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मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

21 अप्रैल,गणपतराय का बलिदान,

 21 अप्रैल/बलिदान-दिवस


गणपतराय का बलिदान


गणपतराय का जन्म 17 जनवरी, 1808 को ग्राम भौरो (जिला लोहरदगा, झारखंड) में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री किसनराय तथा माता श्रीमती सुमित्रादेवी थीं। बचपन से ही वनों में घूमना, घुड़सवारी, आखेट आदि उनकी रुचि के विषय थे। इस कारण उनके मित्र उन्हें ‘सेनापति’ कहते थे। 


बचपन से ही इनका मन अपने देश और जागीरों पर अंग्रेजों के शासन को देखकर बहुत चिढ़ता था। वे इसकी चर्चा अपने साथियों और माता-पिता से करते थे; पर सब इसे उनका बचपना समझकर टाल देते थे। कुछ बड़े होने पर वे पढ़ने के लिए अपने चाचा सदाशिव पांडेय के पास पालकोट आ गये। उनके चाचा पालकोट रियासत के दीवान थे। गणपतराय की योग्यता देखकर चाचा की मृत्यु के बाद उनको ही रियासत का दीवान बना दिया गया। 


रियासत के शासक जगन्नाथ पांडेय सदा अंग्रेजों की चमचागीरी करते रहते थे। गणपतराय उन्हें अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करने का परामर्श देते थे; पर कायर राजा इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 1829 में अंग्रेजों ने राजा जगन्नाथ को गद्दी से हटाकर उनकी जागीर पर कब्जा कर लिया।


राजा ने स्वभाववश कोई विरोध नहीं किया। वह चुप होकर बैठ गये। गणपतराय का मन विद्रोह कर उठा; पर वे कुछ कर नहीं सकते थे। अतः दीवान के पद से त्यागपत्र देकर वे गाँव वापस आ गये तथा अपने पुराने मित्र ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के साथ मिलकर अंग्रेजों का विरोध करने लगे।


दो अगस्त, 1857 को उन्होंने अपने साथियों के साथ राँची जेल तोड़कर 300 वीरों को मुक्त करा लिया और वहाँ तैनात अंग्रेजों को मार डाला। राँची न्यायालय के पास स्थित कुआँ अंग्रेजों की लाशों से भर गया। 21 दिन तक छोटा नागपुर, खूँटी तथा राँची का क्षेत्र स्वतन्त्र रहा। यह सुनकर हजारीबाग के सन्थाल वनवासियों ने भी विद्रोह कर दिया। वे अपने तीर-कमान लेकर सड़कों पर उतर आये। यद्यपि वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाये।


गणपतराय की इच्छा थी कि वे जगदीशपुर के क्रान्तिवीर कुँवरसिंह से मिलकर अस्त्र-शस्त्र का संग्रह करें। इसी योजना के अन्तर्गत वे 200 साथियों को लेकर 11 सितम्बर, 1857 को राँची से चल दिये। चतरा नामक स्थान पर मेजर इगलिश की सशस्त्र टुकड़ी से उनकी मुठभेड़ हुई। इसमें 150 क्रान्तिकारी तथा 58 अंग्रेज मारे गये। अंग्रेजों ने लोगों को आतंकित करने के लिए इन सबके शवों को एक तालाब के आसपास लगे वृक्षों पर टाँग दिया। आज भी वह तालाब ‘फाँसी का तालाब’ कहलाता है।


गणपतराय इस युद्ध में बच गये। वे अपने गाँव वापस आकर फिर से साथियों एवं शस्त्रों का संग्रह करने लगे। अंग्रेजों ने उनकी सब सम्पत्ति जब्त कर ली थी। एक रात अंग्रेजों ने उनके गाँव को घेर लिया; पर गणपतराय अपने पुरोहित उदयनाथ पाठक के साथ लोहरदगा की ओर चल दिये। 


दुर्भाग्यवश अंधेरे के कारण वे रास्ता भटक गये और परहेपाट गाँव में जा पहुँचे। वहाँ के देशद्रोही जमींदार महेश शाही ने उन्हें पकड़वा दिया। राँची लाकर उन पर अभियोग चलाया गया। राँची के तत्कालीन हाईस्कूल के पास एक कदम्ब का पेड़ था। उसी पेड़ पर 20 अप्रैल, 1858 को क्रान्तिकारी विश्वनाथ शाहदेव को तथा 21 अप्रैल को गणपतराय को फाँसी दे दी गयी।


राँची का यह स्थान आज ‘शहीदी चौक’ के नाम से जाना जाता है।

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21 अपै्रल/जन्म-दिवस


कुष्ठ रोगियों के आशा केन्द्र दामोदर गणेश बापट


कुष्ठ रोग और उसके रोगियों को समाज में घृणा की नजर से देखा जाता है। इसका लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियां उनके बीच सेवा का काम करती हैं और फिर चुपचाप उन्हें ईसाई भी बना लेती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने काम के विस्तार के साथ-साथ सेवा के अनेक क्षेत्रों में भी कदम बढ़ाये। कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए ‘भारतीय कुष्ठ निवारक संघ’ नामक संगठन बनाया गया। छत्तीसगढ़ के चांपा नगर में इसका मुख्यालय है। इसकी स्थापना श्री सदाशिव गोविन्द कात्रे ने की थी। वे स्वयं एक कुष्ठ रोगी थे। उनके बाद जिस महापुरुष ने यह काम संभाला, वे थे श्री दामोदर गणेश बापट।


बापटजी का जन्म 21 अपै्रल, 1935 को ग्राम पथरोट (अमरावती, महाराष्ट्र) में हुआ था। नौ वर्ष की अवस्था में वे संघ के स्वयंसेवक बने। नागपुर से बी.काॅम और समाजशास्त्र में बी.ए. कर वे संघ के प्रचारक बन गये। सेवा के प्रति उनका समर्पण देखकर पहले उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम और फिर 1971 में चांपा भेजा गया। 1977 में कात्रेजी के निधन के बाद वे भारतीय कुष्ठ निवारक संघ के सचिव बने। सदा खादी का धोती-कुर्ता पहनने वाले बापटजी की सेवाओं के लिए 1995 में उन्हें कोलकाता में ‘विवेकानंद सेवा सम्मान’ तथा 2017 में राष्ट्रपति महोदय द्वारा ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया।


बापटजी ने सोठी ग्राम स्थित कुष्ठ आश्रम को अपना केन्द्र बनाया। इसमें कुष्ठ से पीडि़त लगभग 200 पुरुष, स्त्री तथा बच्चे रहते हैं। इन सबकी समुचित चिकित्सा तथा देखभाल वहां की जाती है। कुष्ठ रोगियों के बच्चों के लिए ‘झूलाघर’ तथा ‘सुशील बालक गृह’ की व्यवस्था हैै। आश्रम तथा पड़ोसी गांवों के बच्चों की शिक्षा के लिए ‘सुशील विद्या मंदिर’ बना है। बालकों को शिक्षा और संस्कार के साथ ही पौष्टिक भोजन भी मिलता है। बालिकाओं के लिए बिलासपुर में अलग से ‘तेजस्विनी’ छात्रावास खोला गया है।


प्रतिदिन आसपास से लगभग 400 कुष्ठरोगी दवा तथा पट्टी आदि के लिए आश्रम में आते हैं। बापटजी स्वयं उनकी पट्टी करते थे। इससे अब तक 25,000 से भी अधिक रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। एलोपैथी के साथ ही आयुर्वेद तथा होम्यापैथी चिकित्सा की व्यवस्था भी आश्रम में है। कात्रेजी तथा बापटजी का मत था कि कुष्ठ रोगियों को समाज की दया की बजाय प्रेम और सम्मान की जरूरत है। अतः उन्होंने ऐसे प्रकल्प चलाए, जिससे उनका स्वाभिमान जाग्रत हो तथा वे भिक्षावृत्ति से दूर रह सकें। 


आश्रमवासी अपनी तीन एकड़ भूमि में मिर्च, प्याज, संतरा, हल्दी, केला, आम, बिही, पपीता, सीताफल, नींबू आदि उगाते हैं। आश्रम की गोशाला में 175 देसी गाय हैं। उनका पूरा दूध वहीं काम आता है। रोगियों को मोमबत्ती, दरी, रस्सी, चाॅक आदि बनाना सिखाते हैं। कुछ ने वेल्डिंग भी सीखी है। आश्रम में 20 बिस्तर का अस्पताल, स्कूल, गणेश मंदिर, वृद्धाश्रम तथा कार्यकर्ता निवास के अलावा कम्प्यूटर, सिलाई तथा चालक प्रशिक्षण केन्द्र भी हैं। यद्यपि आश्रम के लिए समाज से सहयोग लिया जाता है; पर आश्रमवासियों के परिश्रम और लगन से भी वहां की कई जरूरतें पूरी हो जाती हैं। 


बहुत से लोग इन रोगियों की सेवा करते हुए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं; पर बापटजी कुष्ठरोगियों के बीच रहकर उनके हाथ से बना खाना ही खाते थे। एक बार जर्मनी से आये कुछ लोगों ने दस लाख रु. देने चाहे; पर बापटजी ने नहीं लिये। वे सरकार या विदेशी सहायता की बजाय आम जनता के सहयोग पर अधिक विश्वास करते थे। हजारों कुष्ठ रोगियों के जीवन में प्रकाश फैलाने वाले बापटजी का 17 अगस्त, 2019 को बिलासपुर के एक अस्पताल में निधन हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी देह चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के उपयोग के लिए छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट आॅफ मैडिकल साइंस को दे दी गयी। 

(पांचजन्य 8.9.19 तथा बिलासपुर से प्रकाशित पत्र आदि)         

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