन्द कर दी। कारागार में मुसलमान पहरेदार हिन्दू बन्दियों को परेशानकर मुसलमान बना लेते थे। सावरकर जी ने ऐसे सब धर्मान्तरितों  को शुद्ध कर फिर से हिन्दू बनाया।

हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्थान के प्रबल समर्थक वीर विनायक दामोदर सावरकर का देहावसान 26 फरवरी, 1966 को हुआ था।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

कवि माइकेल मधुसूदन दत्त

 25 जनवरी/जन्म-दिवस


                  कवि माइकेल मधुसूदन दत्त



भारतीय काव्य-क्षेत्र के तेजस्वी नक्षत्र माइकेल मधुसूदन दत्त का जन्म 25 जनवरी, 1824 को ग्राम सागरदारी (जिला जैसोर, बंगाल) में हुआ था। आजकल यह क्षेत्र बांग्लादेश में है। इन्हें 19 वीं सदी के रचनात्मक पुनर्जागरण का प्रणेता माना जाता है। इनके पिता श्री राजनारायण दत्त एक प्रसिद्ध वकील तथा माता जाõवी देवी एक प्रतिष्ठित जमींदार घराने से थीं।

बालपन से ही मधुसूदन तीव्र बुद्धि के थे। शिक्षा के प्रारम्भिक दौर में इन्होंने संस्कृत, बंगला एवं फारसी का अध्ययन किया। कविता के प्रति इनके मन में आकर्षण प्रारम्भ से ही था। 1837 में इन्होंने कोलकाता के हिन्दू कॉलिज में प्रवेश लिया, जहां शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी था।

कुछ समय में इन्होंने अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। इससे वहां भी इनकी प्रतिभा प्रकट होने लगी। कोलकाता के खुले एवं शिक्षित वातावरण में इनकी काव्य कल्पनाएँ अनन्त आकाश में उड़ने को व्याकुल हो उठीं। अब तक मधुसूदन दत्त के मन में सर्जना के अंकुर फूटने लगे थे। अंग्रेजी के प्रख्यात कवि शेक्सपियर, मिल्टन और बॉयरान के ये प्रशंसक थे। उनसे प्रभावित होकर ये अंग्रेजी में कविता लिखने लगे। विद्यालय में अध्यापकों तथा काव्य गोष्ठियों में प्रबुद्ध जनों की प्रशंसा से इनका उत्साह बढ़ता रहा। 1848 में ये मद्रास गये और वहाँ एक विद्यालय में अध्यापन करने लगे। वहीं इन्होंने अपनी सबसे लम्बी कविता ‘दि कैप्टिव लेडी’ लिखी।

मधुसूदन दत्त काव्य की बनी-बनायी लीक पर चलने के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने भारतीय काव्य में पहली बार मुक्तछन्द का प्रयोग किया। इसके लिए उन्हें आलोचना और प्रशंसा दोनों ही मिलीं। मद्रास में ही इन्होंने गीतिकाव्य, त्रिपदी, चतुष्पदी एवं प॰च चरण कविताओं जैसे अनेक प्रयोग किये। नये-नये प्रयोगों के कारण इन्हें कविता का क्रान्तिकारी कहा जाता है।

इन्होंने परिवर्णी काव्य, सम्बोधि गीत, पत्रकाव्य, मुक्तछन्द, चित्रात्मक काव्य आदि में ऐसी नयी शैली प्रस्तुत की, कि सब ओर इनके काव्य की चर्चा होने लगी। वे अपनी कविता में कल्पनाओं का ऐसा भव्य संसार खड़ा करते थे कि उसे पढ़कर लोग दंग रह जाते थे। 

1856 में वे कोलकाता वापस आ गये। यहाँ उन्होंने अनेक प्रसिद्ध अंग्रेजी कविताओं का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया। अंग्रेजों जैसी जीवन शैली अपनाने के लिए इन्होंने ईसाई मत स्वीकार कर लिया था; पर इनकी रचनाओं में भारत और भारतीयता का रंग ही प्रमुख रहा।

कोलकाता में मधुसूदन दत्त ने बंगला भाषा में कविताएँ लिखनी प्रारम्भ कीं। 1860 में लिखित ‘तिलोत्मा सम्भव’ इनकी पहली बंगला कविता थी। 1862 में वे कानून पढ़ने के लिए इंग्लैण्ड गये; पर इससे पूर्व उन्होंने संस्कृत, बंगला, तमिल, तेलगू आदि भारतीय भाषाओं में प्रचुर काव्य साहित्य रचा। 

विदेश प्रवास में उन्होंने कानून के साथ-साथ फ्रेंच, जर्मन, हिब्रू आदि भाषाओं की काव्य कृतियों का भी अध्ययन किया। कविता के साथ-साथ उन्होंने अनेक नाटक एवं काव्य नाटक भी लिखे। इनमें शर्मिष्ठा, पद्मावती, कृष्णा कुमारी, मेघनाद वध, व्रजांगना, वीरांगना, तीरांगना आदि प्रमुख हैं। 
उन्होंने आम आदमी द्वारा बोली जाने वाली सरल भाषा का प्रयोग किया। इससे इनका साहित्य जन-जन का साहित्य बन गया। 

3 जुलाई, 1873 को दुनिया से विदा लेने से पूर्व वे भारतीय साहित्य के क्षेत्र में ऐसी समृद्ध परम्परा निर्माण कर गये, जो लम्बे समय तक लेखकों का मार्गदर्शन करती रही।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

24 फरवरी/बलिदान-दिवस, लोकदेवता कल्ला जी राठौड़

24 फरवरी/बलिदान-दिवस

                   लोकदेवता कल्ला जी राठौड़

राजस्थान में अनेक वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया, जिससे उनकी छवि लोकदेवता जैसी बन गयी। कल्ला जी राठौड़ ऐसे ही एक महामानव थे। उनका जन्म मेड़ता राजपरिवार में आश्विन शुक्ल 8, विक्रम संवत 1601 को हुआ था। 

इनके पिता मेड़ता के राव जयमल के छोटे भाई आसासिंह थे। भक्तिमती मीराबाई इनकी बुआ थीं। कल्ला जी की रुचि बचपन से सामान्य शिक्षा के साथ ही योगाभ्यास, औषध विज्ञान तथा शस्त्र संचालन में भी थी। प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से इन्होंने योग की शिक्षा पायी।

इसी समय मुगल आक्रमणकारी अकबर ने मेड़ता पर हमला किया। राव जयमल के नेतृत्व में आसासिंह तथा कल्ला जी ने अकबर का डटकर मुकाबला किया; पर सफलता न मिलते देख राव जयमल अपने परिवार सहित घेरेबन्दी से निकल कर चित्तौड़ पहुँच गये। राणा उदयसिंह ने उनका स्वागत कर उन्हें बदनौर की जागीर प्रदान की। कल्ला जी को रणढालपुर की जागीर देकर गुजरात की सीमा से लगे क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया।

कुछ समय बाद कल्ला जी का विवाह शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा से तय हुआ। द्वाराचार के समय जब उनकी सास आरती उतार रही थी, तभी राणा उदयसिंह का सन्देश मिला कि अकबर ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया है, अतः तुरन्त सेना सहित वहाँ पहुँचें। कल्ला जी ने विवाह की औपचारिकता पूरी की तथा पत्नी से शीघ्र लौटने को कहकर चित्तौड़ कूच कर दिया।

महाराणा ने जयमल को सेनापति नियुक्त किया था। अकबर की सेना ने चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया था। मेवाड़ी वीर किले से निकलकर हमला करते और शत्रुओं को हानि पहुँचाकर फिर किले में आ जाते। कई दिनों के संघर्ष के बाद जब क्षत्रिय वीरों की संख्या बहुत कम रह गयी, तो सेनापति जयमल ने निश्चय किया कि अब अन्तिम संघर्ष का समय आ गया है। उन्होंने सभी सैनिकों को केसरिया बाना पहनने का निर्देश दिया।

इस सन्देश का अर्थ स्पष्ट था। 23 फरवरी, 1568 की रात में चित्तौड़ के किले में उपस्थित सभी क्षत्राणियों ने जौहर किया और अगले दिन 24 फरवरी को मेवाड़ी वीर किले के द्वार खोल कर भूखे सिंह की भाँति मुगल सेना पर टूट पड़े। भीषण युद्ध होने लगा। 

राठौड़ जयमल के पाँव में गोली लगी। उनकी युद्ध करने की तीव्र इच्छा थी; पर उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। कल्ला जी ने यह देखकर जयमल के दोनों हाथों में तलवार देकर उन्हें अपने कन्धे पर  बैठा लिया। इसके बाद कल्ला जी ने अपने दोनों हाथों में भी तलवारें ले लीं।

चारों तलवारें बिजली की गति से चलने लगीं। मुगल लाशों से धरती पट गयी। अकबर ने यह देखा, तो उसे लगा कि दो सिर और चार हाथ वाला कोई देवता युद्ध कर रहा है। युद्ध में वे दोनों बुरी तरह घायल हो गये। कल्ला जी ने जयमल को नीचे उतारकर उनकी चिकित्सा करनी चाही; पर इसी समय एक शत्रु सैनिक ने पीछे से हमला कर उनका सिर काट दिया। सिर कटने के बाद के बाद भी उनका धड़ बहुत देर तक युद्ध करता रहा। 

इस युद्ध के बाद कल्ला जी का दो सिर और चार हाथ वाला रूप जन-जन में लोकप्रिय हो गया। आज भी लोकदेवता के रूप में चित्तौड़गढ़ में भैंरोपाल पर उनकी छतरी बनी हैं 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

क्या खाएं जो पच जाए


*यदि ना पचे .. तो करें उपाय*


*👉🏻दूध ना पचे तो ~ सोंफ* ,

*👉🏻दही ना पचे तो ~ सोंठ*,

*👉🏻छाछ ना पचे तो ~जीरा व काली मिर्च*

*👉🏻अरबी व मूली ना पचे तो ~ अजवायन*

*👉🏻कड़ी ना पचे तो ~ कड़ी पत्ता,*


*👉🏻तैल, घी, ना पचे तो ~  कलौंजी...* 

*👉🏻पनीर ना पचे तो ~ भुना जीरा,*

*👉🏻भोजन ना पचे तो ~ गर्म जल*

*👉🏻केला ना पचे तो  ~ इलायची*             

*👉🏻ख़रबूज़ा ना पचे तो ~ मिश्री का उपयोग करें...*


1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।

2. *लकवा* - सोडियम की कमी के कारण होता है ।

3. *हाई वी पी में* -  स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।


4. *लो बी पी* - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।

5. *कूबड़ निकलना*- फास्फोरस की कमी ।

6. *कफ* - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं 

7. *दमा, अस्थमा* - सल्फर की कमी ।

8. *सिजेरियन आपरेशन* - आयरन , कैल्शियम की कमी ।


9. *सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें* ।

10. *अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें* ।

11. *जम्भाई*- शरीर में आक्सीजन की कमी ।

12. *जुकाम* - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।


13. *ताम्बे का पानी* - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।

14.  *किडनी* - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।

15. *गिलास* एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्सन् अधिक होता है । 


गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है 

अतः लोटे का पानी पियें,  

*लोटे का कम  सर्फेसटेन्स होता है ।*✔️



16. *अस्थमा , मधुमेह , कैंसर* से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।

17. *वास्तु* के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।



18. *परम्परायें* वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।

19. *पथरी* - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है । 


20. *RO* का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । 

कुएँ का पानी पियें । 

बारिस का पानी सबसे अच्छा , 

पानी की सफाई के लिए *सहिजन* की फली सबसे बेहतर है ।


21. *सोकर उठते समय* हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का *स्वर* चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।


22. *पेट के बल सोने से* हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है । 

23.  *भोजन* के लिए पूर्व दिशा , *पढाई* के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।

24.  *HDL* बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।


25. *गैस की समस्या* होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।

26.  *चीनी* के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। 

चीनी खाने से *पित्त* बढ़ता है । 


27.  *शुक्रोज* हजम नहीं होता है 

*फ्रेक्टोज* हजम होता है 

और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।


28. *वात* के असर में नींद कम आती है ।

29.  *कफ* के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।

30. *कफ* के असर में पढाई कम होती है ।

31. *पित्त* के असर में पढाई अधिक होती है ।


33.  *आँखों के रोग* - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।

34. *शाम को वात*-नाशक चीजें खानी चाहिए ।

35.  *प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए* ।


36. *सोते समय* रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।

37. *व्यायाम* - 

*वात रोगियों* के लिए मालिश के बाद व्यायाम , 

*पित्त वालों* को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । 

*कफ के लोगों* को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।


38. *भारत की जलवायु* वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।


39. *जो माताएं* घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।

40. *निद्रा* से *पित्त* शांत होता है , मालिश से *वायु* शांति होती है , 

उल्टी से *कफ* शांत होता है 

तथा *उपवास* ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।


41.  *भारी वस्तुयें* शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।


42. *दुनियां के महान* वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों , 

43. *माँस खाने वालों* के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।


44. *तेल हमेशा* गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।


45. *छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।* 

46. *कोलेस्ट्रोल की बढ़ी* हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । 

ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।

47. *मिर्गी दौरे* में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए । 


48. *सिरदर्द* में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।


49. *भोजन के पहले* मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है । 

50. *भोजन* के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें । 


51. *अवसाद* में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है।

 

52.  *पीले केले* में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । 


हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।


53.  *छोटे केले* में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।

54. *रसौली* की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।

55.  हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।

56. *एंटी टिटनेस* के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।


57. *ऐसी चोट* जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें । 


58. *मोटे लोगों में कैल्शियम* की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।

59. *अस्थमा में नारियल दें ।* 

नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।

दालचीनी + गुड + नारियल दें ।


60. *चूना* बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है । 

61.  *दूध* का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।


62.  *गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है ।* 

63.  *जिस भोजन* में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए 

64.  *गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।*


65.  *गाय के दूध* में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।

66.  *मासिक के दौरान* वायु बढ़ जाता है , 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे  गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।

67. *रात* में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।


68. *भोजन के* बाद बज्रासन में बैठने से *वात* नियंत्रित होता है ।

69. *भोजन* के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । 

बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।


70. *अजवाईन* अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है 

71. *अगर पेट* में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें ।


72. *कब्ज* होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए । 

73. *रास्ता चलने*, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए । 


74. *जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।* 

75.  *बिना कैल्शियम* की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।


76. *स्वस्थ्य व्यक्ति* सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।

77. *भोजन* करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।

78. *सुबह के नाश्ते* में फल , *दोपहर को दही* व *रात्रि को दूध* का सेवन करना चाहिए । 


79. *रात्रि* को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि । 


80.  *शौच और भोजन* के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें । 

81. *मासिक चक्र* के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए । 


82. *जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।*

83. *जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।*


84. *एलोपैथी* ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है । 


85. *खाने* की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है । 

86 .  *रंगों द्वारा* चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला ..... अंत में लाल रंग । 


87 . *छोटे* बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए 

88. *जो सूर्य निकलने* के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है । 


89.  *बिना शरीर की गंदगी* निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं । 


90. *चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।* 


91.  *गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।*

92. *प्रसव* के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । 

बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती  है ।


93. *रात को सोते समय* सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा 

94. *दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए*।

95. *जो अपने दुखों* को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है । 


96. *सोने से* आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है । 

97. *स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है*। 


98 . *तेज धूप* में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है 

99. *त्रिफला अमृत है* जिससे *वात, पित्त , कफ* तीनो शांत होते हैं । 

इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।  


100. इस विश्व की सबसे मँहगी *दवा लार* है , जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है ,

इसे ना थूके।

साहित्यकार सांसद डा. रघुवीर सिंह

 23 फरवरी/जन्म-दिवस


            साहित्यकार सांसद डा. रघुवीर सिंह

ऐसा प्रायः कम ही होता है कि राजपरिवार में जन्मे व्यक्ति को सत्तामद न हो; पर 23 फरवरी, 1908 को सीतामऊ (मध्य प्रदेश) रियासत के महाराजा श्री रामसिंह के घर में जन्मे महाराज कुमार रघुवीर सिंह इसके अपवाद थे। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर होने के बाद ये इन्दौर के डेली कॉलेज और होल्कर कॉलेज में पढ़े। इतिहास इनकी सर्वाधिक रुचि का विषय था। 1936 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘ट्रांजिट इन मालवा’ विषय पर इन्हें डी.लिट की उपाधि दी गयी। इस विश्वविद्यालय से यह उपाधि लेने वाले वे पहले छात्र थे।


कुँवर रघुवीर सिंह को घर में साहित्यिक वातावरण मिला। उनके पूर्वज महाराज कुमार रतनसिंह ‘नटनागर’ डिंगल के कवि थे। पिता रामसिंह भी सुकवि तथा आधुनिक विचारों के थे। देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन हो रहे थे। 1917 में रूसी क्रान्ति की चर्चा विश्व भर में फैली। घर में भी श्री रामसिंह इसका विश्लेषण सबके सामने ठीक प्रकार से करते थे। इस प्रकार बालक रघुवीर सिंह का राजनीतिक प्रशिक्षण भी पढ़ाई के साथ-साथ चलता रहा।


जब तक रघुवीर सिंह युवा हुए, मालवा क्षेत्र में स्वतन्त्रता संग्राम की गतिविधियाँ तेज हो गयीं। इन्दौर इनका केन्द्र था। वहाँ कांग्रेस के आन्दोलन के साथ ही मजदूर आन्दोलन, प्रजामण्डल आन्दोलन और समाजवादी आन्दोलन भी चल रहे थे। इन सबका प्रभाव युवक रघुवीर सिंह पर भी पड़ा। 1929-30 में उनके लिखे निबन्ध और कविताओं पर इसका प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। 1933 में यह सब रचनाएँ ‘बिखरे फूल’ में प्रकाशित हुईं।


रघुवीर सिंह जहाँ एक ओर गांधीवादी आन्दोलन से जुड़े थे, तो दूसरी ओर क्रान्तिकारियों द्वारा जान हथेली पर लेकर घूमना भी उनके अन्तर्मन को झकझोर देता था। 1928 में प्रकाशित और बहुचर्चित ‘चाँद’ पत्रिका के फाँसी अंक में उन्होंने ‘फ्रान्स की क्रान्ति के कुछ रक्तरंजित पृष्ठ’ लेख लिखा था। इस अंक को ब्रिटिश शासन ने जब्त कर लिया था। 


तत्कालीन लेखक प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद एवं सुमित्रानन्दन पन्त से भी वे बहुत प्रभावित थे। इनके प्रभाव की छाप उनके विचारों और लेखन में दिखायी देती है। उनका लेखकीय स्वरूप पूर्णतः उनकी सामन्ती छवि से भिन्न है। स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री नेहरु जी से उनकी मित्रता थी। उनके आग्रह पर 1952 से 1962 तक डा. रघुवीर सिंह राज्यसभा में सांसद रहे। सदन में भी वे अत्यधिक सक्रिय रहे। संयुक्त राष्ट्र संघ के 11वें अधिवेशन में उन्होंने भारत का पक्ष बहुत मजबूती से रखा। तभी उन्हें कोलम्बिया विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने भी भाषण के लिए आमन्त्रित किया।


डा. रघुवीर सिंह की एक विशेषता यह थी कि वे उन्हें मिलने वाले हर पत्र का उत्तर देते थे। अपनी जन्मभूमि मालवा से उन्हें अत्यधिक प्रेम था। मालवा के गौरवशाली इतिहास को प्रकाश में लाने का उन्होंने सफल प्रयास किया। उनका साहित्य यद्यपि हिन्दी में है; पर अपने क्षेत्र के लोगों से वे स्थानीय बोली में ही बात करते थे। 1975 में जब आपातकाल की घोषणा कर इंदिरा गांधी ने देश में तानाशाही थोप दी, तो डा0 रघुवीर सिंह ने इसे देश की जनता के लोकतान्त्रिक हितों पर कुठाराघात बताते हुए कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया।


सादे जीवन और उच्च विचारों वाले डा. रघुवीर सिंह को प्रख्यात साहित्यकार डा0 वृन्दावनलाल वर्मा ने सीतामऊ का तपस्वी, यशस्वी और प्रतिभा सम्पन्न समर्पित साहित्यकार कहा है।        

पित्त का बढ़ना, जरूर जानिए इसका उपाय

 *46 से 50 बीमारियों का कारण है पित्त का बढ़ना, जरूर जानिए इसका उपाय ...*



शरीर में वात-पित्त और कफ का संतुलन आपको स्वस्थ रखता है, लेकिन इनके असंतुलित होने पर आपको किसी न किसी प्रकार से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ता है। पित्त के बढ़ने पर आपको 46 से 50 बीमारियों का खतरा होता है। जानिए पित्त को सही और संतुलित रखने के लिए क्या खाएं और क्या नहीं -


1

छाछ - दही का सेवन करने के बजाए इसे पतला करके छाछ के रूप में या लस्सी का सेवन करें। इस में अजवाइन का प्रयोग करना पित्त विकार के लिए फायदेमंद रहेगा।


2

काला नमक - छाछ के साथ या खाद्य पदार्थों के साथ काले नमक का सेवन करें लेकिन काला नमक दिन में ही प्रयोग करना फायदेमंद रहेगा।


3 काला जीरा - काला जीरा पित्त के संतुलन में काफी सहायक होता है। अगर पित्त की समस्या है तो काले जीरे को डाइट में शामिल करें।


4 गाय का घी -


घी तो आप खाते ही होंगे, लेकिन कोशिश करें कि गाय के घी का प्रयोग करें। यह पित्त की समस्या में लाभ देता है।


5 आंवला - आंवला रात को भिगो दें।


सुबह उसी में मसलकर छान लें। अब मिश्री जीरा कूटकर मिला कर पिएं।


क्या न खाएं -


आयोडीन युक्त नमक का सेवन ज्यादा न करें।


फास्ट फूड, तले हुए, गरम व जलन वाले खाने से बचें।

22 फरवरी/पुण्य-तिथि सेवा का अक्षय वट माधवराव परलकर

 22 फरवरी/पुण्य-तिथि


           सेवा का अक्षय वट माधवराव परलकर


सेवा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जिस व्यक्ति पर कष्ट पड़ता है, उसकी सेवा तो पुण्य है ही; पर उनके सम्बन्धियों के कष्ट भी कम नहीं होते।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता जनजीवन से जुड़े होते हैं। उन्होंने ऐसे रोगियों और उनके परिचारकों के लिए अनेक सेवा केन्द्रों की स्थापना की है। इनमें मुम्बई का ‘नाना पालकर रुग्ण सेवा केन्द्र’ भी एक है। इसके प्राण थे संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री माधवराव परलकर।


माधवराव अपने बाल्यकाल से ही संघ की शाखा से जुड़ गये थे। उन्होंने 1947 में ‘आयुर्वेद प्रवीण’ की उपाधि ली। तब वे चाहते तो कहीं नौकरी या चिकित्सालय खोल सकते थे; पर वे संघ के प्रचारक के नाते अपना जीवन बिताने का निश्चय कर चुके थे। उन्हें मुम्बई में बान्द्रा से विरार और फिर चेम्बूर तक का क्षेत्र शाखाओं के विस्तार के लिए सौंपा गया। माधवराव ने अपनी साइकिल के बल पर अनेक नयी शाखाएँ खोलीं। उनके मधुर व्यवहार और परिश्रम से प्रभावित होकर सैकड़ों नये कार्यकर्ता संघ से जुड़े। 


उनकी संगठन क्षमता, वार्तालाप की सुमधुर शैली और युवाओं के बीच लोकप्रियता देखकर 1961 में उन्हें मुम्बई नगर का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का संगठन मन्त्री बनाया गया। उस समय यह संगठन नया था; पर माधवराव ने अपने परिश्रम से इसमें जान डाल दी। इसके बाद सम्पूर्ण महाराष्ट्र प्रदेश का काम उन्हें सौंपा गया। 1962-63 में वे विद्यार्थी परिषद के अखिल भारतीय महामन्त्री बनाये गये। 


माधवराव की रुचि चिकित्सा सेवा की ओर भी थी। उन दिनों मुम्बई में ‘नाना पालकर स्मृति समिति’ स्थापित हुई थी। संघ के प्रचारक नाना पालकर का 1967 में पीलिया से देहान्त हुआ था। मुम्बई में बाहर से अनेक स्वयंसेवक इलाज के लिए आते थे। उनके निवास की व्यवस्था, उचित अस्पताल और खर्च में उनका इलाज हो जाए, यह कार्य समिति करती थी। माधवराव की सेवा में रुचि देखते हुए उन्हें इस समिति का काम सौंपा गया।


प्रारम्भ में इनके पास बहुत छोटा स्थान था। वहाँ चार-पाँच लोग ही रह सकते थे। अतः माधवराव ने नया और विशाल भवन बनवाने की योजना सबके सामने रखी। अनेक कार्यकर्ता उनके साथ जुट गये। इन सबकी प्रामाणिकता और लगन देखकर मुम्बई महानगर पालिका के अधिकारियों ने परेल में एक बड़ा भूखण्ड इन्हें दे दिया। थोड़े ही समय में वहाँ एक सात मंजिला भवन बन गया।


भवन का उद्घाटन तत्कालीन सरसंघचालक मा. रज्जू भैया, पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी और स्वाध्याय परिवार के पांडुरंग शास्त्री आठवले जी महाराज की उपस्थिति में हुआ। इस भवन का निर्माण कार्य सरल नहीं था; पर माधवराव ने हर समस्या को शान्ति एवं धैर्य के साथ हल किया। उनकी प्रेरणा के केन्द्र संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी थे, जो उन्हें पुत्रवत स्नेह करते थे।


माधवराव परलकर योग के भी अच्छे जानकार थे। आपातकाल में जब उन्हें नासिक जेल में बन्दी बनाकर रखा गया, तो उन्होंने वहाँ भी योग की कक्षाएँ लगायीं। इससे राजनीतिक तथा अन्य बन्दी भी लाभान्वित हुए। नाना पालकर स्मृति संस्थान में भी उनके दिशा-निर्देशन में योगाभ्यास होता था। स्वयं चिकित्सक होने के कारण वे भी रोगियों का निःशुल्क उपचार करते थे। 


सेवा की सचल प्रतिमूर्ति माधवराव का 81 वर्ष की अवस्था में 22 फरवरी, 2008 को मुम्बई में ही निधन हुआ। उनकी लगन और निष्ठा से आज भी वहाँ के कार्यकर्ता प्रेरणा पा रहे हैं।

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस


                                         अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस


 International Mother Language Day 2021: जानें क्यों मनाया जाता है 'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस', क्या है इस बार की थीम International Mother Language Day 2021: विश्व भर में 21 फरवरी को "अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में अपनी भाषा-संस्कृति (Language culture) के प्रति लोगों में रुझान पैदा करना और जागरुकता फैलाना है. वर्ष 1999 में मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा यूनेस्को (UNESCO) द्वारा की गई थी. वर्ष 2000 में पहली बार इस दिन को "अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" के रूप में मनाया गया था.



जाने इस दिन का इतिहास


वर्ष 1952 में ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी मातृभाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए 21 फरवरी को एक आंदोलन किया गया था. इसमें शहीद हुए युवाओं की स्मृति में ही यूनेस्को ने पहली बार वर्ष 1999 में 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी. इस दिवस को पहली बार yवर्ष 2000 में "अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" के रूप में मनाया गया था.


वर्ष 2021 की थीम

"अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" के लिए यूनेस्को द्वारा हर साल एक थीम (विषय) निर्धारित की जाती है. इस दिन दुनिया भर में भाषा और संस्कृति से जुड़े अलग-अलग तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. ज्यादातर कार्यक्रम निर्धारित की गयी थीम पर ही आधारित होते हैं. वर्ष 2021 के लिए इस दिन की थीम रखी गई है, “Fostering multilingualism for inclusion in education and society” यानि "शिक्षा और समाज में समावेश के लिए बहुभाषावाद को बढ़ावा देना".


ये है इस दिन को मनाने का उद्देश्य


मनुष्य के जीवन में भाषा की अहम भूमिका है. भाषा के ज़रिये ही देश और विदेशों के साथ संवाद स्थापित किया जा सकता है. इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष 21 फरवरी के दिन को "अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" के रूप में मनाया जाता है. इस दिन को मनाये जाने का उद्देश्य विश्व भर में भाषायी और सांस्कृतिक विविधता एवं बहुभाषिता का प्रसार करना और दुनिया में विभिन्न मातृभाषाओं के प्रति जागरुकता लाना है.


विश्व भर में बोली जाती हैं इतनी भाषाएं, भारत में हैं 1652 भाषाएं


विश्व में जो भाषाएं सबसे ज्यादा बोली जाती हैं. उनमें अंग्रेजी, जैपनीज़, स्पैनिश,  हिंदी, बांग्ला, रूसी, पंजाबी, पुर्तगाली, अरबी भाषा शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग 6900 भाषाएं हैं जो विश्व भर में बोली जाती हैं. इनमें से 90 प्रतिशत भाषाएं बोलने वाले लोग एक लाख से भी कम हैं. भारत की बात करें तो 1961 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती हैं.

अमर बलिदानी वीरेन्द्रनाथ दत्त,कस्तूरबा गांधी,

21 फरवरी/बलिदान-दिवस

                 अमर बलिदानी वीरेन्द्रनाथ दत्त

क्रान्तिकारी वीरेन्द्रनाथ दत्त गुप्त का जन्म 20 जून, 1889 को बालीगाँव हाट (साहीगंज, बंगाल) में हुआ था। उनके पिता श्री उमाचरण का देहान्त तब ही हो गया था, जब वे केवल नौ वर्ष के थे। माता वसन्त कुमारी की गोद में पले वीरेन्द्र ने बालीगाँव हाट, साहीगंज और कोलकाता में शिक्षा पायी। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे कक्षा दस की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाये।

उन दिनों विप्लवी दल ‘सुहृद समिति’ के कार्यकर्ता सतीश चन्द्र सेन राधानाथ हाईस्कूल में पढ़ाते थे। उन्होंने वीरेन्द्र को समिति में भर्ती कर प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया। वे उसी गाँव में तरुणों को व्यायाम के साथ ही लाठी व छुरेबाजी का अभ्यास कराते थे। 

इससे वहाँ के मुस्लिम बहुत नाराज होते थे। उन्होंने कई बार उस व्यायामशाला में उपद्रव करने का प्रयास किया; पर वीरेन्द्र तथा उसके साथियों की उग्र तैयारी देखकर वे पीछे हट गये। यद्यपि ‘आत्मोन्नति समिति’ के चाँदपुर, हमालपुर आदि स्थानों पर चल रहे व्यायाम केन्द्रों पर वे हमला करने में सफल रहे। उन दिनों इसी प्रकार के नामों से क्रान्तिकारी युवक एकत्र होते थे।

उन दिनों पुलिस उपाधीक्षक मौलवी शम्सुल आलम अलीपुर बम काण्ड की जाँच कर रहा था। वह अंग्रेज भक्त तथा लीगी मानसिकता का व्यक्ति था। उसकी इच्छा थी कि अधिकाधिक क्रान्तिकारियों को फाँसी के फन्दे तक पहुँचाया जाये। हावड़ा षड्यन्त्र केस में भी इसके प्रयास से अनेक क्रान्तिकारियों को लम्बी सजा हुई थी। 

इसने अलीपुर काण्ड में 40 हिन्दू युवकों को आरोपी बनाकर 206 झूठे गवाह न्यायालय में खड़े किये। इस पर ‘विवेकानन्द समिति’ के नाम से काम कर रहे विप्लवियों ने शम्सुल आलम को उसके पापों का दण्ड देकर जहन्नुम भेजने का निर्णय ले लिया।

यह काम सतीश सरकार, यतीश मजूमदार और वीरेन्द्रनाथ दत्त को सौंपा गया। सुरेश मजूमदार ने वीरेन्द्र को रिवाल्वर दिया और वे सब 24 जनवरी, 1910 को न्यायालय पहुँच गये। उस दिन वहाँ अलीपुर बम काण्ड की सुनवाई शुरू हुई। 

मौलवी शम्सुल आलम बड़ी तत्परता से अपने काम में लगा था। क्रान्तिकारी भी ताक में थे। अचानक शम्सुल किसी काम से न्यायालय से बाहर आया, बस वीरेन्द्र दत्त ने निशाना साधकर गोली दाग दी। शम्सुल के मुँह से ‘या खुदा’ निकला और उसने वहीं दम तोड़ दिया।

सतीश मजूमदार तो वहाँ से फरार होने में सफल हो गये; पर वीरेन्द्र ने बचने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया। अतः वे पुलिस की शिकंजे में फँस गये। इसके कुछ समय बाद इस काण्ड से जुड़े कुछ अन्य क्रान्तिकारी भी पुलिस की गिरफ्त में आ गये; पर शम्सुल के वध से इतना लाभ अवश्य हुआ कि गवाहों के मन में भय बैठ गया। पुलिस केवल छह युवकों पर ही आरोप सिद्ध कर सकी। इसका श्रेय निःसन्देह वीरेन्द्र दत्त को ही है।

पुलिस ने वीरेन्द्र पर अनेक अत्याचार किये; पर वे उससे कोई रहस्य नहीं उगलवा सके। अन्ततः न्यायाधीश लारेन्स जेकिन्स ने वीरेन्द्र को फाँसी की सजा सुना दी। फाँसी से एक दिन पूर्व वीरेन्द्र के बड़े भाई धीरेन्द्र दत्त मिलने आये, तो वीरेन्द्र ने कहा, ‘‘दादा, यह गर्व करने की बात है कि कल मैं मातृभूमि की सेवा में फाँसी पर चढ़ रहा हूँ। यह समय आनन्द का है, शोक का नहीं।’’

21 फरवरी, 1910 को वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुए वीर वीरेन्द्रनाथ दत्त फाँसी पर झूल गये।
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21 फरवरी/पुण्य-तिथि

     गांधी जी के जीवन में कस्तूरबा का योगदान

मोहनदास करमचन्द गांधी को सारा भारत ही क्या, सारा विश्व जानता है; पर उन्हें गोधी जी के रूप में आगे बढ़ाने के लिए जिस महिला ने अन्तिम समय तक सहारा और उत्साह प्रदान किया, वह थीं उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी, जो ‘बा’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यह बात गांधी जी ने कई बार स्वयं स्वीकार की है कि उन्हें महान बनाने का श्रेय उनकी पत्नी को है। बा के बिना गांधी जी स्वयं को अपूर्ण मानते थे।

कस्तूरबा का जन्म पोरबन्दर, गुजरात के कापड़िया परिवार में अपै्रल, 1869 में हुआ था। उनके पिता पोरबन्दर के नगराध्यक्ष रह चुके थे। इस प्रकार कस्तूरबा को राजनीतिक और सामाजिक जीवन विरासत में मिला। उस समय की सामाजिक परम्पराओं के अनुसार उन्हें विद्यालय की शिक्षा कम और घरेलू कामकाज की शिक्षा अधिक दी गयी। 13 साल की छोटी अवस्था में उनका विवाह अपने से पाँच महीने छोटे मोहनदास करमचन्द गांधी से हो गया।

वे गांधी परिवार की सबसे छोटी पुत्रवधू थीं। विवाह के बाद एक सामान्य हिन्दू नारी की तरह बा ने अपनी इच्छा और आकांक्षाओं को अपने पति और उनके परिवार के प्रति समर्पित कर दिया। फिर तो गांधी जी ने जिस मार्ग की ओर संकेत किया, बा ना-नुकुर किये बिना उस पर चलती रहीं। 

दक्षिण अफ्रीका के प्रवास में जब गांधी जी ने सत्याग्रह के शस्त्र को अपनाया, तो कस्तूरबा उनके साथ ही थीं। भारत में भी जितने कार्यक्रम गांधी जी ने हाथ में लिये, सबमें उनकी पत्नी की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। मार्च, 1930 में नमक कानून के उल्लंघन के लिए दाण्डी यात्रा का निर्णय हुआ। यद्यपि उस यात्रा में बा साथ नहीं चलीं; पर उसकी पूर्व तैयारी में उन्होंने कोई कसर नहीं रखी। यात्रा के बाद जब गांधी जी को यरवदा जेल ले जाया गया, तो उन्होंने बा को एक बहादुर स्त्री की तरह आचरण करने का सन्देश दिया। 

बा ने इसे जीवन में उतार कर अपना मनोबल कम नहीं होने दिया। जेल से गांधी जी ने उनके लिए एक साड़ी भेजी, जो उन्होंने स्वयं सूत कातकर तैयार की थी। यह इस बात का प्रतीक था कि गांधी जी के हृदय में बा के लिए कितना प्रेम एवं आदर था।

गांधी जी प्रायः आन्दोलन की तैयारी के लिए देश भर में प्रवास करते रहते थे; पर पीछे से बा शान्त नहीं बैठती थीं। वे भी महिलाओं से मिलकर उन्हें सत्याग्रह, शराब बन्दी, स्वदेशी का प्रयोग तथा विदेशी कपड़ों की होली जैसे कार्यक्रमों के लिए तैयार करती रहती थीं। जब गांधी जी यरवदा जेल से छूटकर वायसराय से मिलने शिमला गये, तो बा भी उनके साथ गयीं और वायसराय की पत्नी को देश की जनता की भावनाओं से अवगत कराया।

कांग्रेस ने दो अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ करने का प्रस्ताव पास किया। गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। 9 अगस्त की शाम को मुम्बई के शिवाजी पार्क में एक विशाल रैली होने वाली थी; पर दिन में ही गंाधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर बा ने घोषणा कर दी कि रैली अवश्य होगी और वे उसे सम्बोधित करेंगी। इस पर शासन ने उन्हें भी गिरफ्तार कर आगा खाँ महल में बन्द कर दिया।

जेल में बा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था; पर उन्होंने किसी भी कीमत पर झुकना स्वीकार नहीं किया। 21 फरवरी, 1944 को बा ने अन्तिम साँस ली और वहीं आगा खाँ महल में उनका अन्तिम संस्कार कर दिया गया।
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21 फरवरी/पुण्य-तिथि

                    कित्तूर की वीर रानी चेन्नम्मा

कर्नाटक में चेन्नम्मा नामक दो वीर रानियां हुई हैं। केलाड़ी की चेन्नम्मा ने औरंगजेब से, जबकि कित्त्ूार की चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से संघर्ष किया था। 

कित्तूर के शासक मल्लसर्ज की रुद्रम्मा तथा चेन्नम्मा नामक दो रानियां थीं। काकतीय राजवंश की कन्या चेन्नम्मा को बचपन से ही वीरतापूर्ण कार्य करने में आनंद आता था। वह पुरुष वेश में शिकार करने जाती थी। ऐसे ही एक प्रसंग में मल्लसर्ज की उससे भेंट हुई। उसने चेन्नम्मा की वीरता से प्रभावित होकर उसे अपनी दूसरी पत्नी बना लिया। 

कित्तूर पर एक ओर टीपू सुल्तान तो दूसरी ओर अंग्रेज नजरें गड़ाये थे। दुर्भाग्यवश चेन्नम्मा के पुत्र शिव बसवराज और फिर कुछ समय बाद पति का भी देहांत हो गया। ऐसे में बड़ी रानी के पुत्र शिवरुद्र सर्ज ने शासन संभाला; पर वह पिता की भांति वीर तथा कुशल शासक नहीं था। स्वार्थी दरबारियों की सलाह पर उसने मराठों और अंग्रेजों के संघर्ष में अंग्रेजों का साथ दिया। 

अंग्रेजों ने जीतने के बाद सन्धि के अनुसार कित्तूर को भी अपने अधीन कर लिया। कुछ समय बाद बीमारी से राजा शिवरुद्र सर्ज का देहांत हो गया। चेन्नम्मा ने शिवरुद्र के दत्तक पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज को युवराज बना दिया।

पर अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को नहीं माना तथा राज्य की देखभाल के लिए धारवाड़ के कलैक्टर थैकरे को अपना राजनीतिक दूत बनाकर वहां बैठा दिया। कित्तूर राज्य के दोनों प्रमुख दीवान मल्लप्पा शेट्टी तथा वेंकटराव भी रानी से नाराज थे। वे अंदर ही अंदर अंग्रेजों से मिले थे। 

थैकरे ने रानी को संदेश भेजा कि वह सारे अधिकार तुरंत मल्लप्पा शेट्टी को सौंप दे। रानी ने यह आदेश ठुकरा दिया। वे समझ गयीं कि अब देश और धर्म की रक्षा के लिए लड़ने-मरने का समय आ गया है। रानी अपनी प्रजा को मातृवत प्रेम करती थीं। अतः उनके आह्नान पर प्रजा भी तैयार हो गयी। गुरु सिद्दप्पा जैसे दीवान तथा बालण्णा, रायण्णा, जगवीर एवं चेन्नवासप्पा जैसे देशभक्त योद्धा रानी के साथ थे।

23 अक्तूबर, 1824 को अंग्रेज सेना ने थैकरे के नेतृत्व में किले को घेर लिया। रानी ने वीर वेश धारण कर अपनी सेना के साथ विरोधियों को मुंहतोड़ उत्तर दिया। थैकरे वहीं मारा गया और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। कई अंग्रेज सैनिक तथा अधिकारी पकड़े गये, जिन्हें रानी ने बाद में छोड़ दिया; पर देशद्रोही दीवान मल्लप्पा शेट्टी तथा वेंकटराव को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

स्वाधीनता की आग अब कित्तूर के आसपास भी फैलने लगी थी। अतः अंग्रेजों ने मुंबई तथा मद्रास से कुमुक मंगाकर फिर धावा बोला। उन्हें इस बार भी मुंह की खानी पड़ी; पर तीसरे युद्ध में उन्होंने एक किलेदार शिव बासप्पा को अपने साथ मिला लिया। उसने बारूद में सूखा गोबर मिलवा दिया तथा किले के कई भेद शत्रुओं को दे दिये। अतः रानी को पराजित होना पड़ा।

अंग्रेजों ने गुरु सिद्दप्पा को फांसी पर चढ़ाकर रानी को धारवाड़ की जेल में बंद कर दिया। देशभक्त जनता ने रानी को मुक्त कराने का प्रयास किया; पर वे असफल रहे। पांच वर्ष के कठोर कारावास के बाद 21 फरवरी, 1929 को धारवाड़ की जेल में ही वीर रानी चेन्नम्मा का देहांत हुआ।

रानी ने 23 अक्तूबर को अंग्रेजों को ललकारा था। उनकी याद में इस दिन को दक्षिण भारत में ‘महिला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

(संदर्भ : क्रांतिकारी कोश, स्वतंत्रता सेनानी सचित्र कोश, राष्ट्रधर्म अपै्रल 2011)
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21 फरवरी/जन्म-दिवस

      विदेशी शरीर में भारतीय आत्मा श्रीमां

21 फरवरी, 1878 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में जन्मी श्रीमां का पूर्व नाम मीरा अल्फांसा था। उनके पिता श्री मोरिस एक बैंकर तथा माता श्रीमती मातिल्डा अल्फांसा थीं। उनके मिस्र के राजघराने से रक्त संबंध थे। अभिभावकों ने उनका नाम परम कृष्णभक्त मीराबाई के नाम पर क्यों रखा, यह कहना कठिन है; पर इससे उनके भावी जीवन का मार्ग अवश्य प्रशस्त हो गया। चार वर्ष की अवस्था से ही वे कुर्सी पर बैठकर ध्यान करने लगी थी। उन्हें लगता कि एक ज्योति शिरोमंडल में प्रवेश कर असीम शांति प्रदान करती है। सामान्य बच्चों की तरह खेलकूद में मीरा की कोई रुचि नहीं थी। 

12-13  वर्ष की अवस्था तक वे कई घंटे ध्यान में डूबने लगीं। इधर पढ़ाई में वे सामान्य पाठ्यक्रम के साथ ही गीत, संगीत, नृत्य, साहित्य, चित्रकला आदि में भी खूब रुचि लेती थीं। उन्हें लगता था कि उनका सूक्ष्म शरीर रात में भौतिक शरीर से बाहर निकल जाता है। उन्हें लगता कि उनका विशाल सुनहरा परिधान पूरे पेरिस नगर के ऊपर छाया हुआ है, जिसके नीचे आकर और उसे छूकर दुनिया के हजारों लोग अपने दुखों से मुक्ति पा रहे हैं। 

मीरा को नींद में ही कई ऋषियों से अनेक अलौकिक शिक्षाएं मिलीं। एक प्रभावी व्यक्तित्व उन्हें प्रायः दिखाई देता था, जिसे वे कृष्ण कहती थीं। उन्हें लगता था कि वे इस धरा पर हैं और उनके साथ रहकर ही उन्हें कार्य करना है। आगे चलकर उन्होंने अल्जीरिया के ‘तेमसेम’ नामक स्थान पर गुह्य विद्या के गुरु ‘तेओ’ दम्पति से इसकी विधिवत शिक्षा ली। इससे उनमें कहीं भी प्रकट होने तथा सूक्ष्म जगत की घटनाओं के बारे में जानने की क्षमता आ गयी। 

1904 में एक योगी ने उन्हें गीता का फ्रेंच अनुवाद दिया। इसे पढ़कर मीरा के मन में भारत और हिन्दू धर्म को जानने की जिज्ञासा बढ़ गयी। उन्हें किसी ने एक गुह्य चक्र यह कहकर दिया था कि जो इसका रहस्य बताएगा, वही उनका पथ प्रदर्शक होगा। उन दिनों पांडिचेरी फ्रांस के अधीन था तथा एक सांसद वहां से चुना जाता था। मीरा के पति पॉल रिशार इसके लिए पांडिचेरी आये। 

आते समय मीरा ने वह गुह्य चक्र उन्हें देकर किसी योगी से उसका रहस्य पूछने को कहा था। श्री अरविंद ने यह रहस्य उन्हें बता दिया। जब पति ने वापस जाकर मीरा को यह कहा, तो मीरा तुरन्त पांडिचेरी के लिए चल दीं। 29 मार्च, 1914 को उन दोनों की भेंट हुई। श्री अरविंद उनका स्वागत करने के लिए आश्रम के द्वार पर खड़े थे। मीरा ने देखा कि वे ध्यान के समय जिस महामानव के दर्शन करती थीं, वह श्रीकृष्ण वस्तुतः श्री अरविन्द ही हैं।

मीरा एक वर्ष वहां रहकर फिर फ्रांस, जापान आदि गयीं। इसके बाद वे 24 अपै्रल, 1920 को सदा के लिए पांडिचेरी आ गयीं। नवम्बर 1926 में श्री अरविंद ने आश्रम का पूरा कार्यभार उन्हें सौंप दिया। उनके नेतृत्व में हजारों लोग आश्रम से जुडे़ तथा ओरोविल में ‘श्री अरविंद अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र’ जैसी कई नयी गतिविधियां प्रारम्भ हुईं, जो आज भी चल रही हैं।

श्रीमां का शरीर भले ही विदेशी था; पर उनकी आत्मा भारतीय थी। वे भारत को अपना असली देश तथा श्री अरविंद की महान शिक्षाओं को मूर्त रूप देना ही अपने जीवन का लक्ष्य मानती थीं। वे कहती थीं कि जगत का गुरु बनना ही भारत की नियति है। 17 नवम्बर, 1973 को अपनी देह त्यागकर वे सदा के लिए अपने पथ प्रदर्शक श्रीकृष्ण के चरणों में लीन हो गयीं। 

(संदर्भ : हिन्दू विश्व तथा पांचजन्य)

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले

 20 फरवरी/जन्म-दिवस


              समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले


महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 20 फरवरी, 1827 को पुणे (महाराष्ट्र) में हुआ था। इनके पिता श्री गोविन्दराव फूलों की खेती से जीवनयापन करते थे। इस कारण इनका परिवार फुले कहलाता था। महाराष्ट्र में उन दिनों छुआछूत की बीमारी चरम पर थी। अछूत जाति के लोगों को अपने चलने से अपवित्र हुई सड़क की सफाई के लिए कमर में पीछे की ओर लम्बा झाड़ू बाँधकर तथा थूकने के लिए गले में एक लोटा लटकाकर चलना होता था।


ज्योतिबा का जन्म भी ऐसी ही जाति में हुआ था। एक वर्ष की अवस्था में उनकी माँ का देहान्त हो गया। अछूत बच्चे उन दिनों विद्यालय नहीं जाते थे; पर समाज के विरोध के बावजूद गोविन्दराव ने ज्योति को शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय भेजा। खेत में फूलों की देखभाल करते हुए भी वे पढ़ने का समय निकाल लेते थे। इस प्रकार वे सातवीं तक पढ़े। 


14 वर्ष की अवस्था में ज्योति का विवाह आठ वर्षीय सावित्रीबाई से हो गया। पढ़ाई में रुचि देखकर उनके पड़ोसी मुंशी गफ्फार तथा पादरी लेजिट ने उन्हें मिशनरी विद्यालय में भर्ती करा दिया। वहाँ सभी जातियों के छात्रों से उनकी मित्रता हुई। एक बार ज्योति के एक ब्राह्मण मित्र ने उन्हें अपने विवाह में बुलाया। वहाँ कुछ कट्टरपन्थी पंडितों ने उन्हें बुरी तरह अपमानित किया। इससे नवयुवक ज्योति के मन को बहुत चोट लगी और उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता तथा कुरीतियों को समाप्त करने का संकल्प ले लिया।


एक बार ज्योति अपने मित्र सदाशिव गोविन्दे से मिलने अहमदनगर गये। वहाँ ईसाइयों द्वारा संचालित स्त्री पाठशालाओं से वे बहुत प्रभावित हुए। पुणे आकर ज्योति ने अपने मित्र भिड़े के घर में स्त्री पाठशाला खोल दी। बड़ी संख्या में निर्धन लड़कियाँ वहाँ आने लगीं। कट्टरपन्थियों ने इसका विरोध किया। 


जब सावित्रीबाई पढ़ने जाती, तो वे उस पर कूड़ा और पत्थर फेंकते। उन्होंने गोविन्दराव को मजबूर किया कि वे ज्योति को घर से अलग कर दें। इस पर गोविन्दे ने उन्हें अहमदनगर बुला लिया। वहाँ उनकी पत्नी ने सावित्री को घर पर पढ़ाया। पुणे आकर गोविन्दे व अण्णा साहब आदि समाजसेवियों के सहयोग से उन्होंने कई विद्यालय खोले। सावित्रीबाई ने यह सारा काम सँभाल लिया। 


ज्योतिबा फुले ने समाज जागरण और छुआछूत निवारण के लिए 23 सितम्बर, 1873 को पुणे में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। इनके कार्यकर्ता सिर पर साफा, गले में ढोल तथा कन्धे पर कम्बल रखते थे। ढोल बजाकर वे जनजागरण करते थे। उनका मत था कि पुनर्जन्म, मूर्तिपूजा, खर्चीले विवाह और अन्धविश्वास छोड़ने से ही उनका उद्धार होगा। ज्योतिबा ने 1860 में विधवाओं तथा उनके बच्चों के लिए एक आश्रम भी खोला।


1876 में वे पुणे नगरपालिका के सदस्य मनोनीत हुए। उन्होंने गरीब बस्तियों में शराबखानों के बदले पानी, पुस्तकालय, विद्यालय आदि खुलवाये तथा गरीबों को सस्ते में दुकानें दिलवायीं। नगरपालिका द्वारा ब्राह्मणों व भिखारियों को दी जाने वाली सरकारी सहायता रोककर उससे साहित्यकारों को पुरस्कृत करवाया। पुणे नगर के आसपास उन्होंने अनेक सुन्दर बाग लगवाये।


उन्होंने मराठी में ब्राह्मणांचे कसब, शिवाजी चा पोवाड़ा, शेतक यात्रा आसूड, इशारा, कैफियत... आदि अनेक पुस्तकें लिखीं तथा ‘सतसार’ नामक पत्रिका निकाली। साठ वर्ष का होने पर मुम्बई में उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया और उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गयी। 21 नवम्बर, 1890 को इस महान समाज सुधारक का देहान्त हो गया।

विटामिन तथा उनके रासायनिक नाम

 ☘️ *_जानिये भिन्न भिन्न प्रकार के विटामिन्स को, उनके रासायनिक नाम,कमी से होने वाले रोग और स्त्रोतो को_*

           विटामिन तथा उनके रासायनिक नाम


  विटामिन- A

रासायनिक नाम : रेटिनाॅल

कमी से रोग: रतौंधी

स्त्रोत : 🥕गाजर,🥛 दूध, 🥚अण्डा ,🍓फल🍉


  विटामिन – B1

रासायनिक नाम: थायमिन

कमी से रोग: बेरी-बेरी

स्त्रोत : 🥜मुंगफली, आलू, 🥦सब्जीयाँ🍆


   विटामिन – B2

रासायनिक नाम: राइबोफ्लेबिन

कमी से रोग: त्वचा फटना, आँख का रोग

स्त्रोत : 🥚अण्डा,🥛 दूध,🥦 हरी सब्जियाँ


   विटामिन – B3

रासायनिक नाम: पैण्टोथेनिक अम्ल

कमी से रोग: पैरों में जलन, बाल सफेद

स्त्रोत :🍗 मांस🍖,🥛 दूध, 🍅टमाटर, मुँगफली🥜


  विटामिन- B5

रासायनिक नाम: निकोटिनेमाइड (नियासिन)

कमी से रोग: मासिक विकार (पेलाग्रा)

स्त्रोत : 🍗मांस🍖, 🥜मूंगफली, आलू


   विटामिन- B6

रासायनिक नाम: पाइरीडाॅक्सिन

कमी से रोग: एनीमिया, त्वचा रोग

स्त्रोत : 🥛दूध, 🍗मांस,🥦 सब्जी🍆


   विटामिन – H / B7

रासायनिक नाम: बायोटिन

कमी से रोग: बालों का गिरना , चर्म रोग

स्त्रोत : यीस्ट, गेहूँ, 🥚अण्डा


   विटामिन – B12

रासायनिक नाम: सायनोकोबालमिन

कमी से रोग: एनीमिया, पाण्डू रोग

स्त्रोत : 🍗मांस, 🍖कजेली, 🥛दूध


   विटामिन- C

रासायनिक नाम: एस्कार्बिक एसिड

कमी से रोग: स्कर्वी, मसूड़ों का फुलना

स्त्रोत : आँवला, 🍋नींबू, 🍑संतरा, 🍊नारंगी


   विटामिन – D

रासायनिक नाम: कैल्सिफेराॅल

कमी से रोग: रिकेट्स

स्त्रोत :☀ सूर्य का प्रकाश,🥛 दूध, अण्डा🥚


   विटामिन – E

रासायनिक नाम: टेकोफेराॅल

कमी से रोग: जनन शक्ति का कम होना

स्त्रोत: 🥦हरी सब्जी, 🍚मक्खन, दूध🥛


   विटामिन- K

रासायनिक नाम: फिलोक्वीनाॅन

कमी से रोग: रक्त का थक्का न बनना

स्त्रोत: 🍅टमाटर, 🥦हरी सब्जियाँ, 🥛दूध


स्वस्थ और सबल भारत

( ͡° ͜ʖ ͡°)