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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज

30 अप्रैल/जन्म-दिवस


राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज


23 जुलाई, 1955 को जापान के विश्व धर्म सम्मेलन में एक संन्यासी जब बोलने खड़े हुए, तो भाषा न समझते हुए भी उनके चेहरे के भाव और कीर्तन के मधुर स्वर ने वह समां बांधा कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो उठे। लोगों को भावरस में डुबोने वाले वे महानुभाव थे राष्ट्रसंत श्री तुकड़ो जी महाराज।


तुकड़ो जी का जन्म 30 अप्रैल, 1909 को अमरावती (महाराष्ट्र) के ‘यावली’ गांव में हुआ था। इनके पिता श्री बंडो जी इंगले तथा माता श्रीमती मंजुला देवी थीं। माता-पिता ने बहुत मनौतियों से प्राप्त पुत्र का नाम ‘माणिक’ रखा। 


इनके पिता चारण थे। सेठ, जमीदारों, राजाओं आदि के यहां जाकर उनकी परिवार परम्परा का झूठा-सच्चा गुणगान करना उनका काम था। माणिक के जन्म के बाद उन्होंने इसे छोड़कर दर्जी का काम किया। इसमें सफलता न मिलने पर गुड़ बेचा; पर हर बार निराशा और गरीबी ही हाथ लगी।


मणि जब कुछ बड़ा हुआ, तो उसे चांदा की पाठशाला में भेजा गया; पर वह विद्यालय के बगल में स्थित मारुति मंदिर के ढपली बजाकर भजन गाने वाले गायक ‘भारती’ के पास प्रायः बैठे मिलते थे। इधर पिता का कर्जा जब बहुत बढ़ गया, तो वे लौटकर फिर अपने गांव पहुंच गये। अब वहां का शिवालय ही मणि की ध्यान साधना का केन्द्र बन गया। मां ने यह देखकर उसे अपने मायके बरखेड़ भेज दिया। वहां पर ही कक्षा चार तक की शिक्षा मणि ने पायी।


बरखेड़ में मां के गुरु आड्कु जी महाराज का पे्रम मणि को मिला। भजन गाने पर उसे रोटी के टुकड़े मिलते थे। इससे उसका नाम ‘तुकड़या’ और फिर तुकड़ो जी हो गया। जब वे 12 वर्ष के थे, तब उनके गुरु समाधिस्थ हो गये। 


भगवान विट्ठल के दर्शन की प्रबल चाह तुकड़ो जी को पंढरपुर ले गयी; पर पुजारियों ने उन्हें भगा दिया। अब वे पुंडलीक मंदिर गये। इसके बाद मां की याद आने पर गांव आकर मजदूरी से पेट पालने लगे। 14 वर्ष की अवस्था में वे घर छोड़कर जंगल चले आये। 


वहां उनकी भेंट एक योगी से हुई, जिसने एक गुफा में उन्हें योग, प्राणायाम, ध्यान आदि सिखाया। वे रात को आते और प्रातः न जाने कहां गायब हो जाते थे। दो माह बाद एक दिन जब तुकड़ो जी की समाधि टूटी, तो वहां न कोई योगी थे और न कोई गुफा। 


अब तुकड़ो जी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उनकी भेंट गांधी जी से भी हुई; पर उनका मार्ग गांधी जी से अलग था। वे गाते थे - झाड़ झड़ूले शस्त्र बनेंगे, पत्थर सारे बम्ब बनेंगे, भक्त बनेगी सेना। ऐसे शब्दों से अंग्रेज शासन को नाराज होना ही था। 


28 अगस्त, 1942 को उन्हें बंदी बना लिया गया। जेल से आने पर वे सेवा कार्य के माध्यम से समाज जागरण में जुट गये। उन्होंने ‘गुरुदेव सेवा मंडल’ स्थापित कर गांव-गांव में उसकी शाखाएं स्थापित कीं। एक समय उनकी संख्या 75,000 तक पहुंच गयी।


इसी समय उनकी भेंट संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी से हुई। दोनों ने एक दूसरे को समझा और फिर शाखाओं पर भी उनके प्रवचन होने लगे। गुरुदेव सेवा मंडल ने गोरक्षा, ग्रामोद्योग, समरसता, कुष्ठ सेवा, व्यसन मुक्ति आदि रचनात्मक काम हाथ में लिये। 


इनके व्यापक प्रभाव को देखकर राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ की उपाधि दी। 1953 में तुकड़ो जी ने ग्राम विकास के सूत्रों की व्याख्या करने वाली ‘ग्राम गीता’ लिखी। 1964 में जब ‘विश्व हिन्दू परिषद’ की स्थापना हुई, तो वे वहां उपस्थित थे।


सूर्य उगता है, तो ढलता भी है। अब चलने का समय हो रहा था। तुकड़ो जी ने क्रमशः सभी कार्य अपने सहयोगियों को सौंप दिये और 11 अक्तूबर, 1966 को अपनी देहलीला को भी समेट लिया।

दादासाहब फाल्के

30 अप्रैल/जन्म-दिवस


भारतीय फिल्मों के पितामह दादासाहब फाल्के


नासिक के पास प्रसिद्ध तीर्थस्थल त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को धुण्डराज गोविन्द फाल्के का जन्म हुआ। उनके पिता श्री गोविन्द फाल्के संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनकी तरह विद्वान् पुरोहित बने। इसलिए उन्होंने बचपन से ही उसे गीता, रामायण, शास्त्र, पुराण, वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन कराया; पर धुण्डराज का मन तो संस्कृत से अधिक कला, फोटोग्राफी, जादू आदि में लगता था।


अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मुम्बई के विल्सन कालेज में संस्कृत कालेज में प्राध्यापक बन गये। वहाँ वे छात्रों को पढ़ाते तो थे ही, पर साथ ही अपना शौक पूरा करने के लिए उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में भी प्रवेश ले लिया। 


इससे उनके अन्दर के कलाकार को पूरी तरह विकसित होने का अवसर मिला। यहाँ उन्होंने नाटक, चित्रकला, फोटोग्राफी तथा कलाक्षेत्र के अन्य तकनीकी विषयों की पूरी जानकारी लेकर इनमें महारत प्राप्त की। बाद में वे बड़ौदा के कलाभवन से भी जुड़ गये। 


एक दिन मुम्बई में उन्होंने ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ नामक फिल्म देखी। उसमें ईसा मसीह के जीवन को दर्शाया गया था। इसके द्वारा ईसाइयत का प्रचार होता देख उन्हें बहुत पीड़ा हुई। उन्होंने संकल्प लिया कि वे भी हिन्दू धर्म से सम्बन्धित कथाओं, अवतारों आदि के बारे में फिल्म बनायेंगे। अतः अब वे फिल्म निर्माण की हर विधा के गहन अध्ययन में जुट गये। 


उनके सम्मुख आर्थिक समस्या भी बहुत प्रबल थी। अपने एक मित्र से कुछ धन उधार लेकर वे इंग्लैण्ड चले गये तथा वहाँ जाकर इस विधा के हर पहलू को निकट से देखा। इंग्लैण्ड से लौटते समय वे अपने साथ एक कैमरा और पर्याप्त मात्रा में फिल्म की रील भी लेकर आये। भारत आकर वे फिल्म निर्माण में जुट गये।


उन दिनों फिल्म बनाना आज की तरह आसान नहीं था। कोई इसमें पैसा लगाने का तैयार नहीं था। नारी पात्रों के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिलती थी; पर दादासाहब ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पुरुषों से ही महिलाओं का अभिनय भी कराया। इस प्रकार 1913 में भारत की पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ बनी। 


इस फिल्म के बनते ही चारों ओर धूम मच गयी। हर आयु और वर्ग की जनता यह फिल्म देखने के लिए थियेटरों पर टूट पड़ी। इसके बाद उन्होंने मोहिनी भस्मासुर और सत्यवान-सावित्री नामक फिल्में बनायीं। हर फिल्म ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। 


दादा साहब भारत के पौराणिक कथानकों को लेकर ही फिल्म बनाते थे। इस प्रकार उन्होंने ईसाइयत के प्रभाव में आ रही नयी पीढ़ी के मन में धर्म के प्रति प्रेम एवं आदर की भावना जाग्रत की। उन्होंने छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 103 फिल्में बनायीं। इस सफलता को देखकर कई उद्योगपति पैसा लगाने को तैयार हो गये। अतः उन्होंने ‘हिन्दुस्तान फिल्म कम्पनी’ की स्थापना की।


जब बोलती फिल्मों का दौर आया, तो लोगों का ध्यान मूक फिल्मों से हट गया। यह देखकर उन्होंने एक बोलती फिल्म भी बनायी; पर वह चल न सकी। तब तक उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ गया था। 16 फरवरी, 1944 को उनका देहान्त हो गया।


दादासाहब फाल्के ने भारतीय फिल्म जगत की नींव रखी। इसलिए उन्हें फिल्म जगत का पितामह माना जाता है। फिल्म क्षेत्र का सबसे बड़ा पुरस्कार उनके नाम पर ही दिया जाता है।

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