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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

इतिहास पुरुष ठाकुर रामसिंह, परावर्तन के योद्धा राजेश्वर जी

 16 फरवरी/जन्म-दिवस



                  इतिहास पुरुष ठाकुर रामसिंह


ऐसा कहा जाता है कि शस्त्र या विष से तो एक-दो लोगों की ही हत्या की जा सकती है; पर यदि किसी देश के इतिहास को बिगाड़ दिया जाये, तो लगातार कई पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं। हमारे इतिहास के साथ दुर्भाग्य से ऐसा ही हुआ। रा.स्व.संघ के कार्यकर्ता इस भूल को सुधारने में लगे हैं। 

बाबा साहब आप्टे एवं मोरोपन्त पिंगले के बाद इस काम को बढ़ाने वाले ठाकुर रामसिंह जी का जन्म 16 फरवरी, 1915 को ग्राम झंडवी (जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश) में श्री भागसिंह एवं श्रीमती नियातु देवी के घर में हुआ था। उन्होंने लाहौर के सनातन धर्म कॉलिज से बी.ए. और क्रिश्चियन कॉलिज से इतिहास में स्वर्ण पदक के साथ एम.ए. किया। वे हॉकी के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। एम.ए. करते समय अपने मित्र बलराज मधोक के आग्रह पर वे शाखा में आये। क्रिश्चियन कॉलिज के प्राचार्य व प्रबन्धकों ने इन्हें अच्छे वेतन पर अपने यहां प्राध्यापक बनने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।  

1942 में खण्डवा (म.प्र.) से संघ शिक्षा वर्ग, प्रथम वर्ष कर वे प्रचारक बन गये। उस साल लाहौर से 58 युवक प्रचारक बने थे, जिसमें से 10 ठाकुर जी के प्रयास से निकले। कांगड़ा जिले के बाद वे अमृतसर के विभाग प्रचारक रहे। विभाजन के समय हिन्दुओं की सुरक्षा और मुस्लिम गुंडों को मुंहतोड़ जवाब देने में वे अग्रणी रहे। उनके संगठन कौशल के कारण 1948 के प्रतिबन्ध काल में अमृतसर विभाग से 5,000 स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया।

1949 में श्री गुरुजी ने उन्हें पूर्वाेत्तर भारत भेज दिया। वहां उन्होंने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में संघ कार्य की नींव डाली। एक दुर्घटना में उनकी एक आंख और घुटने में भारी चोट आयी, जो जीवन भर ठीक नहीं हुई। 1962 में चीन के सैनिकों के असम में घुसने की आशंका से लोगों में भगदड़ मच गयी। ऐसे समय में उन्होंने पूरे प्रान्त और विशेषकर तेजपुर जिले के स्वयंसेवकों को नगर और गांवों में डटे रहकर प्रशासन का सहयोग करने को कहा। इससे जनता का मनोबल बढ़ा, अफवाहें शान्त हुईं और वातावरण ठीक हो गया।

1971 में वे पंजाब के सहप्रान्त प्रचारक, 1974 में प्रांत प्रचारक, 1978 में सहक्षेत्र प्रचारक और फिर क्षेत्र प्रचारक बने। इस दौरान उन्होंने दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर का व्यापक प्रवास किया।
उन्हें अपनी रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल पर बहुत भरोसा था। सैकड़ों कि.मी. की यात्रा वे इसी से कर लेते थे। बुलन्द आवाज के धनी ठाकुर जी ने इस क्षेत्र से लगभग 100 युवकों को प्रचारक बनाया, जिसमें से कई आज भी कार्यरत हैं।

आपातकाल में ठाकुर रामसिंह का केन्द्र दिल्ली था। उन्होंने भूमिगत रहते हुए आंदोलन के साथ ही जेल गये स्वयंसेवक परिवारों को भी संभाला। इस दौरान उन्होंने न अपना वेष बदला और न मोटरसाइकिल। फिर भी पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। 1984 से वेे ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ के काम में लग गये। 1991 में वे इसके अध्यक्ष बने। 

2002 में स्वास्थ्य के कारण उन्होंने जिम्मेदारी छोड़ दी; पर वे नये कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देते रहे। उनके प्रयास से सरस्वती नदी, आर्य आक्रमण, सिकंदर की विजय जैसे विषयों पर हुए शोध ने विदेशी और वामपंथी इतिहासकारों को झूठा सिद्ध कर दिया।

2006 में हमीरपुर जिले के ग्राम नेरी में ‘ठाकुर जगदेवचंद स्मृति इतिहास शोध संस्थान’ की स्थापना कर वे भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की साधना में लग गये। 94 वर्ष की अवस्था तक वे अकेले प्रवास करते थे। कमर झुकने पर भी उन्होंने चलने में कभी छड़ी या किसी व्यक्ति का सहयोग नहीं लिया। 

छह सितम्बर, 2010 को लुधियाना में संघ के वयोवृद्ध प्रचारक एवं भारतीय इतिहास के इस पुरोधा का देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार उनका दाह संस्कार उनके गांव में ही किया गया। 

(संदर्भ : पांचजन्य 19.9.10)
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16 फरवरी/जन्म-दिवस

                  परावर्तन के योद्धा राजेश्वर जी 


भारतवर्ष के सभी मुसलमानों व ईसाइयों के पूर्वज हिन्दू हैं। उन्हें अपने पूर्वजों के पवित्र धर्म में वापस लाने के महान कार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले श्री राजेश्वर जी का जन्म 16 फरवरी, 1916 को दिल्ली में श्री भगवानदास जी के घर में हुआ था। वे कक्षा में सदा प्रथम आते थे।

धनाभाव के कारण पिताजी ने इन्हें कक्षा दस के बाद पढ़ाने से मना कर दिया; पर इनके बड़े भाई श्री लुभाया राम के आग्रह पर पिताजी मान गये और फिर राजेश्वर जी ने ट्यूशन पढ़ाते हुए बी.एस-सी. किया। उन दिनों छुआछूत और जन्मना जातिभेद का जोर था; पर इन्होंने अपनी मां और भाभी को समझाकर रसोई में एक सफाईकर्मी के बेटे को काम पर रखा। इससे पड़ोसियों ने दो वर्ष तक इनके घर से खानपान का बहिष्कार किया। 

1934 में इन्होंने पचकुइया मार्ग पर देखा कि एक मुसलमान कुएं से पानी लेकर हरिजन महिलाओं की बाल्टियों में डाल रहा है। साथ ही वह उनसे गन्दे मजाक भी कर रहा था। उन दिनों हरिजन कुएं की मुंडेर पर अपने घड़े नहीं रख सकते थे। यह देखकर राजेश्वर जी प्रतिदिन वहां आकर घड़ों में पानी भरने लगे। इस पर उस मुसलमान से झगड़ा भी हुआ; पर राजेश्वर जी डटे रहे और फिर धीरे-धीरे वे महिलाएं स्वयं ही कुएं से पानी लेने लगीं।

उन दिनों सफाईकर्मी सिर पर मैला ढोकर ले जाते थे। 1939 में राजेश्वर जी शिमला में रहते थे। उन्होंने एक दिन सफाईकमियों के नेता सोहनलाल के साथ खाना बनाकर खाया। उसने बताया कि हिन्दुओं के व्यवहार से दुखी होकर वे सब धर्मान्तरण करने वाले थे; पर अब वे यह नहीं करेंगे। पहाड़गंज (दिल्ली) में अंधविश्वास के कारण कई हिन्दू महिलाएं नमाज से लौटते हुए मुसलमानों से बच्चों के मुंह पर फूंक लगवाती थीं। राजेश्वर जी ने अपने मित्रों के साथ ‘हिन्दू धर्म संघ’ नामक संस्था बनाकर इस कुप्रथा को बन्द कराया।

राजेश्वर जी कालबाह्य हो चुकी रूढ़ियों के विरोधी थे। 1941 में  उन्होंने प्रतीकात्मक दहेज लेकर अन्तरजातीय विवाह किया। इसके लिए जानबूझ कर वह तिथि चुनी, जिसमें विवाह वर्जित है। इसके बाद आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने बड़ी संख्या में अन्तरजातीय और दहेज रहित विवाह कराये। 

1946 में पहाड़गंज में मुसलमानों ने बकरीद पर गाय का जुलूस निकालकर उसे काटने की योजना बनाई। राजेश्वर जी ने अपने भाई बंसीलाल तथा एक स्वयंसेवक पूरनचंद के साथ उस जुलूस पर हमला कर गाय को छुड़ा लिया।

राजेश्वर जी सभी सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं में सक्रिय रहते थे। वे दक्षिण दिल्ली के विभाग संघचालक थे। 1983 में वि.हि.प. की बैठक में एक कार्यकर्ता ने कहा कि सब हिन्दुओं को एक-एक हरिजन महिला को बहिन बनाना चाहिए। राजेश्वर जी उसी दिन राममनोहर लोहिया अस्पताल की एक सफाईकर्मी महिला शान्तिदेवी को अपनी धर्म बहिन बनाकर घर लौटे।

राजेश्वर जी हिन्दुओं की घटती जनसंख्या से बहुत दुखी रहते थे। इसके लिए वे छुआछूत मिटाने और परावर्तन की गति बढ़ाने पर जोर देते थे। उन्होंने चार पूर्णकालिक कार्यकर्ता रखकर सैकड़ों मुसलमानों और ईसाइयों को समझाकर, बिना लालच के हिन्दू बनाया। कई हिन्दू कन्याओं को मुसलमानों के चंगुल में फंसने से भी बचाया। 

उन्होंने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए ‘परावर्तन क्यों और कैसे’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने अपनी पूरी सम्पत्ति अपने और पत्नी के नाम पर बनाये ‘राजेश्वर चंद्रकांता धर्मार्थ न्यास’ के नाम कर दी, जिससे उन दोनों के देहांत के बाद भी परावर्तन कार्य में बाधा न आये।

कहने की बजाय करने में अधिक विश्वास रखने वाले परावर्तन के इस महान योद्धा का देहांत 11 फरवरी, 1999 को हुआ। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. देवेंद्र भाई बहुत अच्छा आपने जो यह सब के बारे में बताते हैं बहुत ही अच्छा लगता है इसी तरह से आप अपने कार्य को करते रहे अति सुंदर होगा धन्यवाद

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