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मंगलवार, 30 नवंबर 2021

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा


*_उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा_*

*_मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी_*


सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी। वही मैं तुमसे कहता हूँ।


एक समय यु‍धिष्ठिर ने भगवान से पूछा था ‍कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है। उपवास के दिन जो क्रिया की जाती है आप कृपा करके मुझसे कहिए। यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ। सुनो।


सर्वप्रथम हेमंत ऋ‍तु में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है। दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश मुँह में रह न जाए। रात्रि को भोजन कदापि न करें, न अधिक बोलें। एकादशी के दिन प्रात: 4 बजे उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। व्रत करने वाला चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात न करे।




स्नान के पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें। रात्रि में सोना या प्रसंग नहीं करना चाहिए। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए। जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा माँगनी चाहिए। धर्मात्मा पुरुषों को कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए।



जो मनुष्य ऊपर लिखी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है। व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल होता है। संक्रांति से चार लाख गुना तथा सूर्य-चंद्र ग्रहण में स्नान-दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एकादशी के दिन व्रत करने से मिलता है।


अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना तथा एक लाख तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों अथवा सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना पुण्य भूमिदान करने से होता है। उससे हजार गुना पुण्य कन्यादान से प्राप्त होता है। इससे भी दस गुना पुण्य विद्यादान करने से होता है। विद्यादान से दस गुना पुण्य भूखे को भोजन कराने से होता है। अन्नदान के समान इस संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जिससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हों परंतु एकादशी के व्रत का पुण्य सबसे अधिक होता है।


हजार यज्ञों से भी ‍अधिक इसका फल होता है। इस व्रत का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ है। रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है और दिन में एक बार भोजन करने वाले को भी आधा ही फल प्राप्त होता है। जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।


युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए।


भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। वह बड़ा बलवान और भयानक था। उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं। तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ।


वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे। वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे‍कि हे देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है। आप हमारी रक्षा करें। दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं।


आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता और संहार करने वाले हैं। सबको शांति प्रदान करने वाले हैं। आकाश और पाताल भी आप ही हैं। सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं। आप सर्वव्यापक हैं। आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है।


हे भगवन्! दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम सब देवता इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें।


इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताअओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? यह सब मुझसे कहो।


भगवान के ऐसे वचन सुनकर इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस थ उसके महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ। उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है।


सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है। स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है। हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए।


यह वचन सुनकर भगवान ने कहा- हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूंगा। तुम चंद्रावती नगरी जाओ। इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था। उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे। जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े।

 

भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से बींध डाला। बहुत-से दैत्य मारे गए। केवल मुर बचा रहा। वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा। भगवान जो-जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता। उसका शरीर छिन्न‍-भिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा। दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ।

 

10 हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा। थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए। वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए। यह गुफा 12 योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था। विष्णु भगवान वहां योगनिद्रा की गोद में सो गए।

 

मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया। 

 

श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे, तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं।


सोमवार, 29 नवंबर 2021

कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय

.......... ✦•••  *_जय श्री हरि_*  •••✦ ........

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📜 *_कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय_*


*_वैसे तो ज्योतिष विद्या में कई तरह के योग और कुंडली के दोष की चर्चा की गई है, परंतु कुछ दोष ऐसे हैं जिस पर अधिक चर्चा होती है और जिसके निवारण पर जोर दिया जाता है। क्योंकि मान्यता के अनुसार इन दोषों के कारण जिंदगी लगभग बर्बाद हो जाती है। आओ जानते हैं इन दोषों में से 6 खास दोषों के बारे में और उनके निवारण के बारे में।_*

 

🔸 *_1. कालसर्प दोष_*

🔸 *_2. मंगल दोष_*

🔸 *_3. पितृ दोष_*

🔸 *_4. गुरु चांडाल दोष_*

🔸 *_5. विष दोष_*

🔸 *_6. केन्द्राधिपति दोष_*

 

🐍 *_1. कालसर्प दोष : जन्म के समय ग्रहों की दशा में जब राहु-केतु आमने-सामने होते हैं और सारे ग्रह एक तरफ रहते हैं, तो उस काल को सर्पयोग कहा जाता है। इस आधार पर कालसर्प के 12 प्रकार भी बताए गए हैं। कुछ ने तो 250 के लगभग प्रकार बताए हैं।_*

 

☠️ *_निवारण :_*

🔹 *_1. खाना रसोईघर में बैठकर खाएं।_*

🔹 *_2. दीवारों को साफ रखें।_*

🔹 *_3. टॉयलेट व बाथरूम की सफाई रखें।_*

🔹 *_4. ससुराल से संबंध अच्छे रखें।_*

🔹 *_5. पागलों को खाने को दें।_*

🔹 *_6. धर्मस्थान की सीढ़ियों पर 10 दिन तक पोंछा लगाएं।_*

🔹 *_7. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं।_*

🔹 *_8. घर में ठोस चांदी का हाथी रख सकते हैं।_*

🔹 *_9. सरस्वती की आराधना करें।_*

🔹 *_10. लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर मंगल या गुरु का उपाय करें।_*

 

🎯 *_2. मंगल दोष : किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में से किसी भी एक भाव में है तो यह 'मांगलिक दोष' कहलाता है।_*

 

▪️ *_1.प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए।_*

▪️ *_2.सफेद सुरमा 43 दिन तक लगाना चाहिए।_*

▪️ *_3.नीम के पेड़ की पूजा करना चाहिए।_*

▪️ *_4.गुड़ खाना और खिलाना चाहिए।_*

▪️ *_5.क्रोध पर काबू और चरित्र को उत्तम रखना चाहिए।_*

▪️ *_6.मांस और मदिरा से दूर रहें।_*

▪️ *_7.भाई-बहन और पत्नी से संबंध अच्छे रखें।_*

▪️ *_8.पेट और खून को साफ रखें।_*

▪️ *_9.मंगलनाथ उज्जैन में भात पूजा कराएं।_*

▪️ *_10.विवाह नहीं हुआ है तो पहले कुंभ विवाह करें।_*


💁🏻‍♂️ *_3. पितृ दोष : कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है। कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। गुरु का शापित होना पितृदोष का कारण है। सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष माना जाता है। लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है। पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं। जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।_*

 

✍🏼 *_निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। पूर्वजों के धर्म में विश्वास रखना, कुलदेवी और कुलदेव की पूजा करना और श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना। त्र्यंबकेश्वर में जाकर पितृदोष की शंति कराएं।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_4. गुरु चांडाल दोष : कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति के साथ राहु बैठा है तो इसे गुरु चांडाल योग कहते हैं।_*

 

🧞‍♀️ *_चांडाल योग का निवारण :_*

👉🏼 *_1. माथे पर नित्य केसर, हल्दी या चंदन का तिलक लगाएं।_*

 

👉🏼 *_2. सुबह तालाब जाकर मछलियों को काला साबुत मूंग या उड़द खिलाएं।_*

 

👉🏼 *_3. प्रति गुरुवार को पूर्ण व्रत रखें। रात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।_*

 

👉🏼 *_4. उत्तम चरित्र रखकर पीली वस्तुओं का दान करें और पीले वस्त्र ही पहनें।_*

 

👉🏼 *_5. गुरुवार को पड़ने वाले राहु के नक्षत्र में रात्रि में बृहस्पति और राहु के मंत्र का जाप करना चाहिए या शांति करवाएं। राहु के नक्षत्र हैं आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा।_*

 

👉🏼 *_5. विष दोष : चंद्र और शनि किसी भी भाव में इकट्ठा बैठे हो तो विष योग बनता है।_*

 

☝🏼 *_दोष निवारण :_*

🤷🏻‍♀️ *_1. पंचमी को उपवास रखें। खासकर नागपंचमी को कड़ा उपवास रखें।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_2. नागदेव की विधिवत पूजा करें। 'ऊं कुरु कुल्ले फट् स्वाहा' का जाप करते हुए घर में सभी जगह जल छिड़कें।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_3. श्रीसर्प सूक्त का पाठ करें। श्रीमद भागवत पुराण और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाएं।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_4. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। घर में चारों दिशाओं में कर्पूर जलाएं। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है।_*

 

🌪️ *_6. केन्द्राधिपति दोष : केंद्र भाव पहला, चौथा, सातवां, और दसवां भाव होता है। मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यदि बृहस्पति पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो, धनु और मीन लग्न की कुंडली में बुध पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो तो केन्द्राधिपति दोष का निर्माण होता है। दरअसल, बृहस्पति, बुध, शुक्र, और चंद्रमा के कारण यह दोष बनता है।_*

 

👉🏼 *_1. नित्य भगवान शिव की पूजा करें।_*

👉🏼 *_2. नित्य 21 बार ॐ नमो नारायण का जाप करें।_*

👉🏼 *_3. नित्य 11 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।_*


     

रविवार, 28 नवंबर 2021

जगत की रीत

 जगत की रीत 


एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी,  वहीं थोड़ी दूरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था, जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो, किसी ने कहा कि, क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें, अतः सभी संत के पास पहुंचे !


जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो, पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है, मन भी नहीं होता, पानी पीने को।


संत ने पुछा- हुआ क्या ? 

पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?


लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, उसी मर गये , अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?


संत ने कहा - 'एक काम करो , उसमें गंगाजल डलवाओ, तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया !फिर भी समस्या जस की तस।

लोग फिर से संत के पास पहुंचे, अब संत ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।


लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस।

लोग फिर संत के पास पहुंचे। अब संत ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।

सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात।

लोग फिर संत के पास, अब संत खुद चलकर आये ।

लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं।


अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला।

तो संत ने पुछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?


लोग बोले - उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया, वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।


संत बोले - जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।


बात यह है कि, हमारे आपके जीवन की यह कहानी है, इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं, इन्हीं की सारी बदबू है।


हम उपाय पूछते हैं तो, लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा वह करलों, थोड़ी पूजा करो, थोड़ा पाठ करलों !

सब कुछ करते हैं, परन्तु बदबू नहीं जाती, बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है , तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें, तभी बदबू  जाएगी और जीवन उपयोगी होगा, समझेंl


शनिवार, 27 नवंबर 2021

भोजन के लिए उपयोगी कौन -सा वर्तन

 *आइये जानते है कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है*


*सोना*


सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।



चाँदी

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।


*कांसा*


काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल 3 प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


*तांबा*


तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।


*पीतल*


पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल 7 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।


*लोहा*


लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।


*स्टील*


स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।


*एलुमिनियम*


एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।


*मिट्टी*


मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे 100 प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।


*पानी पीने के पात्र के विषय में 'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा है*


जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।

पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।

काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।

(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)


अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।


शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

चाय पीने के फायदा और नुकसान


*_आप चाय पीते हैं तो जरूर पढ़ें, फायदा करता है कि नुकसान?_*



_🚩दो सौ वर्ष पहले भारतीय घरों में चाय नहीं होती थी। पहले घर पर अतिथि आते थे तो देशी गाय का दूध-लस्सी आदि दिया जाता था लेकिन आज कोई भी घर आये अतिथि को पहले चाय पूछते हैं। ये बदलाव अंग्रेजों की देन है। कई लोग घर, दुकान, ऑफिस या यात्रा के दौरान दिन में कई बार चाय लेते रहते हैं, यहाँ तक कि उपवास में भी चाय लेते हैं! किसी भी डॉक्टर के पास जायेंगे तो वो शराब-सिगरेट-तम्बाखू छोड़ने को कहेगा, पर चाय नहीं, क्योंकि यह उसे पढ़ाया नहीं गया और वह भी खुद चाय का गुलाम है। परन्तु किसी अच्छे वैद्य के पास जायेंगे तो वह पहली सलाह देगा- चाय ना पियें।_


*🚩चाय और कॉफी में दस प्रकार के जहर होते हैं*


*★'टैनिन':*  यह विष 18 प्रतिशत होता है। यह पेट में छिद्र और वायु उत्पन्न करता है।


*★‘थिन’:* यह विष 3 प्रतिशत होता है। इसके कारण मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं तथा यह विष फेफड़ों और मस्तिष्क में जड़ता को निर्मित करता है।


*★‘कैफिन’:* यह विष 2.75 प्रतिशत होता है। यह गुर्दों (किडनियों) को दुर्बल बनाता है।


*★‘वॉलाटाइल’:* यह विष आंतों को हानि पहुंचाता है।


*★‘कार्बोनिक अम्ल’:* अम्लपित्त (एसिडिटी) बढ़ाता है।


*★‘पैमिन’:* पाचनशक्ति को दुर्बल करता है।


*★‘एरोमोलीक’:* आँतों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।


*★‘सायनोजन’:* अनिद्रा और पक्षाघात जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करता है।


*★‘ऑक्सेलिक अम्ल’:* शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक होता है।


*★‘स्टिनॉयल’:* रक्तविकार और नपुंसकता उत्पन्न करता है।


इसीलिए चाय अथवा कॉफी का सेवन कभी नहीं करना चाहिए।


*🚩चाय कितना नुकसान पहुंचाता है?*


🚩हमारे गर्म देश में चाय, और गर्मी बढ़ाती है, पित्त बढ़ाती है। चाय के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं। इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है। चाय का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।


🚩●चाय से भूख मर जाती है, दिमाग सूखने लगता है, गुदा और वीर्याशय ढीले पड़ जाते हैं। डायबिटीज़ जैसे रोग होते हैं। दिमाग सूखने से उड़ जाने वाली नींद के कारण आभासित कृत्रिम स्फूर्ति को स्फूर्ति मान लेना, यह बड़ी गलती है। चाय-कॉफी के विनाशकारी व्यसन में फँसे हुए लोग स्फूर्ति का बहाना बनाकर हारे हुए जुआरी की तरह व्यसन में अधिकाधिक गहरे डूबते जाते हैं। वे लोग शरीर, मन, दिमाग और पसीने की कमाई को व्यर्थ गँवा देते हैं और भयंकर व्याधियों के शिकार बन जाते हैं।


🚩●चाय का सेवन रक्त आदि की वास्तविक ऊष्मा को नष्ट करने में भारी भूमिका निभाता है।


🚩●चाय में उपलब्ध कैफीन हृदय पर बुरा प्रभाव डालती है, अत: चाय का अधिक सेवन प्राय: हृदय के रोग को उत्पन्न करने में सहायक होता है।


🚩●जो लोग चाय बहुत पीते हैं उनकी आंतें जवाब दे जाती हैं, कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है। चाय पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है।


🚩●चाय पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है, न्यूरोलॉजिकल गड़बड़ियां आ जाती हैं। चाय में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप चाय का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अधिक चाय पीने से खुश्की आ जाती है और दांत भी खराब होते हैं।


*🚩यह सावधानी अवश्य रखें*


🚩रेलवे स्टेशनों या टी-स्टॉलों पर बिकने वाली चाय का सेवन यदि न करें तो बेहतर होगा क्योंकि ये बरतन को साफ किये बिना कई बार इसी में चाय बनाते रहते हैं जिस कारण कई बार चाय विषैली हो जाती है। चाय को कभी भी दोबारा गर्म करके न पिएं तो बेहतर होगा। बाज़ार की चाय अक्सर अल्युमीनियम के भगोने में खदका (उबाल) कर बनाई जाती है जो बहुत नुकसान करता है। कुछ जगह पर तो दूध भी कलर से बनाकर उसकी चाय बनाई जाती है जो शरीर को अत्यंत नुकसान पहुँचाती है।


🚩कई बार हम लोग बची हुई चाय को थरमस में डालकर रख देते हैं लेकिन भूलकर भी ज्यादा देर तक थरमस में रखी चाय का सेवन न करें। जितना हो सके चायपत्ती को कम उबालें तथा एक बार चाय बन जाने पर इस्तेमाल की गई चायपत्ती को फेंक दें।


🚩चाय-कॉफी को हमेशा के लिए त्याग दें क्योंकि चाय के हर कप के साथ एक चम्मच या उससे अधिक शक्कर ली जाती है जो वजन बढ़ाती है और अनेक बीमारियां बुलाती है। अगर पीनी ही पड़ी तो गुड़, नींबू मिलाकर काली चाय पीएं, शक्कर और दूध नहीं मिलाएं। चाय के साथ नमकीन, खारे बिस्कुट, पकौड़ी आदि लेते हैं, यह विरुद्ध आहार है; इससे त्वचा रोग होते हैं।


*🚩चाय का विकल्प*


🚩संकल्प कर लें कि चाय नहीं पियेंगे।  दो दिन से एक हफ्ते तक याद आएगी ; फिर सोचेंगे अच्छा हुआ छोड़ दी। एक दो दिन सिर दर्द हो सकता है।


🚩सुबह ताजगी के लिए गर्म पानी लें, चाहे तो उसमें आंवले के टुकड़े मिला दें तो और स्फूर्ति आ जाएगी।


🚩तुलसी पत्ते, गुड़ और नींबू मिलाकर चाय बनाकर पियें तो चाय की लत भी छूट जाएगी और शरीर निरोग होने लगेगा।


🚩चाय की जगह देशी गाय के दूध का उपयोग करना चाहिए इससे स्वास्थ्य में चार चांद लग जायेंगे और सभी बीमारियां भाग जाएंगी।


शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

महारानी लक्ष्मीबाई



*शत कोटि नमन महारानी लक्ष्मीबाई 19 नवम्बर, 1835/ जयंती*

            महारानी लक्ष्मीबाई

      *खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थीं.*


                   भारतीय वसुंधरा  को  गौरवान्वित  करने वाली झांसी की  रानी  वीरांगना  लक्ष्मीबाई  वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं।सच्चा वीर कभी आपत्तियों से  नहीं  घबराता  है। प्रलोभन  उसे  कर्तव्य  पालन  से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार  और  उच्च होता  है। उसका  चरित्र  अनुकरणीय  होता  है।  अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति  के  लिए  वह  सदैव  धर्मनिष्ठ, आत्म विश्वासी, कर्तव्य परायण और स्वाभिमानी  होता है। ऐसी ही थीं वीरांगना लक्ष्मीबाई।

                  महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में19 नवंबर सन्1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इन की माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मी बाई अपने बाल्यकाल में मनुबाई के नाम से जानी जाती थीं।

                   इधर सन्‌1838 में गंगाधरराव को झांसी का राजा घोषित किया गया। वे विधुर थे।सन्‌1850 में मनुबाई से उनका विवाह हुआ। सन्‌ 1851 में  उन  को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। झांसी के कोने-कोने में  आनंद की लहर प्रवाहित  हुई, लेकिन  चार  माह  पश्चात  उस बालक का निधन हो गया।

                   सारी झांसी शोक सागर में निमग्न हो गई। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा  कि वे फिर स्वस्थ न हो सके  और  21 नवम्बर 1,853  को चल बसे।

                  यद्यपि महाराजा का  निधन  महारानी  के लिए असहनीय था, लेकिन  फिर  भी  वे  घबराई  नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर  राव  ने  अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज़ी सरकार को सूचना दे दी थी। परन्तु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

                    27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत  दत्तक  पुत्र  दामोदर राव  की  गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेज़ी  राज्य  में मिलाने  की  घोषणा   कर   दी।  पोलेटिकल  एजेंट  की सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित  हो गया, *'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'।*  7 मार्च 1854 को झांसी पर अंग्रेज़ों का अधिकार हुआ। झांसी की रानी ने पेंशन अस्वीकृत कर दी व नगर के राज महल में निवास करने लगीं।

                   यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ।  अंग्रेज़ों की राज्य लिप्सा की नीति  से  उत्तरी  भारत  के  नवाब  और  राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में  विद्रोह  की  आग  भभक उठी।रानी लक्ष्मीबाई ने इसको स्वर्ण अवसर माना और क्रांति की ज्वालाओं को अधिक सुलगाया तथा अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। 

                   भारत की जनता  में  विद्रोह  की  ज्वाला भभक गई।समस्त देश में सुसंगठित और सुदृढ रूप से क्रांति को कार्यान्वित करने की तिथि 31मई सन्1857 निश्चित की गई, लेकिन इससे पूर्व ही क्रांति की  ज्वाला प्रज्ज्वलित हो गई और 7 मई 1857 को मेरठ में  तथा 4 जून सन् 1857 को कानपुर  में, भीषण  विप्लव  हो गए। कानपुर तो 28 जून सन्1857 को पूर्ण स्वतंत्र हो गया।अंग्रेज़ों के कमांडर सर ह्यूरोज ने अपनी सेना को सुसंगठित कर विद्रोह दबाने का प्रयत्न किया।

                   उन्होंने सागर,गढ़कोटा,शाहगढ़, मदनपुर, मडखेड़ा, वानपुर और  तालबेहट  पर  अधिकार  किया और नृशंसतापूर्ण अत्याचार किए। फिर झांसी की ओर अपना कदम बढ़ाया और अपना मोर्चा कैमासन पहाड़ी के मैदान में पूर्व और दक्षिण के मध्य लगा लिया।

                   लक्ष्मीबाई पहले से  ही  सतर्क  थीं  और वानपुर के राजा मर्दनसिंह से भी इस  युद्ध  की  सूचना तथा उन के आगमन की सूचना प्राप्त हो चुकी थी। 23 मार्च सन् 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ। कुशल तोपची गुलाम गौस खां ने झांसी की रानी के आदेशानुसार तोपों के लक्ष्य साधकर ऐसे गोले फेंके कि पहली बार में ही अंग्रेज़ी सेना के छक्के छूट गए।

                   रानी   लक्ष्मी   बाई   ने   सात  दिन  तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेज़ों का बड़ी  बहादुरी  से  मुकाबला किया। रानी ने खुलेरूप से शत्रु का सामना किया  और युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया।

                    वे   अकेले   ही  अपनी  पीठ   के  पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार  हो, अंग्रेज़ों से युद्ध करती रहीं। बहुत  दिन  तक  युद्ध  का  क्रम  इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं।

                   उन्होंने   नानासाहब  और   उनके  योग्य सेनापति  तात्या  टोपे  से  सम्पर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श  किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा  अंग्रेज़  मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी  का  घोड़ा  बुरी तरह घायल हो गया और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुआ,लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया।

                   कालपी में महारानी और  तात्या  टोपे  ने योजना बनाई  और  अंत  में  नाना  साहब, शाहगढ़  के राजा,वानपुर के राजा मर्दनसिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया  और वहां के किले पर अधिकार कर लिया।विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा  लेकिन  रानी  इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय का नहीं था, अपनी शक्ति को सुसंगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था।

                    इधर सेनापति सर ह्यूरोज  अपनी  सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता रहा और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने  ग्वालियर का किला  घमासान  युद्ध  करके  अपने  कब्जे  में  ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 

                  18 जून 1858 को ग्वालियर का अन्तिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी  सेना  का  कुशल  नेतृत्व किया। वे घायल हो  गईं  और  अंततः  उन्होंने  वीरगति प्राप्त की।

बुधवार, 17 नवंबर 2021

भोजन करने के नियम: शास्त्रो व् धर्म के अनुसार


*🚩भोजन करने के नियम*

*शास्त्रो व् धर्म के अनुसार*:🚩


*01. खाने से पूर्व अन्नपूर्णा माता की स्तुति करके उनका धन्यवाद देते हुए, तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इर्श्वर से ऐसी प्रार्थना करके भोजन करना चाहिए ।*

*02. गृहस्थ के लिए प्रातः और सायं (दो समय) ही भोजन का विधान है ।*

*03. दोनो हाथ, दोनो पैर और मुख, इन पाँच अंगो को धोकर भोजन करने वाला दीर्घजीवी होता है।*

*04. भींगे पैर खाने से आयु की वृद्धि होती है।*

*05. सुखे पैर, जुते पहने हुए, खड़े होकर, सोते हुए, चलते फिरते, बिछावन पर बैठकर, गोद मे रखकर, हाथ मे लेकर, फुटे हुए बर्तन मे, बाये हाथ से, मंदिर मे, संध्या के समय, मध्य रात्रि या अंधेरे मे भोजन नही करना चाहिए।*

*06. रात्री मे भरपेट भोजन नही करना चाहिए ।*

*07. रात्री के समय दही, सत्तु एव तिल का सेवन नही करना चाहिए ।*

*08. हँसते हुए, रोते हुए, बोलते हुए, बिना ईच्छा के, सुर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन नही करना चाहिए।*

*09. पूर्व की ओर मुख करके खाना खाने से आयु बढ़ती है।*

*10. उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से आयु तथा धन की प्राप्ति होती है।*

*11. दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से प्रेतत्व की प्राप्ति होती है।*

*12. पश्चिम की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति रोगी होता है।*

*13. भोजन सदा एकान्त मे ही करना चाहिए।*

*14. यदि पत्नि भोजन कर रही हो, तो उसे नही देखना चाहिए।*

*15. बालक और वृद्ध को भोजन करने के बाद स्वंय भोजन ग्रहण करे।*

*16. बिना स्नान, पुजन, हवन किए बिना भोजन न करें।*

*17. बिना स्नान ईख, जल, दुध, फल एवं औषध का सेवन कर सकते है।*

*18. किसी के साथ एक बर्तन मे भोजन न करे। ( पत्नि के साथ कदापि नही) अपना जुठा किसी को ना दे, ना स्वंय किसी का जुठा खाये।*

*19. काँसे के बर्तन मे भोजन करने से (रविवार छोड़कर) आयु, बुद्धि, यश और बल की वृद्धि होती है।*

*20. परोसे हुए अन्न की निन्दा न करे, वह जैसा भी हो, प्रेम से भोजन कर लेना चाहिए। सत्कारपुर्वक खाये गये अन्न से बल और तेज की वृद्धि होती है।*

*21. ईष्या, भय, क्रोध, लोभ, राग और द्वेष के समय किया गया भोजन शरीर मे विकार उत्पन्न कर रोग को आमंत्रित करता है।*

*22. भोजन मे पहले मीठा, बीच मे नमकीन एवं खट्टी तथा अंत मे कड़वे पदार्थ ग्रहण करे।*

*23. कोई भी मिष्ठान्न पदार्थ जैसे हलवा, खीर, मालपूआ इत्यादि देवताओ एवं पितरों को अर्पण करके ही खाना चाहिए।*

*24. जल, शहद, दुध, दही, घी, खीर और सत्तु को छोड़कर कोई भी पदार्थ सम्पुर्ण रूप से नही खाना चाहिए। (अर्थात बिल्कुल थोड़ा सा थाली मे छोड़ देना चाहिए )*

*25. जिससे प्रेम न हो उसके यहाँ भोजन कदापि न करे।*

*26. मल मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वट वृक्ष के नीचे, भोजन नहीं करना चाहिए ।*

*27. आधा खाया हुआ फल, मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ।*

*28. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए ।*

*29. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा नही खाना चाहिए ।*

*30. थोडा खाने वाले को आरोग्य, आयु, बल, सुख, सुन्दर संतान, और सौंदर्य प्राप्त होता है ।*

*31. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए।*

*32. कुत्ते का छुआ, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुह से फूक मरकर ठंडा किया, बाल गिरा हुआ भोजन, अनादर युक्त, अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ।*

*33. कंजूस का, राजा का, चरित्रहीन के हाथ का, शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए।*

*34. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय, कुत्ता, और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये |*


शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बातें

यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बातें

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👺 *_यम द्वितीया 2021 : भाई दूज की 7 रोचक बाते_*


💩 *_गोवर्धन पूजा के अगले दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है। दीपावली के 5 दिनी उत्सव में भाई दूज एक ऐसा त्योहार है जो संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। भाईदूज का त्योहार 6 नंबर 2021 शनिवार को मनाया जाएगा।_*

 

👉🏼 *_1. भाई दूज के कितने नाम : भाई दूज को भैया दूज, भाई टीका, यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया आदि नामों से मनाया जाता है। भाई दूज को संस्कृत में भागिनी हस्ता भोजना कहते हैं। कर्नाटक में इसे सौदरा बिदिगे के नाम से जानते हैं तो वहीं बंगाल में भाई दूज को भाई फोटा के नाम से जाना जाता है। गुजरात में भौ या भै-बीज, महाराष्ट्र में भाऊ बीज कहते हैं तो अधिकतर प्रांतों में भाई दूज। भारत के बाहर नेपाल में इसे भाई टीका कहते हैं। मिथिला में इसे यम द्वितीया के नाम से ही मनाया जाता है।_*


💁🏻‍♀️ *_2. भाई दूज पर भाई को तिलक लगाना है महत्वपूर्ण : भाई दूज के दिन बहनें अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक लगाकर उसकी आरती उतारकर उसे भोजन खिलाती है। भाई दूज पर भाई को भोजन के बाद भाई को पान खिलाने का ज्यादा महत्व माना जाता है। मान्यता है कि पान भेंट करने से बहनों का सौभाग्य अखण्ड रहता है।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_3. यम और यमुना : भाई दूज का त्योहार यमराज के कारण हुआ था, इसीलिए इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज पर यम और यमुना की कथा सुनने का प्रचलन है। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन यमुना अपने भाई भगवान यमराज को अपने घर आमंत्रित करके उन्हें तिलक लगाकर अपने हाथ से स्वादिष्ट भोजन कराती है। जिससे यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी बहन यमुना से वरदान मांगने को कहा। इस पर यमुना ने अपने भाई यम से कहा कि आज के दिन जो बहनें अपने भाई को निमंत्रित कर अपने घर बुलाकर उन्हें भोजन कराएंगी और उनके माथे पर तिलक लगाएंगी तो उन्हें यम का भय ना हो। यमरान ने ऐसा सुनकर कहा, तथास्तु। तभी से कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को बहनों द्वारा अपने भाई को भोजन कराकर तिलक लगाया जाता है। यम के निमित्त धन तेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज पांचों दिन दीपक लगाना चाहिए। कहते हैं कि यमराज के निमित्त जहां दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती हैं।_*


👉🏼 *_4. श्रीकृष्‍ण और सुभद्रा : कहा जाता है कि नरकासुर का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने इसी दिन उनके घर पहुंचे थे। सुभद्रा ने उनका स्वागत करके अपने हाथों से उन्हें भोजन कराकर तिलक लगाया था।_*

 

💁🏻‍♀️ *_5. चित्रगुप्त की पूजा : इस दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा का भी प्रचलन है। कहते हैं कि इसी दिन से चित्रगुप्त लिखते हैं लोगों के जीवन का बहीखाता। चित्रगुप्त की पूजा के साथ-साथ लेखनी, दवात तथा पुस्तकों की भी पूजा भी की जाती है।_*

 

👉🏼 *_6. यमुना में स्नान : कहते हैं कि इस दिन जो भाई-बहन इस रस्म को निभाकर यमुनाजी में स्नान करते हैं, उनको यमराजजी यमलोक की यातना नहीं देते हैं। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना का पूजन किया जाता है।_*

 

🤷🏻‍♀️ *_7. नवीन वर्ष : वणिक वर्ग के लिए यह नवीन वर्ष का प्रारंभिक दिन कहलाता है। इस दिन नवीन बहियों पर 'श्री' लिखकर कार्य प्रारंभ किया जाता है।_*


बुधवार, 3 नवंबर 2021

दीपावली पर महालक्ष्मी का महत्व, पूजा

 दीपावली पर महालक्ष्मी का महत्व, पूजा 

# दीपावली - महालक्ष्मी


*🙏 _सभी लोग  इस सन्देश को अवस्य पढें, समझें अनुशरण करें और शेयर कर जन जन तक पहुँचायें_*


*🪔*दीपावली के दिन जो पूजा होती है उसे लक्ष्मी पूजन कहा जाता है। आज ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि लक्ष्मी का अर्थ है धन की देवी।*⚜️🔱🚩


*🪔ये लक्ष्मी शब्द का बहुत संकुचित अर्थ हो गया। वास्तव में इस शब्द का अर्थ बहुत विशाल है। लक्ष्मी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की लक्ष धातु से हुई है।*


*🪔लक्ष का शाब्दिक अर्थ है ध्यान लगाना, ध्येय बनाना, ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना इत्यादि। इसका अर्थ ये है कि जब हम एकाग्रचित्त होकर कोई कार्य या साधना करते हैं तो उसका जो फल प्राप्त होता है उसे लक्ष्मी कहते हैं।*


*🪔हमारे प्राचीन ॠषियों का प्रत्येक कार्य तप, ध्यान इत्यादि का उद्देश्य हमेशा शुभ एवं आध्यात्मिक समृद्धि के लिए होता था।तब लक्ष्मी का अर्थ जीवन के चार आयामों धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के समन्वय से जीवन को दिव्यता के मार्ग पर ले जाना था।*


*🪔हमारी सबसे प्राचीन पुस्तक ॠग्वेद में भी लक्ष्मी देवी का उल्लेख आता है परंतु वहां लक्ष्मी का अर्थ धन की देवी नहीं, शुभता एवं सौभाग्य की देवी है।*


*🪔धन की उपयोगिता सीमित है।इस संसार में आप धन से सब कुछ नहीं प्राप्त कर सकते। न धन से आप माता-पिता खरीद सकते हैं, न दोस्त, न ज्ञान। ऐसा बहुत कुछ है जो धन से नहीं खरीदा जा सकता। परंतु सौभाग्य से आप जो चाहें वो प्राप्त कर सकते हैं।*


*🪔अथर्ववेद में भी लक्ष्मी को शुभता, सौभाग्य, संपत्ति, समृद्धि, सफलता एवं सुख का समन्वय बताया गया है।*


*🪔पुराणों में लक्ष्मी के आठ प्रकार बताए गए हैं ये हैं ....*

_*आदिलक्ष्मी,*_

_*धान्यलक्ष्मी,*_

_*धैर्यलक्ष्मी,*_

_*गजलक्ष्मी,*_

_*संतानलक्ष्मी,*_

_*विजयलक्ष्मी,*_

_*विद्यालक्ष्मी,*_

_*एवं धनलक्ष्मी।*_


*🪔इससे स्पष्ट होता है कि लक्ष्मी का प्रभाव क्षेत्र केवल धन तक ही सीमित नहीं है। लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय मानी गई है। विभिन्न देवताओं की भिन्न-भिन्न शक्तियों का मूल स्त्रोत भी माता लक्ष्मी ही हैं।*


*🪔पुराणों के अनुसार माता लक्ष्मी ने अग्निदेव को अन्न का वरदान दिया, वरूण देव को विशाल साम्राज्य का, सरस्वती को पोषण का, इन्द्र को बल का, बृहस्पति को पांडित्य का* *इत्यादि-इत्यादि। इससे सिद्ध होता है कि माता लक्ष्मी की कृपा जिसपर भी हो जाए उसे नाना प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। माता लक्ष्मी के हाथ में कमल है।शास्त्रों में कमल को ज्ञान, आत्म साक्षात्कार एवं मुक्ति का प्रतीक माना गया है।*


*🪔हमारा दर्शन हमें जलकमलवत् रहने की शिक्षा देता है। इसका अर्थ है कि समस्त ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी मन को निर्लिप्त रखना। माता के दोनों ओर दो गज शक्ति का हैं। माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू है जो अँधेरे में भली-भाँति देखने में सक्षम है।*


*🪔इसका अर्थ है कि जब चहुँ ओर दुख का अँधकार छाया हो तो माता की कृपा से हम हमारी दृष्टि सम्यक रहती है एवं हम अपना मार्ग सरलता से ढूँढ सकते हैं।*


*🪔माता लक्ष्मी के हाथ से हमेशा धनवर्षा होती रहती है जो इस बात की सूचक है कि हमें केवल धन का संग्रह ही करना है परंतु वंचितों को उनकी आवश्यकतानुसार दान भी करना है। माता लक्ष्मी ने भगवान् विष्णु को पति रूप में वरण किया है जो सर्वश्रेष्ठ हैं।*


*🪔माता सदा उनके चरणों में रहती हैं। यह इस बात का द्योतक है कि धन आदि ऐश्वर्य सदा उत्तम पुरूषों के पास ही टिकता है। अधम पुरूषों को इसकी प्राप्ति नहीं होती*

*यदि संयोगवश प्राप्ति हो भी जाए तो वो टिकती नहीं है। कलियुग में लक्ष्मी का वास नारी में कहा गया है।*


*🪔इसीलिए कन्या के जन्म पर कहा जाता है कि लक्ष्मी जी पधारी हैं ,परंतु विद्वानों का ये भी कहना है कि।यदि हम कन्या के अवतरण पर निराश हो जाते हैं तो लक्ष्मी उल्टे पाँव लौट जाती है। जिस घर में नारी का आदर होता है वहाँ।माता लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है एवं जहां नारी का अनादर होता है वहाँ से लक्ष्मी का पलायन हो जाता है।*


*🪔माता लक्ष्मी की कृपादृष्टि हेतु समस्त नारी जाति का सम्मान करना अत्यावश्यक है।चूंकि माता लक्ष्मी समस्त प्रकार के ऐश्वर्य की प्रदात्री हैं इसलिए माता लक्ष्मी को केवल धन की देवी मानने की भूल न करें।*


*🚩जय लक्ष्मी माता🚩*