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सोमवार, 31 जनवरी 2022

व्यवस्था के विशेषज्ञ जयप्रकाश जी

 1 फरवरी/पुण्य-तिथि


व्यवस्था के विशेषज्ञ जयप्रकाश जी



श्री जयप्रकाश जी का जन्म 1924 में मवाना (जिला मेरठ, उ.प्र.) में श्रीमती चंद्राकली की गोद में हुआ था। उनके पिता श्री भगवत प्रसाद रस्तोगी सरकारी सेवा में थे। जयप्रकाश जी से तीन बड़े भाई और भी थे। घर में पुश्तैनी रूप से कपड़े का व्यापार होता था। जयप्रकाश जी भी बचपन से दुकान पर बैठते थे। वहीं से उन्हें हिसाब-किताब को ठीक रखने की प्रवृत्ति प्राप्त हुई, जो आगे चलकर उनके प्रचारक जीवन में भी बनी रही।


जयप्रकाश जी की लौकिक पढ़ाई में कोई विशेष रुचि नहीं थी। इस कारण वे कक्षा पांच के बाद अपने घरेलू काम में लग गये। उन दिनों देश का वातावरण गरम था। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन विफल हो जाने के कारण युवाओं का विश्वास गांधी जी और कांग्रेस से उठ गया था। उन्हीं दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का विस्तार हो रहा था। 1943 में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे मवाना में लगने वाली शाखा में जाने लगे।


धीरे-धीरे वे संघ की विचारधारा से इतने एकरूप हो गये कि उन्हें दुकान, मकान, नौकरी, घर, गृहस्थी आदि सब व्यर्थ लगने लगा। 1945 में उन्होंने घर छोड़ दिया और संघ की योजना से विस्तारक होकर परीक्षितगढ़ आ गये। संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे संघ कार्य के साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी करने को कहा। यद्यपि उनकी इच्छा नहीं थी, फिर भी आदेश का पालन करते हुए जयप्रकाश जी ने कक्षा बारह तक की शिक्षा पूर्ण की।


इसके साथ ही प्रचारक के नाते संघ का काम भी चलता रहा। जानसठ, खतौली, बुढ़ाना आदि में तहसील प्रचारक रहने के बाद वे फतेहाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद और फिर बुलंदशहर में जिला प्रचारक रहे। 1948 के प्रतिबंध के समय वे मुजफ्फरनगर की जेल में रहे। 1971 के आपातकाल में बुलंदशहर में बस द्वारा प्रवास करते हुए वे पुलिस की पकड़ में आ गये और फिर ‘मीसा’ के अन्तर्गत उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। 


प्रतिबंध के बाद वे सहारनपुर में जिला प्रचारक बने। उन्हीं दिनों आगरा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नये प्रान्तीय कार्यालय का निर्माण होना था। व्यवस्था और हिसाब-किताब में जयप्रकाश जी की रुचि थी। अतः उन्हें आगरा कार्यालय का प्रमुख बनाया गया। इस दौरान उन्होंने नवीन कार्यालय ‘माधव भवन’ का निर्माण अपनी देखरेख में कराया। संघ द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक कार्यों के लिए बनाये गये न्यासों के प्रबंधन को भी उन्होंने व्यवस्थित किया।


इस समय तक वे मधुमेह और हृदय रोग के शिकार हो गये। फिर भी पूरे प्रान्त में घूम कर वे व्यवस्था सम्बन्धी काम करते थे। शरीर ठीक रहने तक वे संघ शिक्षा वर्ग में प्रायः भोजनालय का काम देखते थे। बाद में वृद्धावस्था के कारण वे वर्ग के कार्यालय में बैठकर हिसाब संभालने लगे। 


1989 में मेरठ प्रांत अलग होने पर उन्हें वहां बुला लिया गया। उन्होेंने यहां प्रान्तीय कार्यालय ‘शंकर आश्रम’ का पुनर्निमाण तथा प्राचीन शिव मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। वे केवल हिसाब ही नहीं रखते थे, तो धन संग्रह भी कराते थे। इस प्रकार वे व्यवस्था के हर पहलू के विशेषज्ञ थे। 


एक फरवरी, 1999 को वे आगरा से मेरठ आने वाले थे। आगरा का एक कार्यकर्ता उन्हंे छोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन पर आया था। अचानक वहीं उन्हें तीव्र हृदयाघात हुआ। जब तक कोई सहायता मिलती, तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ गये। इस प्रकार संघ कार्य में अंतिम समय तक सक्रिय रहते हुए उन्होंने अपनी जीवनयात्रा पूर्ण की।

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क्या है चरणामृत का महत्व,पौराणिक एवम् वैदिक कथा


क्या है चरणामृत का महत्व !


*🕉️🚩अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है।*


*अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।*

*विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।*


*"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।*


*🕉️🚩जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।*


*🕉️🚩चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।*


*🕉️🚩श्रीकृष्ण हुए बीमार,,,,दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को कहा। उनका मानना था कि उनके परम भक्त या फिर जो उनसे अति प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे।लेकिन दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं लेकिन उन्हें इस उपाय के निष्फल होने की चिंता सता रही थी।*


*🕉️🚩उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के इस्तेमाल से चरणामृत बना लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह परम भक्त का कार्य तो कर देगी। परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।*


*🕉️🚩अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के राधा के तो जैसे प्राण ही निकल गए हों।जब गोपियों ने कृष्ण द्वारा बताया गया उपाय राधा को बताया तो राधा ने एक क्षण भी व्यर्थ करना उचित ना समझा और जल्द ही स्वयं के पांव धोकर चरणामृत तैयार कर श्रीकृष्ण को पिलाने के लिए आगे बढ़ी।*


*🕉️🚩राधा जानतीं थी कि वे क्या कर रही हैं। जो बात अन्य गोपियों के लिए भय का कारण थी ठीक वही भय राधा को भी मन में था लेकिन कृष्ण को वापस स्वस्थ करने के लिए वह नर्क में चले जाने को भी तैयार थीं।आखिरकार कान्हा ने चरणामृत ग्रहण किया और देखते ही देखते वे ठीक हो गए। क्योंकि वह राधा ही थीं जिनके प्यार एवं सच्ची निष्ठा से कृष्णजी तुरंत स्वस्थ हो गए।  अपने कृष्ण को निरोग देखने के लिए राधाजी ने एक बार भी स्वयं के भविष्य की चिंता ना की और वही किया जो उनका धर्म था।*


*🕉️🚩इतिहास गवाह है इस बात का... राधा-कृष्ण का कभी विवाह ना हुआ लेकिन उनका प्यार इतना पवित्र एवं सच्चा था कि आज भी दोनों का नाम एक साथ लेने में भक्त एक क्षण भी संदेह महसूस नहीं करते। उनके भक्तों के लिए कृष्ण केवल राधा के हैं तथा राधा भी कृष्ण की ही हैं।*


*🕉️🚩राधा-कृष्ण की इस कहानी ने चरणामृत को एक ऐतिहासिक पहलू तो दिया ही लेकिन आज भी चरणामृत को प्रभु का प्रसाद मानकर भक्तों में बांटा जाता है। पीतल के बर्तन में पीतल के ही चम्मच से, थोड़ा मीठा सा यह अमृत भक्तों के कंठ को पवित्र बनाता है।*


*🕉️🚩भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी।*


*🕉️🚩जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है - "चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी"*


*🕉️🚩धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।*


*🕉️🚩कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।*


*🕉️🚩चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।*


*🕉️🚩आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।*


*🕉️🚩इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए । ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।*


*🕉️🚩इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।*


*🕉️🚩इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं.?*


*🕉️🚩दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।*


*🕉️🚩कृपया इस जानकारी को मित्र गण एवं अपने निकटतम परिजनों, और परिवार से साझा व वार्तालाप या परामर्श करें।*



 संदर्भ

1 सूरसागर 

2 रामायण 

3 राम चरित्र मानस 

4 सीरियल रामायण

 लेखक रामानंद सागर





रविवार, 30 जनवरी 2022

एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं...

 एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं... 


NCERT की Book में लिखा है कि दो सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था, जिसे आज कुतुबमीनार कहा जाता है।

इस पर प्रोफेसर साहब ने RTI लगाया कि NCERT ने इस तथ्य को कहाँ से सत्यापित किया है? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे?


इस पर NCERT की तरफ से उत्तर आया है कि...


1. विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है। 

2. इस पुस्तक को प्रोफेसर मृणाल मीरी ने मंजूर किया था, जो राष्ट्रीय निगरानी समिति का हेड था।


मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे काँग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था। काँग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य जोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाए जाते है जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है।


जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में लिखा है कि "आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयाँ मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयाँ मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।"


स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में हैं वे कोई नई नहीं हैं, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।


ऐसे ही वे आगे लिखते हैं "युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख लेते थे, शेष जनता में बाँट दिया जाता था।" यहाँ भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।


आगे एक जगह लिखा है "पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।"


आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है "खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।"


तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, तब उन्होंने NCERT में RTI डाली कि इन बातों का आधार क्या है? 

आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।


जानकर आश्चर्य होगा कि NCERT ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि NCERT हमें इनका जवाब नहीं दे रही।


कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और NCERT को जवाब देने के लिए कहा। तब NCERT ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।


ऋग्वेद में इंद्र को एक योद्धा बताया गया है और उसमें आये नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।


इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है...


संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है। इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?


तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।


कोर्ट:- "और, जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बाँट लेते थे, उसका आधार क्या है?"

जेएनयू:- "चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बाँट रहे हैं।"


अब जेएनयू के इतिहासकारों और NCERT के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें...


NCERT आगे कक्षा 11 की हिस्ट्री में लिखती हैं "गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर कुछ खास नहीं कर सका।"


यहाँ NCERT के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।


सच्चाई यह है कि NCERT के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दू धर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।


सोनिया गाँधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही हैं, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।


और हाँ, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि (Neeraj Atri) है, जिन्होंने कोर्ट में यह पिटीशन डाली थी, वे यूट्यूब पर हैं।


#साभार🙏

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

श्री मद्-भगवत गीता के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य


*हर एक सनातनी को इन बातों की जानकारी याद रखनी चाहिए :*         

*"श्री मद्-भगवत गीता" के बारे में-👇🏻*


*🕉️. किसको किसने सुनाई?*

उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई। 


*🕉️. कब सुनाई?*

उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।


*ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?*

उ.- रविवार के दिन।


*🕉️. कौन सी तिथि को?*

उ.- एकादशी 


*🕉️. कहाँ सुनाई?*

उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।


*🕉️. कितनी देर में सुनाई?*

उ.- लगभग 45 मिनट में


*🕉️. क्योँ सुनाई?*

उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।


*ॐ. कितने अध्याय है?*

उ.- कुल 18 अध्याय


*🕉️. कितने श्लोक है?*

उ.- 700 श्लोक


*🕉️. गीता में क्या-क्या बताया गया है?*

उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। 


*🕉️.गीता को अर्जुन के अलावा*

*और किन किन लोगो ने सुना?*

उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने


*🕉️. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?*

उ.- भगवान सूर्यदेव को


*🕉️. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?*

उ.- उपनिषदों में


*🕉️. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?*

उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।


*ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?*

उ.- गीतोपनिषद


*🕉️. गीता का सार क्या है?*

उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना


*🕉️. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?*

उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574

अर्जुन ने- 85 

धृतराष्ट्र ने- 1

संजय ने- 40.

*अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे।*


*अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।*


33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू

धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार। 

*देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,*

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्खातावश हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...

*कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-*

*12 प्रकार हैं*

आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,

शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,

सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हे :-

वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

*11 प्रकार है :-*

रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,

अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,

रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

*एवं*

दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी 

*अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है*

*तो इस जानकारी को अधिक से अधिक*

*लोगों तक पहुचाएं।*


संदर्भ ग्रंथ 

श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ स्वरूप लेखक कृष्णकृपा मूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद

 अध्याय 12

 प्रकाशन भक्तिवेदांता बुक ट्रस्ट, हरे कृष्ण धाम जूहू मुंबई 400049

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

मीनाक्षी मंदिर, मदुरै(तमिलनाडु) एक परिचय


मीनाक्षी मंदिर, मदुरै(तमिलनाडु)


*🔶 दक्षिण भारत सुंदर मंदिरों के लिए विख्‍यात माना जाता है। इन्‍हीं में से एक मदुरै का मीनाक्षी मंदिर है। तमिलनाडु स्थित मां मीनाक्षी देवी का यह मंदिर सुंदर और महीन शिल्‍पकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है।*


*🔶मीनाक्षी मंदिर का निर्माण राजा कुलसेकरा पंड्या ने 17वीं शताब्‍दी में कराया था। मंदिर में 8 खंभों पर लक्ष्‍मीजी की मूर्तियां बनी हुई हैं। इन खंभों पर भगवान शिव की पौराणिक कथाएं भी लिखी गई हैं। मंदिर के परिसर में एक पवित्र सरोवर भी है तो 165 फीट लंबा और 120 फीट चौड़ा है।*


*🔶 मंदिर का मुख्‍य गर्भगृह 3500 वर्षों से भी अधिक पुराना है। मीनाक्षी मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्राचीन काल की बेहतरीन स्‍थापत्‍य कला और वास्‍तु का विशुद्ध उदाहरण है। तमिल साहित्‍य में अंकित कहानियों में इस मंदिर की काफी चर्चा की गई है।*

माघ कृष्ण चतुर्थी / संकष्टी चतुर्थी / संकट चौथ की कथा,महत्व


माघ कृष्ण चतुर्थी / संकष्टी चतुर्थी / संकट  चौथ

➡ *21 जनवरी 2022 शुक्रवार को संकट चौथ, संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार है। इस चतुर्थी को 'माघी कृष्ण चतुर्थी', 'तिलचौथ', ‘वक्रतुण्डी चतुर्थी’ भी कहा जाता है।*

🙏🏻 *इस दिन गणेश भगवान तथा संकट  माता की पूजा का विधान है। संकष्ट का अर्थ है 'कष्ट या विपत्ति', 'कष्ट' का अर्थ है 'क्लेश', सम् उसके आधिक्य का द्योतक है। आज किसी भी प्रकार के संकट, कष्ट का निवारण संभव है। आज के दिन व्रत रखा जाता है। इस व्रत का आरम्भ ' गणपतिप्रीतये संकष्टचतुर्थीव्रतं करिष्ये ' - इस प्रकार संकल्प करके करें  । सायंकालमें गणेशजी का और चंद्रोदय के समय चंद्र का पूजन करके अर्घ्य दें।*

*'गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धि प्रदायक।*

*संकष्टहर में देव गृहाणर्धं नमोस्तुते।*

*कृष्णपक्षे चतुर्थ्यां तु सम्पूजित विधूदये।*

*क्षिप्रं प्रसीद देवेश गृहार्धं नमोस्तुते।'*

🙏🏻 *नारदपुराण, पूर्वभाग अध्याय 113 में संकष्टीचतुर्थी व्रत का वर्णन इस प्रकार मिलता है।*

*माघकृष्णचतुर्थ्यां तु संकष्टव्रतमुच्यते । तत्रोपवासं संकल्प्य व्रती नियमपूर्वकम् ।। ११३-७२ ।।*

*चंद्रोदयमभिव्याप्य तिष्ठेत्प्रयतमानसः । ततश्चंद्रोदये प्राप्ते मृन्मयं गणनायकम् ।। ११३-७३ ।।*

*विधाय विन्यसेत्पीठे सायुधं च सवाहनम् । उपचारैः षोडशभिः समभ्यर्च्य विधानतः ।। ११३-७४ ।।*

*मोदकं चापि नैवेद्यं सगुडं तिलकुट्टकम् । ततोऽर्घ्यं ताम्रजे पात्रे रक्तचंदनमिश्रितम् ।। ११३-७५ ।।*

*सकुशं च सदूर्वं च पुष्पाक्षतसमन्वितम् । सशमीपत्रदधि च कृत्वा चंद्राय दापयेत् ।। ११३-७६ ।।*

*गगनार्णवमाणिक्य चंद्र दाक्षायणीपते । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ।। ११३-७७ ।।*

*एवं दत्त्वा गणेशाय दिव्यार्घ्यं पापनाशनम् । शक्त्या संभोज्य विप्राग्र्यान्स्वयं भुंजीत चाज्ञया ।। ११३-७८ ।।*

*एवं कृत्वा व्रतं विप्र संकष्टाख्यं शूभावहम् । समृद्धो धनधान्यैः स्यान्न च संकष्टमाप्नुयात् ।। ११३-७९ ।।*

🙏🏻 *माघ कृष्ण चतुर्थी को ‘संकष्टवव्रत’ बतलाया जाता है। उसमें उपवास का संकल्प  लेकर व्रती सबेरे से चंद्रोदयकाल तक नियमपूर्वक रहे। मन को काबू में रखे। चंद्रोदय होने पर मिट्टी की गणेशमूर्ति बनाकर उसे पीढ़े पर स्थापित करे। गणेशजी के साथ उनके आयुध और वाहन भी होने चाहिए। मिटटी में गणेशजी की स्थापना करके षोडशोपचार से विधिपूर्वक उनका पूजन करें । फिर मोदक तथा गुड़ से  बने हुए तिल के लडडू का नैवेद्य अर्पण करें।*

*तत्पश्चात्‌ तांबे के पात्र में लाल चन्दन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र, दधि और जल एकत्र करके निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करते हुए उन्हें चन्द्रमा को अर्घ्य दें -*

*गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।*

*गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥*

*'गगन रूपी समुद्र के माणिक्य, दक्ष कन्या रोहिणी के प्रियतम और गणेश के प्रतिरूप चन्द्रमा! आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।’*

*इस प्रकार गणेश जी को यह दिव्य तथा पापनाशन अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्च्यात स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर भोजन करें। ब्रह्मन ! इस प्रकार कल्याणकारी ‘संकष्टवव्रत’ का पालन करके मनुष्य धन-धान्य से संपन्न होता है। वह कभी कष्ट में नहीं पड़ता।*

🙏🏻 *लक्ष्मीनारायणसंहिता में भी कुछ इसी प्रकार वर्णन मिलता है ।* 

*माघकृष्णचतुर्थ्यां तु संकष्टहारकं व्रतम् ।*

*उपवासं प्रकुर्वीत वीक्ष्य चन्द्रोदयं ततः ।। १२८ ।।*

*मृदा कृत्वा गणेशं सायुधं सवाहनं शुभम् ।*

*पीठे न्यस्य च तं षोडशोपचारैः प्रपूजयेत् ।। १२९ ।।*

*मोदकाँस्तिलचूर्णं च सशर्करं निवेदयेत् ।*

*अर्घ्यं दद्यात्ताम्रपात्रे रक्तचन्दनमिश्रितम् ।। १३० ।।*

*कुशान् दूर्वाः कुसुमान्यक्षतान् शमीदलान् दधि ।*

*दद्यादर्घ्यं ततो विसर्जनं कुर्यादथ व्रती ।। १३१ ।।*

*भोजयेद् भूसुरान् साधून् साध्वीश्च बालबालिकाः ।*

*व्रती च पारणां कुर्याद् दद्याद्दानानि भावतः ।। १३२ ।।*

*एवं कृत्वा व्रतं स्मृद्धः संकटं नैव चाप्नुयात् ।*

*धनधान्यसुतापुत्रप्रपौत्रादियुतो भवेत् ।। १३३ ।।*

➡ *भविष्यपुराण में भी इस व्रत का वर्णन मिलता है  ।*

👉🏻 *आज के दिन क्या करें*

➡ *१. गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ अत्यन्त शुभकारी होगा ।*

➡ *२. गणेश भगवान को दूध (कच्चा), पंचामृत, गंगाजल से स्नान कराकर, पुष्प, वस्त्र आदि समर्पित करके तिल तथा गुड़ के लड्डू, दूर्वा का भोग जरूर लगायें। लड्डू की संख्या 11 या 21 रखें। गणेश जी को मोदक (लड्डू), दूर्वा घास तथा लाल रंग के पुष्प अति प्रिय हैं । गणेश अथर्वशीर्ष में कहा गया है "यो दूर्वांकुरैंर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति" अर्थात जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का पूजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है।  "यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छित फलमवाप्रोति" अर्थात जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा पूजन  करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है।*

➡ *३. आज गणपति के 12 नाम या 21 नाम या 101 नाम से पूजा करें ।*

➡ *४. शिवपुराण के अनुसार “महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्ष के। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली और एक पक्ष तक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।*

➡ *५. किसी भी समस्या के समाधान के लिए आज संकट नाशन गणेश स्तोत्र के 11 पाठ करें.

सोमवार, 17 जनवरी 2022

ॐ के बारे में प्रचलित धारणा, और परिचय



                *ॐ के बारे में प्रचलित धारणा*


आम तौर पर सभी मन्त्रों के आगे ॐ लगा हुआ होता है जिसे प्रणव भी कहते हैं | ॐ तीन अक्षरों से मिल कर बना है “ अ ” “ उ ” और “ म ” | अब आप थ्योरी पढने के साथ प्रैक्टिकल भी करें | एक लम्बी सांस ले कर छोड़ें आहिस्ते आहिस्ते | पुन : एक लम्बी सांस लें और छोड़ते हुए अ sssssssss ................ उच्चारण करें | मह्शूश करने की कोशिश करें कि “ अ ” अक्षर का स्पंदन मूलाधार से ले कर सहस्त्रार के बीच में कहाँ मह्शूश होता है | दो तीन बार सांस लेते हुए “ अ ” का उच्चारण करें | इसी तरह “ उ ” और “ म ” का उच्चारण भी करें और किस स्थान चक्र के नजदीक इन शब्दों का स्पंदन ( Vibration ) मह्शूश होता है | 

पहले इसे कर के देखें और टिप्पणी करें फिर आगे की बात करते हैं |

किसी भी समय किसी भी स्थान पर यह प्रयोग कर सकते हैं |

“ अ ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन मणिपुर चक्र नाभि के पास स्पष्ट मह्शूश किया जा सकता है |

“ उ ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन अनाहत चक्र हृदय के इर्द गिर्द इसका स्पंदन पह्शूश किया जा सकता है |

“ म ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन सम्पूर्ण आज्ञा चक्र के समीप इसका स्पंदन मह्शूश किया जा सकता है | 


“ अ ” के उच्चारण से मूलाधार चक्र , स्वाधिष्ठान चक्र तथा मणिपुर चक्र में सक्रियता होती है |

“ उ ” के उच्चारण से अनाहत चक्र तथा विशुद्धि चक्र में सक्रियता होती है |

“ म ” के उच्चारण से आज्ञा चक्र तथा सहस्त्रार में सक्रियता उत्पन्न होती है |

ॐ के उच्चारण से सम्पूर्ण चक्रों पर प्रभाव पड़ता है |


वैसे तो “ अ ” “ उ ” और “ म के स्वतंत्र स्वतंत्र उच्चारण से सभी चक्रों पर प्रभाव होता है किन्तु उपर लिखे चक्रों पर विशेष प्रभाव होता है | जैसे “ अ ” के स्वतंत्र उच्चारण से मूलाधार , स्वाधिष्ठान तथा मणिपुर पर विशेष प्रभाव होता है उसी तरह “ उ ” और “ म ” का उपर के अन्य चक्रों पर |

हाथ कंगन को आरसी क्या कर के देख लें उच्चारण के वक्त हीं स्पंदन साफ मह्शूश हो जायेगा |

कभी कभी मूल चीज अपने वास्तविक स्वरुप में नहीं रह जाता है | बहुत कुछ ॐ के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है | हम जो ॐ का उच्चारण करते हैं और प्रकृति में , समस्त ब्रह्मांड में जो अनाहत नाद गुंजायमान है दोनों में भेद है | ॐ सिर्फ अनाहत नाद की सूचना देता है लेकिन जब हम ॐ को मुख से उच्चारित कर देते हैं ॐ.................. तब तो यह अनाहत नाद नहीं होता | मुख में वायु के कम्पन से हीं हम ॐ की ध्वनी उत्पन्न करते हैं न ! इसलिए इसका शुद्ध स्वरुप नहीं होता | अनहत नाद वगैर घर्षण के सारे ब्रह्मांड में गूँज रहा है | इसे हम उच्चारित नहीं कर सकते हाँ ध्यान के गहनतम क्षणों में इसका श्रवण हम जरुर कर सकते है | अनहत नाद बोला नहीं जा सकता सिर्फ और सिर्फ सुना जा सकता है | 


लेकिन इसका ये मतलब नहीं जो ॐ शास्त्रों में वर्णित है या जिसे प्रणव कहा जाता है या जिसका हम उच्चारण करते हैं वह बेकार है | ऐसा नहीं है | ॐ के उच्चारण का भी लाभ है | शरीर के विभिन्न स्थानों पर ॐ के संघात से विदुतीय स्पंदन उत्पन्न होता है | जिसका बारीकी से निरिक्षण करके जाना जा सकता है | मुख्य बात यह है कि ॐ अनाहत नाद के जैसा हीं है किन्तु यह अनाहत नाद नहीं है क्योंकि इसे बोल कर उच्चारित किया जाता है | लेकिन ॐ महत्वहीन भी नहीं है ये विभिन्न मन्त्रों में इसका प्रयोग करके या स्वतंत्र रूप से भी इसका प्रयोग करके जाना जा सकता है |


रविवार, 16 जनवरी 2022

एसिडिटी (अम्ल पित्त ),उपचार

 

एसिडिटी (अम्ल पित्त ),

पेट रोग हैँ इसमें खाने के एक घंटे  बाद पेट मे भार महसूस होता हैँ कभी कभी पेट दर्द होता हैँ फिर छाती के बिच जलन महसूस होती हैँ और पेट का पाचक रस गले मे आ जाता हैँ और खट्टी उल्टी आती हैँ. और रोग अगर पुराना हो जाये तो पेट मे घाव हो जाते हैँ.. 


उपचार.. 


No 1..खाने के बाद आवला का पाउडर 5 ग्राम गर्म पानी से लीजिये प्रॉब्लम ठीक हो जाएगी.. एक माह तक लीजिये.. 


No 2..मूली के साथ सक्कर खाने से एसिडिटी प्रॉब्लम ठीक होने लगती हैँ. 


No 3 पांच पीस छोटी इलाची हरे वाली + 5 ग्राम गुड दोनों को मिक्स करके चबा लीजिये ऊपर से गर्म पानी पीजिये ये उपाय सुबह खाली पेट कीजिए 40 दिन 

एसिडिटी हमेसा के लिए खत्म हो जाएगी.. 


विश्वविजेता स्वामी विवेकानंद एक परिचय


  विश्वविजेता स्वामी विवेकानंद


*यदि कोई यह पूछे कि वह कौन युवा संन्यासी था, जिसने विश्व पटल पर भारत और हिन्दू धर्म की कीर्ति पताका फहराई, तो सबके मुख से निःसंदेह स्वामी विवेकानन्द का नाम ही निकलेगा। *


विवेकानन्द का बचपन का नाम नरेन्द्र था। उनका जन्म कोलकाता में 12 जनवरी, 1863 को हुआ था। बचपन से ही वे बहुत शरारती, साहसी और प्रतिभावान थे। पूजा-पाठ और ध्यान में उनका मन बहुत लगता था। 


नरेन्द्र के पिता उन्हें अपनी तरह प्रसिद्ध वकील बनाना चाहते थे; पर वे धर्म सम्बन्धी अपनी जिज्ञासाओं के लिए इधर-उधर भटकते रहते थे। किसी ने उन्हें दक्षिणेश्वर के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में बताया कि उन पर माँ भगवती की विशेष कृपा है। यह सुनकर नरेन्द्र उनके पास जा पहुँचे।


वहाँ पहुँचते ही उन्हें लगा, जैसे उनके मन-मस्तिष्क में विद्युत का संचार हो गया है। यही स्थिति रामकृष्ण जी की भी थी; उनके आग्रह पर नरेन्द्र ने कुछ भजन सुनाये। भजन सुनते ही परमहंस जी को समाधि लग गयी। वे रोते हुए बोले, नरेन्द्र मैं कितने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा में था। तुमने आने में इतनी देर क्यों लगायी ? धीरे-धीरे दोनों में प्रेम बढ़ता गया। वहाँ नरेन्द्र की सभी जिज्ञासाओं का समाधान हुआ। 


उन्होंने परमहंस जी से पूछा - क्या आपने भगवान को देखा है ? उन्होंने उत्तर दिया - हाँ, केवल देखा ही नहीं उससे बात भी की है। तुम चाहो तो तुम्हारी बात भी करा सकता हूँ। यह कहकर उन्होंने नरेन्द्र को स्पर्श किया। इतने से ही नरेन्द्र को भाव समाधि लग गयी। अपनी सुध-बुध खोकर वे मानो दूसरे लोक में पहुँच गये।


अब नरेन्द्र का अधिकांश समय दक्षिणेश्वर में बीतने लगा। आगे चलकर उन्होंने संन्यास ले लिया और उनका नाम विवेकानन्द हो गया। जब रामकृष्ण जी को लगा कि उनका अन्त समय पास आ गया है, तो उन्होंने विवेकानन्द को स्पर्श कर अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियाँ उन्हें दे दीं। अब विवेकानन्द ने देश-भ्रमण प्रारम्भ किया और वेदान्त के बारे में लोगों को जाग्रत करने लगे।


उन्होंने देखा कि ईसाई पादरी निर्धन ग्रामीणों के मन में हिन्दू धर्म के बारे में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ फैलाते हैं। उन्होंने अनेक स्थानों पर इन धूर्त मिशनरियों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी; पर कोई सामने नहीं आया। इन्हीं दिनों उन्हें शिकागो में होने जा रहे विश्व धर्म सम्मेलन का पता लगा। उनके कुछ शुभचिन्तकों ने धन का प्रबन्ध कर दिया। स्वामी जी भी ईसाइयों के गढ़ में ही उन्हें ललकारना चाहते थे। अतः वे शिकागो जा पहुँचे।


शिकागो का सम्मेलन वस्तुतः दुनिया में ईसाइयत की जयकार गुँजाने का षड्यन्त्र मात्र था। इसलिए विवेकानन्द को बोलने के लिए सबसे अन्त में कुछ मिनट का ही समय मिला; पर उन्होंने अपने पहले ही वाक्य ‘अमरीकावासियो भाइयो और बहिनो’ कहकर सबका दिल जीत लिया। तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा। यह 11 सितम्बर, 1893 का दिन था। उनका भाषण सुनकर लोगों के भ्रम दूर हुए। इसके बाद वे अनेक देशों के प्रवास पर गये। इस प्रकार उन्होंने सर्वत्र हिन्दू धर्म की विजय पताका लहरा दी।


भारत लौटकर उन्होंने श्री रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी विश्व भर में वेदान्त के प्रचार में लगा है। जब उन्हें लगा कि उनके जीवन का लक्ष्य पूरा हो गया है, तो उन्होंने 4 जुलाई, 1902 को महासमाधि लेकर स्वयं को परमात्म में लीन कर लिया।


शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

कविता जनतन्त्र का जन्म

 कविता जनतन्त्र का जन्म  

             लेखक रामधारी सिंह दिनकर 



सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, 

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; 

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।  


जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही, 

जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली, 

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे 

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।


जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,  

"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।" 

"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?" 

'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"


मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं, 

जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में; 

अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के 

जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।


लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं, 

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है; 

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।


हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती, 

सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है, 

जनता की रोके राह,समय में ताव कहां? 

वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है। 


अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार 

बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं; 

यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय 

चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं। 


सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा, 

तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो 

अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है, 

तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।  


आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख, 

मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?  

देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे, 

देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में। 


फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं, 

धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है; 

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

मकर संक्रांति एक परिचय

           मकर संक्रांति

ख़ुशी और समृद्धि का प्रतीक मकर संक्रांति त्यौहार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। भारतवर्ष के विभिन्न प्रान्तों में यह त्यौहार अलग-अलग नाम और परम्परा के अनुसार मनाया जाता है।

मकर संक्रांति 

मकर संक्रांति के रूप (Names of Makar Sankranti in Hindi)

उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, पंजाब हरियाणा में लोहड़ी, असम में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्यदेव को भोग लगाते हैं, जिस कारण इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह- सुबह पवित्र नदी में स्नान कर तिल और गुड़ से बनी वस्तु को खाने की परंपरा है। इस पवित्र पर्व के अवसर पर पतंग उड़ाने का अलग ही महत्व है। बच्चे पतंगबाजी करके ख़ुशी और उल्लास के साथ इस त्यौहार का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं।

इस दिन सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं और गीता के अनुसार जो व्यक्ति उत्तरायण में शरीर का त्याग करता है, वह श्री कृष्ण के परम धाम में निवास करता है। इस दिन लोग मंदिर और अपने घर पर विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन प्रयाग और गंगासागर में स्नान का बड़ा महत्व बताया गया है, जिस कारण इस तिथि में स्नान एवं दान का करना बड़ा पुण्यदायी माना गया है।

हिन्दू धर्म के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना "मकर-संक्रांति" (Makar Sankranti) कहलाता है। मकर-संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। इस दिन व्रत और दान (विशेषकर तिल के दान का) का काफी महत्व होता है।

                                                      देवेन्द्र कुमार शर्मा 

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

इलायची के प्रयोग,फायदे


🌷 *इलायची* 🌷

➡ *इलायची औषधीय रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | यह दो प्रकार की होती है – छोटी व बड़ी |*

➡ *छोटी इलायची : यह सुंगधित, जठराग्निवर्धक, शीतल, मूत्रल, वातहर, उत्तेजक व पाचक होती है | इसका प्रयोग खाँसी, अजीर्ण, अतिसार, बवासीर, पेटदर्द, श्वास ( दमा ) तथा दाहयुक्त तकलीफों में किया जाता है |*

 *औषधीय प्रयोग* 


👉🏻 *- अधिक केले खाने से हुई बदहजमी एक इलायची खाने से दूर हो जाती है |*

👉🏻 *- धूप में जाते समय तथा यात्रा में जी मचलाने पर एक इलायची मुँह में डाल दें |*

👉🏻 *- १ कप पानी में १ ग्राम इलायची चूर्ण डालके ५ मिनट तक उबालें | इसे छानकर एक चम्मच शक्कर मिलायें | २ – २ चम्मच यह पानी २ – २ घंटे के अंतर लेने से जी – मचलाना, उबकाई आना, उल्टी आदि में लाभ होता है |*

👉🏻 *- छिलके सहित छोटी इलायची तथा मिश्री समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बनालें | चुटकीभर चूर्ण को १ -१ घंटे के अंतर से चूसने से सूखी खाँसी में लाभ होता है | कफ पिघलकर निकल जाता है |*

👉🏻 *- रात को भिगोये २ बादाम सुबह छिलके उतारकर घिसलें | इसमें १ ग्राम इलायची चूर्ण, आधा ग्राम जावित्री चूर्ण, १ चम्मच मक्खन तथा आधा चम्मच मिश्री मिलाकर खाली पेट खाने से वीर्य पुष्ट व गाढ़ा होता है |*

👉🏻 *- आधा से १ ग्राम इलायची चूर्ण का आँवले के रस या चूर्ण के साथ सेवन करने से पेशाब और हाथ-पैरों की जलन दूर होती है |*

👉🏻 *- आधा ग्राम इलायची दाने का चूर्ण और १-२ ग्राम पीपरामूल चूर्ण को घी के साथ रोज सुबह चाटने से ह्रदयरोग में लाभ होता है |*

👉🏻 *- छिलके सहित १ इलायची को आग में जलाकर राख कर लें | इस राख को शहद मिलाकर चाटने से उलटी में लाभ होता है |*

👉🏻 *- १ ग्राम इलायची दाने का चूर्ण दूध के साथ लेने से पेशाब खुलकर आती है एवं मूत्रमार्ग की जलन शांत होती है |*

💥 *सावधानी : रात को इलायची न खायें, इससे खट्टी डकारें आती है | इसके अधिक सेवन से गर्भपात होने की भी सम्भावना रहती है |*

रविवार, 2 जनवरी 2022

वास्तु के हिसाब से कैलेंडर लगाने के तरीके



🌷 *वास्तु शास्त्र* 🌷

📅 *वास्तु में पुराने कैलेंडर लगाए रखना अच्छा नहीं माना गया है। ये प्रगति के अवसरों को कम करता है। इसलिए, पुराने कैलेंडर को हटा देना चाहिए और नए साल में नया कैलेंडर लगाना चाहिए। जिससे नए साल में पुराने साल से भी ज्यादा शुभ अवसरों की प्राप्ति होती रहे।*

*अगर सालभर अच्छे योग और फायदे चाहते हैं तो घर में कैलेंडर को वास्तु के अनुसार ही लगाएं।*

👉🏻 *वास्तु अनुरुप कहां लगाएं कैलेंडर*

📅  *कैलेंडर उत्तर,पश्चिम या पूर्वी दीवार पर लगाना चाहिए। हिंसक जानवरों, दुःखी चेहरों की तस्वीरों वाला ना हो। इस प्रकार की तस्वीरें घर में नेगेटिव एनर्जी का संचार करती है।*

📅 *पूर्व में कैलेंडर लगाना बढ़ा सकता हैं प्रगति के अवसर- पूर्व दिशा के स्वामी सूर्य हैं , जो लीडरशिप के देवता हैं। इस दिशा में कैलेंडर रखना जीवन में प्रगति लाता है। लाल या गुलाबी रंग के कागज पर उगते सूरज, भगवान आदि की तस्वीरों वाला कैलेंडर हो।*

📅 *उत्तर दिशा में कैलेंडर बढ़ाता है सुख-समृद्धि- उत्तर दिशा कुबेर की दिशा है। इस दिशा में हरियाली,फव्वारा, नदी,समुद्र, झरने, विवाह आदि की तस्वीरों वाला कैलेंडर इस दिशा में लगाना चाहिए। कैलेंडर पर ग्रीन व सफेद रंग का उपयोग अधिक किया हो।*

📅 *पश्चिम दिशा में कैलेंडर लगाने से बन सकते हैं रुके हुए कई कार्य- पश्चिम दिशा बहाव की दिशा है। इस दिशा में कैलेंडर लगाने से कार्यों में तेजी आती हैं। कार्यक्षमता भी बढ़ती है। पश्चिम दिशा का जो कोना उत्तर की ओर हो। उस कोने की ओर कैलेंडर लगाना चाहिए।*

📅  *कैलेंडर नहीं लगाना चाहिए घर की दक्षिण दिशा में- घड़ी और कैलेंडर दोनों ही समय के सूचक हैं। दक्षिण ठहराव की दिशा है। यहां समय सूचक वस्तुओं को ना रखें। ये घर के सदस्यों की तरक्की के अवसर रोकता है। घर के मुखिया के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।* 

📅  *मुख्य दरवाजे से नजर आता कैलेंडर भी नहीं लगाएं- मुख्य दरवाजे के सामने कैलेंडर नहीं लगाना चाहिए। दरवाजे से गुजरने वाली ऊर्जा प्रभावित होती है। साथ ही तेज हवा चलने से कैलेंडर हिलने से पेज उलट सकते हैं । जो कि अच्छा नहीं माना जाता है।*

💥 *विशेष : अगर कैलेंडर में संतों महापुरुषों तथा भगवान के श्रीचित्र लगे हों,तो ये और अधिक पुण्यदायी और आनंददायी माना जाता है |*