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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

सक्सेस मंत्र : जीवन में सफल होने के लिए संघर्षों का सामना करना जरूरी है!

 सक्सेस मंत्र : जीवन में सफल होने के लिए संघर्षों का सामना करना जरूरी है

हर व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है। सफलता हासिल करने के लिए संघर्षों का सामना करना ही पड़ता है। सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है जो कठिनाइयों का सामना कर आगे बढ़ता रहता है। जीवन में सफल होने के लिए संघर्षों का सामना करना बहुत जरूरी है। किसी की मदद लेकर जीवनभर सफलता हासिल नहीं की जा सकती है। अगर हम जीवन में संघर्ष नहीं करेंगे तो हम कमजोर हो जाएंगे। संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं। संघर्षों का डटकर सामना करने वाला व्यक्ति ही जीवन के हर पड़ाव पर सफलता प्राप्त करता है। आइए आज हम आपको एक कहानी के माध्यम से समझाते हैं, जीवन में संघर्ष करना कितना जरूरी है।


कहानी- एक बार एक छोटा लड़का एक पेड़ के पास खेल रहा था, तभी उसे वहां पर एक तितली का खोल दिखाई दिया। उस लड़के ने देखा कि तितली उस खोल से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है, परंतु निकल नहीं पा रही है। वह लड़का देखता रहा कि तितली उस खोल से बाहर निकलने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है, लेकिन हर बार असफल हो जा रही है। जब बहुत देर हो गई और तितली उस खोल से बाहर नहीं निकल पाई तो लड़के को उस तितली पर दया आने लगी। उसने उस तितली की मदद करने की सोच ली। वह लड़का उस तितली की मदद करने लगा। उस लड़के ने तितली के खोल को तोड़ दिया और तितली को बाहर निकाल दिया। तितली ने बाहर निकलने के कुछ ही देर बाद दम तोड़ दिया। लड़का बड़ा दुखी हुआ कि उसने तितली की मदद की फिर भी तितली मर गई। लड़के के ये समझ नहीं आया कि तितली कैसे मर गई। वह घर गया और घर जाकर उसने यह बात अपनी मां को बताई। तब मां ने लड़के से कहा कि अगर तुम उस तितली की मदद नहीं करते तो वह नहीं मरती। तुम्हें उसे खोल से बाहर नहीं निकालना चाहिए था। वह तितली खुद संघर्ष कर खोल से बाहर निकल जाती। संघर्ष ही प्रकृति का नियम है। खोल से बाहर आने के लिए तितली को जो संघर्ष करना पड़ता, उससे उसके पंखों और शरीर को मजबूती मिलती। तुमने तितली के पंखों और शरीर को मजबूत नहीं होने दिया जिस वजह से वो मर गई। अगर तुम तितली की मदद नहीं करते तो वो संघर्ष करती जिससे उसके पंख और शरीर मजबूत हो जाते है और वो आकाश में उड़ पाती।


सीख : जीवन में सफलता हासिल करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। संघर्ष करने से ही व्यक्ति मजबूत बनता है।

30 अप्रैल,अद्भुत योद्धा हरिसिंह नलवा, श्री श्री मां आनंदमयी

  30 अप्रैल/बलिदान-दिवस


अद्भुत योद्धा हरिसिंह नलवा


भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों की मार सर्वप्रथम सिन्ध और पंजाब को ही झेलनी पड़ी। 1802 में रणजीत सिंह विधिवत महाराजा बन गये। 40 साल के शासन में उन्हें लगातार अफगानों और पठानों से जूझना पड़ा। इसमें मुख्य भूमिका उनके सेनापति हरिसिंह नलवा की रही। 1802 में उन्होंने कसूर के पठान शासक निजामुद्दीन तथा 1803 में झंग के पठानों को हराया। 1807 में मुल्तान के शासक मुजफ्फर खान को हराकर उससे वार्षिक कर लेना शुरू किया। 


इस युद्ध के बाद वीरवर हरिसिंह नलवा का नाम पेशावर से काबुल तक मुसलमानों के लिए आतंक का पर्याय बन गया। वहाँ की माताएँ अपने बच्चों को यह कहती थीं कि यदि तू नहीं सोएगा, तो नलवा आ जाएगा। 


मुल्तान और अटक जीतकर रणजीत सिंह ने पेशावर और कश्मीर पर ध्यान दिया। काबुल के वजीर शेर मोहम्मद खान का बेटा अता मोहम्मद कश्मीर में शासन कर रहा था। 1819 में उसे जीतकर पहले दीवान मोतीराम को और फिर 1820 में हरिसिंह नलवा को वहाँ का सूबेदार बनाया गया। इससे कश्मीर पूरी तरह काबू में आ गया। 1822 में हरिसिंह को अफगानों के गढ़ हजारा का शासक बनाया गया। 


पठान और अफगानी सेना में प्रशिक्षित सैनिकों के साथ जेहाद के नाम पर एकत्र ‘मुल्की सेना’ भी रहती थी। 1823 में अटक के पार नोशहरा में दोनों सेनाओं में भारी युद्ध हुआ। 10,000 अफगान सैनिक मारे गये, इधर भी भारी क्षति हुई। अकाली फूलासिंह और हजारों सिख बलिदान हुए; पर जीत हरिसिंह नलवा की हुई। उन्होंने अफगानों का गोला बारूद और तोपें छीन लीं। इससे उनकी धाक काबुल और कन्धार तक जम गयी। उन्होंने वहाँ का सूबेदार बुधसिंह सन्धावालिया को बना दिया। 


पर पठान और अफगानों ने संघर्ष जारी रखा। 1826 से 1831 के बीच सिख राज्य के विरुद्ध जेहाद छेड़ने का कार्य मुख्यतः रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले सैयद अहमद खान ने किया। पठान उसे ‘सैयद बादशाह’ कहते थे। 1827 में 50,000 जेहादी तथा पेशावर के बरकजाई कबीले के 20,000 सैनिकों के साथ उसने हमला किया। 


पेशावर से 32 कि.मी दूर पीरपाई में सिखों और जेहादियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। बुधसिंह के पास 10,000 सैनिक और 12 तोपें थीं। कुछ ही घण्टों में 6,000 मुजाहिदीन मारे गये, अतः उनके पाँव उखड़ गये। सैयद अहमद भागकर स्वात की पहाडि़यों में छिप गया।


पर यह संघर्ष रुका नहीं। 8 मई, 1831 को बालाकोट के युद्ध में मुस्लिम सेना बुरी तरह पराजित हुई। सैयद बादशाह भी मारा गया। सिख सेना का नेतृत्व रणजीत सिंह का बेटा शेरसिंह कर रहा था। नलवा इस समय सम्पूर्ण पेशावर क्षेत्र के शासक थे। 


1837 में काबुल का अमीर मोहम्मद खान एक बड़ी फौज और 40 तोपें लेकर नलवा के किले जमरूद पर चढ़ आया। महीनों तक संघर्ष चलता रहा। हरिसिंह नलवा उन दिनों बुरी तरह बीमार थे, फिर भी 30 अप्रैल, 1837 को वे युद्ध के मैदान में आ गये। उनका नाम सुनते ही अफगानी सेना भागने लगी। उसी समय एक चट्टान के पीछे छिपे कुछ अफगानी सैनिकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। वे घोड़े से गिर पड़े।


इस प्रकार भारत की विजय पताका काबुल, कन्धार और पेशावर तक फहराने वाले वीर ने युद्धभूमि में ही वीरगति प्राप्त की।

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30 अपै्रल/जन्म-दिवस


करुणा की देवी श्री श्री मां आनंदमयी


भक्ति, प्रेम और करुणा की त्रिवेणी श्री श्री मां आनंदमयी एक महान आध्यात्मिक विभूति थीं। उनका जन्म 30 अपै्रल, 1896 (वैशाख पूर्णिमा) को त्रिपुरा के खेड़ा ग्राम में अपनी ननिहाल में हुआ था। अब यह गांव बांग्लादेश में है। 


उनका बचपन का नाम निर्मला सुंदरी था। उनके पिता श्री विपिन बिहारी भट्टाचार्य एक प्रसिद्ध वैष्णव भजन गायक थे। माता श्रीमती मोक्षदा सुंदरी ने आगे चलकर संन्यास ले लिया और उनका नाम मुक्तानंद गिरि हो गया। यद्यपि भक्त लोग उन्हें दीदी मां कहते थे। ऐसे धार्मिक परिवार में निर्मला का बचपन बीता।


निर्मला के मन में बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति बहुत प्रेम था। वे प्रायः समाधि अवस्था में आ जाती थीं। ऐसे में उनका सम्बन्ध बाहरी जगत से टूट जाता था। उनकी लौकिक शिक्षा कुछ नहीं हुई तथा 12 वर्ष की छोटी अवस्था में ही उनका विवाह पुलिसकर्मी रमणी मोहन चक्रवर्ती (भोलानाथ) से हो गया। 


निर्मला ने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को सामान्य रूप से निभाया; पर भक्ति में भाव-विभोर होकर समाधिस्थ हो जाने का क्रम बना रहा। इससे वे जो काम कर रही होती थीं, वह अधूरा रह जाता। धीरे-धीरे परिवार और आसपास के लोग उनकी इस अध्यात्म चेतना को पहचान गये। 


1925 में 'अंबूवाची पर्व' पर वे पति सहित रमणा के सिद्धेश्वरी काली मंदिर में पूजा करने गयीं। वहां वे भाव समाधि में डूब गयीं। उनके हाथों से अपने आप बन रही तांत्रिक मुद्राओं तथा चेहरे की दिव्यता देखकर उनके पति समझ गये कि वह पूर्वजन्म की कोई देवी है। उन्होंने तभी उनसे दीक्षा ले ली।


धीरे-धीरे उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गयी। उनके कीर्तन चैतन्य महाप्रभु की याद दिला देते थे। 26 वर्ष की अवस्था में उन्होंने पहला प्रवचन दिया। वे कुछ समय अपने पति के साथ शाहबाग (ढाका) में भी रहीं। नवाब की बेगम प्यारीबानो उनसे बहुत प्रभावित थी। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.सी.एस.) के अधिकारी ज्योतिष चंद्र (भाई जी) भी वहीं उनके शिष्य बने। ज्योतिष बाबू ने ही उन्हें ‘श्री श्री मां आनंदमयी’ नाम दिया, जो फिर उनकी स्थायी पहचान बन गया। पति के निधन के बाद वे पूरे देश में भ्रमण करने लगीं।  


1932-33 में जवाहर लाल नेहरू देहरादून जेल में थे। मां भी उन दिनों देहरादून में थीं। वहीं नेहरू जी की पत्नी कमला और बेटी इंदिरा मां के संपर्क में आकर उनकी भक्त बनीं। क्रमशः प्रसिद्ध खिलाड़ी पटियाला नरेश भूपेन्द्र सिंह, कुमार नृपेन्द्र नाथ शाहदेव (रांची), संगीतकार एम.एस.सुबुलक्ष्मी, बांसुरीवादक हरिप्रसाद चैरसिया आदि अनेक विद्वान एवं विख्यात लोग उनके भक्त बने।


मां का राजनीति से कुछ सम्बन्ध न होने पर भी गांधी जी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, महाराजा (सोलन), महाराजा चिंतामणि शरणनाथ शाहदेव (रातू), रानी साहिब (बामड़ा), फ्रांस के राष्ट्रपति, कनाडा के प्रधानमंत्री तथा भारत के अनेक उद्योगपति, वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता उनके दर्शन को आते रहते थे।


तत्कालीन सभी आध्यात्मिक विभूतियों से मां का संपर्क बना रहता था। इनमें देवरहा बाबा, उडि़या बाबा, हरिबाबा, नीमकरौली बाबा, श्रीराम ठाकुर, पगला बाबा, स्वामी अखंडानंद, स्वामी शरणानंद, परमहंस योगानंद, गोपीनाथ कविराज, संत छोटे महाराज, हरिगुण गायक आदि प्रमुख हैं। 


असंख्य लोगों में प्रेम, भक्ति और करुणा का संदेश बांटते हुए मां ने 27 अगस्त, 1982 को देहरादून (उत्तराखंड) में अपनी देहलीला पूर्ण की। दो दिन बाद उन्हें कनखल (हरिद्वार) स्थित उनके आश्रम में समाधि दी गयी। समाधि पर जाकर उनके भक्तों को आज भी उनकी जीवंत उपस्थिति का अनुभव होता है। 


(संदर्भ : अमर उजाला 20.5.2008 एवं विकीपीडिया आदि)

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राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज

30 अप्रैल/जन्म-दिवस


राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज


23 जुलाई, 1955 को जापान के विश्व धर्म सम्मेलन में एक संन्यासी जब बोलने खड़े हुए, तो भाषा न समझते हुए भी उनके चेहरे के भाव और कीर्तन के मधुर स्वर ने वह समां बांधा कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो उठे। लोगों को भावरस में डुबोने वाले वे महानुभाव थे राष्ट्रसंत श्री तुकड़ो जी महाराज।


तुकड़ो जी का जन्म 30 अप्रैल, 1909 को अमरावती (महाराष्ट्र) के ‘यावली’ गांव में हुआ था। इनके पिता श्री बंडो जी इंगले तथा माता श्रीमती मंजुला देवी थीं। माता-पिता ने बहुत मनौतियों से प्राप्त पुत्र का नाम ‘माणिक’ रखा। 


इनके पिता चारण थे। सेठ, जमीदारों, राजाओं आदि के यहां जाकर उनकी परिवार परम्परा का झूठा-सच्चा गुणगान करना उनका काम था। माणिक के जन्म के बाद उन्होंने इसे छोड़कर दर्जी का काम किया। इसमें सफलता न मिलने पर गुड़ बेचा; पर हर बार निराशा और गरीबी ही हाथ लगी।


मणि जब कुछ बड़ा हुआ, तो उसे चांदा की पाठशाला में भेजा गया; पर वह विद्यालय के बगल में स्थित मारुति मंदिर के ढपली बजाकर भजन गाने वाले गायक ‘भारती’ के पास प्रायः बैठे मिलते थे। इधर पिता का कर्जा जब बहुत बढ़ गया, तो वे लौटकर फिर अपने गांव पहुंच गये। अब वहां का शिवालय ही मणि की ध्यान साधना का केन्द्र बन गया। मां ने यह देखकर उसे अपने मायके बरखेड़ भेज दिया। वहां पर ही कक्षा चार तक की शिक्षा मणि ने पायी।


बरखेड़ में मां के गुरु आड्कु जी महाराज का पे्रम मणि को मिला। भजन गाने पर उसे रोटी के टुकड़े मिलते थे। इससे उसका नाम ‘तुकड़या’ और फिर तुकड़ो जी हो गया। जब वे 12 वर्ष के थे, तब उनके गुरु समाधिस्थ हो गये। 


भगवान विट्ठल के दर्शन की प्रबल चाह तुकड़ो जी को पंढरपुर ले गयी; पर पुजारियों ने उन्हें भगा दिया। अब वे पुंडलीक मंदिर गये। इसके बाद मां की याद आने पर गांव आकर मजदूरी से पेट पालने लगे। 14 वर्ष की अवस्था में वे घर छोड़कर जंगल चले आये। 


वहां उनकी भेंट एक योगी से हुई, जिसने एक गुफा में उन्हें योग, प्राणायाम, ध्यान आदि सिखाया। वे रात को आते और प्रातः न जाने कहां गायब हो जाते थे। दो माह बाद एक दिन जब तुकड़ो जी की समाधि टूटी, तो वहां न कोई योगी थे और न कोई गुफा। 


अब तुकड़ो जी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उनकी भेंट गांधी जी से भी हुई; पर उनका मार्ग गांधी जी से अलग था। वे गाते थे - झाड़ झड़ूले शस्त्र बनेंगे, पत्थर सारे बम्ब बनेंगे, भक्त बनेगी सेना। ऐसे शब्दों से अंग्रेज शासन को नाराज होना ही था। 


28 अगस्त, 1942 को उन्हें बंदी बना लिया गया। जेल से आने पर वे सेवा कार्य के माध्यम से समाज जागरण में जुट गये। उन्होंने ‘गुरुदेव सेवा मंडल’ स्थापित कर गांव-गांव में उसकी शाखाएं स्थापित कीं। एक समय उनकी संख्या 75,000 तक पहुंच गयी।


इसी समय उनकी भेंट संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी से हुई। दोनों ने एक दूसरे को समझा और फिर शाखाओं पर भी उनके प्रवचन होने लगे। गुरुदेव सेवा मंडल ने गोरक्षा, ग्रामोद्योग, समरसता, कुष्ठ सेवा, व्यसन मुक्ति आदि रचनात्मक काम हाथ में लिये। 


इनके व्यापक प्रभाव को देखकर राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ की उपाधि दी। 1953 में तुकड़ो जी ने ग्राम विकास के सूत्रों की व्याख्या करने वाली ‘ग्राम गीता’ लिखी। 1964 में जब ‘विश्व हिन्दू परिषद’ की स्थापना हुई, तो वे वहां उपस्थित थे।


सूर्य उगता है, तो ढलता भी है। अब चलने का समय हो रहा था। तुकड़ो जी ने क्रमशः सभी कार्य अपने सहयोगियों को सौंप दिये और 11 अक्तूबर, 1966 को अपनी देहलीला को भी समेट लिया।

दादासाहब फाल्के

30 अप्रैल/जन्म-दिवस


भारतीय फिल्मों के पितामह दादासाहब फाल्के


नासिक के पास प्रसिद्ध तीर्थस्थल त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को धुण्डराज गोविन्द फाल्के का जन्म हुआ। उनके पिता श्री गोविन्द फाल्के संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनकी तरह विद्वान् पुरोहित बने। इसलिए उन्होंने बचपन से ही उसे गीता, रामायण, शास्त्र, पुराण, वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन कराया; पर धुण्डराज का मन तो संस्कृत से अधिक कला, फोटोग्राफी, जादू आदि में लगता था।


अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मुम्बई के विल्सन कालेज में संस्कृत कालेज में प्राध्यापक बन गये। वहाँ वे छात्रों को पढ़ाते तो थे ही, पर साथ ही अपना शौक पूरा करने के लिए उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में भी प्रवेश ले लिया। 


इससे उनके अन्दर के कलाकार को पूरी तरह विकसित होने का अवसर मिला। यहाँ उन्होंने नाटक, चित्रकला, फोटोग्राफी तथा कलाक्षेत्र के अन्य तकनीकी विषयों की पूरी जानकारी लेकर इनमें महारत प्राप्त की। बाद में वे बड़ौदा के कलाभवन से भी जुड़ गये। 


एक दिन मुम्बई में उन्होंने ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ नामक फिल्म देखी। उसमें ईसा मसीह के जीवन को दर्शाया गया था। इसके द्वारा ईसाइयत का प्रचार होता देख उन्हें बहुत पीड़ा हुई। उन्होंने संकल्प लिया कि वे भी हिन्दू धर्म से सम्बन्धित कथाओं, अवतारों आदि के बारे में फिल्म बनायेंगे। अतः अब वे फिल्म निर्माण की हर विधा के गहन अध्ययन में जुट गये। 


उनके सम्मुख आर्थिक समस्या भी बहुत प्रबल थी। अपने एक मित्र से कुछ धन उधार लेकर वे इंग्लैण्ड चले गये तथा वहाँ जाकर इस विधा के हर पहलू को निकट से देखा। इंग्लैण्ड से लौटते समय वे अपने साथ एक कैमरा और पर्याप्त मात्रा में फिल्म की रील भी लेकर आये। भारत आकर वे फिल्म निर्माण में जुट गये।


उन दिनों फिल्म बनाना आज की तरह आसान नहीं था। कोई इसमें पैसा लगाने का तैयार नहीं था। नारी पात्रों के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिलती थी; पर दादासाहब ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पुरुषों से ही महिलाओं का अभिनय भी कराया। इस प्रकार 1913 में भारत की पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ बनी। 


इस फिल्म के बनते ही चारों ओर धूम मच गयी। हर आयु और वर्ग की जनता यह फिल्म देखने के लिए थियेटरों पर टूट पड़ी। इसके बाद उन्होंने मोहिनी भस्मासुर और सत्यवान-सावित्री नामक फिल्में बनायीं। हर फिल्म ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। 


दादा साहब भारत के पौराणिक कथानकों को लेकर ही फिल्म बनाते थे। इस प्रकार उन्होंने ईसाइयत के प्रभाव में आ रही नयी पीढ़ी के मन में धर्म के प्रति प्रेम एवं आदर की भावना जाग्रत की। उन्होंने छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 103 फिल्में बनायीं। इस सफलता को देखकर कई उद्योगपति पैसा लगाने को तैयार हो गये। अतः उन्होंने ‘हिन्दुस्तान फिल्म कम्पनी’ की स्थापना की।


जब बोलती फिल्मों का दौर आया, तो लोगों का ध्यान मूक फिल्मों से हट गया। यह देखकर उन्होंने एक बोलती फिल्म भी बनायी; पर वह चल न सकी। तब तक उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ गया था। 16 फरवरी, 1944 को उनका देहान्त हो गया।


दादासाहब फाल्के ने भारतीय फिल्म जगत की नींव रखी। इसलिए उन्हें फिल्म जगत का पितामह माना जाता है। फिल्म क्षेत्र का सबसे बड़ा पुरस्कार उनके नाम पर ही दिया जाता है।

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अद्भुत चित्रकार राजा रवि वर्मा

  29 अप्रैल/जन्म-दिवस


अद्भुत चित्रकार राजा रवि वर्मा


आज तो चित्रकला की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है। अब पेन्सिल, रबड़, रंग या कूची की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी लगती है। संगणक (कम्प्यूटर) द्वारा यह सब काम आज आसानी से हो जाते हैं। एक साथ छह रंगों की छपाई भी अब सम्भव है।


पर कुछ समय पूर्व तक ऐसा नहीं होता था। तब एक-एक चित्र को बनाने और उसमें सजीवता लाने के लिए कई दिन और महीने लग जाते थे। चित्र के रंगों में भेद न हो जाये, यह बड़े अनुभव और साधना का काम था। ऐसे युग में भारतीय चित्रकला को पूरे विश्व में प्रसिद्ध करने वाले थे राजा रवि वर्मा।


राजा रवि वर्मा का जन्म केरल के किलिमनूर में 29 अप्रैल, 1848 को हुआ था। इनके घर में प्रारम्भ से ही चित्रकारी का वातावरण था। इसका प्रभाव बालक रवि पर भी पड़ा। वे भी पेन्सिल और कूची लेकर तरह-तरह के चित्र बनाया करते थे। 


इनके चाचा राजा राज वर्मा ने इनकी रुचि देखकर इन्हें विधिवत चित्रकला की शिक्षा दी। इसके बाद तो रवि वर्मा ने मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने आगे चलकर चित्रकला की अपनी स्वतन्त्र शैली भी विकसित की। उनकी चित्रकारी सबका मन मोह लेती थी।


एक बार प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार थियोडोर जौन्सन त्रावणकोर आये। वे रवि वर्मा की चित्रकारी देखकर दंग रह गये। रवि वर्मा ने अपने चित्रों में पात्रों के चेहरे पर रंगों के जो प्रयोग किये थे, उससे थियोडोर जौन्सन बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने रवि वर्मा को कैनवास पर तैल चित्र बनाने का प्रशिक्षण दिया और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे रवि वर्मा इस प्रकार के तैल चित्र बनाने में भी निष्णात हो गये।


रवि वर्मा अपने चित्रों में हिन्दू पौराणिक कथाओं से पात्रों का चयन करते थे। 1873 में उन्होंने मद्रास में आयोजित एक प्रतियोगिता में भाग लिया। इसमें उनके द्वारा निर्मित नायर महिला के चित्र को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिर उन्होंने अपने चित्रों की प्रदर्शिनी पुणे में लगाई। इससे उनकी प्रसिद्धि देश भर में फैल गयी। उन दिनों कैमरे का चलन नहीं था। अतः उन्हें दूर-दूर से चित्र बनाने के निमन्त्रण मिलने लगे। 


अनेक राजा-महाराजाओं और धनिकों ने उनसे अपने परिजनों के व्यक्तिगत और सामूहिक चित्र बनवाये। 1888 में बड़ौदा नरेश श्री गायकवाड़ ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। वे दो वर्ष तक वहाँ रहे और महल की कला दीर्घा के लिए अनेक चित्र बनाये। उनके चित्रों की इतनी माँग थी कि बड़ौदा नरेश ने उन्हें मुम्बई में तैल चित्रों की छपाई के लिए प्रेस स्थापित करने की सलाह दी, जिससे उनके चित्र सामान्य लोगों को भी उपलब्ध हो सकें।


राजा रवि वर्मा ने चित्रकला में एक नया युग प्रारम्भ किया। उन्होंने अपने कौशल से विश्व भर में भरपूर ख्याति और सम्मान अर्जित किया। उनके चित्र भारत के अनेक महत्वपूर्ण घरानों, राज परिवारों और कला दीर्घाओं में आज भी सुरक्षित हैं। इनमें तिरुअनन्तपुरम् की श्रीचित्र कला दीर्घा प्रमुख है। अब तो उनके चित्रों का मूल्य लाखों-करोड़ों रु. में आँका जाता है।


अपने अन्तिम दिनों में राजा रवि वर्मा अपने जन्मस्थान किलिमनूर ही आ गये और यही कला साधना करते रहे। 2 अक्तूबर, 1906 को त्रिवेन्द्रम के पास अत्तिगल में उनकी कलम और कूची के रंग सदा के लिए मौन हो गये।

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

29 अप्रैल,धार्मिक साहित्य के प्रचार में अग्रणी गीता प्रेस


29 अप्रैल/स्थापना दिवस


धार्मिक साहित्य के प्रचार में अग्रणी गीता प्रेस


धार्मिक विचारों के प्रसार में साहित्य का बहुत बड़ी भूमिका है। इस नाते हिन्दू साहित्य के प्रचार व प्रसार में गीता प्रेस, गोरखपुर का योगदान विश्व इतिहास में अतुलनीय है। 


पूर्वी उत्तर प्रदेश का गोरखपुर नगर महायोगी गुरु गोरखनाथ, गौतम बुद्ध और महात्मा कबीर की तपस्थली व कर्मस्थली रहा है। नेपाल से लगा होने के कारण यह दैनन्दिन व्यापार का भी बहुत बड़ा केन्द्र है। इसी नगर में सेठ जयदयाल जी गोयन्दका ने 29 अप्रैल, 1923 को धार्मिक साहित्य के प्रचार के लिए गीता प्रेस की स्थापना की थी। 


गोयन्दका जी के मन में इस बात की बहुत पीड़ा थी कि ईसाइयों का साहित्य तो विपुल मात्रा में प्रकाशित हो रहा है, पर हिन्दू साहित्य प्रायः दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार जो साहित्य प्रकाशित होता है, उसमें इतनी गलतियां होती थीं कि प्रायः अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हर प्रकाशक अपनी ओर से इनमें कुछ जोड़ या छोड़ देता था। इस कारण गीता, रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत, पुराण, उपनिषद आदि की प्रामाणिक व्याख्या नहीं की जा सकती थी। इसी को लेकर विधर्मी लोग हिन्दू धर्म की हंसी उड़ाते थे।


इस कमी को पूरा करने के लिए ही गोयन्दका जी ने गीताप्रेस की स्थापना की। उन्होंने तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस की सभी प्रकार की उपलब्ध प्रतियां मंगायी। विद्वानों को एकत्र कर उसका शुद्ध पाठ तैयार कराया और फिर उसे प्रकाशित किया। 


वर्ष 2007-08 तक 85 वर्षों की यात्रा में प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 42 करोड़ तक पहुंच चुकी है। सस्ती और ‘विज्ञापन रहित‘ पुस्तकों की रिकार्ड बिक्री करने वाला विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशन संस्थान श्रद्धालु ग्राहकों की मांग को पूरा नहीं कर पा रहा है। गत वित्तीय वर्ष में गीता प्रेस ने 29.50 करोड़ रुपये की पुस्तकें बेची। संस्थान में लगभग 1,000 कर्मचारी हैं, जिनके माध्यम से यह कार्य सम्पन्न हो रहा है। 


नई तकनीक, आधुनिक मशीनों एवं आवश्यक सुविधाओं से युक्त गीताप्रेस हिन्दी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, उडि़या, मलयालम, पंजाबी, असमिया तथा उर्दू भाषियों के लिए, उन्हीं की भाषा में ‘हिन्दू धर्म ग्रन्थ‘ उपलब्ध करा रहा है। 


2006 में नेपाली भाषा में ‘रामचरितमानस‘ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। अध्यात्म प्रधान ‘कल्याण‘ मासिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन संस्थान की एक विशेष उपलब्धि है। धर्मप्रेमी पाठकों में यह अत्यधिक लोकप्रिय है। वर्तमान में इसके लगभग ढाई लाख ग्राहक हैं। इसके अब तक 80 विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं। भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार, स्वामी रामसुख दास जैसे मनीषी इसके सम्पादक रह चुके हैं।


यों तो संस्थान की सभी पुस्तकें अति लोकप्रिय हैं; पर अकेले ‘तुलसीकृत रामचरितमानस‘ की सात करोड़ तथा हिन्दी और संस्कृत गीता की 7.50 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। पुराण दो करोड़, नारी व बालोपयोगी साहित्य 9.50 करोड़ तथा भक्त-चरित्र 5.25 करोड़ की संख्या में बिक चुके हैं। इस प्रकार समस्त विश्व को ‘हिन्दू धर्म‘ की श्रेष्ठता व विशिष्टता से परिचित कराने के उद्देश्य से यह संस्थान अपनी साधना में लगा है। 


इस पुनीत प्रकाशन ने विश्व के हर हिन्दू तथा भारतीय संस्कृति व अध्यात्म प्रेमी लोगों के घरों में भी गीता, रामचरितमानस के साथ काफी श्रेष्ठ साहित्य पहुंचा दिया है। कम मूल्य के साथ ही इसकी एक विशेषता यह भी है कि मुद्रण एकदम शुद्ध होता है। यदि किसी कारण से कोई भूल रह भी जाए, तो उसे हाथ से ठीक कर ही ग्राहक को दिया जाता है। 


(संदर्भ : प्रभासाक्षी 25.10.08)

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

27 अप्रैल,कांगला दुर्ग का पतन

 27 अप्रैल/इतिहास-स्मृति


कांगला दुर्ग का पतन


1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ भी कहते हैं। 


उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1856 को हुआ था। वे राजा चन्द्रकीर्ति के चौथे पुत्र थे। राजा की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र सूरचन्द्र राजा बने। दूसरे और तीसरे पुत्रों को क्रमशः पुलिस प्रमुख तथा सेनापति बनाया गया। कुछ समय बाद सेनापति झलकीर्ति की मृत्यु हो जाने से टिकेन्द्रजीत सिंह सेनापति बनाये गये। 


राजवंशों में आपसी द्वेष व अहंकार के कारण सदा से ही गुटबाजी होती रही है। मणिपुर में भी ऐसा ही हुआ। अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाना चाहा। टिकेन्द्रजीत सिंह ने राजा सूरचन्द्र को कई बार सावधान किया; पर वे उदासीन रहे। इससे नाराज होकर टिकेन्द्रजीत सिंह ने अंगसेन, जिलंगाम्बा आदि कई वीर व स्वदेशप्रेमी साथियों सहित 22 सितम्बर, 1890 को विद्रोह कर दिया।  


इस विद्रोह से डरकर राजा भाग गया। अब कुलचन्द्र को राजा तथा टिकेन्द्रजीत सिंह को युवराज व सेनापति बनाया गया। पूर्व राजा सूरचन्द्र ने टिकेन्द्रजीत सिंह को सूचना दी कि वे राज्य छोड़कर सदा के लिए वृन्दावन जाना चाहते हैं; पर वे वृन्दावन की बजाय कलकत्ता में ब्रिटिश वायसराय लैंसडाउन के पास पहुंच गये और अपना राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की।


इस पर वायसराय ने असम के कमिश्नर जे.डब्ल्यू. क्विंटन को मणिपुर पर हमला करने को कहा। उनकी इच्छा टिकेन्द्रजीत सिंह को पकड़ने की थी। चूंकि इस शासन के निर्माता तथा संरक्षक वही थे। क्विंटन 22 मार्च, 1891 को 400 सैनिकों के साथ मणिपुर जा पहुंचा। इस दल का नेतृत्व कर्नल स्कैन कर रहा था। उसने राजा कुलचंद्र को कहा कि हमें आपसे कोई परेशानी नहीं है। आप स्वतंत्रतापूर्वक राज्य करें; पर युवराज टिकेन्द्रजीत सिंह को हमें सौंप दें।


पर स्वाभिमानी राजा तैयार नहीं हुए। अंततः क्विंटन ने 24 मार्च को राजनिवास ‘कांगला दुर्ग’ पर हमला बोल दिया। उस समय दुर्ग में रासलीला का प्रदर्शन हो रहा था। लोग दत्तचित्त होकर उसे देख रहे थे।इस असावधान अवस्था में ही क्विंटन ने सैकड़ों पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों को मार डाला; पर थोड़ी देर में ही दुर्ग में स्थित सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया। इससे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। क्रोधित नागरिकों ने पांच अंग्रेज अधिकारियों को पकड़कर फांसी दे दी। इनमें क्विंटन तथा उनका राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड भी था।


अंग्रेज सेना की इस पराजय की सूचना मिलते ही कोहिमा, सिलचर और तामू से तीन बड़ी सैनिक टुकडि़यां भेज दी गयीं। 31 मार्च, 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर शासन से युद्ध घोषित कर दिया। टिकेन्द्रजीत सिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज सेना का मुकाबला किया; पर उनके साधन सीमित थे। अंततः 27 अप्रैल, 1891 को अंग्रेज सेना ने कांगला दुर्ग पर अधिकार कर लिया।


अंग्रेजों ने राजवंश के एक बालक चारुचंद्र सिंह को राजा तथा मेजर मैक्सवेल को उनका राजनीतिक सलाहकार बनाकर मणिपुर को अपने अधीन कर लिया। टिकेन्द्रजीत सिंह भूमिगत हो गये; पर अंततः 23 मई को वे भी पकड़ लिये गये। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर उन्हें और उनके साथी जनरल थंगल को 13 अगस्त, 1891 को इम्फाल के पोलो मैदान (वर्तमान वीर टिकेन्द्रजीत सिंह मैदान) में फांसी दे दी।  

रविवार, 25 अप्रैल 2021

26 अप्रैल, भारत दर्शन कार्यक्रम के प्रणेता विद्यानंद शेणाय

 26 अप्रैल/पुण्य-तिथि

भारत दर्शन कार्यक्रम के प्रणेता विद्यानंद शेणाय


भारत माता की जय और वन्दे मातरम् तो प्रायः सब लोग बोलते हैं; पर भारतभूमि की गोद में जो हजारों तीर्थ, धाम, पर्यटन स्थल, महामानवों के जन्म और कर्मस्थल हैं, उनके बारे में प्रायः लोगों को मालूम नहीं होता। भारत दर्शन कार्यक्रम के माध्यम से इस बारे में लोगों को जागरूक करने वाले श्री विद्यानंद शेणाय का जन्म कर्नाटक के प्रसिद्ध तीर्थस्थल शृंगेरी में हुआ था। श्रीमती जयम्मा एवं श्री वैकुंठ शेणाय दम्पति को पांच पुत्र और आठ पुत्रियां प्राप्त हुईं। इनमें विद्यानंद सातवें स्थान पर थे। उनके पिताजी केले बेचकर परिवार चलाते थे। सात वर्ष की अवस्था तक वे बहुत कम बोलते थे। 


किसी के सुझाव पर उनकी मां पुराना शहद और बच्च नामक जड़ी पीस कर प्रातःकाल उनके गले पर लगाने लगी। इस दवा और मां शारदा की कृपा से उनका स्वर खुल गया। ‘भारत दर्शन कार्यक्रम’ की लोकप्रियता के बाद उनकी मां ने कहा कि मेरा बेटा इतना बोलेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था।


ज्योतिषियों ने विद्यानंद को पानी से खतरा बताया था; पर उन्हें तुंगभद्रा नदी के तट पर बैठना बहुत अच्छा लगता था। एक बार नहाते समय वे नदी में डूबने से बाल-बाल बचे। बी.काॅम. की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैंक में नौकरी करने लगे; पर इसमें उनका मन नहीं लगा। अतः नौकरी छोड़कर वे एक चिकित्सक के पास सहायक के नाते काम करने लगे। इसी बीच उनके बड़े भाई डा0 उपेन्द्र शेणाय संघ के प्रचारक बन गये। 


आपातकाल में भूमिगत कार्य करते समय वे पकड़े गये और 15 मास तक जेल में रहे। इसके बाद उन्होंने सी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके एक बड़े भाई अपने काम के सिलसिले में हैदराबाद रहने लगे थे। अतः पूरा परिवार वहीं चला गया; पर एक दिन विद्यानंद जी भी घर छोड़कर प्रचारक बन गये।


संघ शिक्षा वर्ग में मानचित्र परिचय का कार्यक्रम होता है। विद्यानंद जी प्रायः वर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से उसे अधिक रोचक बनाने को कहते थे। वे वरिष्ठ प्रचारक श्री कृष्णप्पा जी की प्रेरणा से प्रचारक बने थे। उन्होंने विद्यानंद जी की रुचि देखकर उन्हें ही इसे विकसित करने को कहा। अब विद्यानंद जी ‘भारत दर्शन’ के नाम से शाखा तथा विद्यालयों में यह कार्यक्रम करने लगे। सांस्कृतिक भारत के मानचित्र में पवित्र नदियां, पर्वत, तीर्थ आदि देखते और उनका महत्व सुनते हुए श्रोता मंत्रमुग्ध हो जातेे थे। 


कुछ समय बाद उन्हंे बंगलौर में ‘राष्ट्रोत्थान परिषद’ का काम सौंपा गया। शीघ्र ही यह कार्यक्रम पूरे कर्नाटक के गांव-गांव में लोकप्रिय हो गया। यहां तक कि पुलिस वाले भी अपने परिजनों के बीच अलग से यह कार्यक्रम कराने लगेे।


जब इस कार्यक्रम की पूरे देश में मांग होने लगी, तो उन्होंने हिन्दी और अंगे्रजी में भी इसे तैयार किया। अपनी मातृभाषा कोंकणी में तो वे बोल ही लेते थे। भारत दर्शन के 50,000 कैसेट भी जल्दी ही बिक गये। इस प्रकार भारत दर्शन ने युवा पीढ़ी में देश-दर्शन के प्रति जागृति निर्माण की। 


परन्तु इसी बीच उनके सिर में दर्द रहने लगा। काम करते हुए अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था। जांच से पता लगा कि मस्तिष्क में एक बड़ा फोड़ा बन गया है। यह एक असाध्य रोग था। चिकित्सकों के परामर्श पर दो बार शल्यक्रिया हुई; पर कुछ सुधार नहीं हुआ और कष्ट बढ़ता गया। 


इसी अवस्था में 26 अप्रैल, 2007 को 55 वर्ष की आयु में बंगलौर के चिकित्सालय में अपने मित्र और परिजनों के बीच उनका प्राणांत हुआ।


26 अप्रैल,डी.ए.वी. कॉलिज के सूत्रधार पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी

 26 अप्रैल/जन्म-दिवस


डी.ए.वी. कॉलिज के सूत्रधार पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी 


आर्य समाज द्वारा संचालित डी.ए.वी. विद्यालयों की स्थापना में महात्मा हंसराज और पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का विशेष योगदान रहा है। गुरुदत्त जी का जन्म 26 अप्रैल, 1864 को मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में लाला रामकृष्ण जी के घर में हुआ था। गुरुदत्त जी ने प्रारम्भिक शिक्षा मुल्तान में पायी और फिर वे लाहौर आ गये। यहाँ हंसराज जी और लाजपत राय जी भी पढ़ रहे थे। तीनों की आपस में बहुत घनिष्ठता हो गयी।


गुरुदत्त जी की विज्ञान में बहुत रुचि थी। वे हर बात को विज्ञान की कसौटी पर कस कर देखते थे। इससे धीरे-धीरे उनका स्वभाव नास्तिक जैसा हो गया; पर जब उनका सम्पर्क आर्य समाज से हुआ, तो वे घोर आस्तिक हो गये। 1883 में जब ऋषि दयानन्द अजमेर में बीमार थे, तो लाहौर से दो लोगों को उनकी सेवा के लिए भेजा गया, उनमें से एक 19 वर्षीय गुरुदत्त जी भी थे। 


स्वामी जी के अन्त समय को उन्होंने बहुत निकट से देखा। उनके मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। स्वामी जी के देहान्त के बाद जब लाहौर में शोकसभा हुई, तो उसमें श्रद्धांजलि अर्पण करते हुए वे फूट-फूट कर रोये। उनका भाषण इतना मार्मिक था कि उपस्थित श्रोताओं की भी यही दशा हो गयी।


स्वामी जी के देहान्त से आर्यजनों में घोर निराशा छा गयी थी; पर गुरुदत्त जी ने कुछ दिन बाद सबके सामने स्वामी जी की स्मृति में ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक काॅलिज’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा। वहाँ उपस्थित सब लोगों ने इसका तालियाँ बजाकर समर्थन किया और उसी समय 8,000.रु0 भी एकत्र हो गये। यह चर्चा कुछ ही समय में पूरे पंजाब में फैल गयी।


इस कार्य के लिए जहाँ भी सभा होती, उसमें गुरुदत्त जी को अवश्य भेजा जाता। उनकी धन की अपील का बहुत असर होता था। वे विद्यालय की योजना बहुत अच्छे ढंग से सबके सामने रखते थे। कुछ लोगों ने अंग्रेजी शिक्षा का विरोध किया; पर गुरुदत्त जी ने बताया कि संस्कृत और वेद शिक्षण के साथ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी आज की आवश्यकता है। उसके बिना काम नहीं चलेगा। उनके तर्क के आगे लोग चुप रह जाते थे। 


लाला लाजपत राय उन दिनों हिसार में वकालत करते थे। वे भी गुरुदत्त जी के साथ सभाओं में जाने लगे। लाला जी के जोशीले भाषण और गुरुदत्त जी की अपील से तीन साल में 20,000 रु. नकद और 44,000 रु. के आश्वासन उन्हें मिले। अन्ततः एक जून, 1886 को लाहौर में डी.ए.वी. स्कूल की स्थापना हो गयी। हंसराज जी उसके पहले प्राचार्य बने।


1886 में ही पंडित गुरुदत्त ने विज्ञान से एम.ए. किया तथा लाहौर के सरकारी विद्यालय में प्राध्यापक हो गये। यह स्थान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। उन्होंने ‘रिजेनरेटर ऑफ आर्यावर्त’ नामक पत्र भी निकाला। इसके विद्वत्तापूर्ण लेखों की देश-विदेश में काफी चर्चा हुई। गुरुदत्त जी के दो अंग्रेजी लेख ‘वैदिक संज्ञा विज्ञान’ तथा ‘वैदिक संज्ञा विज्ञान व यूरोप के विद्वान’ को आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।


काम का क्षेत्र बहुत विस्तृत होने के कारण गुरुदत्त जी को बहुत प्रवास करना पड़ता था। अत्यधिक परिश्रम के कारण उन्हें क्षय रोग (टी.बी) हो गया। इसके बाद भी वे विश्राम नहीं करते थे। विश्राम के अभाव में दवाएँ भी कैसे असर करतीं ? अन्ततः 19 मार्च, 1890 को केवल 26 वर्ष की अल्पायु में उनका देहान्त हो गया।

शरणार्थी नहीं घुसपैठिये हैं रोहिंग्या


*शरणार्थी नहीं घुसपैठिये हैं रोहिंग्या―*

(प्रोफेसर रसाल सिंह)


*रोहिंग्या घुसपैठिए न सिर्फ हमारे संसाधनों पर बोझ हैं*, *बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है ...*…


एक रोहिंग्या घुसपैठिये मोहम्मद सलीमुल्ला की याचिका पर *उच्चतम न्यायालय का निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण है* उसमें उसने जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा कठुआ जिला स्थित हीरा नगर डिटेंशन सेंटर में रखे गए 170 रोहिंग्या घुसपैठियों की तत्काल रिहाई की मांग की थी इसके अलावा जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा शुरू की गई रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान और उनकी स्वदेश रवानगी की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी साथ ही गृह मंत्रालय को यह निर्देश देने की भी गुजारिश की थी कि वह अनौपचारिक शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए तीव्र गति से शरणार्थी पहचान पत्र जारी करें ताकि इन *तथाकथित शरणार्थियों* का कथित उत्पीड़न न हो सके *...*…


लेकिन *उच्चतम न्यायालय ने न सिर्फ हिरासत में लिये गए घुसपैठियों की रिहाई के लिए आदेश देने से मना कर दिया* बल्कि प्रशासन द्वारा घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए की जा रही कार्रवाई में *हस्तक्षेप से भी इंकार कर दिया* न्यायालय ने कहा कि *अनुच्छेद 32 सिर्फ देश के नागरिकों पर लागू होता है* हालांकि उसने घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए तय प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश सरकार को अवश्य दिया है *...*…


*सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को असम में घुसपैठियों की भारी समस्या से निपटने के लिए उसके द्वारा पूर्व में दिए गए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने के निर्णय की निरंतरता में देखा जाना चाहिए ...*…


दरअसल *कुछ लोग भारत को घुसपैठियों की राजधानी बनाना चाहते है* वे जानबूझकर घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच फर्क भी नहीं करना चाहते लेकिन उच्चतम न्यायालय ने घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए न सिर्फ *अपना मंतव्य* बल्कि *घुसपैठियों की वापसी का रास्ता भी साफ कर दिया है ...*…


गृह मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में दिये गए एक लिखित जवाब के अनुसार 2018 से 2020 के बीच *दो वर्षों में अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने का प्रयास करने वाले 3000 लोगों को गिरफ्तार किया गया है* इनमें सबसे बड़ी संख्या बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और म्यांमार के रोहिंग्या घुसपैठियों की है गौरतलब है कि मात्र दो वर्ष में तीन हजार लोग तो गिरफ्तार हुए हैं *पिछले 20 वर्षों में ही न जाने कितने घुसपैठिए भारत में कहां-कहां बस गए होंगे ...*…


जम्मू की भटिंडी कॉलोनी को *मिनी पाकिस्तान* कहा जाता है इसके पीछे की बड़ी वजह *यहां बसे हुए रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं* इसके अलावा ये लोग जम्मू के ही नरवाल वाला, सुंजवां और सांबा जिले में भी बड़ी संख्या में बसे है *जबकि मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में इनकी संख्या नगण्य* है *यह अकारण नहीं है* बल्कि इसके पीछे तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रदेश सरकार की सुविचारित राजनीतिक साजिश रही है *...*…


म्यांमार से जम्मू की भौगोलिक दूरी और रास्ते को देखकर इस साजिश का सहज अनुमान लगाया जा सकता है *दरअसल यह हिंदू बहुल जम्मू संभाग की जनसांख्यिकी को बदलने की व्यापक परियोजना का परिणाम है* रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को राजनीतिक प्रश्रय देकर असम और बंगाल में भी बड़ी संख्या में बसाया गया *यह वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का दुष्परिणाम है* इन अवैध घुसपैठियों को भारत में बसाने के लिए पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों से हवाला फंडिंग भी की जा रही है *...*…


बहुत से रोहिंग्या घुसपैठियों ने लेनदेन करके या सत्ताधीशों के साथ सांठगांठ करके राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड आदि बनवा लिए हैं और सिम कार्ड हासिल कर लिए हैं *रोहिंग्या म्यांमार के बांग्लाभाषी मुसलमान* है *राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में भी इनकी संलिप्तता के सुबूत मिलते रहे है* यह बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसकर असम, बंगाल, जम्मू कश्मीर, दिल्ली और हैदराबाद आदि में फैल गए हैं *देश में इनकी संख्या 40 हजार से अधिक है* ये वही रोहिंग्या है जिन्होंने म्यांमार के रखाइन प्रांत को हिंदू विहीन कर दिया है *...*…


पिछले साल जो लोग अविभाजित भारत के विस्थापित शरणार्थियों को नागरिकता देने संबंधी नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में *दिल्ली में खूनीखेल खेल रहे थे* और शाहीन बाग में टेंट तानकर बैठे थे वही लोग आज ही इन अवैध घुसपैठियों को सिर पर बैठाने और सारे अधिकार देने की वकालत कर रहे हैं *...*…


राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का विरोध भी इसी कारण किया जा रहा था ताकि इस प्रकार के अवैध घुसपैठियों की पहचान और प्रत्यर्पण न किया जा सके *आजादी से लेकर आज तक कई राजनीतिक दल और अनेक झोला छाप स्वघोषित स्वयंसेवी संगठन* इन तथाकथित अल्पसंख्यकों के हिमायती दिखकर ही अपना उल्लू सीधा करते रहे है *ये अवैध घुसपैठिए न सिर्फ स्थानीय सीमित संसाधनों पर बोझ है* बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है *...*…


जिन साधनों और संसाधनों पर भारतवासियों का प्राथमिक अधिकार है उनका *उपयोग और उपभोग ये लोग बेधड़क कर रहे है* इस पर पूर्ण विराम लगना आवश्यक है *उच्चतम न्यायालय का निर्णायक पहल है !!!!!!!!!*


( लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में *अधिष्ठाता* )

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

24 अप्रैल,राष्ट्रवादी पत्रकारिता के अग्रदूत के.नरेन्द्र,अनशनव्रती महात्मा रामचंद्र वीर

24 अप्रैल/जन्म-दिवस


राष्ट्रवादी पत्रकारिता के अग्रदूत के.नरेन्द्र   


श्री के.नरेन्द्र उन राष्ट्रवादी पत्रकारों में अग्रणी थे, जो देश और धर्म पर होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध आजीवन अपने पाठकों को जाग्रत करते रहे। उनका जन्म 24 अप्रैल, 1914 को लाहौर में उर्दू के प्रखर पत्रकार महाशय कृष्ण जी के घर में हुआ था। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए उन्होंने उर्दू के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता में भी नये मानदंड स्थापित किये।


श्री के.नरेन्द्र के घर का वातावरण स्वाधीनता आंदोलन से अनुप्राणित था।  कांग्रेस के बड़े नेता तथा क्रांतिकारी वहां आते रहते थे। लाला लाजपत राय तथा भाई परमानंद से प्रेरित होकर इनके बड़े भाई श्री वीरेन्द्र खुलकर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे। उन्होंने भगतसिंह के साथ अनेक अभियानों में भाग लिया। भगतसिंह की फांसी वाले दिन वे लाहौर जेल में ही थे। 


महाशय जी लाहौर के एक प्रमुख आर्य समाजी नेता थे। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के प्रबल समर्थक होने के कारण उन्हें जेहादियों की ओर से प्रायः हत्या की धमकियां मिलती रहती थीं; पर वे कभी उनसे भयभीत नहीं हुए। अप्रैल, 1926 में ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक श्री राजपाल जी की हत्या के बाद उन्होंने सबसे पहले इसकी निंदा में अपने पत्र ‘प्रताप’ में लेख लिखा था।


अपने पिता और बड़े भाई के प्रभाव से श्री नरेन्द्र भी स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गये। पुलिस से लुकाछिपी चलती रहने के कारण उनके विद्यालय के अंग्रेज प्राचार्य ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया।विभाजन के बाद महाशय जी को लाहौर छोड़ना पड़ा। उन्होंने दिल्ली आकर हिन्दी में ‘वीर अर्जुन’ तथा उर्दू में ‘प्रताप’ समाचार पत्र निकाले। थोड़े ही समय में ये दोनों पत्र लोकप्रिय हो गये। पिताजी के बाद इनका काम श्री नरेन्द्र ने संभाल लिया।


लाहौर में रहते हुए ही श्री नरेन्द्र का सम्पर्क संघ से हुआ। विभाजन के समय उन्होंने संघ तथा आर्य समाज द्वारा संचालित शिविरों में जाकर सेवा तथा सुरक्षा कार्य में सहयोग दिया। गांधी जी की हत्या के बाद जब शासन ने संघ पर झूठे आरोप लगाये, तो श्री नरेन्द्र ने अपने पत्रों में उनका विरोध किया। 


1952 में जब डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ ने ‘कश्मीर आंदोलन’ चलाया, तब भी श्री नरेन्द्र ने अपने पत्रों द्वारा उनका समर्थन किया। इतना ही नहीं, वे अनेक सभाओं में इसके पक्ष में भाषण देने भी गये।


श्री के.नरेन्द्र पर महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, भाई परमानंद और वीर सावरकर का बहुत प्रभाव था। अंग्रेजों ने वीर सावरकर के मुंबई स्थित मकान को जब्त कर लिया था। आजादी के बाद भी शासन ने उन्हें यह नहीं लौटाया। ऐसे में श्री नरेन्द्र ने एक अभियान चलाकर धनसंग्रह किया तथा यह राशि वीर सावरकर को भेंट की, जिससे वे अपना पुश्तैनी मकान फिर से ले सकें।


अनुशासनप्रिय नरेन्द्र जी प्रतिदिन ठीक दस बजे कार्यालय आ जाते थे। जब हाथ से लिखना संभव नहीं रहा, तो वे बोल-बोलकर लिखवाते थे। पंजाब में आतंकवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण, कश्मीर में हिन्दुओं की दुर्दशा आदि पर वे बड़ी प्रखरता से सरकार को कटघरे में खड़ा करते थे। जब कांग्रेस शासन ने हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा छेड़ा, तब भी उनकी लेखनी इसके विरुद्ध चली। 


शासन ने उन पर अनेक मुकदमे ठोके, उनकी गिरफ्तारी के वारंट निकाले; पर उन्होंने अपनी कलम को झुकने नहीं दिया। ऐसे तेजस्वी पत्रकार का 96 वर्ष की सुदीर्घ आयु में 27 अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में देहांत हुआ।


(संदर्भ : पांचजन्य 14.11.2000/राष्ट्रधर्म अप्रैल 2012)

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 24 अप्रैल/पुण्य-तिथि


अनशनव्रती महात्मा रामचंद्र वीर 


1966 में दिल्ली में गोरक्षार्थ 166 दिन का अनशन करने वाले महात्मा रामचंद्र वीर का जन्म आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, वि.संवत 1966 (1909 ई.) में महाभारतकालीन विराट नगर (राजस्थान) में हुआ था। इनके पूर्वज स्वामी गोपालदास बाणगंगा के तट पर स्थित ग्राम मैड़ के निवासी थे। 


उन्होंने औरंगजेब द्वारा दिल्ली में हिन्दुओं पर थोपे गये श्मशान कर के विरोध में उसके दरबार में ही आत्मघात किया था। उनके पास समर्थ स्वामी रामदास द्वारा प्रदत्त पादुकाएं थीं, जिनकी प्रतिदिन पूजा होती थी। इन्हीं की 11 वीं पीढ़ी में रामचंद्र का जन्म हुआ। इनके पिता श्री भूरामल्ल तथा माता वृद्धिदेवी थीं। 


बालपन से ही उनके मन में मूक पशुओं के प्रति अतिशय करुणा विद्यमान थी। जब कोई पशुबलि को शास्त्र सम्मत बताता, तो वे रो उठते थे। आगे चलकर उन्होंने गोवंश की रक्षा और पशुबलि उन्मूलन को ही अपना ध्येय बना लिया। 


इस प्रयास में जिन महानुभावों का स्नेह उन्हें मिला, उनमें स्वामी श्रद्धानंद, मालवीय जी, वीर सावरकर, भाई परमानंद, गांधी जी, डा. हेडगेवार, नेहरू जी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, श्री गोलवलकर, प्रफुल्ल चंद्र राय, रामानंद चट्टोपाध्याय, बालकृष्ण शिवराम मुंजे, करपात्री जी, गाडगे बाबा, विनोबा भावे, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, जयदयाल गोयन्दका, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि प्रमुख हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तो उनकी प्रशस्ति में एक कविता भी लिखी थी। वीर जी ने कोलकाता व लाहौर के कांग्रेस अधिवेशनों में भी भाग लिया था। 1932 में अजमेर में दिये गये उग्र भाषण के लिए वे छह माह जेल में भी रहे।


प्रखर वक्ता, कवि व लेखक वीर जी ने गोहत्या के विरोध में 18 वर्ष की अवस्था में अन्न व नमक त्याग का संकल्प लिया और उसे आजीवन निभाया। उन्होंने अपने प्रयासों से 1100 मंदिरों को पशुबलि के कलंक से मुक्त कराया। इसके लिए उन्होंने 28 बार जेलयात्रा की तथा 100 से अधिक अनशन किये। इनमें तीन दिन से लेकर 166 दिन तक के अनशन शामिल हैं। वे एक शंख तथा मोटा डंडा साथ रखते थे और सभा में शंखध्वनि करते रहते थे।


महात्मा वीर जी ने हिन्दू समाज को पाखंडपूर्ण कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए पशुबलि निरोध समिति तथा आदर्श हिन्दू संघ की स्थापना की। उनका पूरा परिवार गोरक्षा को समर्पित है। 1966 के आंदोलन में उनके साथ उनके एकमात्र पुत्र आचार्य धर्मेन्द्र ने भी तिहाड़ जेल में अनशन किया। उनकी पुत्रवधू प्रतिभा देवी ने भी दो पुत्रियों तथा एक वर्षीय पुत्र प्रणवेन्द्र के साथ सत्याग्रह कर कारावास भोगा था। 


वीर जी ने अपने जन्मस्थान के निकट भीमगिरि पर्वत के पंचखंड शिखर पर हनुमान जी की 100 मन वजनी प्रतिमा स्थापित की। यहां हनुमान जी के साथ ही महाबली भीम की भी पूजा होती है। समर्थ स्वामी रामदास की पादुकाएं भी यहां विराजित हैं। महात्मा वीर जी ने जीवन के अंतिम 28 वर्ष इसी स्थान पर व्यतीत किये। 


उन्होंने देश व धर्म के लिए बलिदान देने वाले वीरों का विस्तृत इतिहास लिखा तथा अपनी जीवनी ‘विकट यात्रा’, हमारी गोमाता, श्री वीर रामायण (महाकाव्य), वज्रांग वंदना, हमारा स्वास्थ्य, विनाश का मार्ग आदि पुस्तकों की रचना की। इसके लिए उन्हें कई संस्थाओं ने सम्मानित किया।


हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिए समर्पित वीर जी भारत को पुनः अखंड देखना चाहते थे। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री द्वारा ‘जीवित हुतात्मा’ की उपाधि से विभूषित वीर जी का 24 अप्रैल, 2009 को जन्मशती वर्ष में देहांत हुआ। उनकी अंतिम यात्रा में दूर-दूर से आये 50,000 नर-नारियों ने भाग लेकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। शवयात्रा में रामधुन तथा वीर जी की जय के साथ ही ‘हिन्दू प्रचंड हो, भारत अखंड हो’ तथा ‘गोमाता की जय’ जैसे नारे लग रहे थे।

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23 अप्रैल,विद्वत्ता की प्रतिमूर्ति पण्डिता रमाबाई,

 23 अप्रैल/जन्म-दिवस


विद्वत्ता की प्रतिमूर्ति पण्डिता रमाबाई


रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल, 1858 को ग्राम गंगामूल (जिला मंगलोर, कर्नाटक) में हुआ था। उस समय वहाँ लड़कियांे की उच्च शिक्षा को ठीक नहीं माना जाता था। बाल एवं अनमेल विवाह प्रचलित थे। रमा के विधुर पिता का नौ वर्षीय बालिका से पुनर्विवाह हुआ। उससे ही एक पुत्र एवं दो पुत्रियाँ हुईं। 


रमा के पिता ने अपनी पत्नी को भी संस्कृत पढ़ाकर विद्वान बनाया। इस पर स्थानीय पंडित उनसे नाराज हो गये। वे उन्हें जाति बहिष्कृत करने पर तुल गये। तब उन्होंने उडुपि में 400 विद्वानों के साथ दो महीने तक लिखित शास्त्रार्थ में सिद्ध किया कि महिलाओं को वेद पढ़ाना शास्त्रसम्मत है। इससे वे जाति बहिष्कार से तो बच गये; पर लोगों का द्वेष कम नहीं हुआ। 


उन्होंने अपने सब बच्चों को पढ़ाया। रमा जब नौ साल की थी, तो उनके पिता तीर्थयात्रा पर चले गये। रमा की माँ ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए उसकी पढ़ाई जारी रखी। जब छह साल बाद रमा के पिता लौटकर आये, तब तक रमा हिन्दी, मराठी, कन्नड़, बंगला तथा संस्कृत भाषाएँ जान गयी थी।


जब रमा 15 साल की ही थी, तो उसके पिता की मृत्यु हो गयी। लोगों में द्वेष इतना था कि उनकी अंत्येष्टि के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। इस पर रमा के भाई ने उनके शव को धोती में बाँधकर गाँव से बाहर गाड़ दिया। 


कुछ समय बाद माँ की मृत्यु होने पर रमा एवं उसके भाई ने बड़ी कठिनाई से दो लोगों को तैयार किया, तब जाकर माँ का अन्तिम संस्कार हो सका।

इसके बाद रमा अपने छोटे भाई को लेकर कोलकाता आ गयी। वहाँ विद्वानों ने उसकी विद्वत्ता देखकर उन्हें ‘पंडिता रमाबाई’ की उपाधि दी। ब्रह्मसमाज के केशवचन्द्र सेन की प्रेरणा से रमा ने वेदों का और गहन अध्ययन किया। 


इसी दौरान उनके भाई की भी मृत्यु हो गयी। रमाबाई का पत्र व्यवहार एवं भेंट आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती से भी हुई। महर्षि दयानन्द जी चाहते थे कि रमाबाई पूरी तरह वेद और धर्म प्रचार का कार्य करंे; पर वह इससे सहमत नहीं हुई। वे अभी और पढ़ना चाहती थीं।


22 वर्ष की अवस्था में विपिनबिहारी दास से उनका अन्तरजातीय विवाह हुआ। एक साल बाद पुत्री मनोरमा के जन्म तथा उससे अगले साल पति के निधन से पुत्री की पूरी जिम्मेदारी रमाबाई पर आ गयी। आर्य समाज से निकटता के कारण ब्रह्मसमाज वाले भी अब उनकी आलोचना करने लगे।


इसके बाद भी रमाबाई नहीं घबराईं। वे पुत्री को लेकर पुणे आ गयीं और आर्य समाज की स्थापना कर समाजसेवा में लग गयीं। उन्होंने महाराष्ट्र के कई नगरों में आर्य समाज की स्थापना की। सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें बहुत लोगों से मिलना पड़ता था। कुछ रूढि़वादियों ने इसका विरोधकर उनके चरित्र पर लांछन लगाये। इससे रमाबाई का मन बहुत दुखी हुआ।


1883 में वे चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने इंग्लैंड गयीं। वहाँ उनका सम्पर्क ईसाइयों से हुआ। रमा का मन अपने सम्बन्धियों और विद्वानों द्वारा किये गये दुव्र्यवहार से दुखी था। अतः उन्होंने ईसाई मजहब स्वीकार कर लिया।


अब उन्होंने हिब्रू और ग्रीक भाषा सीखकर बाइबल का इन भाषाओं तथा मराठी में अनुवाद किया। इसके बाद वे अमरीका भी गयीं। वहाँ उन्होंने महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ते देखा। इससे वे बहुत प्रभावित हुईं। 


ईसाई बनने के बाद भी हिन्दुत्व और भारतीयता के प्रति उनका प्रेम कम नहीं हुआ। 1889 में भारत लौटकर उन्होंने पुणे में ‘शारदा सदन’ नामक विधवाश्रम बनाया। पांच अप्रैल, 1922 को पंडिता रमाबाई का देहान्त हो गया।

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23 अप्रैल/इतिहास-स्मृति      


पेशावर कांड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली


चन्द्रसिंह का जन्म ग्राम रौणसेरा, (जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) में 25 दिसम्बर, 1891 को हुआ था। वह बचपन से ही बहुत हृष्ट-पुष्ट था। ऐसे लोगों को वहाँ ‘भड़’ कहा जाता है। 14 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। 


उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो जाने के कारण सेना में भर्ती चल रही थी। चन्द्रसिंह गढ़वाली की इच्छा भी सेना में जाने की थी; पर घर वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। अतः चन्द्रसिंह घर से भागकर लैंसडाउन छावनी पहुँचे और सेना में भर्ती हो गये। उस समय वे केवल 15 वर्ष के थे।


इसके बाद राइफलमैन चन्द्रसिंह ने फ्रान्स, मैसोपोटामिया, उत्तर पश्चिमी सीमाप्रान्त, खैबर तथा अन्य अनेक स्थानों पर युद्ध में भाग लिया। अब उन्हें पदोन्नत कर हवलदार बना दिया गया। छुट्टियांे में घर आने पर उन्हें भारत में हो रहे स्वतन्त्रता आन्दोलन की जानकारी मिली। उनका सम्पर्क आर्यसमाज से भी हुआ। 1920 में कांग्रेस के जगाधरी (पंजाब) में हुए सम्मेलन में भी वे गये; पर फिर उन्हें युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया।


युद्ध के बाद वे फिर घर आ गये। उन्हीं दिनों रानीखेत (उत्तराखंड) में हुए कांग्रेस के एक कार्यक्रम में गांधी जी भी आये थे। वहाँ चन्द्रसिंह अपनी फौजी टोपी पहनकर आगे जाकर बैठ गये। गांधी जी ने यह देखकर कहा कि मैं इस फौजी टोपी से नहीं डरता। चन्द्रसिंह ने कहा यदि आप अपने हाथ से मुझे टोपी दें, तो मैं इसे बदल भी सकता हूँ। इस पर गांधी जी ने उसे खादी की टोपी दी। तब से चन्द्रसिंह का जीवन आमूल चूल बदल गया।


1930 में गढ़वाल राइफल्स को पेशावर भेजा गया। वहाँ नमक कानून के विरोध में आन्दोलन चल रहा था। चन्द्रसिंह ने अपने साथियों के साथ यह निश्चय किया कि वे निहत्थे सत्याग्रहियांे को हटाने में तो सहयोग करेंगे; पर गोली नहीं चलायेंगे। सबने उसके नेतृत्व में काम करने का निश्चय किया। 


23 अप्रैल, 1930 को सत्याग्रह के समय पेशावर में बड़ी संख्या में लोग जमा थे। तिरंगा झंडा फहरा रहा था। बड़े-बड़े कड़ाहों में लोग नमक बना रहे थे। एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी मोटरसाइकिल उस भीड़ में घुसा दी। इससे अनेक सत्याग्रही और दर्शक घायल हो गये। सब ओर उत्तेजना फैल गयी। लोगों ने गुस्से में आकर मोटरसाइकिल में आग लगा दी। 


गुस्से में पुलिस कप्तान ने आदेश दिया - गढ़वाली थ्री राउंड फायर। पर उधर से हवलदार मेजर चन्द्रसिंह गढ़वाली की आवाज आयी - गढ़वाली सीज फायर। सिपाहियों ने अपनी राइफलें नीचे रख दीं। पुलिस कप्तान बौखला गया; पर अब कुछ नहीं हो सकता था। 


चन्द्रसिंह ने कप्तान को कहा कि आप चाहे हमें गोली मार दें; पर हम अपने निहत्थे देशवासियांे पर गोली नहीं चलायेंगे। कुछ अंग्रेज पुलिसकर्मियों तथा अन्य पल्टनों ने गोली चलायी, जिससे अनेक सत्याग्रही तथा सामान्य नागरिक मारे गये।


तुरन्त ही गढ़वाली पल्टन को बैरक में भेजकर उनसे हथियार ले लिये गये। चन्द्रसिंह को गिरफ्तार कर 11 वर्ष के लिए जेल में ठूँस दिया गया। उनकी सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली गयी। जेल से छूटकर वे फिर स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गये। स्वतन्त्रता के बाद उन्होंने राजनीति से दूर रहकर अपने क्षेत्र में ही समाजसेवा करना पसन्द किया। 


एक अक्तूबर, 1979 को पेशावर कांड के इस महान सेनानी की मृत्यु हुई। शासन ने 1994 में उन पर डाक टिकट जारी किया                 


बुधवार, 21 अप्रैल 2021



       क्रान्ति और सेवा के राही योगेश चन्द्र चटर्जी


क्रान्तिवीर योगेश चन्द्र चटर्जी का जीवन देश को विदेशी दासता से मुक्त कराने की गौरवमय गाथा है। उनका जन्म अखंड भारत के ढाका जिले के ग्राम गोकाडिया, थाना लोहागंज में तथा लालन-पालन और शिक्षा कोमिल्ला में हुई। 1905 में बंग-भंग से जो आन्दोलन शुरू हुआ, योगेश दा उसमें जुड़ गये। पुलिन दा ने जब 'अनुशीलन पार्टी' बनायी, तो ये उसमें भी शामिल हो गये। उस समय इनकी अवस्था केवल दस वर्ष की थी। 


अनुशीलन पार्टी की सदस्यता बहुत ठोक बजाकर दी जाती थी; पर योगेश दा हर कसौटी पर खरे उतरे। 1916 में उन्हें पार्टी कार्यालय से गिरफ्तार कर कोलकाता के कुख्यात ‘नालन्दा हाउस’ में रखा गया। वहाँ बन्दियों पर अमानुषिक अत्याचार होते थे। योगेश दा ने भी यह सब सहा। 1919 में आम रिहाई के समय वे छूटे और बाहर आकर फिर पार्टी के काम में लग गये। अतः बंगाल शासन ने 1923 में इन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया।


1925 में जब क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल ने अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे क्रान्तिकारियों को एक साथ और एक संस्था के नीचे लाने का प्रयास किया, तो योगेश दा को संयुक्त प्रान्त का संगठक बनाया गया। काकोरी रेल डकैती कांड में कुछ को फाँसी हुई, तो कुछ को आजीवन कारावास। यद्यपि योगेश दा इस कांड के समय हजारीबाग जेल में बन्द थे; पर उन्हें योजनाकार मानकर दस वर्ष के कारावास की सजा दी गयी।


जेल में रहते हुए उन्होंने राजनीतिक बन्दियों के अधिकारों के लिए कई बार भूख हड़ताल की। फतेहगढ़ जेल में तो उनका अनशन 111 दिन चला। तब प्रशासन को झुकना ही पड़ा। जेल से छूटने के बाद भी उन्हें छह माह के लिए दिल्ली से निर्वासित कर दिया गया। 1940 में संयुक्त प्रान्त की सरकार ने उन्हें फिर पकड़ कर आगरा जेल में बन्द कर दिया। 


वहाँ से उन्हें देवली शिविर जेल में भेजा गया। संघर्षप्रेमी योगेश दा ने देवली में भी भूख हड़ताल की। इससे उनकी हालत खराब हो गयी। उन्हें जबरन कोई तरल पदार्थ देना भी सम्भव नहीं था; क्योंकि उनकी नाक के अन्दर का माँस इतना बढ़ गया था कि पतली से पतली नली भी उसमें नहीं घुसती थी। अन्ततः शासन को उन्हें छोड़ना पड़ा।


पर शांत बैठना उनके स्वभाव में नहीं था। अतः 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी फरार अवस्था में व्यापक प्रवास कर वे नवयुवकों को संगठित करते रहे। इस बीच उन्हें कासगंज षड्यन्त्र में फिर जेल भेज दिया गया। 1946 में छूटते ही वे फिर काम में लग गये। इसके बाद वे लखनऊ में ही रहने लगे। 


स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वे राजनीति में अधिक सक्रिय हो गये। उन पर मार्क्सवाद और लेनिनवाद का काफी प्रभाव था; पर भारत के कम्युनिस्ट दलों की अवसरवादिता और सिद्धान्तहीनता देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई। उन्होंने कई खेमों में बंटे साथियों को एक रखने का बहुत प्रयास किया; पर जब उन्हें सफलता नहीं मिली, तो उनका उत्साह ठंडा हो गया। 1955 में वे चुपचाप कम्युनिस्ट पार्टी और राजनीति से अलग हो गये।


योगेश दा सादगी की प्रतिमूर्ति थे। वे सदा खद्दर ही पहनते थे। 1967 के लोकसभा चुनाव के बाद उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया। 22 अप्रैल, 1969 को 74 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में उनका देहान्त हुआ। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘इन सर्च आॅफ फ्रीडम’ नामक पुस्तक में लिखी है।

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22 अपै्रल/जन्म-दिवस

     लोकतंत्र-प्रेमी न्यायाधीश नेकश्याम शमशेरी 


आपातकाल में मेरठ की जेल में सैकड़ों लोकतंत्र प्रेमी बन्द थे। शासन चाहता था कि वे वहीं सड़ जाएं; पर उन दिनों मेरठ के कई न्यायाधीशों में एक थे श्री नेकश्याम शमशेरी। उनके पास जो भी वाद जाता था, वे उसे जमानत दे देते थे। यद्यपि इसमें बहुत खतरा था; पर वे सदा न्याय के पथ पर डटे रहे। 


नेकश्याम जी का जन्म उ.प्र. के मुरादाबाद नगर में 22 अपै्रल, 1930 को न्यायालय में कार्यरत श्री राधेशरण भटनागर एवं श्रीमती चमेली देवी के घर में हुआ था। गाजियाबाद के पास ‘शमशेर’ गांव के मूल निवासी होने से ये परिवार ‘शमशेरी’ कहलाया। पांच भाई और तीन बहिनों वाला ये भरापूरा परिवार था। 


मेधावी नेकश्याम जी ने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में भी प्रथम स्थान पर रहकर उत्तीर्ण कीं। उनका नामपट आज भी राजकीय इंटर कॉलिज, मुरादाबाद में लगा है। आगरा, प्रयाग और फिर मुरादाबाद से उच्च शिक्षा पाकर उन्होंने कुछ वर्ष वकालत की। 1956 में न्यायिक परीक्षा में प्रथम स्थान पाकर वे न्यायाधीश बने। इससे पूर्व वे प्रशासनिक सेवा की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे; पर संघ से सम्पर्क के कारण उन्हें साक्षात्कार में नहीं चुना गया।


नेकश्याम जी मुरादाबाद में 1940 में स्वयंसेवक बने। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय वहां एक जुलूस में तिरंगा लिये युवक को पुलिस की गोली लग गयी। ऐसे में बालक होते हुए भी उन्होंने झंडा थाम लिया। 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय वे आगरा में बी.एस-सी. कर रहे थे। कांग्रेसी गुुंडों ने वहां संघ कार्यालय पर हमला कर दिया। नेकश्याम जी तथा अन्य स्वयंसेवकों ने उनका डटकर मुकाबला किया। उस मारपीट की चोट उनके चेहरे पर अंत तक बनी रही। प्रतिबंध के विरोध में वे डेढ़ महीने आगरा जेल में भी रहे। 


1957 में उनका विवाह शारदा जी से हुआ। उनकी पत्नी बहुत धार्मिक एवं सात्विक स्वभाव की थीं। अतः उनके चारों बच्चों पर देश एवं धर्मनिष्ठा के गहरे संस्कार पड़े। न्यायिक सेवा के कारण वे संघ की दैनिक गतिविधियों से दूर रहे; पर संघ के प्रति प्रेम उनके मन में बना रहा, जो आपातकाल में निरपराध स्वयंसेवकों की रिहाई के रूप में प्रकट हुआ। वे कानपुर, बरेली, हरदोई, ललितपुर, बनारस और मेरठ में न्यायाधीश रहे। सभी जगह उन्होंने अपने आचरण से एक आदर्श न्यायाधीश की छाप छोड़ी।


1988 में मेरठ में विशेष न्यायाधीश के पद से वे सेवानिवृत्त हुए। लम्बे समय तक संघ के काम से अलग रहने के कारण उन्होंने वृद्धावस्था में तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया और फिर संघ के काम में जुट गये। पहले उन्हें मेरठ प्रांत में ‘सेवा भारती’ की जिम्मेेदारी दी गयी। इसके बाद वे मेरठ प्रांत कार्यवाह, प्रांत संघचालक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र संघचालक तथा फिर संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। वे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय क्षेत्रों में भी गये। सेवा कार्य में रुचि होने के कारण वे प्रवास में इन कामों पर विशेष ध्यान देते थे। 2007 में वे नागपुर में प्रौढ़ स्वयंसेवकों के तृतीय वर्ष के वर्ग में सर्वाधिकारी थे।


इतनी ऊंचे और प्रतिष्ठित पद पर रहकर भी उनका जीवन सादगी से परिपूर्ण था। अवकाश प्राप्ति के बाद वे निःसंकोच खाकी नेकर पहन कर सायं शाखा में जाते थे। बच्चों से मिलना, खेलना और हंसी-मजाक करना उन्हें अच्छा लगता था। देहरादून में एक कार्यकर्ता ने अज्ञानवश रेलगाड़ी में आरक्षण के लिए उनकी आयु अधिक लिखा दी; लेकिन उन्होंने उस टिकट पर जाना स्वीकार नहीं किया। उनके तीनों पुत्र अच्छे काम और स्थानों पर हैं। वे जब उनके पास जाते थे, तो पड़ोस के सभी लोगों और परिवारों में घुलमिल जाते थे।



25 नवम्बर, 2015 को अपने बड़े पुत्र के मुम्बई स्थित निवास पर उनका निधन हुआ। 

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

21 अप्रैल,गणपतराय का बलिदान,

 21 अप्रैल/बलिदान-दिवस


गणपतराय का बलिदान


गणपतराय का जन्म 17 जनवरी, 1808 को ग्राम भौरो (जिला लोहरदगा, झारखंड) में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री किसनराय तथा माता श्रीमती सुमित्रादेवी थीं। बचपन से ही वनों में घूमना, घुड़सवारी, आखेट आदि उनकी रुचि के विषय थे। इस कारण उनके मित्र उन्हें ‘सेनापति’ कहते थे। 


बचपन से ही इनका मन अपने देश और जागीरों पर अंग्रेजों के शासन को देखकर बहुत चिढ़ता था। वे इसकी चर्चा अपने साथियों और माता-पिता से करते थे; पर सब इसे उनका बचपना समझकर टाल देते थे। कुछ बड़े होने पर वे पढ़ने के लिए अपने चाचा सदाशिव पांडेय के पास पालकोट आ गये। उनके चाचा पालकोट रियासत के दीवान थे। गणपतराय की योग्यता देखकर चाचा की मृत्यु के बाद उनको ही रियासत का दीवान बना दिया गया। 


रियासत के शासक जगन्नाथ पांडेय सदा अंग्रेजों की चमचागीरी करते रहते थे। गणपतराय उन्हें अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करने का परामर्श देते थे; पर कायर राजा इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 1829 में अंग्रेजों ने राजा जगन्नाथ को गद्दी से हटाकर उनकी जागीर पर कब्जा कर लिया।


राजा ने स्वभाववश कोई विरोध नहीं किया। वह चुप होकर बैठ गये। गणपतराय का मन विद्रोह कर उठा; पर वे कुछ कर नहीं सकते थे। अतः दीवान के पद से त्यागपत्र देकर वे गाँव वापस आ गये तथा अपने पुराने मित्र ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के साथ मिलकर अंग्रेजों का विरोध करने लगे।


दो अगस्त, 1857 को उन्होंने अपने साथियों के साथ राँची जेल तोड़कर 300 वीरों को मुक्त करा लिया और वहाँ तैनात अंग्रेजों को मार डाला। राँची न्यायालय के पास स्थित कुआँ अंग्रेजों की लाशों से भर गया। 21 दिन तक छोटा नागपुर, खूँटी तथा राँची का क्षेत्र स्वतन्त्र रहा। यह सुनकर हजारीबाग के सन्थाल वनवासियों ने भी विद्रोह कर दिया। वे अपने तीर-कमान लेकर सड़कों पर उतर आये। यद्यपि वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाये।


गणपतराय की इच्छा थी कि वे जगदीशपुर के क्रान्तिवीर कुँवरसिंह से मिलकर अस्त्र-शस्त्र का संग्रह करें। इसी योजना के अन्तर्गत वे 200 साथियों को लेकर 11 सितम्बर, 1857 को राँची से चल दिये। चतरा नामक स्थान पर मेजर इगलिश की सशस्त्र टुकड़ी से उनकी मुठभेड़ हुई। इसमें 150 क्रान्तिकारी तथा 58 अंग्रेज मारे गये। अंग्रेजों ने लोगों को आतंकित करने के लिए इन सबके शवों को एक तालाब के आसपास लगे वृक्षों पर टाँग दिया। आज भी वह तालाब ‘फाँसी का तालाब’ कहलाता है।


गणपतराय इस युद्ध में बच गये। वे अपने गाँव वापस आकर फिर से साथियों एवं शस्त्रों का संग्रह करने लगे। अंग्रेजों ने उनकी सब सम्पत्ति जब्त कर ली थी। एक रात अंग्रेजों ने उनके गाँव को घेर लिया; पर गणपतराय अपने पुरोहित उदयनाथ पाठक के साथ लोहरदगा की ओर चल दिये। 


दुर्भाग्यवश अंधेरे के कारण वे रास्ता भटक गये और परहेपाट गाँव में जा पहुँचे। वहाँ के देशद्रोही जमींदार महेश शाही ने उन्हें पकड़वा दिया। राँची लाकर उन पर अभियोग चलाया गया। राँची के तत्कालीन हाईस्कूल के पास एक कदम्ब का पेड़ था। उसी पेड़ पर 20 अप्रैल, 1858 को क्रान्तिकारी विश्वनाथ शाहदेव को तथा 21 अप्रैल को गणपतराय को फाँसी दे दी गयी।


राँची का यह स्थान आज ‘शहीदी चौक’ के नाम से जाना जाता है।

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21 अपै्रल/जन्म-दिवस


कुष्ठ रोगियों के आशा केन्द्र दामोदर गणेश बापट


कुष्ठ रोग और उसके रोगियों को समाज में घृणा की नजर से देखा जाता है। इसका लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियां उनके बीच सेवा का काम करती हैं और फिर चुपचाप उन्हें ईसाई भी बना लेती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने काम के विस्तार के साथ-साथ सेवा के अनेक क्षेत्रों में भी कदम बढ़ाये। कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए ‘भारतीय कुष्ठ निवारक संघ’ नामक संगठन बनाया गया। छत्तीसगढ़ के चांपा नगर में इसका मुख्यालय है। इसकी स्थापना श्री सदाशिव गोविन्द कात्रे ने की थी। वे स्वयं एक कुष्ठ रोगी थे। उनके बाद जिस महापुरुष ने यह काम संभाला, वे थे श्री दामोदर गणेश बापट।


बापटजी का जन्म 21 अपै्रल, 1935 को ग्राम पथरोट (अमरावती, महाराष्ट्र) में हुआ था। नौ वर्ष की अवस्था में वे संघ के स्वयंसेवक बने। नागपुर से बी.काॅम और समाजशास्त्र में बी.ए. कर वे संघ के प्रचारक बन गये। सेवा के प्रति उनका समर्पण देखकर पहले उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम और फिर 1971 में चांपा भेजा गया। 1977 में कात्रेजी के निधन के बाद वे भारतीय कुष्ठ निवारक संघ के सचिव बने। सदा खादी का धोती-कुर्ता पहनने वाले बापटजी की सेवाओं के लिए 1995 में उन्हें कोलकाता में ‘विवेकानंद सेवा सम्मान’ तथा 2017 में राष्ट्रपति महोदय द्वारा ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया।


बापटजी ने सोठी ग्राम स्थित कुष्ठ आश्रम को अपना केन्द्र बनाया। इसमें कुष्ठ से पीडि़त लगभग 200 पुरुष, स्त्री तथा बच्चे रहते हैं। इन सबकी समुचित चिकित्सा तथा देखभाल वहां की जाती है। कुष्ठ रोगियों के बच्चों के लिए ‘झूलाघर’ तथा ‘सुशील बालक गृह’ की व्यवस्था हैै। आश्रम तथा पड़ोसी गांवों के बच्चों की शिक्षा के लिए ‘सुशील विद्या मंदिर’ बना है। बालकों को शिक्षा और संस्कार के साथ ही पौष्टिक भोजन भी मिलता है। बालिकाओं के लिए बिलासपुर में अलग से ‘तेजस्विनी’ छात्रावास खोला गया है।


प्रतिदिन आसपास से लगभग 400 कुष्ठरोगी दवा तथा पट्टी आदि के लिए आश्रम में आते हैं। बापटजी स्वयं उनकी पट्टी करते थे। इससे अब तक 25,000 से भी अधिक रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। एलोपैथी के साथ ही आयुर्वेद तथा होम्यापैथी चिकित्सा की व्यवस्था भी आश्रम में है। कात्रेजी तथा बापटजी का मत था कि कुष्ठ रोगियों को समाज की दया की बजाय प्रेम और सम्मान की जरूरत है। अतः उन्होंने ऐसे प्रकल्प चलाए, जिससे उनका स्वाभिमान जाग्रत हो तथा वे भिक्षावृत्ति से दूर रह सकें। 


आश्रमवासी अपनी तीन एकड़ भूमि में मिर्च, प्याज, संतरा, हल्दी, केला, आम, बिही, पपीता, सीताफल, नींबू आदि उगाते हैं। आश्रम की गोशाला में 175 देसी गाय हैं। उनका पूरा दूध वहीं काम आता है। रोगियों को मोमबत्ती, दरी, रस्सी, चाॅक आदि बनाना सिखाते हैं। कुछ ने वेल्डिंग भी सीखी है। आश्रम में 20 बिस्तर का अस्पताल, स्कूल, गणेश मंदिर, वृद्धाश्रम तथा कार्यकर्ता निवास के अलावा कम्प्यूटर, सिलाई तथा चालक प्रशिक्षण केन्द्र भी हैं। यद्यपि आश्रम के लिए समाज से सहयोग लिया जाता है; पर आश्रमवासियों के परिश्रम और लगन से भी वहां की कई जरूरतें पूरी हो जाती हैं। 


बहुत से लोग इन रोगियों की सेवा करते हुए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं; पर बापटजी कुष्ठरोगियों के बीच रहकर उनके हाथ से बना खाना ही खाते थे। एक बार जर्मनी से आये कुछ लोगों ने दस लाख रु. देने चाहे; पर बापटजी ने नहीं लिये। वे सरकार या विदेशी सहायता की बजाय आम जनता के सहयोग पर अधिक विश्वास करते थे। हजारों कुष्ठ रोगियों के जीवन में प्रकाश फैलाने वाले बापटजी का 17 अगस्त, 2019 को बिलासपुर के एक अस्पताल में निधन हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी देह चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के उपयोग के लिए छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट आॅफ मैडिकल साइंस को दे दी गयी। 

(पांचजन्य 8.9.19 तथा बिलासपुर से प्रकाशित पत्र आदि)         

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

20 अप्रैल/इतिहास-स्मृति,


20 अप्रैल/इतिहास-स्मृति

               विजयनगर साम्राज्य के प्रेरक 
                देवलरानी और खुशरोखान

मध्यकालीन इतिहास में हिन्दू गौरव के अनेक पृष्ठों को वामपंथी इतिहासकारों ने छिपाने का राष्ट्रीय अपराध किया है। ऐसा ही एक प्रसंग गुजरात की राजनकुमारी देवलरानी और खुशरो खान का है।

अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में नरसंहार कर अपार धनराशि लूटी  तथा वहां हिन्दू कला व संस्कृति को भी भरपूर नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। गुजरात के शासक रायकर्ण की पत्नी कमलादेवी को जबरन अपनी तथा राजकुमारी देवलरानी को अपने बड़े बेटे खिजरखां की बीवी बना लिया। अलाउद्दीन की मृत्यु के कुछ दिन बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारकशाह ने खिजरखां को मारकर देवलरानी को अपने हरम में डाल लिया। देवलरानी खून का घूंट पीकर सही समय की प्रतीक्षा करती रही।

इस अराजकता के काल में दिल्ली दरबार में खुशरो खान अत्यन्त प्रभावी व्यक्ति बन गया। वह भी मूलतः गुजराती हिन्दू था, जिसे दिल्ली लाकर जबरन मुसलमान बनाया गया था। वह हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखकर योजना बनाता रहा और मुबारक शाह का सबसे विश्वस्त तथा प्रभावी दरबारी बन गया। मुबारक शाह ने उसे खुशरो खान नाम देकर अपना वजीर बना लिया।

खुशरो के मन में हिन्दू राज्य का सपना पल रहा था। उसने गुजरात शासन में अपने सगे भाई हिमासुद्दीन को मुख्य अधिकारी बनाया, जो पहले हिन्दू ही था। इसी प्रकार उसने दिल्ली में जबरन मुस्लिम बनाये गये 20,000 सैनिक भरती किये। एक बार वह मुबारक शाह के साथ तथा एक बार अकेले दक्षिण की लूट पर गया। उसने वहां विध्वंस और नरसंहार तो खूब किया; पर गुप्त रूप से कुछ हिन्दू राजाओं से मित्रता व मंत्रणा भी की। कुछ लोगों ने मुबारक शाह से उसकी शिकायत की; पर मुबारक ने उन पर विश्वास नहीं किया।

परिस्थिति पूरी तरह अनुकूल होने पर खुशरो खान तथा देवलरानी ने एक योजना बनाई। 20 अप्रैल, 1320 की रात्रि में खुशरो खान ने 300 हिन्दुओं के साथ राजमहल में प्रवेश किया। उसने कहा कि इन्हें मुसलमान बनाना है, अतः सुल्तान से मिलाना आवश्यक है। सुल्तान से भेंट के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भूरिया नामक एक व्यक्ति ने मुबारक शाह का वध कर दिया। बाकी सबने मिलकर राजपरिवार के सब सदस्यों को मार डाला।

इसके बाद खुशरो खान ने स्वयं को सुल्तान घोषितकर देवलरानी से विवाह कर लिया। उसने अपना नाम नहीं बदला; पर महल में मूर्तिपूजा प्रारम्भ हो गयी। इससे हिन्दुओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी। खुशरो खान ने घोषणा की - अब तक मुझे जबरन मुसलमान जैसा जीवन जीना पड़ रहा था, जबकि मैं मूल रूप से हिन्दू की संतान हूं। कल तक सुल्ताना कहलाने वाली देवलरानी भी मूलतः हिन्दू राजकन्या है। इसलिए अब हम दोनों धर्मभ्रष्टता की बेड़ी तोड़कर हिन्दू की तरह जीवन बिताएंगे।

यद्यपि यह राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, चूंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया; पर इससे उस विचार का बीज पड़ गया, जिससे 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। खुशरो खान की यह योजना दक्षिण में ही बनी थी तथा इसे दक्षिण के अनेक हिन्दू व जबरन धर्मान्तरित मुस्लिम शासकों तथा सेनानायकों का समर्थन प्राप्त था।

(संदर्भ : डा0 सतीश मित्तल, इतिहास दृष्टि, पांचजन्य 28.6.09)

20 अप्रैल/जन्म-दिवस,विपिन बिहारी पाराशर

 20 अप्रैल/जन्म-दिवस


         सदा आज्ञाकारी विपिन बिहारी पाराशर


वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशानुसार संघ, जनसंघ और वनवासियों के बीच काम करने वाले वरिष्ठ प्रचारक श्री विपिन बिहारी पाराशर का जन्म मैलानी (जिला लखीमपुर खीरी, उ.प्र.) में 20 अपै्रल, 1925 (श्रीरामनवमी) को हुआ था। उनके पिता श्री प्रभुदयाल पाराशर उन दिनों वहां रेलवे स्टेशन पर तारबाबू थे। विपिन जी के अतिरिक्त उनके चार पुत्र और एक कन्या भी थी। वैसे यह परिवार बरेली जिले के आंवला नामक स्थान का निवासी था।

मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर विपिन जी भारत छोड़ो आंदोलन तथा सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर स्वाधीनता संग्राम में कूद गये। इससे उनकी पढ़ाई छूट गयी। 1943-44 में स्वयंसेवक बनने के बाद उनकी जीवन यात्रा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही आगे बढ़ती रही। 1945 में प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लेकर वे प्रचारक बने। उन्हें नैनीताल जिले में काशीपुर, रामनगर, जसपुर आदि स्थानों पर भेजा गया। 

1947 में उन्होंने फगवाड़ा से द्वितीय वर्ष किया। 1948 में गांधी जी की हत्या तथा संघ पर प्रतिबंध के बाद उन्होंने बदायूं में सत्याग्रह का संचालन किया। कुछ समय बाद वे स्वयं भी बन्दी बना लिये गये। उन्हें मुरादाबाद जेल में रखा गया। वहां उनके साथ वैद्य गुरुदत्त तथा उनके पुत्र योगेन्द्र जी भी थे। पुलिस और जेल प्रशासन ने उनसे क्षमापत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। अतः प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद ही वे जेल से छूटे।

प्रतिबंध समाप्ति के बाद दीनदयाल जी ने उन्हें मुरादाबाद जिले में ही काम करने को कहा। जनसंघ की स्थापना होने पर उन्होंने बरेली और मुरादाबाद जिले में जनसंघ के संगठन को सुदृढ़ किया। 1961 में उन्हें बिहार भेजा गया। वहां उन्होंने जनसंघ के साथ ही राष्ट्रधर्म और पांचजन्य जैसे पत्रों का विस्तार भी किया। वहां उनकी क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त से घनिष्ठ मित्रता हो गयी। 

1970 में वरिष्ठ प्रचारक श्री सभापति सिंह चिकित्सा हेतु मुंबई गये। उनके साथ सहयोगी के नाते विपिन जी को भी भेजा गया। मुंबई में रहते हुए उन्होंने उत्तर भारतीयों को जनसंघ से जोड़ा। मुंबई से आकर वे उ.प्र. में जनसंघ के काम में लगे। आपातकाल में पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। आपातकाल के बाद विपिन जी ने बरेली जिले में संघ का काम किया। 

उन दिनों पूर्वोत्तर भारत में बड़ी विकट परिस्थिति थी। देश भर से कई प्रचारकों को वहां भेजा गया। विपिन जी भी उनमें से एक थे। वहां की भाषा, मौसम, भोजन आदि भिन्नताओं से समरस होते हुए वे कारबियांगलांग, डिबू्रगढ़ व तिनसुकिया में जिला व विभाग प्रचारक रहे। फिर उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद के संगठन मंत्री तथा ‘आलोक’ साप्ताहिक के प्रबंध संपादक के नाते भी काम किया। उनके परिवार में प्याज-लहसुन का भी प्रयोग नहीं होता था; पर पूर्वोत्तर  में उन्हें सब कुछ खाना पड़ा। यद्यपि विपिन जी के सभी परिजन संघ से जुड़े हैं। फिर भी इससे उनके बड़े भाई बहुत नाराज हुए। 

‘विद्या भारती’ तथा ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ द्वारा पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के लिए कई छात्रावास देश के विभिन्न स्थानों पर चलाये जा रहे हैं। पश्चिमी उ.प्र. में भी ऐसे कई छात्रावास हैं। वृद्धावस्था के कारण जब प्रवास कठिन हो गया, तो वर्ष 2004 से विपिन जी उ.प्र. में वृन्दावन के ‘केशवधाम’ में रहते हुए इनकी देखरेख करने लगे। 

हिन्दी, अंग्रेजी तथा पूर्वोत्तर की कई भाषाओं के ज्ञाता विपिन जी ने पूर्वोत्तर भारत के अज्ञात स्वाधीनता सेनानियों के बारे में कई लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराए। संगठन की आज्ञा को सर्वोपरि मानने वाले विपिन जी का 26 जनवरी, 2014 को केशवधाम में ही निधन हुआ।  

(संदर्भ : विपिन जी का हस्तलिखित पत्र)

20 अप्रैल/बलिदान-दिवस, नक्सली हिंसा के शिकार वीर माणिक्यम्

 20 अप्रैल/बलिदान-दिवस


        नक्सली हिंसा के शिकार वीर माणिक्यम् 


आंध्र प्रदेश और उसमें भी तेलंगाना का क्षेत्र लम्बे समय से नक्सली गतिविधियों का केन्द्र रहा है। रूस और चीन के वामपंथी नेताओं का हाथ उनकी पीठ पर रहता था। वहां से उन्हें हथियार और पैसा भी आता था। अतः गांव और कस्बों में वही होता था, जो नक्सली चाहते थे। यद्यपि अब उनके पैर उखड़ चुके हैं। गांव और जंगलों में ‘लाल सलाम’ की जगह अब ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के स्वर सुनायी देने लगे हैं; पर यह स्थिति लाने में सैकड़ों युवा देशप्रेमी कार्यकर्ताओं ने अपनी जान दी है। ऐसे ही एक वीर थे तिम्ममपेट गांव के निवासी श्री माणिक्यम्।

माणिक्यम् अपने गांव तिम्ममपेट के मंदिर में पुजारी थे। अतः धर्म और देश के प्रति भक्ति उनके खून में समाहित थी। उनका व्यवहार सभी गांव वालों से बहुत अच्छा था। अतः वे पूरे गांव में बहुत लोकप्रिय थे। संघ का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उनके विचारों में और प्रखरता आ गयी। गांव में युवाओं की शाखा भी लगने लगी। 

नक्सली प्रायः उसके गांव में आकर धनी किसानों और व्यापारियों को लूटते थे। जो उनकी बात नहीं मानते थे, उनकी हत्या या हाथ-पैर काट देना उनके लिए आम बात थी। इसके लिए नक्सलियों की लोक अदालतें काम करती थीं। शासन भी डर के मारे इनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करता था। कहने को तो वे स्वयं को गरीबों का हितचिंतक कहते थे; पर वास्तव में वे गुंडे, माफिया और लुटेरों का एक संगठित गिरोह बन चुके थे।

माणिक्यम् की लोकप्रियता को देखकर नक्सलियों ने उसे अपना साथी बनने को कहा। वे चाहते थे कि हर महीने गांव वालों से एक निश्चित राशि लेकर माणिक्यम् ही उन तक पहुंचा दिया करे; पर माणिक्यम् ने इसके लिए साफ मना कर दिया। इतना ही नहीं, वह गांव के युवकों को उनके विरुद्ध संगठित करने लगा। इससे वह नक्सलियों की आंखों में खटकने लगा।

माणिक्यम् के मामा नारायण गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे वारंगल जिला पंचायत के अध्यक्ष भी रह चुके थे। 20 अपै्रल, 1965 को नक्सलियों का एक दल गांव में आया। वे नारायण को पकड़कर गांव से बाहर ले गये और उनसे एक बड़ी राशि की मांग की। जैसे ही माणिक्यम् को यह पता लगा वह सब काम छोड़कर उधर ही भागा, जिधर नक्सली उसके मामा जी को ले गये थे। कुछ ही देर में दोनों की मुठभेड़ हो गयी। नक्सलियों ने माणिक्यम् और नारायण दोनों को मारना-पीटना शुरू कर दिया।

नक्सली संख्या में काफी अधिक थे; पर माणिक्यम् ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने ताकत लगाकर उनके नेता के हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और उस पर ही पिल पड़ा। इससे उसका सिर तत्काल ही धड़ से अलग हो गया। कुछ देर में दूसरे की भी यही गति हुई तथा तीसरा बाद में मरा। बाकी नक्सली भी सिर पर पांव रखकर भाग गये; पर इस संघर्ष में माणिक्यम् को भी पचासों घाव लगे। उसका पूरा शरीर लहू-लुहान हो गया। चार-पांच लोगों से अकेले लड़ते हुए वह बहुत थक भी गया था। अतः वह भी धरती पर गिर पड़ा।

इधर नारायण ने गांव में आकर सबको इस लड़ाई की बात बताई। जब गांव के लोग वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि माणिक्यम् के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं। माणिक्यम् की वीरता का समाचार राज्य की सीमाओं को पार कर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया। अतः राष्ट्रपति महोदय की ओर से उसकी विधवा पत्नी को ‘कीर्ति चक्र’ प्रदान किया गया। आंध्र के मुख्यमंत्री ने हैदराबाद में उन्हें सम्मानित किया। सामान्यतः यह सम्मान सैनिकों को ही दिया जाता है। ऐसे नागरिक बहुत कम हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला हो।

इस घटना से पूरे गांव तथा आसपास के क्षेत्र में बड़ी जागृति आयी। अतः नक्सलियों ने ही डरकर उधर आना बंद कर दिया। 

(कृ.रू.सं.दर्शन/भाग 1, पृष्ठ 113)

20 अप्रैल/जन्म-दिवस,उड़नपरी पी.टी. उषा

 20 अप्रैल/जन्म-दिवस


                        उड़नपरी पी.टी. उषा


पी.टी. उषा पहली महिला खिलाड़ी है, जिन्होंने अन्तरराष्ट्रीय खेल जगत् में भारत का नाम ऊँचा किया। उनका पूरा नाम पायोली थेवरापारम्पिल उषा है। उनका जन्म 20 अप्रैल, 1964 को केरल में कालीकट के निकट पायोली नामक गाँव में हुआ। 

उनका बचपन घोर गरीबी में बीता। खेलना तो बहुत दूर पढ़ने और खाने की भी ठीक व्यवस्था नहीं थी। 1976 में केरल सरकार ने जब महिलाओं के लिए खेल विद्यालय की स्थापना की, तो उषा ने उसमें प्रवेश ले लिया। यहाँ से उनकी प्रतिभा का विकास होने लगा। उस समय उन्हें 250 रु0 प्रतिमाह छात्रवृत्ति मिलती थी। इसी में उन्हें सभी प्रबन्ध करने होते थे।

1977 में केवल 13 साल की अवस्था में उषा ने 100 मीटर की दौड़ में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया। 1979 में उन्हें राष्ट्रीय खेल विद्यालय में प्रवेश मिल गया। वहाँ उन पर प्रशिक्षक श्री ओ.एम.नाम्बियार की दृष्टि पड़ी। उन्होंने पी.टी.उषा के अन्दर छिपी प्रतिभा को पहचान लिया और कठोर प्रशिक्षण द्वारा उसे निखारने में जुट गये। उन दिनों लड़कियाँ राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कम ही भाग लिया करती थीं; पर उषा ने इस परम्परा को तोड़ा।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने पहली बार 1982 के एशियाई खेलों में भाग लिया। इन खेलों में उन्हें 100 और 200 मीटर की दौड़ में रजत पदक प्राप्त हुआ। इससे उनका साहस बढ़ा। 1983 में कुवैत में आयोजित फील्ड चैम्पियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और नया एशियाई कीर्तिमान भी बनाया। अब उनकी दृष्टि ओलम्पिक खेलों पर थी। वह ओलम्पिक में पदक जीतकर देश का नाम ऊँचा करना चाहती थी।

1986 का लास एजेंल्स ओलम्पिक उषा के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु था। वहाँ वह सेकेण्ड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक जीतने से रह गयीं। इससे उन्हें दुःख तो बहुत हुआ; पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उसी वर्ष सियोल में हुए एशियाई खेलों में उन्होंने 200 मी0, 400 मी0, 400 मी0 बाधा दौड़ तथा 4 x 400 मीटर रिले दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन सफलताओं के कारण लोगों ने उसे ‘पायोली एक्सपे्रस’ कहना शुरू कर दिया।

आगामी सियोल ओलम्पिक में भी वह कोई पदक जीतने में सफल नहीं हो सकीं। उसकी भरपाई उसने 1989 में दिल्ली में आयोजित एशियन टैªक फैडरेशन में चार स्वर्ण और दो रजत पदक जीतकर की। 1990 के बीजिंग एशियाई खेलों में उन्होंने रजत पदक जीता। 1991 में उनका विवाह हो गया। इसके बाद वह सात साल तक खेल जगत् से प्रायः दूर ही रहीं।

1998 में जापान में आयोजित एशियन टैªक फैडरेशन में फिर से उन्होंने भाग लिया और दो कांस्य पदक जीते। यद्यपि वह इस समय एक बच्चे की माँ भी थीं। अपने अदम्य साहस एवं इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने भारत को अन्तरराष्ट्रीय खेल जगत में सम्मान दिलाया। भारतीय ओलम्पिक संघ ने उन्हें शताब्दी का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया। आज भी वह भारत की सर्वाधिक अन्तरराष्ट्रीय पदक जीतने वाली खिलाड़ी हैं।

शासन ने उन्हें 1983 में अर्जुन पुरस्कार तथा 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया। अब वह प्रत्यक्ष प्रतियोगिताओं में तो भाग नहीं लेेतीं; पर लड़कियों के लिए प्रशिक्षण विद्यालय चलाकर भारतीय खेल जगत की नयी प्रतिभाओं को निखारने में लगी हैं।