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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

30 अप्रैल,अद्भुत योद्धा हरिसिंह नलवा, श्री श्री मां आनंदमयी

  30 अप्रैल/बलिदान-दिवस


अद्भुत योद्धा हरिसिंह नलवा


भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों की मार सर्वप्रथम सिन्ध और पंजाब को ही झेलनी पड़ी। 1802 में रणजीत सिंह विधिवत महाराजा बन गये। 40 साल के शासन में उन्हें लगातार अफगानों और पठानों से जूझना पड़ा। इसमें मुख्य भूमिका उनके सेनापति हरिसिंह नलवा की रही। 1802 में उन्होंने कसूर के पठान शासक निजामुद्दीन तथा 1803 में झंग के पठानों को हराया। 1807 में मुल्तान के शासक मुजफ्फर खान को हराकर उससे वार्षिक कर लेना शुरू किया। 


इस युद्ध के बाद वीरवर हरिसिंह नलवा का नाम पेशावर से काबुल तक मुसलमानों के लिए आतंक का पर्याय बन गया। वहाँ की माताएँ अपने बच्चों को यह कहती थीं कि यदि तू नहीं सोएगा, तो नलवा आ जाएगा। 


मुल्तान और अटक जीतकर रणजीत सिंह ने पेशावर और कश्मीर पर ध्यान दिया। काबुल के वजीर शेर मोहम्मद खान का बेटा अता मोहम्मद कश्मीर में शासन कर रहा था। 1819 में उसे जीतकर पहले दीवान मोतीराम को और फिर 1820 में हरिसिंह नलवा को वहाँ का सूबेदार बनाया गया। इससे कश्मीर पूरी तरह काबू में आ गया। 1822 में हरिसिंह को अफगानों के गढ़ हजारा का शासक बनाया गया। 


पठान और अफगानी सेना में प्रशिक्षित सैनिकों के साथ जेहाद के नाम पर एकत्र ‘मुल्की सेना’ भी रहती थी। 1823 में अटक के पार नोशहरा में दोनों सेनाओं में भारी युद्ध हुआ। 10,000 अफगान सैनिक मारे गये, इधर भी भारी क्षति हुई। अकाली फूलासिंह और हजारों सिख बलिदान हुए; पर जीत हरिसिंह नलवा की हुई। उन्होंने अफगानों का गोला बारूद और तोपें छीन लीं। इससे उनकी धाक काबुल और कन्धार तक जम गयी। उन्होंने वहाँ का सूबेदार बुधसिंह सन्धावालिया को बना दिया। 


पर पठान और अफगानों ने संघर्ष जारी रखा। 1826 से 1831 के बीच सिख राज्य के विरुद्ध जेहाद छेड़ने का कार्य मुख्यतः रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले सैयद अहमद खान ने किया। पठान उसे ‘सैयद बादशाह’ कहते थे। 1827 में 50,000 जेहादी तथा पेशावर के बरकजाई कबीले के 20,000 सैनिकों के साथ उसने हमला किया। 


पेशावर से 32 कि.मी दूर पीरपाई में सिखों और जेहादियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। बुधसिंह के पास 10,000 सैनिक और 12 तोपें थीं। कुछ ही घण्टों में 6,000 मुजाहिदीन मारे गये, अतः उनके पाँव उखड़ गये। सैयद अहमद भागकर स्वात की पहाडि़यों में छिप गया।


पर यह संघर्ष रुका नहीं। 8 मई, 1831 को बालाकोट के युद्ध में मुस्लिम सेना बुरी तरह पराजित हुई। सैयद बादशाह भी मारा गया। सिख सेना का नेतृत्व रणजीत सिंह का बेटा शेरसिंह कर रहा था। नलवा इस समय सम्पूर्ण पेशावर क्षेत्र के शासक थे। 


1837 में काबुल का अमीर मोहम्मद खान एक बड़ी फौज और 40 तोपें लेकर नलवा के किले जमरूद पर चढ़ आया। महीनों तक संघर्ष चलता रहा। हरिसिंह नलवा उन दिनों बुरी तरह बीमार थे, फिर भी 30 अप्रैल, 1837 को वे युद्ध के मैदान में आ गये। उनका नाम सुनते ही अफगानी सेना भागने लगी। उसी समय एक चट्टान के पीछे छिपे कुछ अफगानी सैनिकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। वे घोड़े से गिर पड़े।


इस प्रकार भारत की विजय पताका काबुल, कन्धार और पेशावर तक फहराने वाले वीर ने युद्धभूमि में ही वीरगति प्राप्त की।

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30 अपै्रल/जन्म-दिवस


करुणा की देवी श्री श्री मां आनंदमयी


भक्ति, प्रेम और करुणा की त्रिवेणी श्री श्री मां आनंदमयी एक महान आध्यात्मिक विभूति थीं। उनका जन्म 30 अपै्रल, 1896 (वैशाख पूर्णिमा) को त्रिपुरा के खेड़ा ग्राम में अपनी ननिहाल में हुआ था। अब यह गांव बांग्लादेश में है। 


उनका बचपन का नाम निर्मला सुंदरी था। उनके पिता श्री विपिन बिहारी भट्टाचार्य एक प्रसिद्ध वैष्णव भजन गायक थे। माता श्रीमती मोक्षदा सुंदरी ने आगे चलकर संन्यास ले लिया और उनका नाम मुक्तानंद गिरि हो गया। यद्यपि भक्त लोग उन्हें दीदी मां कहते थे। ऐसे धार्मिक परिवार में निर्मला का बचपन बीता।


निर्मला के मन में बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति बहुत प्रेम था। वे प्रायः समाधि अवस्था में आ जाती थीं। ऐसे में उनका सम्बन्ध बाहरी जगत से टूट जाता था। उनकी लौकिक शिक्षा कुछ नहीं हुई तथा 12 वर्ष की छोटी अवस्था में ही उनका विवाह पुलिसकर्मी रमणी मोहन चक्रवर्ती (भोलानाथ) से हो गया। 


निर्मला ने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को सामान्य रूप से निभाया; पर भक्ति में भाव-विभोर होकर समाधिस्थ हो जाने का क्रम बना रहा। इससे वे जो काम कर रही होती थीं, वह अधूरा रह जाता। धीरे-धीरे परिवार और आसपास के लोग उनकी इस अध्यात्म चेतना को पहचान गये। 


1925 में 'अंबूवाची पर्व' पर वे पति सहित रमणा के सिद्धेश्वरी काली मंदिर में पूजा करने गयीं। वहां वे भाव समाधि में डूब गयीं। उनके हाथों से अपने आप बन रही तांत्रिक मुद्राओं तथा चेहरे की दिव्यता देखकर उनके पति समझ गये कि वह पूर्वजन्म की कोई देवी है। उन्होंने तभी उनसे दीक्षा ले ली।


धीरे-धीरे उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गयी। उनके कीर्तन चैतन्य महाप्रभु की याद दिला देते थे। 26 वर्ष की अवस्था में उन्होंने पहला प्रवचन दिया। वे कुछ समय अपने पति के साथ शाहबाग (ढाका) में भी रहीं। नवाब की बेगम प्यारीबानो उनसे बहुत प्रभावित थी। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.सी.एस.) के अधिकारी ज्योतिष चंद्र (भाई जी) भी वहीं उनके शिष्य बने। ज्योतिष बाबू ने ही उन्हें ‘श्री श्री मां आनंदमयी’ नाम दिया, जो फिर उनकी स्थायी पहचान बन गया। पति के निधन के बाद वे पूरे देश में भ्रमण करने लगीं।  


1932-33 में जवाहर लाल नेहरू देहरादून जेल में थे। मां भी उन दिनों देहरादून में थीं। वहीं नेहरू जी की पत्नी कमला और बेटी इंदिरा मां के संपर्क में आकर उनकी भक्त बनीं। क्रमशः प्रसिद्ध खिलाड़ी पटियाला नरेश भूपेन्द्र सिंह, कुमार नृपेन्द्र नाथ शाहदेव (रांची), संगीतकार एम.एस.सुबुलक्ष्मी, बांसुरीवादक हरिप्रसाद चैरसिया आदि अनेक विद्वान एवं विख्यात लोग उनके भक्त बने।


मां का राजनीति से कुछ सम्बन्ध न होने पर भी गांधी जी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, महाराजा (सोलन), महाराजा चिंतामणि शरणनाथ शाहदेव (रातू), रानी साहिब (बामड़ा), फ्रांस के राष्ट्रपति, कनाडा के प्रधानमंत्री तथा भारत के अनेक उद्योगपति, वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता उनके दर्शन को आते रहते थे।


तत्कालीन सभी आध्यात्मिक विभूतियों से मां का संपर्क बना रहता था। इनमें देवरहा बाबा, उडि़या बाबा, हरिबाबा, नीमकरौली बाबा, श्रीराम ठाकुर, पगला बाबा, स्वामी अखंडानंद, स्वामी शरणानंद, परमहंस योगानंद, गोपीनाथ कविराज, संत छोटे महाराज, हरिगुण गायक आदि प्रमुख हैं। 


असंख्य लोगों में प्रेम, भक्ति और करुणा का संदेश बांटते हुए मां ने 27 अगस्त, 1982 को देहरादून (उत्तराखंड) में अपनी देहलीला पूर्ण की। दो दिन बाद उन्हें कनखल (हरिद्वार) स्थित उनके आश्रम में समाधि दी गयी। समाधि पर जाकर उनके भक्तों को आज भी उनकी जीवंत उपस्थिति का अनुभव होता है। 


(संदर्भ : अमर उजाला 20.5.2008 एवं विकीपीडिया आदि)

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