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रविवार, 23 मई 2021

भगवानशिव महाकाली के पैरों के नीचे?

 क्यों आये भगवानशिव महाकाली के पैरों के नीचे?


भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। 


उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-


दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया।


 देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।


सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी।


 महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। 


जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।


महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया। 


दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था


सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। 


जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है.

भारतीय इतिहास के 2 सबसे बड़े गद्दार जयचन्द्र और राघव चेतन

 *भारतीय इतिहास के 2 सबसे बड़े गद्दार राजा कौन थे जिनकी वजह से भारत मुगलों का गुलाम बन गया?*

भारतीय इतिहास के दो गद्दार राजा ऐसे रहे थे जिनकी वजह से लाखों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी और भारत में मुस्लिम साम्राज्य राज करता हुआ नजर आया है। आज हम आपको इन्हीं दो गद्दारों के बारे में बताने वाले हैं जिनकी वजह से भारत में मुस्लिम शासक और इस्लामिक आक्रमणकारियों की एंट्री हो पाई। जयचन्द्र, राघव चेतन दो गद्दार हैं जिनको कि भारत इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला जाता है। पहला नाम जयचन्द्र है जिसकी वजह से पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी के साथ युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था और मोहम्मद गौरी अपने कई सारे प्रयत्नों के बाद जयचन्द्र की गद्दारी से भारत में एंट्री ले पाया था।

जयचन्द्र


आइए आज हम आपको सबसे पहले जयचन्द्र्र के बारे में बताते हैं।

भारतीय इतिहास के पन्नों में राजा पृथ्वीराज चौहान का नाम काफी स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है पृथ्वीराज चौहान के साथ जयचन्द्र ने गद्दारी की थी और उसी गद्दारी के द्वारा गौरी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हरा पाया था युद्ध जीतने के बाद गौरी ने राजा जयचन्द्र को भी मार दिया था और उसके बाद गौरी ने कन्नौज और दिल्ली समेत कई राज्यों पर कब्जा कर लिया था। पृथ्वीराज चौहान के होते हुए मोहम्मद गौरी कभी भी भारत में प्रवेश नहीं कर सकता था यह बात मोहम्मद गोरी अच्छी तरीके से जानता था।

जयचन्द्र दिल्ली की सत्ता के लालच में मोहम्मद गौरी का साथ दिया और युद्ध में गौरी को अपनी सेना देकर पृथ्वीराज को हरा दिया। मोहम्मद गौरी के पास जो सेना थी वह पृथ्वीराज को हराने के लिए काफी नहीं थी। जयचन्द्र ने अपनी सेना मोहम्मद गौरी को दे दी थी और तब गौरी ने पृथ्वीराज को युद्ध में हरा दिया था और उनको मार दिया था।इसके बाद मोहम्मद गौरी ने जयचन्द्र की हत्या कर दी थी और कन्नौज में और दिल्ली जैसे राज्यों पर कब्जा कर लिया था लेकिन मोहम्मद गौरी अगर भारत में घुस पाया है तो उसके पीछे जयचन्द्र का सबसे बड़ा हाथ है और यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला जा सकता है।


जयचन्द्र कन्नौज साम्राज्य का राजा था। पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता से शादी की थी और इसलिए पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द्र के दामाद बन चुके थे। मोहम्मद गौरी को तराइन के प्रथम युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था और इस हार को मोहम्मद गोरी भूल नहीं पा रहा था। जब राजा जयचन्द्र को पता लगा कि गौरी पृथ्वीराज चौहान से बदला लेना चाहता है तो उसने खुद मोहम्मद गोरी तो कि संदेश पहुंचाया था कि वह अपनी सेना के द्वारा मोहम्मद गोरी की मदद करना चाहता है ताकि गौरी पृथ्वीराज को हरा दे। पृथ्वीराज और गौरी के बीच में तराइन के क्षेत्र में युद्ध हुआ था। पृथ्वीराज की ओर से 3 लाख सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया था। गौरी के पास एक लाख के करीब सैनिक थे लेकिन पृथ्वीराज की सेना ने जब गौरी का साथ दिया तो उस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान हार गया और मोहम्मद गौरी ने दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब के अधिकतर क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। इसलिए जयचन्द्र को भारत देश का सबसे बड़ा गद्दार बोला जा सकता है।

राघव चेतन

दूसरागद्दार राघव चेतन है।मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य पद्मावत में राघव चेतन तांत्रिक के रूप में जाना जाता है।राघव चतन ने ही खिलजी के सामने पद्मावती के रूप का बखान किया था। इसी ने खिलजी को बताया था कि इस महल मे किस तरह से सोने से भरे मंदिर है, भारी संपद है। राघव चेतन की वजह से ही हजारों रानियां चिता मे तब्दील हो गयी थी। राघव चेतन को भारत का दूसरा सबसे बड़ा गद्दार माना जाता है।

इतिहास गवाह है,बिना गद्दारों के कोई भी दुश्मन किसी देश पर राज नही कर सकता।आज जो भारत की स्थिति है वो भी आज हमारे देश के गद्दारों के कारण है जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये, सत्ता के लिये दुश्मन देशों और मुगलोँ के हाथों अपने को बेच रखा है, परन्तु वो ये नही जानते कि जिस दिन इन सबके दुश्मन देशों और मुगलोँ मकसद पूरे हो जायेगे उस दिन इन सभी गद्दारों का भी वही हाल होगा जो जयचंद ,और राघव का किया गया था।

गुरुवार, 20 मई 2021

धारा 370 और आर्टिकल 35A का इतिहास

 धारा 370 और आर्टिकल 35A का इतिहास?

            

 धारा 370 और आर्टिकल 35A के इतिहास को समझेंगे तभी यह समझ पाएंगे कि इसे हटाना कितना मुश्किल या सरल है। दरअसल, जब अंग्रेज अपने उपनिवेशों को छोड़कर जा रहे थे तब उन्होंने भारत के भी दो हिस्से करने का प्लान बनाया और उन्होंने उसे सफलतापूर्वक लागू भी कर दिया।       

 गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 भारतीय संविधान के पहले का संविधान है। इस एक्ट के सेक्शन 311 में भारत की परिभाषा लिखी है। उसमें लिखा है कि ब्रिटिश इंडिया इन्क्लूडिंग प्रिंसली स्टेट्स यानी भारत जो है, वह ब्रिटिश इंडिया और प्रिंसली स्टेट्स को मिलाकर है। मतलब यह कि जब पासपोर्ट बनता था तो आपको ब्रिटिश इंडिया से लेना पड़ता था, भले ही आप किसी रियासत के राजा क्यों न हो।       

 मतलब यह कि जब अंग्रेज यहां से जा रहे थे तो वे भारत छोड़कर जा रहे थे, किसी रियासत को नहीं। स्वाभाविक ही ये सभी रियासतें मिलाकर भारत ही थीं। जब रियासतें भारत में ही थीं तो विलय का कोई मतलब ही नहीं बनता। जब भारत से रियासतें बाहर हैं ही नहीं तो कैसा विलय? लेकिन फिर भी विलय का प्रारूप बनाया गया,क्योंकि भारत के दो टूकड़े किए जा रहे थे। एक का नाम पाकिस्तान और दूसरे का नाम हिंदुस्तान हुआ। ऐसे में विलय पत्र जरूरी था।             

 प्रारूप बनाकर 25 जुलाई 1947 को माउंटबेटन की अध्यक्षता में सभी रियासतों को बुलाया गया। इन सभी रियासतों को बताया गया कि आपको अपना विलय करना है। वह हिन्दुस्तान में करें या पाकिस्तान में, यह आपका निर्णय है। जाहिर सी बात थी कि माउंटबेटन के प्लान में किसी भी राज्य को स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं था। उसे दो में से किसी एक देश को चुनना था। उस विलय पत्र को सभा में बांट दिया गया।        

 यह विलय पत्र सभी रियासतों के लिए एक ही फॉर्मेट में बनाया गया था जिसमें कुछ भी लिखना या काटना संभव नहीं था। 

मंगलवार, 18 मई 2021

गाय के घी के अद्भुत फायदे

गाय के घी के 30 अद्भुत फायदे

1. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।


2. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।


3. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।


4. 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।


5. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।


6. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है।


7. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है।


8. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।


9. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।


10. हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है।


11. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।


12. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।


13. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है.!


14. गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।


15. अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।


16. हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।


17. गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।


18. जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।


19. देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।


20. घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू

खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा गुनगुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है.!


21. फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।


22. गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।


23. सांप के काटने पर 100-150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।


24. दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है।


25. सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।


26. यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन

को संतुलित करता है। यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।


27. एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।


28. गाय के घी को ठंडे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइसिस के लिए भी कारगर है।


29. गाय का घी एक अच्छा कोलेस्ट्रॉलकारक है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है।


30. अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार, नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।


*केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*

 *केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*


भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें।


नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।


नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।


दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।


महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।

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कथा नर और नारायण की

 नर नारायण जन्मोत्सव विशेष

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कथा नर और नारायण की

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प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे।

आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा।


भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है।  वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है।  बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है।  उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं।  बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।


सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये।  ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये।  उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है।  इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।  इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म।  अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए।  उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए।  क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए।  उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए।  ये सब अधर्म की सन्तति है।  ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति -


ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ।  प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की।  उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया।  एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को।  जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति।


धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई।  सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया।  जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया।  क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है।  वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है।


नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की।  अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा।  पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी।  अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी।  दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये।


बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें  इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं।


श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है।  देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है।  


 नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है।


इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा।

उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग  मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।'

भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण.

 कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी

आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं।


कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं।  फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि  द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा


उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ।


केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी।


*केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*


भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें।


नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।


नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।


दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।


महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।

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रविवार, 16 मई 2021

सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों

 *सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों*

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गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।'


' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। 


यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।


 इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। 


मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं। 


सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।


 कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। 


उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।


 रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। 


राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। 


अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। 


वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ।


' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया। 


उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। 


लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। 


भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।


 गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। 


भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। 


जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है।

मूर्तिपूजा का इतिहास, जानिए?

 मूर्तिपूजा का इतिहास, जानिए?

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मूर्तिपूजकों तथा मूर्तिभंजकों के संघर्षों से इतिहास भरा पड़ा है। प्रारंभ में मूर्तिपूजकों के धर्म ही थे। मूर्तिपूजकों के धर्म के अंतर्गत ही मूर्तिभंजकों की एक धारा भी प्राचीनकाल से चली आ रही थी। मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं- एक वे जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, तो उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए। ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे।


 दूसरे वे, जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे। तीसरे वे, जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे। हर कबीले का एक देवता होता था। कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी।


शोधकर्ताओं के अनुसार अरब के मक्का में पहले मूर्तियां ही रखी होती थीं। वहां उस काल में बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह और महाराजा बलि सहित लगभग 360 मूर्तियां रखी हुई थीं। ऐसा माना जाता है हालांकि इसमें कितनी सचाई है यह हम नहीं जानते कि जाट और गुर्जर इतिहास अनुसार तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था। यहां नागपूजा का प्रचलन था।


भारत में वैसे तो मूर्तिपूजा का प्रचलन पूर्व आर्य काल (वैदिक काल) से ही रहा है। भगवान कृष्ण के काल में नाग, यक्ष, इन्द्र आदि की पूजा की जाती थी। वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ गया।


वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति, क्योंकि इसका इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं मिलता। इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तियां थीं इसके भी साक्ष्य नहीं मिलते हैं।


भगवान कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे। भगवान कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था। इसके अलावा हड़प्पा काल में देवताओं (पशुपति-शिव) की मूर्ति का साक्ष्य मिला है, लेकिन निश्चित ही यह आर्य और अनार्य का मामला रहा होगा।


प्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था। बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा। वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है। वेदों में सभी तरह की प्राकृतिक शक्तियों का खुलासा कर उनके महत्व का गुणागान किया गया है। हालांकि वेदों का केंद्रीय दर्शन 'ब्रह्म' ही है।


पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे। वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे। बाद में धीरे-धीरे लोग वेदों का गलत अर्थ निकालने लगे। हिन्दू धर्म मूलत: अद्वैतवाद और एकेश्वरवाद का समर्थक है जिसका मूल ऋग्वेद, उपनिषद और गीता में मिलता है। अथर्ववेद की रचना के बाद हिन्दू समाज में दो फाड़ हो गई- ऋग-यजु और साम-अथर्व।


इस तरह वेदों में ईश्वर उपासना के दो रूप प्रचलित हो गए- साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि ऋषि-मनीषियों ने दोनों उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था।


शिवलिंग की पूजा का प्रचलन अथर्व और पुराणों की देन है। शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन हिन्दू-जैन धर्म में बढ़ने लगा। बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां बनाई जाने लगीं।


मान्यता के अनुसार महाभारत काल तक अर्थात द्वापर युग के अंत तक देवी और देवता धरती पर ही रहते थे और वे भक्तों के समक्ष कभी भी प्रकट हो जाते थे। तब उनके साक्षात रूप की पूजा या प्रार्थना होती थी। लेकिन कलयुग के प्रारंभ होने के बाद उनके विग्रह रूप की पूजा होने लगी। विग्रह रूप अर्थात शिवलिंग, शालिग्राम, जल, अग्नि, वायु, आकाश और वृक्ष रूप आदि की।


अब सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ वेद, उपनिषद और गीता भी मूर्ति पूजा को नहीं मानते हैं तो हिन्दू क्यों मूर्ति या पत्थर की पूजा करते हैं और इस पूजा का प्रचलन आखिर कैसे, क्यूं और कब हुआ?


भारत में जो लोग अनीश्वरवादी थे, वे निराकार ईश्‍वर को नहीं मानते थे। उन्होंने अपने प्रॉफेटों, पूर्वजों आदि की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजना आरंभ कर दिया। इन अनीश्वरवादियों में जैन, चार्वाक, न्यायवादी आदि धर्म के लोग थे।


महावीर स्वामी और बुद्ध के जाने के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में जैन और बौद्ध मंदिर बनने लगे। जिसमें बुद्ध और महावीर की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी। इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में राम और कृष्ण के मंदिर बनाए जाने लगे और इस तरह भारत में मूर्ति आधारित मंदिरों का विस्तार हुआ।


मूर्तिपूजा का पक्ष : मूर्तिपूजा के समर्थक कहते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने में मूर्तिपूजा रास्ते को सरल बनाती है। मन की एकाग्रता और चित्त को स्थिर करने में मूर्ति की पूजा से सहायता मिलती है। मूर्ति को आराध्य मानकर उसकी उपासना करने और फूल आदि अर्पित करने से मन में विश्वास और खुशी का अहसास होता है। इस विश्वास और खुशी के कारण ही मनोकामना की पूर्ति होती है। विश्वास और श्रद्धा ही जीवन में सफलता का आधार है।


प्राचीन मंदिर ध्यान या प्रार्थना के लिए होते थे। उन मंदिरों के स्तंभों या दीवारों पर ही मूर्तियां आवेष्टित की जाती थीं। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं होता था। यदि आप खजुराहो, कोणार्क या दक्षिण के प्राचीन मंदिरों की रचना देखेंगे तो जान जाएंगे कि ये मंदिर किस तरह के होते हैं।


 ध्यान या प्रार्थना करने वाली पूरी जमात जब खत्म हो गई है तो इन जैसे मंदिरों पर पूजा-पाठ का प्रचलन बढ़ा। पूजा-पाठ के प्रचलन से मध्यकाल के अंत में मनमाने मंदिर बने। मनमाने मंदिर से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं माने जा सकते।


मूर्तिपूजा के पक्ष में  हैं- 'जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतापूर्वक उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है।


 परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्तिपूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्याप्त चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं। 


आप जिस बुद्धि को या मन को आधारभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं, क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है?


वैसे तो पूरा विश्व ही मूर्तिपूजक है। पंचभूतों से निर्मित किसी आकार पर श्रद्धा स्थिर करना मूर्तिपूजा है। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, पुस्तक, आकाश इत्यादि सभी मूर्तिपूजा के अंतर्गत हैं। कौन मूर्तिपूजक नहीं है?


यह एक निर्विवाद सत्य है कि भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं; किंतु भारत मूर्तिपूजक नहीं है। ये मंदिर, मूर्तियां आध्यात्मिक देश भारत में अध्यात्म की शिशु कक्षाएं हैं। 


मारकंडेय पुराण में वर्णित कथानक ही देवी मृतिका मूर्ति पूजा का आधार है। परब्रह्म परमात्मा सर्वविश्व में निहित है। इसलिए मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति का प्रचलन अनादि काल से चला आ रहा है। वेदों की ऋचाओं में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश में निहित प्राण सत्ता में ईश्वरीय सत्ता की अभिव्यक्ति है। पौराणिक युग में इसे विग्रह के रूप में स्थापित कर पूजन प्रारंभ हुआ। 


मारकंडेय पुराण के अनुसार राजा और वैश्य जो महामोह से ग्रसित थे, देवी की मूर्ति बनाकर आराधना करने लगे। राजा को राज्य व वैश्य को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार वह देवी लौकिक व पारलौकि दोनों अभिष्टों को प्रदान करने वाली मानी गई।

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मत्स्य अवतार कथा

  विस्मयकारिणी कथा मत्स्य अवतार की


मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। 


एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया। 


एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया। 


कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। 


सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। 


सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। 


दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया।


 यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।


 तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया।


 आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। 


अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? 


मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। 


मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी। 


आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। 


समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। 


नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े।


 सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए।


 भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया।

अवतार के कारण


मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। 


एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया। 


एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया। 


कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। 


सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। 


सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। 


दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया।


 यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।


 तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया।


 आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। 


अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? 


मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। 


मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी। 


आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। 


समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। 


नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े।


 सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए।


 भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया।

जनेऊ का महत्व,जनेऊ के लाभ (संस्कार)

            "" संस्कार ""


जनेऊ के लाभ !!


पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था।


वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। 

जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है।


पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को 

पढऩे का अधिकार मिलता था। 

मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस 

कर तीन बार लपेटना पड़ता है। 

इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट 

की आंतों से है।


आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है।


जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा 

कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन 

के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है।


जनेऊ उसके वेग को रोक देती है,जिससे कब्ज, एसीडीटी,पेट रोग,मूत्रन्द्रीय रोग,रक्तचाप,हृदय 

रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।


जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। 

वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार 

नहीं सकता।


जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। 

अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही 

जनेऊ कान से उतारता है।


यह सफाई उसे दांत,मुंह,पेट,कृमि,जिवाणुओं के 

रोगों से बचाती है। 

जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को 

होता है।


यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है। 

इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय 

करने का अधिकार प्राप्त होता है।


यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक 

पृष्ठभूमि भी है। 

शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक 

प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह 

कार्य करती है। 

यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक 

स्थित होती है। 

यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। 

इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह 

होता है। 

यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य 

काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता।


अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसकी मात्र 

अनुभूति होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त 

होने लगता है।


यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के 

कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो 

कोई आश्चर्य नहीं है।


इसीलिए सभी हिंदुओं में किसी न किसी कारण

वश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। 

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत 

की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है।


यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य 

का पोषक भी है,अतएव एसका सदैव धारण करना चाहिए।


शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया 

गया है। 

आदित्य,वसु,रूद्र,वायु,अगि्न,धर्म,वेद,आप,सोम 

एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में 

होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने 

पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है।


यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा 

जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।


यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) 

शब्द के दो अर्थ हैं-


उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है 

और विद्यारंभ होता है। 

मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार 

के अंग होते हैं।


जनेऊ पहनाने का संस्कार


सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी 

व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है।


यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, 

यज्ञसूत्र या जनेऊ


यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से 

ग्रन्थित करके बनाया जाता है। 

इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं । 

ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। 

तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के 

बाद हमेशा धारण किया जाता है। 

तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश के 

प्रतीक होते हैं।


तीन सूत्र हमारे ऊपर तीन प्रकार के ऋणों 

का बारम्बार स्मरण कराते हैं कि उन्हें भी 

हमें चुकाना है।


1 - पितृ ऋण 

2 - मातृ ऋण

3 - गुरु ऋण


अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। 

बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न जल गृहण नहीं 

किया जाता।


यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है


यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।


जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांति मौजूद है|


लोग जनेऊ को धर्म से जोड़ दिए हैं जबकि सच 

तो कुछ और ही है।


जानें कि सच क्या है ? 

जनेऊ पहनने से आदमी को लकवा से सुरक्षा 

मिल जाती है।

क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ 

धारण करने वाले को लघुशंका करते समय 

दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए अन्यथा 

अधर्म होता है।


दरअसल इसके पीछे साइंस का गहरा रह्स्य 

छिपा है।

दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा 

नहीं मारता।

आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, 

एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का 

भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है,एक पत्नी 

पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् 

पति पक्ष का।


अब एक एक जनेऊ में 9 - 9 धागे होते हैं।


जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी 

पक्ष के 9 - 9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन 

करना है।

अब इन 9 - 9 धांगों के अंदर से 1 - 1 धागे 

निकालकर देंखें तो इसमें 27 - 27 धागे होते हैं।


अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27 - 27 

नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है।


अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 

27+9 = 36 होता है,जिसको एकल अंक 

बनाने पर 36 = 3+6 = 9 आता है,

जो एक पूर्ण अंक है।


अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 

2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें 

बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो 

लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के 

मिलने सेबना है | 1 + 1 = 2 होता है जो अंक 

विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा 

हमें शीतलता प्रदान करता है।

जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर 

लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है|


यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं 

कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।


अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं 

कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। 

अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के लिए 

भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है। 

हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान 

पर से उतारें। 

इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि 

शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक 

क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का 

हिस्सा अपवित्र माना गया है।


दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक 

कारण यह है कि इस कान की नस,गुप्तेंद्रिय 

और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है।


मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की 

संभावना रहती है। 

दाएं कान को ब्रह्म सूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश 

से बचाव होता है।


यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है। 

यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां कान 

बम्ह्रसूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है।


बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दाएं कान 

में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है। 

किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान 

पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है।


अंडवृद्धि के सात कारण हैं। 

मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है। 

दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है। 

इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते 

समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय 

आज्ञा है।

रविवार, 9 मई 2021

कहां तो तय था चराग़ लेखक दुष्यंत कुमार

     कहां तो तय था चराग़

                          दुष्यंत कुमार

 कहां तो तय था चराग़ां हर एक घर के लिये

 कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

 

 यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है

 चलो यहां से चले और उम्र भर के लिये

 

 न हो क़मीज़ तो पांवों से पेट ढंक लेंगे

 ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

 

 वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

 मैं बेक़रार हूं आवाज़ में असर के लिये

 

 

शुक्रवार, 7 मई 2021

आग की भीख रामधारी सिंह 'दिनकर'

  आग की भीख     

                      रामधारी सिंह 'दिनकर'


धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, 

कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। 

कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; 

मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज़ रो रहा है? 

दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे; 

बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। 

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ। 

चढ़ती जवानियों का शृंगार माँगता हूँ।


बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है, 

कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है? 

मँधार है, भँवर है या पास है किनारा? 

यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा? 

आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा, 

भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा। 

तम-वेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ। 

ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ। 

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है, 

बल-पुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है, 

अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ, ढेर हो रहा है, 

है रो रही जवानी, अँधेरा हो रहा है। 

निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है; 

निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है। 

पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता है। 

जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता है। 

मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं, 

अरमान-आरजू की लाशें निकल रही हैं। 

भींगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं, 

सोती वसुंधरा जब तुझको पुकारते हैं। 

इनके लिए कहीं से निर्भीक तेज़ ला दे, 

पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे, 

उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ। 

विस्फोट माँगता हूँ, तूफ़ान माँगता हूँ। 

आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे, 

मेरे श्मशान में आ शृंगी ज़रा बजा दे; 

फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे, 

हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे। 

आमर्ष को जगानेवाली शिखा नई दे, 

अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे। 

विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ, 

बेचैन ज़िंदगी का मैं प्यार माँगता हूँ। 

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे, 

जो राह हो हमारी उस पर दिया जला दे। 

गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे; 

इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे। 

हम दे चुके लहू हैं, तू देवता, विभा दे, 

अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे। 

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ, 

तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।

सोमवार, 3 मई 2021

सुविचार, विद्वानों के सुविचार(कोटस)

 सुविचार


1) कर्म वो आईना है, जो हमारा स्वरूप हमें दिखा देता है | अत: हमें कर्म का एहसानमंद होना चाहिए |   – विनोबा भावे


2)  बुराई से असहयोग करना मानव का पवित्र कर्तव्य है | – महात्मा गांधी


3) कर्म सुख भले ही न ला सके, परंतु कर्म के बिना सुख नहीं मिलता |   – डिजरायली


4) दुःख पर तरस खाना मानवीय है; दुःख दूर करना देवतातुल्य है |   – होरेस मैन


5) पीड़ा पाप का परिणाम है |महात्मा गौतम बुद्ध


6) विपत्ति हीरे की धुल है, जिससे परामात्मा अपने रत्नों को चमकाता है |  – लेटन


7) क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है |  – इंगरसोल


8) जब क्रोध में हों, तो दस बार सोचकर बोलिए, जब ज्यादा क्रोधित अवस्था में हों, तो हजार बार सोचिए |    – जेफरसन


9) जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है, वह दूसरों के क्रोध से बच जाता है | – सुकरात


10) किसी के प्रति मन में क्रोध लिये रहने की अपेक्षा उसे तुरंत प्रकट कर देना अधिक अच्छा है, जैसे क्षणभर में जल जाना देर तक सुलगने से अधिक अच्छा है |  – वेदव्यास

रविवार, 2 मई 2021

पितृ और मातृभक्त गणेश

 पितृ और मातृभक्त गणेश, 

विश्व इतिहास में सर्वप्रथम मातृ और पितृभक्त के रूप में भगवान गणेश का उल्लेक मिलता है। इस बात का उल्लेख शिवपुराण में मिलता है। एक बार माता की आज्ञा से गणेश द्वार पर शिव को रोक लेते हैं। कुपित होकर शिव उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं। जब पार्वती को पता चलता है तो वे दुख से बेहाल हो जाती हैं और बालक के जन्म की बात बताते हुए अपने पति से उसे पुनः जीवित करने को कहती हैं।

तब शिव हाथी के बच्चे का सिर बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर देते हैं और उसे गणेश नाम देते हुए अपने समस्त गणों में अग्रणी घोषित करते हैं। साथ ही कहते हैं कि गणेश समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य होंगे।

 

एक बार जब सभी देवताओं में धरती की परिक्रमा की प्रतियोगिता होती है तो कार्तिकेय और गणेश भी इस प्रतियोगीता में हिस्सा लेते हैं। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर चढ़कर पृथ्वी की परिक्रमा करने चल पड़े। गणेशजी ने सोचा अपने वाहन चूहे पर बैठकर पृथ्वी परिक्रमा पूरी करने में बहुत समय लग जाएगा। इसलिए गणेश ने अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और कार्तिकेय के आने की प्रतीक्षा करने लगे। कार्तिकेय ने लौटने पर अपने पिता से कहा- गणेश तो पृथ्वी की परिक्रमा करने गया ही नहीं। इस पर गणेश बोले- मैंने तो अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की है। माता-पिता में ही समस्त तीर्थ है। तब शंकर ने गणेश को आर्शीवाद दिया कि समस्त देवताओं में सर्वप्रथम तुम्हारी पूजा होगी।

जो लोग अपने जीवन से संतुष्ट हैं, वे बुरे समय में भी शांत और प्रसन्न रहते हैं

 कथा: जो लोग अपने जीवन से संतुष्ट हैं, वे बुरे समय में भी शांत और प्रसन्न रहते हैं

एक संत अभावों में भी बहुत खुश रहते थे, एक धनी सेठ ने उस संत को देखा तो वह हैरान रह गया

एक धनवान सेठ के पास सुख-सुविधा की हर एक चीज थी। परिवार में भी सब कुछ अच्छा था, लेकिन उसके जीवन में शांति नहीं थी। एक दिन वह व्यापार के लिए एक जंगल में से गुजर रहा था।

जंगल में सेठ को एक आश्रम दिखाई दिया। वहां एक संत टूटी झोपड़ी में रह रहे थे। उनके पास न तो अच्छे कपड़े नहीं थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त खाना था। सेठ संत के पास पहुंचा और उसने संत को अपनी सारी परेशानियां बता दीं।

सेठ ने संत से पूछा कि आपके पास तो सुख-सुविधा की कोई चीज नहीं। न अच्छे कपड़े हैं, न ही खाने के लिए ज्यादा खाना है। फिर भी आप इतने शांत और प्रसन्न क्यों दिख रहे हैं?

संत ने सेठ की पूरी बात ध्यान से सुनी और मुस्कान के साथ संत ने एक कागज पर कुछ लिखा। कागज देते हुए संत ने सेठ से कहा कि इस कागज को घर ले जाओ और घर पहुंचकर इसे पढ़ना। इस कागज पर तुम्हारे लिए सुखी जीवन का सूत्र लिखा है।

सेठ कागज लेकर अपने घर पहुंच गया। सेठ ने कागज खोला तो उस पर लिखा था - जहां शांति और संतुष्टि रहती है, वहीं सुख रहता है।

धनवान सेठ को मालूम हो गया कि उसके जीवन में सुख-शांति क्यों नहीं है। इस प्रसंग के बाद सेठ ने भी संतुष्ट रहना शुरू कर दिया। अब वह धन के लिए परेशान नहीं होता था। जो मिल जाता, उसी में खुश रहता था। उसके जीवन में भी सुख-शांति आ गई। 

" द होप एक्सपेरिमेंट" कर्ट रिचट्टर

" द होप एक्सपेरिमेंट"  कर्ट रिचट्टर    


 1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबोगरीब शोध किया था। कर्ड ने एक जार को पानी से भर दिया और उसमें एक चूहे को फेंक दिया। 

पानी से भरे जार में गिरते ही चूहा हड़बड़ाने लगा। 

जार से बाहर निकलने के लिये ज़ोर लगाने लगा। 

 चंद मिनट फड़फड़ाने के पश्चात चूहे ने हथियार डाल दिये और वह उस जार में डूब गया। 

कर्ट ने उस समय अपने शोध में थोड़ा सा बदलाव किया। उन्होंने एक चूहे को पानी से भरे जार में डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा। जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था......उसी समय कर्ड ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। कर्ड ने चूहे को ठीक उसी क्षण जार से बाहर निकाल लिया जब वह डूबने की कगार पर था। 

चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया ......कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एक दम से उसे पुनः जार में फेंक दिया। 

पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की जद्दोजेहद शुरू कर दी। 

लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी हैरान रह गये। 

कर्ट सोच रहे थे के चूहा बमुश्किल 15 - 20 मिनट संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा। 


लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 


चूहा जार में तैरता रहा। 

जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा। 


60 घँटे .......जी हाँ .....60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा। 

कर्ट यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये। जो चूहा 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था ........वही चूहा 60 घँटे से परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था। 


कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था......." The HOPE experiment".....! 


Hope........यानि आशा। 


कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा के जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया .....वह डूबने की कगार पर पहुंच गया .....उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया। 


उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ के एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है। 


जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा.......वजह था वह हाथ......वजह थी वह आशा ......वजह थी वह उम्मीद। 


इस परीक्षा की घड़ी में उम्मीद बनाये रखिये। 

सँघर्षरत रहिये। 

सांसे टूटने मत दीजिये।

मन को हारने मत दीजिये। 

जिसने हाथ ने हमें इस पानी के जार में फेंका है वही हाथ हमें इस पानी के जार से सकुशल वापिस निकाल लेगा। 


उस हाथ पर विश्वास रखिये।

तीर्थों का महत्त्व क्यों?

 तीर्थों का महत्त्व क्यों?

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शास्त्रकार ने कहा है- तारयितुं समर्थः इति तीर्थ । अर्थात् जो तार देने, पार कर देने में समर्थ होता है, वह तीर्थ कहलाता है। तरना सद्विचारों, सत्कर्मों एवं संतों के सत्संग से ही हो सकता है। जिन स्थानों में देवी-देवताओं की शक्तियों का प्रभाव, प्राकृतिक सौंदर्य, विशेष तेजोमय जल, संतों, महात्माओं का सत्संग आदि प्राप्त होते हैं, उन्हें ही तीर्थस्थान कहा जाता है। तीर्थयात्रा के पुण्यफल का उल्लेख धर्मशास्त्रों में अनेक बार हुआ है। शिवपुराण, पद्मपुराण व स्कंदपुराण का बहुत बड़ा भाग तीर्थ माहात्म्य से ही भरा पड़ा है। महाभारत, वेदों, पुराणों, उपपुराणों में तीर्थ करने से पापों से निवृत्ति, पुण्य संचय, मुक्ति और स्वर्ग की प्राप्ति, देवताओं की अनुकंपा, आत्मशांति, मनोकामनाओं की पूर्ति जैसे लाभ गिनाए गए हैं, जिन्हें पढ़कर धर्म प्रेमी सहज ही श्रद्धापूर्वक तीर्थयात्राएं करते हैं। महाभारत/बनपर्व में कहा गया है कि जो पुण्य अग्निष्टोम जैसे विशाल यज्ञों से उपलब्ध नहीं हो सकता, वह तीर्थ यात्रा से, तीर्थ सेवन से सहज सुलभ हो जाता है। अश्रद्धा युक्त मात्र पर्यटन और मनोरंजन के लिए इधर-उधर परिभ्रमण करने वाले संशयात्मा व्यक्ति इस पुण्य-फल को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। तीर्थ यात्रा का उद्देश्य है-अंतःकरण की शुद्धि और आत्म

कल्याण। अतः आत्म कल्याण के इच्छुक को तीर्थयात्रा का पुण्य लाभ लेना चाहिए।


पुलस्त्य ऋषि ने कहा है -


पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गंगायां मगधेषु च।

स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्त सप्तावरांस्तथा ॥ 


-महाभारत बनपर्व 85/92


अर्थात् पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा और मगध देशीय तीर्थों में स्नान करने वाला मनुष्य अपनी सात पीछे की और सात आगे की पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। देवीभागवत में कहा गया है कि जिस प्रकार कृषि का फल अन्न उत्पादन है, उसी प्रकार निष्पाप बनना ही तीर्थयात्रा का प्रतिफल है।


अथर्ववेद 18/4/7 में कहा गया है कि तीर्थयात्रा करने वाले तीर्थयात्री तीर्थादि द्वारा बड़े-बड़े पापों और आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करते हैं।


शास्त्रकारों ने कहा है कि तीर्थ में जिसकी जैसी और जितनी श्रद्धा होती है, उसे वैसा ही फल मिलता हैं। 'जो यथोक्त विधि से तीर्थ यात्रा करते हैं, संपूर्ण द्वदों को सहन करने वाले हैं, वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं, ऐसा नारदपुराण में लिखा है


कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्वमाविशेत् । 

न तेन किंचिदप्राप्तं तीर्वाभिगमनाद् भवेत् ॥


नारदपुराण


अर्थात् जो काम, क्रोध और लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थयात्रा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है।


स्कंदपुराण में तीर्थ फल के संबंध में लिखा है।


यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् । निर्विकाराः क्रियाः सर्वा स तीर्थफलमश्नुते ॥


अर्थात् जिसके हाथ, पैर और मन भली-भांति संयम में हों तथा जिसकी सभी क्रियाएं निर्विकार भाव से संपन्न होती हों, वही तीर्थ का पूरा फल प्राप्त करता है। स्कंदपुराण में तीर्थ के संबंध में कहा गया है कि सत्य तीर्थ है। क्षमा करना तीर्थ के समान फलदायक है। इंद्रियों पर नियंत्रण करना तीर्थ के समान उपकारी है। सब प्राणियों पर दया करना तीर्थ के समान पुण्य देने वाला है और सरल जीवन भी तीर्थ ही समझना चाहिए। तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ है अंतःकरण की अत्यंत विशुद्धि ।


यस्य हस्तौ च पादौ च वाड्मनस्तु सुसंयते। 

विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्रुते ॥ अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकोऽच्छिसंशयः। 

हेतुनिष्टाश्च पंचेते न तीर्वफलभागिनः ॥


-भविष्यपुराण / उत्तराखंड 122 7-8


अर्थात् जिसके हाथ, पैर, मन और वाणी सुसंयत हैं तथा जिसकी विद्या, कीर्ति और तपस्या पूरी है, उसे ही तीर्थ का फल मिलता है। श्रद्धारहित, पापी, संशयग्रस्त, नास्तिक और तार्किक-इन पांच प्रकार के लोगों को तीर्थ का फल नहीं मिलता ।


पद्मपुराण में कहा गया है कि तीर्थों में ब्रह्मपरायण, साधु-सज्जन मिलते हैं। उनका दर्शन मनुष्यों की पाप राशि को जला डालने के लिए अग्नि के समान है ।


तीर्थ के संबंध में शास्त्रकारों का यह भी कहना है कि काम, क्रोध, लोम, मोह, मद ये सब मन के मैल हैं। मन का निर्मल रहना परम तीर्थ है। महाभारत समाप्त होने के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर ने तीर्थयात्रा करने का निश्चय किया साथ में चारों भाई अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी भी थी। प्रस्थान करने के पूर्व वे भगवान् श्रीकृष्ण के पास गए, तो उन्होंने अपना कमंडलु देते हुए कहा-जहां-जहां तीर्थ स्थानों, नदियों और सरोवरों में आपको स्नान करने का अवसर मिले, वहां-वहां इसे भी डुबो देना। काफी दिनों बाद जब वे लौटे, तो उन्होंने कमंडलु लौटाते हुए श्रीकृष्ण को बताया कि उसे सभी स्नान के स्थानों पर डुबोया गया है। इस पर कृष्ण ने उसे जमीन पर पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और प्रसाद के रूप में उपस्थित लोगों में वितरित कर दिया। जिसने भी प्रसाद चखा, मुंह कड़वा हो गया। लोगों को यूकते और मुंह बनाते देख श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से पूछा-'यह इतने तीर्थों में घूमकर आ रहा है और स्नान भी कर आया है फिर भी इसका कड़वापन दूर क्यों नहीं हुआ ?'


धर्मराज ने कहा-'आप भी कैसी बात करते हैं, कहीं धोने मात्र से कमंडलु का कड़वापन निकल सकता है ? भगवान् कृष्ण ने समाधान करते हुए कहा-'यदि ऐसा है तो तीर्थ स्नान का बाह्योपचार करने मात्र से अंतः का परिष्कार, धुलाई, मार्जन कैसे हो सकता है ?' धर्मराज ने अपनी गलती सुधारी और आत्मशोधन की गरिमा को जाना।

भारतीय संस्कृति में में तीर्थो का महत्व अतुलनीय हैं और इसे सर्वोपरि माना गया है !

                                        

जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा

 जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा

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सनातन धर्म के अनुसार घरों में धूनी (धूप) देने की परंपरा काफी प्राचीन है। धूप देने से मन को शांति और प्रसन्नता मिलती है। साथ ही, मानसिक तनाव दूर करने में भी इससे बहुत लाभ मिलता है। घरों में धूनी देने के लिए कई तरह की चीज़ें आती है। आइए जानते है किस चीज़ की धूनी करने से क्या फायदे होते है।


1- कर्पूर और लौंग

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रोज़ाना सुबह और शाम घर में कर्पूर और लौंग जरूर जलाएं। आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेनी चाहिए। इससे घर के वास्तुदोष ख़त्म होते हैं। साथ ही पैसों की कमी नहीं होती।


2- गुग्गल की धूनी

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हफ्ते में 1 बार किसी भी दिन घर में कंडे जलाकर गुग्गल की धूनी देने से गृहकलह शांत होता है। गुग्गल सुगंधित होने के साथ ही दिमाग के रोगों के लिए भी लाभदायक है।


3- पीली सरसों

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पीली सरसों, गुग्गल, लोबान, गौघृत को मिलाकर सूर्यास्त के समय उपले (कंडे) जलाकर उस पर ये सारी सामग्री डाल दें। नकारात्मकता दूर हो जाएगी।


4- धूपबत्ती

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घर में पैसा नहीं टिकता हो तो रोज़ाना महाकाली के आगे एक धूपबत्ती लगाएं। हर शुक्रवार को काली के मंदिर में जाकर पूजा करें।


5- नीम के पत्ते

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घर में सप्ताह में एक या दो बार नीम के पत्ते की धूनी जलाएं। इससे जहां एक और सभी तरह के जीवाणु नष्ट हो जाएंगे। वही वास्तुदोष भी समाप्त हो जाएगा।


6- षोडशांग धूप

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अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागर, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गल, ये सोलह तरह के धूप माने गए हैं। इनकी धूनी से आकस्मिक दुर्घटना नहीं होती है।


7- लोबान धूनी

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लोबान को सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है, लेकिन लोबान को जलाने के नियम होते हैं इसको जलाने से पारलौकिक शक्तियां आकर्षित होती है। इसलिए बिना विशेषज्ञ से पूछे इसे न जलाएं।


8- दशांग धूप

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चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं। इससे घर में शांति रहती है।


9- गायत्री केसर

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घर पर यदि किसी ने कुछ तंत्र कर रखा है तो जावित्री, गायत्री केसर लाकर उसे कूटकर मिला लें। इसके बाद उसमें उचित मात्रा में गुग्गल मिला लें। अब इस मिश्रण की धुप रोज़ाना शाम को दें। ऐसा 21 दिन तक करें।

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