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रविवार, 11 अप्रैल 2021

12 अप्रैल,स्वधर्म के सेनानी एच.अण्डरसन मावरी,सुन्दर सिंह भंडारी

 12 अप्रैल/जन्म-दिवस

स्वधर्म के सेनानी एच.अण्डरसन मावरी


पूर्वोत्तर भारत में धर्मान्तरण के महाराक्षसों से लड़ने वाले स्वधर्म के कर्मठ सेनानी श्री एच.अंडरसन मावरी का जन्म 12 अप्रैल, 1920 को शिलांग (मेघालय) के लेटुमखराह ग्राम में हुआ था। जब वे 10 वर्ष के थे, तब उनके पूरे परिवार को ईसाई बना लिया गया। 


इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे 1943 में सेना में भर्ती हो गये। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1946 में सेना से अवकाश लेकर उन्होंने फिर अध्ययन प्रारम्भ किया तथा गोहाटी वि.वि. से बी.ए. कर शिलांग के शासकीय हाईस्कूल में अध्यापक हो गये।


इस दौरान उन्होंने ईसाई मजहब के प्रचार-प्रसार में काफी समय लगाया। कई जगह वे प्रवचन करने जाते थे; पर इससे उन्हें आध्यात्मिक तृप्ति नहीं हुई। अतः 1966 में नौकरी छोड़कर दर्शन एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए उन्होंने श्रीरामपुर (कोलकाता) के थियोलाॅजिकल काॅलिज में प्रवेश ले लिया। एक वर्ष बाद वे चेरापूंजी के विद्यालय में प्रधानाचार्य हो गये।


इस दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों की तुलना, आदिधर्म एवं चर्च के इतिहास का गहन अध्ययन किया। इससे उन्हें अनुभव हुआ कि ईसाई पादरी जिस खासी धर्म की आलोचना करते हैं, वह तो एक श्रेष्ठ धर्म है। इसकी तुलना में ईसाई मजहब कहीं नहीं ठहरता। अतः 1968 में उन्होंने ईसाई मजहब छोड़कर स्वयं को अपने पूर्वजों के पवित्र खासी धर्म की सेवार्थ समर्पित कर दिया। वे अपने गांव लौट आये और वहां पर ही एक हाईस्कूल के प्राचार्य हो गये।


अब उन्होंने समाचार पत्रों में लेखन भी प्रारम्भ कर दिया। खासी जाति की अवस्था पर इनकी पहली पुस्तक ‘का परखात ऊ खासी’ प्रकाशित हुई। इसके बाद तो खासी एवं स्वधर्म, खासी धर्मसार, भविष्य की झलक, पूर्वी बनाम पश्चिमी संस्कृति तथा अन्य कई लघु पुस्तिकाएं छपीं। स्थानीय भाषा-बोली के साथ ही उनका अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ। 


उन्होंने स्वामी विवेकानंद की जीवनी भी लिखी। अब वे गांव-गांव में जाकर खासी धर्म का प्रचार करने लगे। इससे जहां एक ओर खासी जाति का खोया हुआ स्वाभिमान वापस आया, वहां ईसाई षड्यन्त्रों के विफल होने से पादरियों में हलचल मच गयी।


छह मार्च, 1978 को श्री मावरी मेघालय तथा बांगलादेश की सीमा पर स्थित ग्राम नोंगतालांग में आयोजित ‘सेंग खासी सम्मेलन’ में शामिल हुए। उसके बाद से वे खासी जाति के उत्थान के लिए खासी जयन्तिया पहाडि़यों में घूम-घूम कर ‘स्वधर्मों निधनम् श्रेय, परमधर्मो भयावह’ की अलख जगा रहे हैं। 


उनके प्रयासों से खासी जाति संगठित हुई तथा ईसाइयों के चंगुल में फंसे हजारों लोग वापस अपने धर्म में लौट आये। उनकी सक्रियता देखकर लोगों ने उन्हें खासी जाति की प्रमुख संस्था ‘सेंग खी लांग’ का अध्यक्ष बना दिया।


पूर्वोत्तर में सघन प्रवास से उनकी ख्याति भारत के साथ ही विदेशों तक जा पहुंची। 1981 में हालैंड तथा बेल्जियम में आयोजित विश्व धर्म सभाओं में श्री मावरी ने खासी धर्म की महत्ता पर प्रभावी व्याख्यान दिये। मेघालय में हिन्दू धर्म तथा स्थानीय जनजातियों की भाषा, बोली, रीति-रिवाज तथा परम्पराओं की रक्षार्थ काम करने वाली विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संस्थाओं के विचारों से प्रभावित होकर उनकी यह धारणा दृढ़ हुई है कि सेंगखासी आंदोलन विराट हिन्दू धर्म के पुनर्जागरण का ही एक प्रयास है। 


अब श्री मावरी पूरे देश के वनवासियों के बीच जाकर उन्हें ईसाइयों के षड्यन्त्रों से सावधान करते हैं। यद्यपि ईसाई मिशनरियों को देश तथा विदेश से भारी सहायता मिलती है, उनके संसाधनों का मुकाबला करना कठिन है। फिर भी श्री मावरी को विश्वास है कि अंतिम विजय सत्य की ही होगी। 


(संदर्भ : श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय, कोलकाता)

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12 अप्रैल/पुण्य-तिथि


भोजनालय के साधक मंगल प्रसाद जी


संघ के प्रचारक प्रायः स्वयंसेवक परिवारों में ही भोजन करते हैं; पर अब सभी बड़े कार्यालयों पर कई वृद्ध प्रचारक रहते हैं तथा प्रतिदिन बाहर से भी कार्यकर्ता आते रहते हैं। अतः स्थायी भोजनालय की व्यवस्था आवश्यक हो गयी है। इनका संचालन प्रायः वेतनभोगी लोग ही करते हैं; पर सब कार्यकर्ताओं के बीच वे परिवार के सदस्य की ही तरह रहते हैं।


नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर भी 1952-53 तक यही स्थिति थी। श्री गुरुजी नागोबा गली में अपने माता-पिता के पास, जबकि शेष लोग एक छात्रावास में भोजन करते थे। ऐसे में कार्यालय प्रमुख श्री पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने भोजनालय चलाने के लिए एक युवक मंगलप्रसाद को खोज निकाला। श्री गुरुजी की सहमति से समुचित मानदेय पर वे कार्यालय में आ गये।


मंगलप्रसाद जी म.प्र. में रीवा जिले में बंधुआ गांव के निवासी थे। उन दिनों नागपुर के होटल तथा छात्रावासों में रीवा के कई लोग काम करते थे। ऐसे लोग प्रायः मंगलप्रसाद जी से मिलने कार्यालय आते थे। विशाल हृदय वाले मंगलप्रसाद जी दुख-सुख में उनकी भली प्रकार चिन्ता करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे वे विशाल संघ परिवार के अभिन्न अंग बन गये।


कार्यालय के साथ ही संघ की विभिन्न बैठकों तथा शिविरों की व्यवस्था भी उनके जिम्मे ही रहती थी। संघ के किस वरिष्ठ कार्यकर्ता को कैसा भोजन चाहिए; किसे मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग है और कौन मिर्च नहीं खाता, यह सब उन्हें याद रहता था। अतः वे उसी अनुसार व्यवस्था कर देते थे।


उन दिनों सभी केन्द्रीय बैठकें कार्यालय पर ही होती थीं। एक बार नागपुर के एक बाल शिविर में भीषण आंधी और वर्षा से तम्बू उखड़ गये, चारों ओर कीचड़ हो गया। ऐसे में भी उन्होंने समय से भोजन तैयार कर दिया।


मंगलप्रसाद जी कभी शाखा पर नहीं गये; पर एक निष्ठावान स्वयंसेवक जैसे सब गुण उनमें विद्यमान थे। भोजनालय ही उनकी साधनास्थली थी। 1975 के आपातकाल में अनेक प्रमुख कार्यकर्ता पकड़े गये, जबकि बाकी भूमिगत हो गये। संघ कार्यालय को भी पुलिस ने सील कर दिया। यद्यपि इससे पूर्व ही कार्यालय के महत्वपूर्ण कागज तथा सामान वहां से हटा दिया गया था। 


भालचंद्र गोखले नामक कार्यकर्ता कार्यालय के पास वाले भूखंड पर रहने लगे। मंगलप्रसाद जी भी एक अन्य घर में काम करने लगे; पर वे प्रतिदिन दोपहर में वहां आते थे। इस प्रकार इन दोनों ने भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच सेतु बनकर संदेशों के आदान-प्रदान का क्रम बनाये रखा। 


आपातकाल के बाद जब रेशीम बाग का आवासीय परिसर बन गया, तो ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ तथा ‘केन्द्रीय कार्यकारी मंडल’ की बैठकें वहीं होने लगीं। वहां भोजनालय की व्यवस्था के लिए अलग टोली लगती थी, फिर भी सरकार्यवाह श्री शेषाद्रि जी उन्हें वहां अवश्य भेजते थे। उनके निर्देशन में ही सब काम होता था। इस प्रकार वे भोजनालय की पहचान बन गये। 


अपने मधुर स्वभाव के कारण वे वयोवृद्ध से लेकर बाल और किशोर तक, सभी स्वयंसेवकों के प्रिय थे। उनकी कार्यनिष्ठा को देखकर नागपुर की एक सेवाभावी संस्था ने उन्हें ‘जीवननिष्ठा पुरस्कार’ से सम्मानित किया।


अधिक अवस्था होने पर वे अपने गांव चले गये। वे हृदयरोगी थे ही। संघ के कार्यकर्ताओं की देखरेख में प्रयाग में उनका इलाज चलता रहा। 12 अप्रैल, 2008 को अपने गांव बंधुआ में अपने परिजनों के बीच उनका देहांत हुआ। उनके अंतिम संस्कार में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख श्री लक्ष्मण राव पार्डीकर ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। 


(संदर्भ : पांचजन्य)

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12 अप्रैल/जन्म-दिवस


कुशल संगठक सुन्दर सिंह भंडारी 

श्री सुन्दर सिंह भंडारी का जन्म 12 अप्रैल, 1921 को उदयपुर (राजस्थान) में प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सुजानसिंह के घर में हुआ था। 1937-38 में कानपुर में बी.ए. करते समय वे अपने सहपाठी दीनदयाल उपाध्याय के साथ नवाबगंज शाखा पर जाने लगे। भाऊराव देवरस से भी इनकी घनिष्ठता थी। 


1940 में नागपुर से प्रथम वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग करते समय इन्हें डा0 हेडगेवार के दर्शन का सौभाग्य मिला। 1946 में तृतीय वर्ष कर भंडारी जी प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम इन्हें जोधपुर विभाग का काम दिया गया। 1948 के प्रतिबंध काल में भूमिगत रहकर इन्होंने सत्याग्रह का संचालन किया। 


1951 में डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना कर श्री गुरुजी से कुछ कार्यकर्ताओं की मांग की। उनके आग्रह पर दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख के साथ भंडारी जी को भी इसमें भेज दिया गया।


प्रारम्भ में वे राजस्थान में ही जनसंघ के संगठन मन्त्री रहे। उनके प्रयास से 1952 के चुनाव में राजस्थान से जनसंघ के आठ विधायक जीते। बहुत शीघ्र ही जनसंघ का काम गांव-गांव में फैल गया। वे अति साहसी एवं स्थिरमति के व्यक्ति थे। कश्मीर सत्याग्रह के दौरान 23 जून, 1953 को डा0 मुखर्जी की जेल में ही षड्यन्त्रपूर्वक हत्या कर दी गयी; पर भंडारी जी ने उसी दिन स्वयं को एक सत्याग्रही जत्थे के साथ गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत कर दिया। 


1954 में जनसंघ के केन्द्रीय मंत्री के नाते उन्होंने राजस्थान, गुजरात, हिमाचल तथा उ.प्र. में सघन कार्य किया। 1967 में दीनदयाल जी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर वे महामंत्री बनाये गये। 1968 में दीनदयाल जी की हत्या के बाद उन्हें जनसंघ का राष्ट्रीय संगठन मन्त्री बनाया गया।


वे संगठन के अनुशासन तथा रीति-नीति का कठोरता से पालन करते थे। निर्णय से पूर्व वे विचार-विमर्श का खुले मन से स्वागत करते थे; पर बाद में बोलने को अक्षम्य मानते थे। कई वर्ष संगठन मन्त्री रहने के बाद वे दल के उपाध्यक्ष बने। आपातकाल के विरुद्ध हुए संघर्ष में वे भूमिगत रहकर काम करते रहे; पर कुछ समय बाद वे पकड़े गये। जेल में उन्होंने अपनी सादगी और वैचारिक स्पष्टता से विरोधियों का मन भी जीत लिया। जेल से ही वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। 


1977 में जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ; पर यह मित्रता स्थायी नहीं रही। भंडारी जी को इसका अनुमान था। अतः उन्होंने पहले ही ‘युवा मोर्चा’ तथा ‘जनता विद्यार्थी मोर्चा’ का गठन कर लिया था। 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ का गठन होने पर नये दल का संविधान उन्हीं की देखरेख में बना।


दो बार उन्हें राजस्थान से राज्यसभा में भेजा गया। तीसरी बार उन्होंने यह कहकर मनाकर दिया कि अब किसी अन्य कार्यकर्ता को अवसर मिलना चाहिए; पर मा0 रज्जू भैया एवं शेषाद्रि जी के आग्रह पर वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में जाने को तैयार हुए। केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में बनी सरकार में वे बिहार और गुजरात के राज्यपाल तथा ‘मानवाधिकार आयोग’ के अध्यक्ष रहे। 


भंडारी जी ने आजीवन प्रचारक की मर्यादा को निभाया। वैचारिक संभ्रम की स्थिति में उनका परामर्श सदा काम आता था। वे बहुत कम बोलते थे; पर उनकी बात गोली की तरह अचूक होती थी। अटल जी तथा आडवाणी जी उनसे छोटे थे। अतः आवश्यकता होने पर वे उन्हें भी खरी-खरी सुना देते थे। 


संघ, जनसंघ और भा.ज.पा. को अपने संगठन कौशल से सींचने वाले श्री सुंदर सिंह भंडारी का 84 वर्ष की सुदीर्घ आयु में 22 जून, 2005 को अति प्रातः नींद में हुए तीव्र हृदयाघात से देहान्त हो गया।


(संदर्भ : अभिलेखागार, भारती भवन, जयपुर/पांचजन्य/आर्गनाइजर)

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