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सोमवार, 17 जनवरी 2022

ॐ के बारे में प्रचलित धारणा, और परिचय



                *ॐ के बारे में प्रचलित धारणा*


आम तौर पर सभी मन्त्रों के आगे ॐ लगा हुआ होता है जिसे प्रणव भी कहते हैं | ॐ तीन अक्षरों से मिल कर बना है “ अ ” “ उ ” और “ म ” | अब आप थ्योरी पढने के साथ प्रैक्टिकल भी करें | एक लम्बी सांस ले कर छोड़ें आहिस्ते आहिस्ते | पुन : एक लम्बी सांस लें और छोड़ते हुए अ sssssssss ................ उच्चारण करें | मह्शूश करने की कोशिश करें कि “ अ ” अक्षर का स्पंदन मूलाधार से ले कर सहस्त्रार के बीच में कहाँ मह्शूश होता है | दो तीन बार सांस लेते हुए “ अ ” का उच्चारण करें | इसी तरह “ उ ” और “ म ” का उच्चारण भी करें और किस स्थान चक्र के नजदीक इन शब्दों का स्पंदन ( Vibration ) मह्शूश होता है | 

पहले इसे कर के देखें और टिप्पणी करें फिर आगे की बात करते हैं |

किसी भी समय किसी भी स्थान पर यह प्रयोग कर सकते हैं |

“ अ ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन मणिपुर चक्र नाभि के पास स्पष्ट मह्शूश किया जा सकता है |

“ उ ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन अनाहत चक्र हृदय के इर्द गिर्द इसका स्पंदन पह्शूश किया जा सकता है |

“ म ” के लम्बे उच्चारण के वक्त इसका स्पंदन सम्पूर्ण आज्ञा चक्र के समीप इसका स्पंदन मह्शूश किया जा सकता है | 


“ अ ” के उच्चारण से मूलाधार चक्र , स्वाधिष्ठान चक्र तथा मणिपुर चक्र में सक्रियता होती है |

“ उ ” के उच्चारण से अनाहत चक्र तथा विशुद्धि चक्र में सक्रियता होती है |

“ म ” के उच्चारण से आज्ञा चक्र तथा सहस्त्रार में सक्रियता उत्पन्न होती है |

ॐ के उच्चारण से सम्पूर्ण चक्रों पर प्रभाव पड़ता है |


वैसे तो “ अ ” “ उ ” और “ म के स्वतंत्र स्वतंत्र उच्चारण से सभी चक्रों पर प्रभाव होता है किन्तु उपर लिखे चक्रों पर विशेष प्रभाव होता है | जैसे “ अ ” के स्वतंत्र उच्चारण से मूलाधार , स्वाधिष्ठान तथा मणिपुर पर विशेष प्रभाव होता है उसी तरह “ उ ” और “ म ” का उपर के अन्य चक्रों पर |

हाथ कंगन को आरसी क्या कर के देख लें उच्चारण के वक्त हीं स्पंदन साफ मह्शूश हो जायेगा |

कभी कभी मूल चीज अपने वास्तविक स्वरुप में नहीं रह जाता है | बहुत कुछ ॐ के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है | हम जो ॐ का उच्चारण करते हैं और प्रकृति में , समस्त ब्रह्मांड में जो अनाहत नाद गुंजायमान है दोनों में भेद है | ॐ सिर्फ अनाहत नाद की सूचना देता है लेकिन जब हम ॐ को मुख से उच्चारित कर देते हैं ॐ.................. तब तो यह अनाहत नाद नहीं होता | मुख में वायु के कम्पन से हीं हम ॐ की ध्वनी उत्पन्न करते हैं न ! इसलिए इसका शुद्ध स्वरुप नहीं होता | अनहत नाद वगैर घर्षण के सारे ब्रह्मांड में गूँज रहा है | इसे हम उच्चारित नहीं कर सकते हाँ ध्यान के गहनतम क्षणों में इसका श्रवण हम जरुर कर सकते है | अनहत नाद बोला नहीं जा सकता सिर्फ और सिर्फ सुना जा सकता है | 


लेकिन इसका ये मतलब नहीं जो ॐ शास्त्रों में वर्णित है या जिसे प्रणव कहा जाता है या जिसका हम उच्चारण करते हैं वह बेकार है | ऐसा नहीं है | ॐ के उच्चारण का भी लाभ है | शरीर के विभिन्न स्थानों पर ॐ के संघात से विदुतीय स्पंदन उत्पन्न होता है | जिसका बारीकी से निरिक्षण करके जाना जा सकता है | मुख्य बात यह है कि ॐ अनाहत नाद के जैसा हीं है किन्तु यह अनाहत नाद नहीं है क्योंकि इसे बोल कर उच्चारित किया जाता है | लेकिन ॐ महत्वहीन भी नहीं है ये विभिन्न मन्त्रों में इसका प्रयोग करके या स्वतंत्र रूप से भी इसका प्रयोग करके जाना जा सकता है |


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