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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

9 अपै्रल,सरोद को समर्पित सरोदरानी

 9 अपै्रल/जन्म-दिवस


सरोद को समर्पित सरोदरानी 


सरोद जैसे मरदाने वाद्य को बजाकर ‘सरोदरानी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई शरणरानी बाकलीवाल का जन्म नौ अपै्रल, 1929 को दिल्ली में लाला पन्नूलाल और श्रीमती नंद रानी के घर में हुआ था। घर में ग्रामोफोन पर श्रीकृष्ण भक्ति के गीत बजते तो थे; पर संगीत की विधिवत परम्परा वहां नहीं थी।


एक बार शरणरानी ने अल्मारी में पड़े पुराने सरोद को देखा, तो उसे साफकर तांबे के सिक्के से उस पर सरगम निकालने लगी। इस प्रकार उनका सरोद से जो लगाव हुआ, वह आजीवन बना रहा। एक कार्यक्रम में जब उन्होंने अली अकबर खां को सरोद बजाते सुना, तबसे वे उसे ही समर्पित हो गयीं।


बचपन से ही संगीत के प्रति उन्हें बहुत लगाव था। उन्होंने बिरजू महाराज के पिता अच्छन गुरु से कथक और नभकुमार सिन्हा से मणिपुरी नृत्य भी सीखा। घर में इसका विरोध होता था; पर वे अपने संकल्प से पीछे नहीं हटीं।


एक बार मैहर घराने के उस्ताद अलाउद्दीन खां दिल्ली आये, तो शरणरानी ने उनसे सरोद सिखाने की प्रार्थना की। उस्ताद ने हंसकर कहा कि यह मरदाना वाद्य है, इसे महिलाएं नहीं बजातीं; पर उसकी जिद देखकर वे उसे मैहर ले आये और अपने घर में, अपनी बेटी अन्नपूर्णा के साथ रखकर सरोद सिखाया। 


उन दिनों उस्ताद जी के पास रहकर अली अकबर खां, पंडित रविशंकर, निखिल बनर्जी, पन्नालाल घोष जैसे शिष्य संगीत सीख रहे थे। आगे चलकर इन सबने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। इनके बीच शरणरानी अकेली लड़की थी। फिर भी उसने साहसपूर्वक सरोद की साधना जारी रखी।


उस्ताद अलाउद्दीन खां को सब लोग ‘बाबा’ कहते थे। उनसे सीखना आसान नहीं था। प्रतिदिन आठ-नौ घंटे रियाज करनी पड़ती थी। इसमें ढिलाई होने पर वे नाराज होकर अपनी गुल्लक से पैसे निकालकर शिष्य से कहते थे, ‘‘लो, टिकट लेकर घर चले जाओ। तुम्हारे बस का संगीत सीखना नहीं है।’’ शरणरानी को भी कई बार उनका गुस्सा झेलना पड़ा; पर वे डटी रहीं। 


क्रमशः सरोद और शरणरानी एक-दूसरे के पर्याय हो गये। उनसे प्रेरित होकर कई महिलाओं ने सरोद सीखा। संगीतप्रेमी जौहरी सुल्तान सिंह बाकलीवाल से विवाह के बाद घरेलू दायित्व निभाते हुए भी उन्होंने साधना जारी रखी। 


कई देशी-विदेशी ग्रामोफोन कंपनियों ने उनके रिकार्ड बनाये। यूनेस्को ने भी उनकी रिकार्डिंग की थी। नेहरू जी उन्हें भारत का ‘सांस्कृतिक राजदूत’ कहते थे। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने उन्हें ‘सरोदरानी’ की उपाधि दी। संगीत में शुद्धता की समर्थक शरणरानी ने कई नये राग और बंदिशों की रचना भी की।


उन दिनों संगीत में महिलाओं को महत्व नहीं दिया जाता था; पर उनके साथ तत्कालीन सभी विख्यात तबलावादकों ने संगत की है। इनमें गुदई महाराज, देवाशीष चक्रवर्ती, अहमद जान थिरकवा, उस्ताद अल्ला रक्खा खां, जाकिर हुसैन, पंडित शिवकुमार शर्मा, उस्ताद शफात अहमद खां आदि प्रमुख हैं।


शरणरानी ने देश-विदेश में घूमते हुए 15 वीं शती के बाद के दुर्लभ भारतीय वाद्य संग्रहकर ऐसे 500 वाद्य राष्ट्रीय संग्रहालय को दे दिये। उनके द्वारा स्थापित ‘शरणरानी बाकलीवाल वीथिका’ में भी 450 शास्त्रीय वाद्य प्रदर्शित हैं। 1998 में इस वीथिका के चार वाद्यों पर डाक टिकट जारी हुए। सरोद के उद्भव, इतिहास और विकास पर लिखी उनकी पुस्तक अधिकृत मानी जाती है।


1968 में पद्मश्री तथा 2000 में पद्मभूषण से अलंकृत शरणरानी को संगीत क्षेत्र के भी प्रायः सभी बड़े पुरस्कार मिले। अपने 81वें जन्मदिवस की पूर्वसंध्या (आठ अपै्रल, 2008) को उन्होंने अपनी संगीत-यात्रा पूर्ण की। 


(संदर्भ : जनसत्ता 20.4.08/इंडिया टुडे 30.4.08/विकीपीडिया)