24 अप्रैल/जन्म-दिवस
राष्ट्रवादी पत्रकारिता के अग्रदूत के.नरेन्द्र
श्री के.नरेन्द्र उन राष्ट्रवादी पत्रकारों में अग्रणी थे, जो देश और धर्म पर होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध आजीवन अपने पाठकों को जाग्रत करते रहे। उनका जन्म 24 अप्रैल, 1914 को लाहौर में उर्दू के प्रखर पत्रकार महाशय कृष्ण जी के घर में हुआ था। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए उन्होंने उर्दू के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता में भी नये मानदंड स्थापित किये।
श्री के.नरेन्द्र के घर का वातावरण स्वाधीनता आंदोलन से अनुप्राणित था। कांग्रेस के बड़े नेता तथा क्रांतिकारी वहां आते रहते थे। लाला लाजपत राय तथा भाई परमानंद से प्रेरित होकर इनके बड़े भाई श्री वीरेन्द्र खुलकर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे। उन्होंने भगतसिंह के साथ अनेक अभियानों में भाग लिया। भगतसिंह की फांसी वाले दिन वे लाहौर जेल में ही थे।
महाशय जी लाहौर के एक प्रमुख आर्य समाजी नेता थे। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के प्रबल समर्थक होने के कारण उन्हें जेहादियों की ओर से प्रायः हत्या की धमकियां मिलती रहती थीं; पर वे कभी उनसे भयभीत नहीं हुए। अप्रैल, 1926 में ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक श्री राजपाल जी की हत्या के बाद उन्होंने सबसे पहले इसकी निंदा में अपने पत्र ‘प्रताप’ में लेख लिखा था।
अपने पिता और बड़े भाई के प्रभाव से श्री नरेन्द्र भी स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गये। पुलिस से लुकाछिपी चलती रहने के कारण उनके विद्यालय के अंग्रेज प्राचार्य ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया।विभाजन के बाद महाशय जी को लाहौर छोड़ना पड़ा। उन्होंने दिल्ली आकर हिन्दी में ‘वीर अर्जुन’ तथा उर्दू में ‘प्रताप’ समाचार पत्र निकाले। थोड़े ही समय में ये दोनों पत्र लोकप्रिय हो गये। पिताजी के बाद इनका काम श्री नरेन्द्र ने संभाल लिया।
लाहौर में रहते हुए ही श्री नरेन्द्र का सम्पर्क संघ से हुआ। विभाजन के समय उन्होंने संघ तथा आर्य समाज द्वारा संचालित शिविरों में जाकर सेवा तथा सुरक्षा कार्य में सहयोग दिया। गांधी जी की हत्या के बाद जब शासन ने संघ पर झूठे आरोप लगाये, तो श्री नरेन्द्र ने अपने पत्रों में उनका विरोध किया।
1952 में जब डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ ने ‘कश्मीर आंदोलन’ चलाया, तब भी श्री नरेन्द्र ने अपने पत्रों द्वारा उनका समर्थन किया। इतना ही नहीं, वे अनेक सभाओं में इसके पक्ष में भाषण देने भी गये।
श्री के.नरेन्द्र पर महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, भाई परमानंद और वीर सावरकर का बहुत प्रभाव था। अंग्रेजों ने वीर सावरकर के मुंबई स्थित मकान को जब्त कर लिया था। आजादी के बाद भी शासन ने उन्हें यह नहीं लौटाया। ऐसे में श्री नरेन्द्र ने एक अभियान चलाकर धनसंग्रह किया तथा यह राशि वीर सावरकर को भेंट की, जिससे वे अपना पुश्तैनी मकान फिर से ले सकें।
अनुशासनप्रिय नरेन्द्र जी प्रतिदिन ठीक दस बजे कार्यालय आ जाते थे। जब हाथ से लिखना संभव नहीं रहा, तो वे बोल-बोलकर लिखवाते थे। पंजाब में आतंकवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण, कश्मीर में हिन्दुओं की दुर्दशा आदि पर वे बड़ी प्रखरता से सरकार को कटघरे में खड़ा करते थे। जब कांग्रेस शासन ने हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा छेड़ा, तब भी उनकी लेखनी इसके विरुद्ध चली।
शासन ने उन पर अनेक मुकदमे ठोके, उनकी गिरफ्तारी के वारंट निकाले; पर उन्होंने अपनी कलम को झुकने नहीं दिया। ऐसे तेजस्वी पत्रकार का 96 वर्ष की सुदीर्घ आयु में 27 अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में देहांत हुआ।
(संदर्भ : पांचजन्य 14.11.2000/राष्ट्रधर्म अप्रैल 2012)
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24 अप्रैल/पुण्य-तिथि
अनशनव्रती महात्मा रामचंद्र वीर
1966 में दिल्ली में गोरक्षार्थ 166 दिन का अनशन करने वाले महात्मा रामचंद्र वीर का जन्म आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, वि.संवत 1966 (1909 ई.) में महाभारतकालीन विराट नगर (राजस्थान) में हुआ था। इनके पूर्वज स्वामी गोपालदास बाणगंगा के तट पर स्थित ग्राम मैड़ के निवासी थे।
उन्होंने औरंगजेब द्वारा दिल्ली में हिन्दुओं पर थोपे गये श्मशान कर के विरोध में उसके दरबार में ही आत्मघात किया था। उनके पास समर्थ स्वामी रामदास द्वारा प्रदत्त पादुकाएं थीं, जिनकी प्रतिदिन पूजा होती थी। इन्हीं की 11 वीं पीढ़ी में रामचंद्र का जन्म हुआ। इनके पिता श्री भूरामल्ल तथा माता वृद्धिदेवी थीं।
बालपन से ही उनके मन में मूक पशुओं के प्रति अतिशय करुणा विद्यमान थी। जब कोई पशुबलि को शास्त्र सम्मत बताता, तो वे रो उठते थे। आगे चलकर उन्होंने गोवंश की रक्षा और पशुबलि उन्मूलन को ही अपना ध्येय बना लिया।
इस प्रयास में जिन महानुभावों का स्नेह उन्हें मिला, उनमें स्वामी श्रद्धानंद, मालवीय जी, वीर सावरकर, भाई परमानंद, गांधी जी, डा. हेडगेवार, नेहरू जी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, श्री गोलवलकर, प्रफुल्ल चंद्र राय, रामानंद चट्टोपाध्याय, बालकृष्ण शिवराम मुंजे, करपात्री जी, गाडगे बाबा, विनोबा भावे, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, जयदयाल गोयन्दका, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि प्रमुख हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तो उनकी प्रशस्ति में एक कविता भी लिखी थी। वीर जी ने कोलकाता व लाहौर के कांग्रेस अधिवेशनों में भी भाग लिया था। 1932 में अजमेर में दिये गये उग्र भाषण के लिए वे छह माह जेल में भी रहे।
प्रखर वक्ता, कवि व लेखक वीर जी ने गोहत्या के विरोध में 18 वर्ष की अवस्था में अन्न व नमक त्याग का संकल्प लिया और उसे आजीवन निभाया। उन्होंने अपने प्रयासों से 1100 मंदिरों को पशुबलि के कलंक से मुक्त कराया। इसके लिए उन्होंने 28 बार जेलयात्रा की तथा 100 से अधिक अनशन किये। इनमें तीन दिन से लेकर 166 दिन तक के अनशन शामिल हैं। वे एक शंख तथा मोटा डंडा साथ रखते थे और सभा में शंखध्वनि करते रहते थे।
महात्मा वीर जी ने हिन्दू समाज को पाखंडपूर्ण कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए पशुबलि निरोध समिति तथा आदर्श हिन्दू संघ की स्थापना की। उनका पूरा परिवार गोरक्षा को समर्पित है। 1966 के आंदोलन में उनके साथ उनके एकमात्र पुत्र आचार्य धर्मेन्द्र ने भी तिहाड़ जेल में अनशन किया। उनकी पुत्रवधू प्रतिभा देवी ने भी दो पुत्रियों तथा एक वर्षीय पुत्र प्रणवेन्द्र के साथ सत्याग्रह कर कारावास भोगा था।
वीर जी ने अपने जन्मस्थान के निकट भीमगिरि पर्वत के पंचखंड शिखर पर हनुमान जी की 100 मन वजनी प्रतिमा स्थापित की। यहां हनुमान जी के साथ ही महाबली भीम की भी पूजा होती है। समर्थ स्वामी रामदास की पादुकाएं भी यहां विराजित हैं। महात्मा वीर जी ने जीवन के अंतिम 28 वर्ष इसी स्थान पर व्यतीत किये।
उन्होंने देश व धर्म के लिए बलिदान देने वाले वीरों का विस्तृत इतिहास लिखा तथा अपनी जीवनी ‘विकट यात्रा’, हमारी गोमाता, श्री वीर रामायण (महाकाव्य), वज्रांग वंदना, हमारा स्वास्थ्य, विनाश का मार्ग आदि पुस्तकों की रचना की। इसके लिए उन्हें कई संस्थाओं ने सम्मानित किया।
हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिए समर्पित वीर जी भारत को पुनः अखंड देखना चाहते थे। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री द्वारा ‘जीवित हुतात्मा’ की उपाधि से विभूषित वीर जी का 24 अप्रैल, 2009 को जन्मशती वर्ष में देहांत हुआ। उनकी अंतिम यात्रा में दूर-दूर से आये 50,000 नर-नारियों ने भाग लेकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। शवयात्रा में रामधुन तथा वीर जी की जय के साथ ही ‘हिन्दू प्रचंड हो, भारत अखंड हो’ तथा ‘गोमाता की जय’ जैसे नारे लग रहे थे।
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