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बुधवार, 31 मार्च 2021

1 अप्रैल,संघ संस्थापक डा. हेडगेवार, मौन साधक अरविन्द भट्टाचार्य,

 1 अप्रैल/जन्म-दिवस

संघ संस्थापक डा. हेडगेवार


विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता डा. केशवराव हेडगेवार का जन्म एक अपै्रल, 1889 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वि. सम्वत् 1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं।


केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते  हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई। 


वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया।


उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। 


सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे।


उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है।


प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे।


डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।

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1 अप्रैल/जन्म-दिवस


मौन साधक अरविन्द भट्टाचार्य



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसे सैकड़ों मौन साधकों का निर्माण किया है, जिन्होंने अपनी देह को तिल-तिल गलाकर गहन क्षेत्रों में हिन्दुत्व की जड़ें मजबूत कीं। ऐसे ही एक साधक थे श्री अरविन्द भट्टाचार्य। 


अरविन्द दा का जन्म एक अपै्रल, 1929 को हैलाकांडी (असम) में हुआ। वे विद्यार्थी जीवन में संघ के स्वयंसेवक बने। एम.ए. तथा बी.टी. कर वे एक इंटर कालिज में प्राध्यापक हो गये। उन दिनों श्री मधुकर लिमये असम में प्रचारक थे। उनके सम्पर्क में आकर ‘अरविंद दा’ ने 1966 में नौकरी छोड़कर प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया। प्रारम्भ में उन्हें संघ के काम में लगाया गया। फिर उनकी कार्यक्षमता देखकर उन्हें 1970 में ‘विश्व हिन्दू परिषद’ का सम्पूर्ण उत्तर पूर्वांचल अर्थात सातों राज्यों का संगठन मंत्री बनाया गया।


उन दिनों यहां का वातावरण बहुत भयावह था। एक ओर बंगलादेश से आ रहे मुस्लिम घुसपैठिये, उनके कारण बढ़ते अपराध और बदलता जनसंख्या समीकरण, दूसरी ओर चर्च द्वारा बाइबिल के साथ राइफल का भी वितरण और इससे उत्पन्न आतंकवाद। जनजातियों के आपसी हिंसक संघर्ष और नक्सलियों का उत्पात। ऐसे में अरविंद दा ने शून्य में से ही सृष्टि खड़ी कर दिखाई।


इस क्षेत्र में यातायात के लिए पैदल और बस का ही सहारा है। ऐसे में 50-60 कि.मी. तक पैदल चलना या 20-22 घंटे बस में लगातार यात्रा करना उनके जैसे जीवट वाले व्यक्ति के लिए ही संभव था। उन्होंने नगा नेता रानी मां गाइडिन्ल्यू तथा अनेक जनजातीय प्रमुखों को संघ और परिषद से जोड़ा। 


त्रिपुरा में शांतिकाली महाराज की हत्या के बाद उन्होंने हिन्दू सम्मेलन कर आतंक के माहौल को समाप्त किया। इस क्षेत्र में बंगलाभाषियों से घृणा की जाती है। अरविंद दा की मातृभाषा बंगला थी; पर अपने परिश्रम और मधुर व्यवहार से उन्होंने सबका मन जीत लिया था। हिन्दू सम्मेलनों द्वारा जनजातीय प्रमुखों व सत्राधिकारों को वे एक मंच पर लाए। गोहाटी आदि शहरों में बिहार से आये श्रमिकों को भी उन्होंने संगठित कर परिषद से जोड़ा।


उत्तर पूर्वांचल में चर्च की शह पर सैकड़ों आतंकी गुट अलग न्यू इंग्लैंड बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग वहां ईसाई बन भी चुके हैं। ऐसे में संघ और विश्व हिन्दू परिषद ने वहां अनेक छात्रावास, विद्यालय, चिकित्सालय आदि स्थापित किये। इन सबमें अरविंद दा की मौन साधना काम कर रही थी। आतंकियों द्वारा लगाये गये 100 से लेकर 500 घंटे तक के कफ्र्यू के बीच भी वे निर्भयतापूर्वक समस्या पीडि़त गांवों में जाते थे। 


हिन्दू पर कहीं भी कठिनाई हो, तो अरविंद दा वहां पहुंचते अवश्य थे। आगे चलकर उन्हें वि.हि.प. का क्षेत्रीय संगठन मंत्री तथा फिर 2002 में केन्द्रीय सहमंत्री बनाया गया। सेवा कार्य और परावर्तन में उनकी विशेष रुचि थी।


अत्यधिक परिश्रम और खानपान की अव्यवस्था के कारण उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। 2005 में उनके पित्ताशय में पथरी की शल्य चिकित्सा हुई। इसके बाद उनका प्रवास प्रायः बंद हो गया। मार्च 2009 में उनका ‘सहस्रचंद्र दर्शन’ कार्यक्रम मनाया गया। कार्यकर्ताओं ने इसके लिए साढ़े तीन लाख परिवारों से सम्पर्क किया। पूर्वांचल के सब क्षेत्रों से हजारों कार्यकर्ता आये। 


जुलाई में तेज बुखार के कारण उन्हें चिकित्सालय भेजा गया। चिकित्सकों ने मस्तिष्क की जांच कर बताया कि वहां की कोशिकाएं क्रमशः मर रही हैं। दोनों फेफड़ों में पानी भरने से संक्रमण हो गया था। धीरे-धीरे नाड़ी की गति भी कम होने लगी। भरपूर प्रयास के बाद भी 26 जुलाई, 2009 को ब्रह्ममुहूर्त में उन्होंने देह त्याग दी। इस प्रकार एक मौन साधक सदा के लिए मौन हो गया।


31 मार्च, संघनिष्ठ नानासाहब भागवत,शिक्षाप्रेमी जयगोपाल गाडोदिया

 31 मार्च/पुण्य-तिथि      


संघनिष्ठ नानासाहब भागवत


श्री नारायण पांडुरंग (नानासाहब) भागवत मूलतः महाराष्ट्र में चंद्रपुर जिले के वीरमाल गांव के निवासी थे। वहां पर ही उनका जन्म 1884 में हुआ था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वे अपने मामा जी के घर नागपुर काटोल पढ़ने आ गये। आगे चलकर उन्होंने प्रयाग (उ.प्र.) से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा चंद्रपुर के पास वरोरा में कारोबार करने लगे। इसी दौरान उनका संपर्क संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार से हुआ।


वरोरा उन दिनों कांग्रेस की गतिविधियों का एक बड़ा केन्द्र था। नानासाहब कांग्रेस की प्रांतीय समिति के सदस्य थे। 1930 में सारा परिवार चंद्रपुर आकर रहने लगा। चंद्रपुर के जिला न्यायालय में वकालत करते हुए नानासाहब की घनिष्ठता तिलक जी के अनुयायी बलवंतराव देशमुख से हुई। अतः उनके मन में भी देश, धर्म और संस्कृति के प्रति अतीव निष्ठा जाग्रत हो गयी। 


जब डा. हेडगेवार ने चंद्रपुर में शाखा प्रारम्भ की, तब तक नानासाहब की ख्याति एक अच्छे वकील के रूप में हो चुकी थी; पर डा. जी से भेंट होते ही अपने सब बड़प्पन छोड़कर नानासाहब उनके अनुयायी बन गये। 


नानासाहब बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते थे। लोग उनके पास मुकदमे लेकर आते थे। यदि उस मुकदमे में जीतने की संभावना नहीं दिखाई देती थी, तो नाना साहब साफ बता देते थे। फिर भी उनके प्रति विश्वास अत्यधिक था। अतः लोग यह कहकर उन्हें ही कागज सौंपते थे कि यदि हमारे भाग्य में पराजय ही है, तो वही स्वीकार कर लेंगे; पर हमारा मुकदमा आप ही लड़ेंगे।


संघ में सक्रिय होने के बावजूद चंद्रपुर के मुसलमान तथा ईसाइयों का उन पर बहुत विश्वास था। वे अपने मुकदमे उन्हें ही देते थे। उनके घर से नानासाहब के लिए मिठाई के डिब्बे भी आते थे; पर ऐसे शीघ्रकोपी स्वभाव के नानासाहब संघ की शाखा में बाल और शिशु स्वयंसेवकों से बहुत प्यार से बोलते थे। डा. हेडगेवार के साथ उनका लगातार संपर्क बना रहता था। उनकी ही तरह नानासाहब ने भी अपने स्वभाव में काफी परिवर्तन किया।


एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी वे घर-घर से बालकों को बुलाकर शाखा में लाते थे। उनके बनाये हुए अनेक स्वयंसेवक आगे चलकर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता बने। 1935 में उन्हें चंद्रपुर का संघचालक बनाया गया। संघ के सब प्रचारक तथा कार्यकर्ता उनके घर पर आते थे। संघ की बैठकें भी वहीं होती थीं। 1950 से 60 तक वहां संघ का कार्यालय भी नहीं था। ऐसे में पूरे जिले से आने वाले कार्यकर्ता उनके घर पर ही ठहरते और भोजन आदि करते थे। 


नानासाहब ने संघ के संस्कार अपने घर में भी प्रतिरोपित किये। उनके एक पुत्र मधुकरराव गुजरात में प्रचारक थे। इस दौरान उनके दूसरे पुत्र मनोहर का देहांत हो गया। सबकी इच्छा थी कि ऐसे में मधुकरराव को घर वापस आ जाना चाहिए; पर नानासाहब ने इसके लिए कोई आग्रह नहीं किया। 


मधुकरराव इसके बाद भी अनेक वर्ष प्रचारक रहे और गुजरात के प्रांत प्रचारक बने। युवावस्था का काफी समय प्रचारक के रूप में बिताकर वे घर आये और गृहस्थ जीवन स्वीकार किया। घर पर रहते हुए भी उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। उनके पुत्र श्री मोहन भागवत आजकल हमारे सरसंघचालक हैं।


नानासाहब ने आजीवन संघ कार्य किया। इसके साथ ही अपने पुत्र एवं पौत्र को भी इसकी प्रेरणा दी। ऐसे श्रेष्ठ एवं आदर्श गृहस्थ कार्यकर्ता नारायण पांडुरंग भागवत का 31 मार्च, 1971 को देहांत हुआ। 


(संदर्भ : साप्ताहिक विवेक, मुंबई द्वारा प्रकाशित संघ गंगोत्री)

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31 मार्च/जन्म-दिवस      


शिक्षाप्रेमी जयगोपाल गाडोदिया


अभाव और कठिनाइयों में अपने जीवन का प्रारम्भ करने वाले जयगोपाल गाडोदिया का जन्म 31 मार्च, 1931 को सुजानगढ़ (जिला चुरू, राजस्थान) में हुआ था। गरीबी के कारण उन्हें विद्यालय में पढ़ने का अवसर नहीं मिला। इतना ही नहीं, तो प्रायः उन्हें दोनों समय पेट भर भोजन भी नहीं मिलता था। 


इन अभावों से उनके मन में समाज के निर्धन वर्ग के प्रति संवेदना का जन्म हुआ। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उनके मन पर बहुत प्रभाव था। आगे चलकर जब अपने परिश्रम और प्रभु की कृपा से उन्होंने धन कमाया, तो उसे इन अभावग्रस्त बच्चों की शिक्षा में ही लगा दिया।


दस साल की अवस्था में वे पैसा कमाने के लिए कोलकाता आ गये। यहां काम करते हुए उन्होंने कुछ लिखना व पढ़ना सीखा। काम के लिए देश भर में घूमने से उन्हें निर्धन और निर्बल वर्ग की जमीनी सच्चाइयों का पता लगा। अतः उन्होंने ‘जयगोपाल गाडोदिया फाउंडेशन’ की स्थापना की तथा उसके माध्यम से चेन्नई में रहकर अनेक सामाजिक गतिविधियों का संचालन करने लगे।


उनका विचार था कि बच्चा चाहे निर्धन हो या धनवान, उसमें कुछ प्रतिभा अवश्य होती है, जिसे उचित प्रशिक्षण से संवारा और बढ़ाया जा सकता है। अतः उन्होंने कॉमर्स, अर्थशास्त्र, गणित, खेल, युवा वैज्ञानिक, संस्कृति, संगीत, खगोल विज्ञान, फोटो पत्रकारिता, शतरंज जैसे विषयों के लिए अकादमियों की स्थापना की। इनमें बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता था। 


1973 में उन्होंने ‘जयगोपाल गाडोदिया विवेकानंद विद्यालय न्यास’ की स्थापना कर चेन्नई, बंगलौर तथा मैसूर के आसपास 23 विद्यालय प्रारम्भ किये। इनमें 60,000 छात्रों को निःशुल्क शिक्षा व पुस्तकें दी जाती हैं। प्रतिवर्ष वे 18 लाख रु. की छात्रवृत्ति भी वितरित करते थे। अतः उनके सम्पर्क में आये किसी छात्र को धनाभाव के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की नौबत नहीं आती थी। लड़कियों की शिक्षा पर भी उनका विशेष ध्यान रहता था।


श्री गाडोदिया का प्रत्येक विद्यालय आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण रहता है। उन्होंने संस्थान के प्रत्येक छात्र के लिए एक निजी कम्प्यूटर की व्यवस्था की। हर विद्यालय में एक ‘बुक बैंक’ रहता है, जिससे किसी छात्र को पुस्तक का अभाव न हो। इस बैंक से 35,000 छात्र लाभ उठाते हैं।


शिक्षा के क्षेत्र में उनकी सफल योजनाओं को देखकर तमिलनाडु सरकार ने अपने कुछ विद्यालयों की दशा सुधारने के लिए उन्हें आमन्त्रित किया। श्री गाडोदिया ने इसे सहर्ष स्वीकार कर 11 विद्यालयों का कायाकल्प किया। विशेष बात यह भी थी कि ये सब विद्यालय बालिकाओं के थे। 


श्री गाडोदिया ने बालिका शिक्षा के साथ ही विधवा व बेसहारा महिलाओं के उत्थान के भी अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये। उनके कुछ केन्द्रों पर गूंगे, बहरे तथा शारीरिक रूप से अशक्त युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता था। सैनिकों के प्रति आदरभाव के कारण उन्होंने करगिल युद्ध के समय प्रधानमंत्री द्वारा गठित सहायता कोष में भरपूर योगदान दिया।


उनके उल्लेखनीय काम के लिए उन्हें अनेक मान-सम्मानों से अलंकृत किया गया। वे शिक्षा के दान को सबसे बड़ा दान मानते थे। अतः उन्होंने अपने परिश्रम और योग्यता से अर्जित धन को इसी क्षेत्र में खर्च किया। इसके साथ ही वे अपने धनी मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित करते रहते थे। 


श्री गाडोदिया निःसंतान थे। 1986 में अपनी पत्नी श्रीमती सीतादेवी के देहांत के बाद उन्होंने सम्पूर्ण सम्पत्ति अपने न्यास को सौंप दी, जिससे उनके देहांत के बाद भी इन योजनाओं को धन की कमी न हो। ऐसे समाजसेवी व शिक्षाप्रेमी का दो अपै्रल, 2010 को चेन्नई में ही निधन हुआ।


(संदर्भ : पांचजन्य 25.4.2010) )       

30 मार्च,अप्पा जी जोशी,श्यामजी कृष्ण वर्मा, बौद्धिक योद्धा देवेन्द्र स्वरूपजी

 30 मार्च/जन्म-दिवस


आदर्श कार्यकर्ता अप्पा जी जोशी



एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने कार्यकर्ता  बैठक में कहा कि क्या केवल संघकार्य किसी के जीवन का ध्येय नहीं बन सकता ? यह सुनकर हरिकृष्ण जोशी ने उन 56 संस्थाओं से त्यागपत्र दे दिया, जिनसे वे सम्बद्ध थे। यही बाद में ‘अप्पा जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।


30 मार्च, 1897 को महाराष्ट्र के वर्धा में जन्मे अप्पा जी ने क्रांतिकारियों तथा कांग्रेस के साथ रहकर काम किया। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष जमनालाल बजाज के वे निकट सहयोगी थे; पर डा. हेडगेवार के सम्पर्क में आने पर उन्होंने बाकी सबको छोड़ दिया। डा. हेडगेवार, श्री गुरुजी और बालासाहब देवरस, इन तीनों सरसंघचालकों के दायित्वग्रहण के समय वे उपस्थित थे।


उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता। उनके पिता एक वकील के पास मुंशी थे। उनके 12 वर्ष की अवस्था में पहुँचते तक पिताजी, चाचाजी और तीन भाई दिवंगत हो गये। ऐसे में बड़ी कठिनाई से उन्होंने कक्षा दस तक पढ़ाई की। 1905 में बंग-भंग आन्दोलन से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता समर में कूद गये। 1906 में लोकमान्य तिलक के दर्शन हेतु जब वे विद्यालय छोड़कर रेलवे स्टेशन गये, तो अगले दिन अध्यापक ने उन्हें बहुत मारा; पर इससे उनके अन्तःकरण में देशप्रेम की ज्वाला और धधक उठी।


14 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया और वे भी एक वकील के पास मुंशी बन गये; पर सामाजिक कार्यों के प्रति उनकी सक्रियता बनी रही। वे नियमित अखाड़े में जाते थे। वहीं उनका सम्पर्क संघ के स्वयंसेवक श्री अण्णा सोहनी और उनके माध्यम से डा. हेडगेवार से हुआ। डा. जी बिना किसी को बताये देश भर में क्रान्तिकारियों को विभिन्न प्रकार की सहायता सामग्री भेजते थे, उसमें अप्पा जी उनके विश्वस्त सहयोगी बन गये। कई बार तो उन्होंने स्त्री वेष धारणकर यह कार्य किया।


दिन-रात कांग्रेस के लिए काम करने से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी। यह देखकर कांग्रेस के कोषाध्यक्ष जमनालाल बजाज ने इन्हें कांग्रेस के कोष से वेतन देना चाहा; पर इन्होंने मना कर दिया। 1947 के बाद जहाँ अन्य कांग्रेसियों ने ताम्रपत्र और पेंशन ली, वहीं अप्पा जी ने यह स्वीकार नहीं किया। आपातकाल में वे मीसा में बन्द रहे; पर उससे भी उन्होंने कुछ लाभ नहीं लिया। वे देशसेवा की कीमत वसूलने को पाप मानते थे।


एक बार कांग्रेस के काम से अप्पा जी नागपुर आये। तब डा. हेडगेवार के घर में ही बैठक के रूप में शाखा लगती थी। अप्पा जी ने उसे देखा और वापस आकर 18 फरवरी, 1926 को वर्धा में शाखा प्रारम्भ कर दी। यह नागपुर के बाहर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा थी। डा. हेडगेवार ने स्वयं उन्हें वर्धा जिला संघचालक का दायित्व दिया था।


नवम्बर, 1929 में नागपुर में प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक में सबसे परामर्श कर अप्पा जी ने निर्णय लिया कि डा. हेडगेवार संघ के सरसंघचालक होने चाहिए। 10 नवम्बर शाम को जब सब संघस्थान पर आये, तो अप्पा जी ने सबको दक्ष देकर ‘सरसंघचालक प्रणाम एक-दो-तीन’ की आज्ञा दी। सबके साथ डा. जी ने भी प्रणाम किया। इसके बाद अप्पा जी ने घोषित किया कि आज से डा. जी सरसंघचालक बन गये हैं।


1934 में गांधी जी को वर्धा के संघ शिविर में अप्पा जी ही लाये थे। 1946 में वे सरकार्यवाह बने। अन्त समय तक सक्रिय रहते हुए 21 दिसम्बर, 1979 को अप्पा जी जोशी का देहान्त हुआ।

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30 मार्च/पुण्य-तिथि      


सागरपार भारतीय क्रान्ति के दूत श्यामजी कृष्ण वर्मा


भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिन महापुरुषों ने विदेश में रहकर क्रान्ति की मशाल जलाये रखी, उनमें श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रणी है। चार अक्तूबर, 1857 को कच्छ (गुजरात) के मांडवी नगर में जन्मे श्यामजी पढ़ने में बहुत तेज थे।


इनके पिता श्रीकृष्ण वर्मा की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी; पर मुम्बई के सेठ मथुरादास ने इन्हें छात्रवृत्ति देकर विल्सन हाईस्कूल में भर्ती करा दिया। वहाँ वे नियमित अध्ययन के साथ पंडित विश्वनाथ शास्त्री की वेदशाला में संस्कृत का अध्ययन भी करने लगे।


मुम्बई में एक बार महर्षि दयानन्द सरस्वती आये। उनके विचारों से प्रभावित होकर श्यामजी ने भारत में संस्कृत भाषा एवं वैदिक विचारों के प्रचार का संकल्प लिया। ब्रिटिश विद्वान प्रोफेसर विलियम्स उन दिनों संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोष बना रहे थे। श्यामजी ने उनकी बहुत सहायता की। इससे प्रभावित होकर प्रोफेसर विलियम्स ने उन्हें ब्रिटेन आने का निमन्त्रण दिया। वहाँ श्यामजी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के अध्यापक नियुक्त हुए; पर स्वतन्त्र रूप से उन्होंने वेदों का प्रचार भी जारी रखा।


कुछ समय बाद वे भारत लौट आये। उन्होंने मुम्बई में वकालत की तथा रतलाम, उदयपुर व जूनागढ़ राज्यों में काम किया। वे भारत की गुलामी से बहुत दुखी थे। लोकमान्य तिलक ने उन्हें विदेशों में स्वतन्त्रता हेतु काम करने का परामर्श दिया। इंग्लैण्ड जाकर उन्होंने भारतीय छात्रों के लिए एक मकान खरीदकर उसका नाम इंडिया हाउस (भारत भवन) रखा। शीघ्र ही यह भवन क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गया। उन्होंने राणा प्रताप और शिवाजी के नाम पर छात्रवृत्तियाँ प्रारम्भ कीं।


1857 के स्वातंत्र्य समर का अर्धशताब्दी उत्सव ‘भारत भवन’ में धूमधाम से मनाया गया। उन्होंने ‘इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक समाचार पत्र भी निकाला। उसके पहले अंक में उन्होंने लिखा - मनुष्य की स्वतन्त्रता सबसे बड़ी बात है, बाकी सब बाद में। उनके विचारों से प्रभावित होकर वीर सावरकर, सरदार सिंह राणा और मादाम भीकाजी कामा उनके साथ सक्रिय हो गये। लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल आदि भी वहाँ आने लगे।


विजयादशमी पर्व पर ‘भारत भवन’ मंे वीर सावरकर और गांधी जी दोनों ही उपस्थित हुए। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के अपराधी माइकेल ओ डायर का वध करने वाले ऊधमसिंह के प्रेरणास्रोत श्यामजी ही थे। अब वे शासन की निगाहों में आ गये, अतः वे पेरिस चले गये। वहाँ उन्होंने ‘तलवार’ नामक अखबार निकाला तथा छात्रों के लिए ‘धींगरा छात्रवृत्ति’ प्रारम्भ की।


भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए शस्त्रों का प्रबन्ध मुख्यतः वे ही करते थे। भारत में होने वाले बमकांडों के तार उनसे ही जुड़े थे। अतः पेरिस की पुलिस भी उनके पीछे पड़ गयी। उनके अनेक साथी पकड़े गये। उन पर भी ब्रिटेन में राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाने लगा। अतः वे जेनेवा चले गये। 30 मार्च, 1930 को श्यामजी ने और 22 अगस्त, 1933 को उनकी धर्मपत्नी भानुमति ने मातृभूमि से बहुत दूर जेनेवा में ही अन्तिम साँस ली। 


श्यामजी की इच्छा थी कि स्वतन्त्र होने के बाद ही उनकी अस्थियाँ भारत में लायी जायें। उनकी यह इच्छा 73 वर्ष तक अपूर्ण रही। अगस्त, 2003 में गुजरात के मुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी उनके अस्थिकलश लेकर भारत आये।

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30 मार्च/जन्म-दिवस

बौद्धिक योद्धा देवेन्द्र स्वरूपजी


बौद्धिक जगत में संघ और हिन्दुत्व के विचार को प्रखरता से रखने वाले देवेन्द्र स्वरूपजी का जन्म 30 मार्च, 1926 को उ.प्र. में मुरादाबाद के पास कांठ नामक कस्बे में हुआ था। कांठ और चंदौसी के बाद उन्होंने काशी हिन्दू वि.वि. से बी.एस-सी. किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागी होने के कारण वे दो बार विद्यालय से निष्कासित किये गये। 1947 से 1960 तक वे संघ के प्रचारक तथा 1948 के प्रतिबंध काल में छह माह जेल में रहे।


बौद्धिक प्राणी होने के कारण संघ की योजना से 1958 में वे लखनऊ से प्रकाशित साप्ताहिक पांचजन्य के संपादक बने। लखनऊ वि.वि. से इतिहास में एम.ए. कर 1964 में वे डी.ए.वी (पी.जी) काॅलिज, दिल्ली में इतिहास के प्राध्यापक हो गये। 1966-67 में वे अ.भा.विद्यार्थी परिषद के प्रदेश अध्यक्ष तथा 1968 से 72 तक अध्यापक के साथ पांचजन्य के अवैतनिक संपादक भी रहे। आपातकाल में वे एक बार फिर जेल गये। 1980 से 94 तक वे दीनदयाल शोध संस्थान के निदेशक तथा फिर उपाध्यक्ष रहे। वहां से हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘मंथन’ का भी उन्होंने संपादन किया। इतिहासज्ञ होने के नाते वे भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से भी जुड़े रहे।


संघ साहित्य के निर्माण में देवेन्द्रजी ने बहुत समय लगाया। हमारे रज्जू भैया, राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख, सभ्यताओं के संघर्ष में भारत कहां, अखंड भारत, गांधीजी: हिन्द स्वराज से नेहरू तक, संस्कृति एक: नाम-रूप अनेक, अयोध्या का सच, संघ: बीज से वृक्ष, संघ: राजनीति और मीडिया, जातिविहीन समाज का सपना, राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का इतिहास, भारतीय संविधान की औपनिवेशिक पृष्ठभूमि आदि उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। इसके साथ ही सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं तथा स्मारिकाओं में प्रकाशित हजारों लेख तो हैं ही।


राममंदिर आंदोलन के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वामपंथी खड़े होते थे। उनके सामने तथ्य और तर्कों से लैस देवेन्द्रजी की टीम होती थी। अतः हर बार विपक्षी भाग खड़े होते थे। शासकीय वार्ताओं से लेकर न्यायालय तक में मंदिर पक्ष को ऐतिहासिक तथ्य उन्होंने ही उपलब्ध कराये। 1991 में अध्यापन कार्य से सेवानिवृत्त होकर वे पूरी तरह लिखने-पढ़ने में ही लग गये।


देवेन्द्रजी ने आजीवन सदा सत्य ही लिखा। इसीलिए पांचजन्य में पाठक सबसे पहले उनका ‘मंथन’ नामक स्तम्भ ही पढ़ते थे। सुदर्शनजी ने 1990 में बुद्धिजीवियों को एकत्र करने का ‘प्रज्ञा प्रवाह’ नामक कार्य शुरू किया। अब यह काम पूरे देश में चल रहा है। दिल्ली में देवेन्द्रजी इसके सूत्रधार थे। सीताराम गोयल, रामस्वरूपजी तथा गिरिलाल जैन आदि इसी से संपर्क में आये।


बौद्धिक योद्धा होते हुए भी सादगी एवं विनम्रता उनकी बड़ी विशेषता थी। वे पद, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान से सदा दूर रहते थे। लखनऊ में वे पहला ‘वचनेश त्रिपाठी स्मृति व्याख्यान’ देने आये। वहां वे इस बात से नाराज हुए कि उन्हें संघ कार्यालय की बजाय होटल में क्यों ठहराया गया ? आयोजकों के बहुत आग्रह पर उन्होंने केवल मार्गव्यय स्वीकार किया, मानदेय नहीं।


दिल्ली में वे मयूर विहार के सहयोग अपार्टमेंट में सबसे ऊंची मंजिल वाले घर में रहते थे। वहां छत पर उनके निजी पुस्तकालय में हजारों पुस्तकें थीं। किसी भी नयी महत्वपूर्ण पुस्तक के आते ही वे उसे खरीद लेते थे। उनका हर कमरा, यहां तक की सीढि़यां भी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं से भरी रहती थी। ताजा खबरों के लिए वे प्रतिदिन 12-15 अखबार भी पढ़ते थे।


वयोवृद्ध होने पर वे अपने बेटे के पास भिवाड़ी (राजस्थान) चले गये। मकर संक्रांति (14 जनवरी, 2019) को दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका निधन हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी देहदान कर दी गयी। शासन ने उनके बौद्धिक अवदान के लिए उन्हें मृत्योपरांत ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया।

 (संदर्भ : पांचजन्य 27.1.19, साहित्य अमृत अपै्रल 2019)

रविवार, 28 मार्च 2021

29 मार्च/पुण्य-तिथि, गुरु अंगददेव

 29 मार्च/पुण्य-तिथि


सेवा और समर्पण के साधक गुरु अंगददेव


सिख पन्थ के दूसरे गुरु अंगददेव का असली नाम ‘लहणा’ था। उनकी वाणी में जीवों पर दया, अहंकार का त्याग, मनुष्य मात्र से प्रेम, रोटी की चिन्ता छोड़कर परमात्मा की सुध लेने की बात कही गयी है। वे उन सब परीक्षाओं में सफल रहे, जिनमें गुरु नानक के पुत्र और अन्य दावेदार विफल ह¨ गये थे।


गुरु नानक ने उनकी पहली परीक्षा कीचड़ से लथपथ घास की गठरी सिर पर रखवा कर ली। फिर गुरु जी ने उन्हें धर्मशाला से मरी हुई चुहिया उठाकर बाहर फेंकने को कहा। उस समय इस प्रकार का काम शूद्रों का माना जाता था। तीसरी बार मैले के ढेर में से कटोरा निकालने को कहा। गुरु नानक के दोनों पुत्र इस कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हुए। 


इसी तरह गुरु जी ने लहणा को सर्दी की रात में धर्मशाला की टूटी दीवार बनाने को कहा। वर्षा और तेज हवा के बावजूद उन्होंने दीवार बना दी। गुरु जी ने एक बार उन्हें रात को कपड़े धोने को कहा, तो घोर सर्दी में रावी नदी पर जाकर उन्होंने कपड़े धो डाले। एक बार उन्हें शमशान में मुर्दा खाने को कहा, तो वे तैयार हो गये। इस पर गुरु जी ने उन्हें गले लगा कर कहा - आज से तुम मेरे अंग हुए। तभी से उनका नाम अंगददेव हो गया। 


गुरु अंगददेव का जन्म मुक्तसर, पंजाब में ‘मत्ते दी सराँ’ नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम फेरुमल और माता का दयाकौरि था। फेरुमल फारसी और बही खातों के विद्वान थे। कुछ वर्ष फिरोजपुर के हाकिम के पास नौकरी के बाद उन्होंने अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया। 


15 वर्ष की अवस्था में लहणा का विवाह संघर (खडूर) के साहूकार देवीचन्द की पुत्री बीबी खीबी से हुआ। उनके परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। बाबा फेरुमल हर वर्ष जत्था लेकर वैष्णो देवी जाते थे। कई बार लहणा भी उनके साथ गये। 


सन् 1526 में पिता की मृत्यु के बाद दुकान का भार पूरी तरह लहणा पर आ गया। अध्यात्म के प्रति रुचि होने के कारण एक दिन लहणा ने भाई जोधा के मुख से गुरु नानक की वाणी सुनी। वे इससे बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में गुरु नानक के दर्शन की प्यास जाग गयी। वे करतारपुर जाकर गुरु जी से मिले। इस भेंट से उनका जीवन बदल गया। 


सात वर्ष तक गुरु नानक के साथ रहने के बाद उन्होंने गुरु गद्दी सँभाली। वे इस पर सितम्बर, 1539 से मार्च, 1552 तक आसीन रहे। उन्हांेने खडूर साहिब क¨ धर्म प्रचार का केन्द्र बनाया। सिख पन्थ के इतिहास में गुरु अंगददेव का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती गुरु नानक की वाणी और उनकी जीवनी को लिखा। 


उन दिनों हिन्दुओं में ऊँच-नीच, छुआछूत और जाति-पाँति के भेद अत्यधिक थे। गुरु अंगददेव ने लंगर की प्रथा चलाई, जिसमें सब एक साथ पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। पश्चिम से होने वाले मुस्लिम आक्रमणों का पहला वार पंजाब को ही झेलना पड़ता था। इनसे टक्कर लेने के लिए गुरु अंगददेव ने गाँव-गाँव में अखाड़े खोलकर युवकों की टोलियाँ तैयार कीं। उन्होंने गुरुमुखी लिपि का निर्माण कर पंजाबी भाषा को समृद्ध किया। 


बाबा अमरदास को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी बनाया, जिन्होंने उनकी वाणी को भी श्री गुरु ग्रन्थ साहब के लिए लिपिबद्ध किया। सेवा और समर्पण के अनुपम साधक गुरु अंगददेव 29 मार्च, 1552 को इस दुनिया से प्रयाण कर गये।

29 मार्च/जन्म-दिवस,नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर भवानी प्रसाद मिश्र

 29 मार्च/जन्म-दिवस


नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर भवानी प्रसाद मिश्र


साहित्य क्षेत्र में कविता सबसे प्राचीन एवं लोकप्रिय विधा है, चूँकि इसमें कम शब्दों में बड़ी बात कही जा सकती है। काव्य को अनुशासित रखने हेतु व्याकरण के आचार्यों ने छन्द शास्त्र का विधान किया है; पर छन्द की बजाय भावना को प्रमुख मानने वाले अनेक कवि इस छन्दानुशासन से बाहर जाकर कविताएँ लिखते हैं। इस विधा को ‘नयी कविता’ कहा जाता है।


नयी कविता के क्षेत्र में ‘भवानी भाई’ के नाम से प्रसिद्ध श्री भवानी प्रसाद मिश्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 29 मार्च, 1913 को ग्राम टिकोरेया (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) में हुआ था। 


काव्य रचना की ओर उनका रुझान बचपन से था। छात्र जीवन में ही उनकी कविताएं पंडित ईश्वरी प्रसाद वर्मा की पत्रिका ‘हिन्दूपंच’ तथा श्री माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रिका ‘कर्मवीर’ में छपने लगी थीं। 1930 से तो वे स्थानीय मंचों पर काव्य पाठ करने लगे; पर उन्हें प्रसिद्धि और उनकी कविता को धार जबलपुर में आकर मिली।


1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय वे पौने तीन साल जेल में रहे। वहां उनका सम्पर्क मध्य प्रदेश के स्वाधीनता सेनानियों से हुआ। जेल से छूटकर 1946 में वे वर्धा के महिलाश्रम में शिक्षक हो गये। इसके बाद कुछ समय उन्होंने दक्षिण में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार सभा’ का कार्य किया। फिर वे भाग्यनगर (हैदराबाद) से प्रकाशित प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ में सम्पादक हो गये। वैचारिक स्वतंत्रता के समर्थक होने के नाते 1975 में लगे आपातकाल का उन्होंने प्रतिदिन तीन कविताएं लिखकर विरोध किया। 


काव्य और लेखन में प्रसिद्ध होने के बाद उनका रुझान फिल्म लेखन की ओर हुआ; क्योंकि इससे बहुत जल्दी धन और प्रसिद्धि मिलती है। तीन वर्ष हैदराबाद में रहने के बाद वे मुम्बई और फिर चेन्नई गये, जहाँ उन्होंने फिल्मों में संवाद लेखन का कार्य किया; पर इसमें उन्हें बहुत यश नहीं मिला, अतः वे दिल्ली में आकाशवाणी से जुड़ गये। 1975 से पूर्व हुए आन्दोलन के समय उन्होंने बीमार होते हुए भी जयप्रकाश जी की कई सभाओं में भाग लिया।


दूसरे ‘तार सप्तक’ में प्रकाशित भवानी भाई के काव्य में शब्दों की सरलता और प्रवाह का अद्भुत सामंजस्य मिलता है। उन्होंने कई नये व युवा कवियों को आगे भी बढ़ाया। उनकी एक प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ हैं -


जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख

और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।।


नर्मदा, विन्ध्याचल और सतपुड़ा से उन्हें बहुत स्नेह था। इस कारण प्रकृति की छाया उनकी रचनाओं में सर्वत्र दिखायी देती है। उन्होंने 12 काव्य संग्रहों का सृजन किया; जिसमें गीत फरोश, चकित है दुख, अंधेरी कविताएँ, गांधी पंचशती, खुशबू के शिलालेख, परिवर्तन के लिए, त्रिकाल सन्ध्या, अनाम तुम आते हो...आदि प्रमुख हैं। उन्होंने अनेक निबन्ध, संस्मरण तथा बच्चों के लिए तुकों के खेल जैसी पुस्तकें भी लिखीं। 


‘बुनी हुई रस्सी’ पर उन्हें 1972 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उ.प्र. हिन्दी संस्थान तथा मध्य प्रदेश शासन ने भी उन्हें शिखर सम्मानों से विभूषित किया।


पद्मश्री से सम्मानित भवानी भाई की हृदय रोग से पीडि़त होने के बाद भी सक्रियता कम नहीं हुई। कई वर्ष तक वे ‘पेसमेकर’ के सहारे काम चलाते रहे; पर 20 फरवरी, 1985 को अपने गृहनगर नरसिंहपुर में अपने पैतृक घर में ही भीषण हृदयाघात से उनका देहान्त हो गया।

28 मार्च/जन्म-दिवस, सिख पन्थ के सेवक सन्त अतरसिंह

 28 मार्च/जन्म-दिवस


सिख पन्थ के सेवक सन्त अतरसिंह


संत अतरसिंह जी का जन्म 28 मार्च, 1866 को ग्राम चीमा (संगरूर, पंजाब) में हुआ था। इनके पिता श्री करमसिंह तथा माता श्रीमती भोली जी थीं। छोटी अवस्था में वे फटे-पुराने कपड़ों के टुकड़ों की माला बनाकर उससे जप करते रहते थे। लौकिक शिक्षा की बात चलने पर वे कहते कि हमें तो बस सत्य की ही शिक्षा लेनी है। 


घर वालों के आग्रह पर उन्होंने गांव में स्थित निर्मला सम्प्रदाय के डेरे में संत बूटा सिंह से गुरुमुखी की शिक्षा ली। कुछ बड़े होकर वे घर में खेती, पशु चराना आदि कामों में हाथ बंटाने लगे। एक साधु ने इनके पैर में पद्मरेखा देखकर इनके संत बनने की भविष्यवाणी की। 


1883 में वे सेना में भर्ती हो गये। घर से सगाई का पत्र आने पर उन्होंने जवाब दिया कि अकाल पुरुख की ओर से विवाह का आदेश नहीं है। 54 पल्टन में काम करते हुए उन्होंने अमृत छका और फिर निष्ठापूर्वक सिख मर्यादा का पालन करने लगे। वे सूर्योदय से पूर्व कई घंटे जप और ध्यान करते थे। 


पिताजी के देहांत से उनके मन में वैराग्य जागा और वे पैदल ही हुजूर साहिब चल दिये। माया मोह से मुक्ति के लिए सारा धन उन्होंने नदी में फेंक दिया। हुजूर साहिब में दो साल और फिर हरिद्वार और ऋषिकेश के जंगलों में जाकर कठोर साधना की। इसके बाद वे अमृतसर तथा दमदमा साहिब गये। 


इसी प्रकार भ्रमण करते वे अपने गांव पहुंचे। मां के आग्रह पर वे वहीं रुक गये। उन्होंने मां से कहा कि जिस दिन तुम मेरे विवाह की चर्चा करोगी, मैं यहां से चला जाऊंगा। मां ने आश्वासन तो दिया; पर एक बार उन्होंने फिर यह प्रसंग छेड़ दिया। इससे नाराज होकर वे चल दिये और सियालकोट जा पहंुचे। इसके बाद सेना से भी नाम कटवा कर वे सभी ओर से मुक्त हो गये।


इसके बाद कनोहे गांव के जंगल में रहकर उन्होंने साधना की। इस दौरान वहां अनेक चमत्कार हुए, जिससे उनकी ख्याति चहुंओर फैल गयी। वे पंथ, संगत और गुरुघर की सेवा, कीर्तन और अमृत छककर पंथ की मर्यादानुसार चलने पर बहुत जोर देते थे। वे कीर्तन में राग के बदले भाव पर अधिक ध्यान देते थे। उन्होंने 14 लाख लोगों को अमृतपान कराया। 


1901 में उन्होंने मस्तुआणा के जंगल में डेरा डालकर उसे एक महान तीर्थ बना दिया। संत जी ने स्वयं लौकिक शिक्षा नहीं पायी थी; पर उन्होंने वहां पंथ की शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का भी प्रबंध किया। उन्होंने पंजाब में कई शिक्षा संस्थान स्थापित किये, जिससे लाखों छात्र लाभान्वित हो रहे हैं।


1911 में राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित हुई। इस अवसर पर सिख राजाओं ने उनके नेतृत्व और श्री गुरुगं्रथ साहिब की हुजूरी में शाही जुलूस में भाग लिया। जार्ज पंचम के सामने से निकलने पर उन्होंने पद गाया - 


कोउ हरि समान नहीं राजा। 

ऐ भूपति सभ दिवस चार के, झूठे करत नवाजा। 


यह सुनकर जार्ज पंचम भी सम्मानपूर्वक खड़ा हो गया। 1914 में मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पहले विद्यालय की नींव संतजी के हाथ से रखवाई। 


माताजी के अंत समय में उन्होंने माताजी को जीवन और मृत्यु के बारे में उपदेश दिया, इससे उनके कष्टों का शमन हुआ। जब गुरुद्वारों के प्रबंध को लेकर पंथ में भारी विवाद हुआ, तो उन्होंने सबको साथ लेकर चलने पर जोर दिया। 


इसी प्रकार पंथ और संगत की सेवा करते हुए 31 जनवरी, 1927 को अमृत समय में ही उनका शरीर शांत हुआ। उनके विचारों का प्रचार-प्रसार कलगीधर ट्रस्ट, बड़ू साहिब के माध्यम से उनके प्रियजन कर रहे हैं।


(संदर्भ : विश्व सदीवी शांति का मार्ग, कलगीधर ट्रस्ट)

शनिवार, 27 मार्च 2021

27 मार्च/बलिदान-दिवस,क्रान्तिवीर काशीराम

 27 मार्च/बलिदान-दिवस


क्रान्तिवीर काशीराम, जिन्हें डाकू समझा गया


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अनेक ऐसे वीरों ने भी बलिदान दिया, जिन्हें गलत समझा गया। 1981 में ग्राम बड़ी मढ़ौली (अम्बाला, पंजाब) में पण्डित गंगाराम के घर में जन्मे काशीराम ऐसे ही क्रान्तिवीर थे, जिन्हें डाकू समझ कर  अपने देशवासियों ने ही मार डाला। 


शिक्षा पूरी कर काशीराम ने भारत में एक-दो छोटी नौकरियाँ कीं और फिर हांगकांग होते हुए अमरीका जाकर बारूद के कारखाने में काम करने लगे। कुछ दिन बाद उन्होंने एक टापू पर सोने की खान का ठेका लिया और बहुत पैसा कमाया। जब उनके मन में छिपे देशप्रेम ने जोर मारा, तो वे भारत आ गये। वे अपने गाँव थोड़ी देर के लिए ही रुके और फिर यह कहकर चल दिये कि लाहौर नेशनल बैंक में मेरे 30,000 रु. जमा हैं, उन्हें लेने जा रहा हूँ। इसके बाद वे अपने गाँव लौट कर नहीं आये।


विदेश में रहते हुए ही उनका सम्पर्क भारत के क्रान्तिकारियों से हो गया था। पंजाब में जिस दल के साथ वे काम करते थे, उसे हथियार खरीदने के लिए पैसे की आवश्यकता थी। सबने निश्चय किया कि मोगा के सरकारी खजाने को लूटा जाये। योजना बन गयी और 27 नवम्बर, 1914 को दिन के एक बजे 15 नवयुवक तीन इक्कों में सवार होकर फिरोजपुर की ओर चल दिये।


रास्ते मे मिश्रीवाला गाँव पड़ता था। वहाँ थानेदार बशारत अली तथा जेलदार ज्वालसिंह कुछ सिपाहियों के साथ पुलिस अधीक्षक की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब उन्होंने तीन इक्कों पर सवार अलमस्त युवकों को देखा, तो उन्हें रुकने को कहा। जब वे नहीं रुके, तो थानेदार ने एक पुलिसकर्मी को इनके पास भेजा। इस पर वे सब लौटे और बताया कि हम सरकारी कर्मचारी हैं और सेना में रंगरूटों की भर्ती के लिए मोगा जा रहे हैं।


थानेदार ने उन्हें रोक लिया और कहा कि पुलिस अधीक्षक महोदय के आने के बाद ही तुम लोग जा सकते हो। इन नवयुवकों को इतना धैर्य कहाँ था। उनमें से एक जगतसिंह ने पिस्तौल निकाल कर थानेदार और जेलदार दोनों को ढेर कर दिया। बाकी पुलिसकर्मी भागकर गाँव में छिप गये और शोर मचा दिया कि गाँव में डाकुओं ने हमला बोल दिया है।


गोलियों और डाकुओं का शोर सुनकर मिश्रीवाला गाँव के लोग बाहर निकल आये। थोड़ी ही देर में सैकड़ों लोग एकत्र हो गये। उनमें से अधिकांश के पास बन्दूकें, फरसे और भाले जैसे हथियार भी थे। अब तो क्रान्तिवीरों की जान पर बन आयी। उन्होंने भागना ही उचित समझा। छह युवक ‘ओगाकी’ गाँव की ओर भागे और शेष नौ वहीं नहर के आसपास सरकण्डों के पीछे छिप गये।


अब गाँव वाले सरकण्डों के झुण्ड में गोलियाँ चलाने लगे। पुलिस वाले भी उनका साथ दे रहे थे। एक युवक मारा गया। यह देखकर सभी क्रान्तिकारी बाहर आ गये। उन्होंने चिल्लाकर अपनी बात कहनी चाही; पर गाँव वालों की सहायता से पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। फिरोजपुर के सेशन न्यायालय में मुकदमा चला और 13 फरवरी, 1915 के निर्णय के अनुसार सात लोगों को फाँसी का दण्ड दिया गया। वीर काशीराम भी उनमें से एक थे।


उनकी सारी चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। इन सबको तीन समूहों में 25, 26 और 27 मार्च, 1915 को फाँसी दे दी गयी। काशीराम को फाँसी 27 मार्च को हुई। यह उनका दुर्भाग्य था कि उन्हें डाकू समझा गया, जबकि वे आजादी के लिए ही बलिदान हुए थे।

गुरुवार, 25 मार्च 2021

26 मार्च/जन्म-दिवस, साहित्यकार कुबेरनाथ राय

26 मार्च/जन्म-दिवस


मनीषी चिन्तक कुबेरनाथ राय


ललित निबन्ध हिन्दी साहित्य की एक अनुपम विधा है। इसमें किसी विषय को लेखक अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर आगे बढ़ाता है। इन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो पाठक नदी के प्रवाह में बिना प्रयास स्वयमेव बह रहा हो। गद्य को पढ़ते हुए पद्य जैसे आनन्द की अनुभूति होती है। अच्छे ललित निबन्ध को एक बार पढ़ना प्रारम्भ करने के बाद समाप्त किये बिना उठने की इच्छा नहीं होती। हिन्दी साहित्य में अनेक ललित निबन्धकार हुए हैं। इनमें श्री कुबेरनाथ राय का अप्रतिम स्थान है।


श्री कुबेरनाथ का साहित्यिक व्यक्तित्व एक ऐसा विशाल वट वृक्ष है, जिसकी दूर-दूर तक फैली जड़ें भारत के वैष्णव साहित्य, श्रीराम कथा और गांधी चिन्तन से जीवन रस ग्रहण करती हैं। भारतीयता पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर भी उनका चिन्तन सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रेमपूर्ण बन्धन में बाँधने को तत्पर दिखाई देता है। हिन्दी ललित निबन्ध को उन्होंने एक नया आयाम दिया, जिससे पाठक के मन को भी भव्यता प्राप्त होती है।


श्री कुबेरनाथ राय का जन्म 26 मार्च, 1933 को मतसा (गाजीपुर, उत्तर प्रदेश) में एक सुसंस्कृत वैष्णव परिवार में हुआ था। उनके छोटे बाबा पंडित बटुकदेव शर्मा अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान और उच्च कोटि के पत्रकार थे। उनका संकल्प था कि गुलाम भारत में मैं सन्तान उत्पन्न नहीं करूँगा। इसलिए किशोरवस्था में ही उन्होंने घर छोड़ दिया और आजीवन अविवाहित रहकर देशसेवा की। 


उन्होंने देश, तरुण, भारत, प्रताप, लोक संग्रह, प्रणवीर जैसे राष्ट्रव्यापी ख्याति प्राप्त पत्रों का सम्पादन किया। महात्मा गांधी, डा0 राजेन्द्र प्रसाद, गणेश शंकर विद्यार्थी, सहजानन्द सरस्वती, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि से उनके निकट सम्बन्ध थे।


श्री कुबेरनाथ जी पर अपने इन छोटे बाबा के व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी का श्रेष्ठ ज्ञान और राष्ट्रीयता के संस्कार उन्हें छोटे बाबा से ही मिले। कक्षा दस में पढ़ते समय ही उनकी रचनाएँ ‘माधुरी’ और ‘विशाल भारत’ जैसे विख्यात पत्रों में छपने लगी थीं। इनमें छपने के लिए तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यकार भी लालायित रहते थे। स्पष्ट है कि कुबेरनाथ राय के मन में साहित्य का बीज किशोरवस्था में ही पल्लवित और पुष्पित हो चुका था।


प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1958 से 86 तक वे असम के नलबाड़ी कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। 1986 में उनकी नियुक्ति अपने गृह जनपद गाजीपुर में स्वामी सहजानन्द स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राचार्य के पद पर हुई। इसी पद से वे 1995 में सेवानिवृत्त भी हुए।


उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं - प्रिया नीलकण्ठी, रस आखेटक, मेघमादन, निषाद बाँसुरी, विषाद योग, पर्णमुकुट, महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, मन वचन की नौका, किरात नदी में चन्द्रमधु, दृष्टि अभिसार, त्रेता का बृहत साम, कामधेनु मराल आदि। विशेष बात यह है कि श्री कुबेरनाथ ने सदा अंग्रेजी का अध्यापन किया; पर साहित्य द्वारा अपने मन की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को ही श्रेष्ठ माना।


वे भारतीय ज्ञानपीठ के प्रतिष्ठित ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत किये गये। 5 जून, 1996 को हिन्दी के इस रससिद्ध साधक का हृदयगति रुकने से देहान्त हो गया 

26 मार्च, चिपको आन्दोलन और गौरादेवी

26 मार्च

चिपको आन्दोलन और गौरादेवी 


आज पूरी दुनिया लगातार बढ़ रही वैश्विक गर्मी से चिन्तित है। पर्यावरण असंतुलन, कट रहे पेड़, बढ़ रहे सीमेंट और कंक्रीट के जंगल, बढ़ते वाहन, ए.सी, फ्रिज, सिकुड़ते ग्लेशियर तथा भोगवादी पश्चिमी जीवन शैली इसका प्रमुख कारण है। 


हरे पेड़ों को काटने के विरोध में सबसे पहला आंदोलन पांच सितम्बर, 1730 में अलवर (राजस्थान) में इमरती देवी के नेतृत्व में हुआ था, जिसमें 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया था। इसी प्रकार 26 मार्च, 1974 को चमोली गढ़वाल के जंगलों में भी ‘चिपको आंदोलन’ हुआ, जिसका नेतृत्व ग्राम रैणी की एक वीरमाता गौरादेवी ने किया था।


गौरादेवी का जन्म 1925 में ग्राम लाता (जोशीमठ, उत्तरांचल) में हुआ था। विद्यालयीन शिक्षा से विहीन गौरा का विवाह 12 वर्ष की अवस्था में ग्राम रैणी के मेहरबान सिंह से हुआ। 19 वर्ष की अवस्था में उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई और 22 वर्ष में वह विधवा भी हो गयी। गौरा ने इसे विधि का विधान मान लिया। 


पहाड़ पर महिलाओं का जीवन बहुत कठिन होता है। सबका भोजन बनाना, बच्चों, वृद्धों और पशुओं की देखभाल, कपड़े धोना, पानी भरना और जंगल से पशुओं के लिए घास व रसोई के लिए ईंधन लाना उनका नित्य का काम है। इसमें गौरादेवी ने स्वयं को व्यस्त कर लिया।


1973 में शासन ने जंगलों को काटकर अकूत राजस्व बटोरने की नीति बनाई। जंगल कटने का सर्वाधिक असर पहाड़ की महिलाओं पर पड़ा। उनके लिए घास और लकड़ी की कमी होने लगी। हिंसक पशु गांव में आने लगे। धरती खिसकने और धंसने लगी। वर्षा कम हो गयी।हिमानियों के सिकुड़ने से गर्मी बढ़ने लगी और इसका वहां की फसल पर बुरा प्रभाव पड़ा। लखनऊ और दिल्ली में बैठे निर्मम शासकों को इन सबसे क्या लेना था, उन्हें तो प्रकृति द्वारा प्रदत्त हरे-भरे वन अपने लिए सोने की खान लग रहे थे।


गांव के महिला मंगल दल की अध्यक्ष गौरादेवी का मन इससे उद्वेलित हो रहा था। वह महिलाओं से इसकी चर्चा करती थी। 26 मार्च, 1974 को गौरा ने देखा कि मजदूर बड़े-बड़े आरे लेकर ऋषिगंगा के पास देवदार के जंगल काटने जा रहे थे। उस दिन गांव के सब पुरुष किसी काम से जिला केन्द्र चमोली गये थे। सारी जिम्मेदारी महिलाओं पर ही थी। अतः गौरादेवी ने शोर मचाकर गांव की अन्य महिलाओं को भी बुला लिया। सब महिलाएं पेड़ों से लिपट गयीं। उन्होंने ठेकेदार को बता दिया कि उनके जीवित रहते जंगल नहीं कटेगा।


ठेकेदार ने महिलाओं को समझाने और फिर बंदूक से डराने का प्रयास किया; पर गौरादेवी ने साफ कह दिया कि कुल्हाड़ी का पहला प्रहार उसके शरीर पर होगा, पेड़ पर नहीं। ठेकेदार डर कर पीछे हट गया। यह घटना ही ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। कुछ ही दिनों में यह आग पूरे पहाड़ में फैल गयी। आगे चलकर चंडीप्रसाद भट्ट तथा सुंदरलाल बहुगुणा जैसे समाजसेवियों के जुड़ने से यह आंदोलन विश्व भर में प्रसिद्ध हो गया। 


चार जुलाई, 1991 को इस आंदोलन की प्रणेता गौरादेवी का देहांत हो गया। यद्यपि जंगलों का कटान अब भी जारी है। नदियों पर बन रहे दानवाकार बांध और विद्युत योजनाओं से पहाड़ और वहां के निवासियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। गंगा-यमुना जैसी नदियां भी सुरक्षित नहीं हैं; पर रैणी के जंगल अपेक्षाकृत आज भी हरे और जीवंत हैं। सबको लगता है कि वीरमाता गौरादेवी आज भी अशरीरी रूप में अपने गांव के जंगलों की रक्षा कर रही हैं।

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25 मार्च,झंडेवाला कार्यालय की पहचान चमनलाल जी

 25 मार्च/जन्म-दिवस  


      झंडेवाला कार्यालय की पहचान चमनलाल जी


दुनिया भर में फैले स्वयंसेवकों को एक सूत्र में जोड़ने वाले चमनलाल जी का जन्म 25 मार्च, 1920 को ग्राम सल्ली (स्यालकोट, वर्तमान पाकिस्तान) में जमीनों का लेनदेन करने वाले धनी व्यापारी श्री बुलाकीराम गोरोवाड़ा के घर में हुआ था। 


वे मेधावी छात्र और कबड्डी तथा खो-खो के उत्कृष्ट खिलाड़ी थे। गणित में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरा शहर मानता था। 1942 में उन्होंने लाहौर से स्वर्ण पदक के साथ वनस्पति शास्त्र में एम.एस-सी. किया। 


संघ शाखा से उनका सम्पर्क 1936 में ही हो चुका था। 1940-41 में वे गांधी जी के वर्धा स्थित सेवाग्राम आश्रम में भी रहे; पर वहां उनका मन नहीं लगा। विभाजन के उस नाजुक वातावरण में 1942 में लाहौर से चमनलाल जी सहित 52 युवक प्रचारक बने। उन्हें सर्वप्रथम मंडी (वर्तमान हिमाचल) में भेजा गया। वहां हजारों कि.मी. पैदल चलकर उन्होंने सैकड़ों शाखाएं खोलीं। 


1946 में उन्हें लाहौर बुला लिया गया। विभाजन के भय से हिन्दू गांव छोड़कर शहरों में आ रहे थे। चमनलाल जी ने वहां सब व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संभाला। अपनी डायरी में वे हर दिन की घटना लिखते रहते थे।


गांधी हत्या के बाद वे चार माह अंबाला जेल में रहे। 1947 के बाद वे लाहौर से जालंधर और 1950 में दिल्ली आ गये। उस समय कार्यालय के नाम पर वहां एक खपरैल का कमरा ही था। चमनलाल जी झाड़ू लगाने से लेकर आगंतुकों के लिए चाय आदि स्वयं बनाते थे। धीरे-धीरे कार्यालय का स्वरूप सुधरता गया और वे झंडेवाला कार्यालय की पहचान बन गये।


विदेश में बस गये स्वयंसेवक प्रायः दिल्ली आते थे। उनके नाम, पते, फोन नंबर आदि चमनलाल जी के पास सुरक्षित रहते थे। इस प्रकार वे दुनिया में स्वयंसेवकों के बीच संपर्क सेतु बन गये। उन्होंने कई देशों का प्रवासकर इस सूत्र को सबल बनाया। मारीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने अपने पुत्र के विवाह में उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में पोर्ट लुई बुलवाया। 


विदेश जाते समय सब उनसे वहां के पते लेकर जाते थे। वे उनके पहुंचने से पहले ही पत्र एवं फोन द्वारा सब व्यवस्था करा देते थे। विश्व भर से कब, कहां से, किसका फोन आ जाए, कहना कठिन था। इसलिए वे बेतार फोन को सदा पास में रखते थे। लोग हंसी में उसे उनका बेटा कहते थे।


झंडेवाला कार्यालय में पूज्य श्री गुरुजी से मिलने कई प्रमुख लोग आते थे। चमनलाल जी उस वार्ता के बिन्दु लिख लेते थे। इस प्रकार उनकी डायरियां संघ का इतिहास बन गयीं। कश्मीर आंदोलन के समय श्री गुरुजी ने चमनलाल जी के हाथ एक पत्र भेजकर डा. मुखर्जी को सावधान किया था। 


संघ के प्रमुख प्रकाशन, पत्र, पत्रिकाएं, बैठकों में पारित प्रस्ताव आदि वे सुरक्षित रखते थे। इसमें से ही संघ का अभिलेखागार और कई महत्वपूर्ण पुस्तकें बनीं। कपड़े स्वयं धोकर, बिना निचोड़े सुखाने और बिना प्रेस किये पहनने वाले चमनलाल जी का जीवन इतना सादा था कि 1953 और 1975 में जब पुलिस संघ कार्यालय पर आई, तो वे उनके सामने ही बाहर निकल गये। पुलिस वाले उन्हें पहचान ही नहीं सके। 


आपातकाल में स्वयंसेवकों पर हो रहे अत्याचारों का विवरण वे भूमिगत रहते हुए अपनी छोटी टाइप मशीन पर लिखकर विश्व भर में भेजते थे। इससे विश्व जनमत का दबाव इंदिरा गांधी पर पड़ा। जनसंघ के बारे में भी उनकी डायरियों में अनेक टिप्पणियां मिलती हैं।


फरवरी, 2003 में वे मुंबई में विश्व विभाग के एक कार्यक्रम में गये थे। कई दिन से उनका स्वास्थ्य खराब था। आठ फरवरी को स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। दो दिन तक संघर्ष करने के बाद 10 फरवरी को विश्व विभाग का यह पथिक अनंत की यात्रा पर चल दिया।


(संदर्भ : चमनलाल जी, एक स्वयंसेवक की यात्रा - अमरजीव लोचन)

25 मार्च,भूमिगत रेडियो की संचालक उषा मेहता

 25 मार्च/जन्म-दिवस


         भूमिगत रेडियो की संचालक उषा मेहता


आजकल मोबाइल और अंतरजाल जैसे संचार के तीव्र साधनों के बल पर संपर्क और संबंध ही नहीं, तो विश्व स्तर पर व्यापार और आंदोलन भी हो रहे हैं; पर भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन के समय यह सुविधा नहीं थी। तब टेलिफोन, रेडियो और बेतार आदि शासन के पास ही होते थे। ऐसे में आंदोलन के समाचार तथा नेताओं के संदेशों को भूमिगत रेडियो द्वारा जनता तक पहुंचाने में जिस महिला ने बड़े साहस का परिचय दिया, वे थीं उषा मेहता। 


उषा मेहता का जन्म 25 मार्च, 1920 को सूरत (गुजरात) के पास एक गांव में हुआ था। गांधी जी को उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में कर्णावती में देखा था। कुछ समय बाद उनके गांव के पास लगे एक शिविर में उन्होंने गांधी जी के विचारों को सुना और उनके कार्यों के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। वहां पर ही उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया और इसे जीवन भर निभाया। 


आठ वर्ष की अवस्था में वे स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत ‘मांजर सेना’ में शामिल होकर अपने बाल मित्रों के साथ भरूच की गलियों में तिरंगा झंडा लेकर प्रभातफेरी निकालने लगीं। उन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध जुलूस निकाला तथा विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों के आगे विरोध प्रदर्शन भी किये। 


उनके पिता एक जज थे। 1930 में अवकाश पाकर वे मुंबई आ गये। यहां उषा मेहता की सक्रियता और बढ़ गयी। वे जेल में बंदियों से मिलकर उनके संदेश बाहर लाती थीं तथा अपने साथियों के साथ गुप्त पर्चे भी बांटती थीं।


उषा मेहता ने 1939 में दर्शन शास्त्र की स्नातक उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। इसके बाद वे कानून की पढ़ाई करने लगीं; पर तभी भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ गया। ऐसे में वे पढ़ाई अधूरी छोड़कर आंदोलन में कूद गयीं। आंदोलन के समाचार तथा नेताओं के संदेश रेडियो द्वारा जनता तक पहुंचाने के लिए कुछ लोगों ने गुप्त रेडियो प्रणाली की व्यवस्था भी कर ली।


उषा जी ने यह कठिन काम अपने कंधे पर लिया। 14 अगस्त, 1942 को इसका पहला प्रसारण उनकी आवाज में ही हुआ। इस पर नेताओं के पहले से रिकार्ड किये हुए संदेश भी सुनाये जाते थे। इससे सरकार के कान खड़े हो गये। वे इस रेडियो स्टेशन की तलाश करने लगे; पर ‘तुम डाल-डाल, हम पात-पात’ की तरह ये लोग हर दिन इसका स्थान बदल देते थे। श्री राममनोहर लोहिया तथा अच्युत पटवर्धन का भी इस काम में बड़ा सहयोग था; पर तीन माह बाद उषा जी और उनके साथी पुलिस के हत्थे चढ़ ही गये। 


उषा मेहता को चार साल की सजा दी गयी। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया; पर वे झुकी नहीं। 1946 में वहां से आकर उन्होंने फिर पढ़ाई प्रारम्भ कर दी। स्वाधीनता के बाद उन्होंने गांधी जी के सामाजिक तथा राजनीतिक विचारों पर शोध कर पी.एच-डी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद मुंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य को उन्होंने अपनी आजीविका बनाया। 

(संदर्भ : पंजाब केसरी 19.3.2005 तथा अंतरजाल)

बुधवार, 24 मार्च 2021

25 मार्च/बलिदान-दिवस,गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’

 25 मार्च/बलिदान-दिवस


गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’ का बलिदान


क्रांतिकारी पत्रकार श्री गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’ का जन्म 1890 ई0 (आश्विन शुक्ल 14, रविवार, संवत 1947) को प्रयाग के अतरसुइया मौहल्ले में अपने नाना श्री सूरजप्रसाद श्रीवास्तव के घर में हुआ था। इनके नाना सहायक जेलर थे। इनके पुरखे हथगांव (जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश) के मूल निवासी थे; पर जीवनयापन के लिए इनके पिता मुंशी जयनारायण अध्यापन एवं ज्योतिष को अपनाकर जिला गुना (मध्य प्रदेश) के गंगवली कस्बे में बस गये।  


प्रारम्भिक शिक्षा वहाँ के एंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल से लेकर गणेश ने अपने बड़े भाई के पास कानपुर आकर हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने प्रयाग में इण्टर में प्रवेश लिया। उसी दौरान उनका विवाह हो गया, जिससे पढ़ाई छूट गयी; पर तब तक उन्हें लेखन एवं पत्रकारिता का शौक लग गया था, जो अन्त तक जारी रहा। विवाह के बाद घर चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी, अतः वे फिर भाईसाहब के पास कानपुर आ गये। 


1908 में उन्हें कानपुर के करेंसी दफ्तर में 30 रु. महीने की नौकरी मिल गयी; पर एक साल बाद अंग्रेज अधिकारी से झगड़ा हो जाने से उसे छोड़कर विद्यार्थी जी पी.पी.एन.हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। यहाँ भी अधिक समय तक उनका मन नहीं लगा। अतः वे प्रयाग आ गये और कर्मयोगी, सरस्वती एवं अभ्युदय नामक पत्रों के सम्पादकीय विभाग में कार्य किया; पर यहाँ उनके स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया। अतः वे फिर कानपुर लौट गये और 9 नवम्बर, 1913 से साप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया।


‘प्रताप’ समाचार पत्र के कार्य में विद्यार्थी जी ने स्वयं को खपा दिया। वे उसके संयोजन, छपाई से लेकर वितरण तक के कार्य में स्वयं लगे रहते थे। पत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भरपूर सामग्री होती थी। अतः दिन-प्रतिदिन ‘प्रताप’ की लोकप्रियता बढ़ने लगी। 


दूसरी ओर वह अंग्रेज शासकों की निगाह में भी खटकने लगा। 23 नवम्बर, 1920 से विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप’ को दैनिक कर दिया। इससे प्रशासन बौखला गया। उसने विद्यार्थी जी को झूठे मुकदमों में फँसाकर जेल भेज दिया और भारी जुर्माना लगाकर उसका भुगतान करने को विवश किया।


इसके बावजूद भी विद्यार्थी जी का साहस कम नहीं हुआ। उनका स्वर प्रखर से प्रखरतम होता चला गया। कांग्रेस की ओर से स्वाधीनता के लिए जो भी कार्यक्रम दिये जाते थे, वे उसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। वे क्रान्तिकारियों के भी समर्थक थे। अतः उनके लिए रोटी और गोली से लेकर उनके परिवारों के भरणपोषण की भी चिन्ता वे करते थे। क्रान्तिवीर भगतसिंह ने भी कुछ समय तक विद्यार्थी जी के समाचार पत्र ‘प्रताप’ में काम किया था।


स्वतन्त्रता आन्दोलन में शुरू में तो मुसलमानों ने अच्छा सहयोग दिया; पर फिर उनका स्वर बदलने लगे। पाकिस्तान की माँग जोर पकड़ रही थी। 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह आदि को फांसी हुई। इसका समाचार फैलने पर अगले दिन कानपुर में लोगों ने विरोध जुलूस निकाले; पर न जाने क्यों इससे मुसलमान भड़क कर दंगा करने लगे। विद्यार्थी जी अपने जीवन भर की तपस्या को भंग होते देख बौखला गये। वे सीना खोलकर दंगाइयों के आगे कूद पड़े। 


दंगाई तो मरने-मारने पर उतारू ही थे। उन्होंने विद्यार्थी जी के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। यहाँ तक की उनकी साबुत लाश भी नहीं मिली। केवल एक बाँह मिली, जिस पर लिखे नाम से उनकी पहचान हुई। वह 25 मार्च, 1931 का दिन था, जब अन्ध मजहबवाद की बलिवेदी पर भारत माँ के सच्चे सपूत, पत्रकार गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’ का बलिदान हुआ।

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24 मार्च/बलिदान-दिवस,पांचाल क्षेत्र में क्रान्ति के संचालक नवाब खान

 24 मार्च/बलिदान-दिवस


     पांचाल क्षेत्र में क्रान्ति के संचालक नवाब खान


उत्तर प्रदेश में बरेली और उसका निकटवर्ती क्षेत्र पांचाल क्षेत्र कहलाता है। जन मान्यता यह है कि महाभारत काल में द्रौपदी (पांचाली) का स्वयंवर इसी क्षेत्र में हुआ था। आगे चलकर विदेशी मुस्लिम रुहेलों ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, इससे यह क्षेत्र रुहेलखण्ड भी कहलाया। 

जब 1857 की क्रान्ति का बिगुल बजा, तो यहाँ के नवाब खान बहादुर ने नाना साहब पेशवा की योजना से निर्धारित दिन 31 मई को ही इस क्षेत्र को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा लिया। रुहेले सरदार हाफिज रहमत खान के वंशज होने के कारण इनका पूरे क्षेत्र में बहुत दबदबा था। इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें मानद न्यायाधीश (नेटिव जज) बना दिया। रुहेले सरदार के वंशज और जज होने के कारण उन्हें दुगनी पेंशन मिलती थी।

खान बहादुर पर एक ओर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, तो दूसरी ओर वे गुप्त रूप से क्रान्ति की सभी योजनाओं में सहभागी थे।  उस समय बरेली में आठवीं घुड़सवार, 18वीं तथा 68वीं पैदल रेजिमेण्ट के साथ तोपखाने की एक इकाई भी तैनात थी। 

जब 10 मई को मेरठ से विद्रोह प्रारम्भ हुआ, तो खान बहादुर ने सैनिकों को 31 मई तक शान्त रहने को कहा। उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को यह विश्वास दिला दिया कि ये सैनिक कुछ नहीं करेंगे। 31 मई को रविवार होने के कारण अधिकांश अंगे्रज चर्च गये थे। 

जैसे ही 11 बजे तोप से गोला छोड़ा गया, सैनिकों ने अंग्रेजों पर हमला बोल दिया। चुन-चुनकर उन्हें मारा जाने लगा। अनेक अंग्रेज जान बचाने के लिए नैनीताल भाग गये। शाम तक पूरा बरेली शहर मुक्त हो गया। इसी दिन शाहजहाँपुर और मुरादाबाद में तैनात 29वीं रेजिमेण्ट ने भी क्रान्ति कर पूरे पांचाल क्षेत्र को एक ही दिन में मुक्त करा लिया। 

खान बहादुर ने स्वदेशी शासन स्थापित करने के लिए सेनापति बख्त खान के नेतृत्व में 16,000 सैनिकों को क्रान्तिकारियों का सहयोग करने के लिए दिल्ली भेजा। राज्य में शान्ति स्थापित करने के लिए 5,000 अश्वारोही तथा 25,000 पैदल सैनिक भी भर्ती किये। 

दस माह तक पांचाल क्षेत्र में शान्ति बनी रही। इनकी शक्ति देखकर अंग्रेजों की इस ओर आने की हिम्मत नहीं पड़ी। फरवरी, 1858 में लखनऊ तथा कानपुर अंग्रेजों के अधीन हो गये। यह देखकर 25 मार्च को नाना साहब बरेली आ गये।

इसके बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर फिर कब्जा करने का प्रयास आरम्भ किया। प्रधान सेनापति कैम्पबेल ने चारों ओर से हमला करने की योजना बनायी। पहले आक्रमण में अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। उसका एक प्रमुख नायक जनरल पेनी भी मारा गया।

पर क्रान्तिवीरों की शक्ति बँटी हुई थी। यह देखकर खान बहादुर ने पूरी सेना को बरेली बुला लिया। 5 मई, 1858 को नकटिया नदी के पास इस देशभक्त सेना ने अंगे्रजों पर धावा बोला। दो दिन के संघर्ष में अंग्रेजों की भारी पराजय हुई। दूसरे दिन फिर संघर्ष हुआ; पर उसी समय मुरादाबाद से अंग्रेज सैनिकों की एक टुकड़ी और आ गयी। इससे पासा पलट गया और 6 मई, 1858 को बरेली पर अंग्रेजों का फिर से अधिकार हो गया। 

खान बहादुर और कई प्रमुख क्रान्तिकारी पीलीभीत चले गये। वहाँ से वे लखनऊ आये और फिर बेगम हजरत महल के साथ नेपाल चले गये; पर वहाँ राणा जंगबहादुर ने उन्हें पकड़वा दिया। अंग्रेज शासन ने उन पर बरेली में मुकदमा चलाया और 24 मार्च, 1860 को बरेली कोतवाली के द्वार पर उन्हें फाँसी दे दी गयी।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

23 मार्च/पुण्य-तिथि सर्वप्रिय प्रचारक रतन भट्टाचार्य

 23 मार्च/पुण्य-तिथि


सर्वप्रिय प्रचारक रतन भट्टाचार्य


रतन जी के नाम से प्रसिद्ध श्री विश्वरंजन भट्टाचार्य का जन्म 1927 में दिल्ली में हुआ था। उनके पिता श्री सुरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य तथा माता श्रीमती इन्दुबाला देवी थीं। पांच भाइयों वाले परिवार में रतन जी दूसरे नंबर पर थे। वे लोग मुर्शिदाबाद (जिला खागड़ा, बंगाल) के मूल निवासी थे; पर उनके पिताजी केन्द्र सरकार के लेखा विभाग में नौकरी मिलने पर दिल्ली आ गये।  


दिल्ली में उन दिनों संघ का काम मंदिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा भवन से चलता था। श्री सुरेन्द्रनाथ भी वहीं रणजीत प्लेस में रहते थे। संघ को न जानने के कारण माताजी शाखा जाने से रतन जी को रोकती थीं। श्री वसंत राव ओक तथा नारायण जी प्रायः उन्हें बुलाने आते थे। एक बार मां ने गुस्से में कहा कि मेरे पांच लड़के हैं। जाओ, मैं एक लड़का देश और धर्म के लिए देती हूं। इसके कुछ समय बाद 14 वर्ष की अवस्था में रतन जी घर छोड़कर संघ कार्यालय में ही रहने लगे। यहां रहकर उन्होंने मैट्रिक तथा इंटर किया। 


फिर प्रांत प्रचारक वसंतराव ओक ने उन्हें बरेली भेज दिया। उन दिनों सर्वत्र विभाजन की चर्चा चल रही थी। ऐसे माहौल में रतन जी ने बरेली कॉलिज से बी.ए. किया। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लग गया। उन्होंने बरेली में सत्याग्रह का संचालन किया और फिर स्वयं भी जेल गये। प्रतिबंध हटने पर संघ के प्रांतों की पुनर्रचना हुई और रतन जी उत्तर प्रदेश में ही रह गये। इसके बाद उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः उ.प्र. ही रहा। 


साठ के दशक में उन्हें कोलकाता भेजा गया। उन दिनों पूर्वी पाकिस्तान से उत्पीड़ित हिन्दू बड़ी संख्या में भारत आ रहे थे। रतन जी इन शरणार्थियों की सेवा में लग गये। वे कई बार ढाका तक भी गये। 1971 में जब भारत ने युद्ध छेड़ दिया, तो वे ‘मुक्ति वाहिनी’ के साथ काफी अंदर तक गये। पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत के सम्मुख समर्पण के समय वे वहीं उपस्थित थे।


कोलकाता में एक बार उन्हें हृदय का भीषण दौरा पड़ा। अतः वे स्वास्थ्य लाभ के लिए नौ मास दिल्ली में छोटे भाई गोपीरंजन के घर रहे। ठीक होकर वे फिर बंगाल चले गये; पर वहां फिर दौरा पड़ गया। अतः उन्हें वापस उ.प्र. में ही बुला लिया गया। लम्बे समय तक वे बरेली के विभाग प्रचारक, संभाग प्रचारक, पश्चिमी उ.प्र.के सम्पर्क प्रमुख और ‘विद्या भारती’ पश्चिमी उ.प्र. के संरक्षक रहे। अटल जी जब पहली बार बलरामपुर से सांसद बने, तब रतन जी वहीं प्रचारक थे। उनकी देखरेख में ही चुनाव लड़ा गया था। अतः अटल जी और उनके सहायक शिवकुमार जी उनका बहुत सम्मान करते थे।


रतन जी प्रवास में जहां ठहरते थे, वहां सबसे हिलमिल जाते थे। महिलाएं और बच्चे रात में उनके पास बैठकर संस्कारप्रद किस्से सुनते थे। सैकड़ों परिवारों में उन्हें बाबा जैसा आदर मिलता था। हंसमुख होने पर भी वे समयपालन, व्यवस्था तथा अनुशासन के मामले में बहुत कठोर थे। संघ शिक्षा वर्ग में यदि कोई शिक्षक संघस्थान पर उचित वेष में नहीं होता था, तो वे उसे वापस भेज देते थे। कार्यकर्ता द्वारा भूल होने पर पहले समझाना, फिर चेतावनी और फिर दंड, यह उनका सिद्धांत था। कार्यकर्ता उनसे दिल खोलकर बात करते थे। वे भी पूरी बात धैर्य से सुनकर पक्का निदान करते थे।


उच्च रक्तचाप के कारण प्रायः उनके पैर सूज जाते थे। कोलकाता में वे अधरंग के भी शिकार हो चुके थे। बोलते हुए उनकी जीभ लड़खड़ा जाती थी। अतः आगरा केन्द्र बनाकर उन्हें प्रवास से विश्राम दे दिया गया। 23 मार्च, 1999 को दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान में हैपिटाइटिस बी के कारण उनका निधन हुआ। अपने छोटे भाई गोपीरंजन से उन्हें बहुत स्नेह था। वे तब रतन जी के पास ही थे। उनकी अंत्यक्रिया में सुदर्शन जी पूरे समय उपस्थित रहे। उनके निधन पर आगरा में संघ कार्यालय के पास के बाजार भी आधे दिन बंद रहे। 


23 मार्च/जन्म-दिवस, कृष्ण प्रेम में दीवानी मीराबाई

 23 मार्च/जन्म-दिवस


                   कृष्ण प्रेम में दीवानी मीराबाई


भारत का राजस्थान प्रान्त वीरों की खान कहा जाता है; पर इस भूमि को श्रीकृष्ण के प्रेम में अपना तन-मन और राजमहलों के सुखों को ठोकर मारने वाली मीराबाई ने भी अपनी चरण रज से पवित्र किया है। हिन्दी साहित्य में रसपूर्ण भजनों को जन्म देने का श्रेय मीरा को ही है। साधुओं की संगत और एकतारा बजाते हुए भजन गाना ही उनकी साधना थी। मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई..गाकर मीरा ने स्वयं को अमर कर लिया।


मीरा का जन्म मेड़ता के राव रत्नसिंह के घर 23 मार्च, 1498 को हुआ था। जब मीरा तीन साल की थी, तब उनके पिता का और दस साल की होने पर माता का देहान्त हो गया। जब मीरा बहुत छोटी थी, तो एक विवाह के अवसर पर उसने अपनी माँ से पूछा कि मेरा पति कौन है ? माता ने हँसी में श्रीकृष्ण की प्रतिमा की ओर इशारा कर कहा कि यही तेरे पति हैं। भोली मीरा ने इसे ही सच मानकर श्रीकृष्ण को अपने मन-मन्दिर में बैठा लिया।


माता और पिता की छत्रछाया सिर पर से उठ जाने के बाद मीरा अपने दादा राव दूदाजी के पास रहने लगीं। उनकी आयु की बालिकाएँ जब खेलती थीं, तब मीरा श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सम्मुख बैठी उनसे बात करती रहती थी। कुछ समय बाद उसके दादा जी भी स्वर्गवासी हो गये। अब राव वीरमदेव गद्दी पर बैठे। उन्होंने मीरा का विवाह चित्तौड़ के प्रतापी राजा राणा साँगा के बड़े पुत्र भोजराज से कर दिया। इस प्रकार मीरा ससुराल आ गयी; पर अपने साथ वह अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की प्रतिमा लाना नहीं भूली।


मीरा की श्रीकृष्ण भक्ति और वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक बीत रहा था। राजा भोज भी प्रसन्न थे; पर दुर्भाग्यवश विवाह के दस साल बाद राजा भोजराज का देहान्त हो गया। अब तो मीरा पूरी तरह श्रीकृष्ण को समर्पित हो गयीं। उनकी भक्ति की चर्चा सर्वत्र फैल गयी। दूर-दूर से लोग उनके दर्शन को आने लगे। पैरों में घुँघरू बाँध कर नाचते हुए मीरा प्रायः अपनी सुधबुध खो देती थीं।


मीरा की सास, ननद और राणा विक्रमाजीत को यह पसन्द नहीं था। राज-परिवार की पुत्रवधू इस प्रकार बेसुध होकर आम लोगों के बीच नाचे और गाये, यह उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध था। उन्होंने मीरा को समझाने का प्रयास किया; पर वह तो सांसारिक मान-सम्मान से ऊपर उठ चुकी थीं। उनकी गतिविधियों में कोई अन्तर नहीं आया। अन्ततः राणा ने उनके लिए विष का प्याला श्रीकृष्ण का प्रसाद कह कर भेजा। मीरा ने उसे पी लिया; पर सब हैरान रह गये, जब उसका मीरा पर कुछ असर नहीं हुआ।


राणा का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने एक काला नाग पिटारी में रखकर मीरा के पास भेजा; पर वह नाग भी फूलों की माला बन गया। अब मीरा समझ गयी कि उन्हें मेवाड़ छोड़ देना चाहिए। अतः वह पहले मथुरा-वृन्दावन और फिर द्वारका आ गयीं। इसके बाद चित्तौड़ पर अनेक विपत्तियाँ आयीं। राणा के हाथ से राजपाट निकल गया और युद्ध में उनकी मृत्यु हो गयी।


यह देखकर मेवाड़ के लोग उन्हें वापस लाने के लिए द्वारका गये। मीरा आना तो नहीं चाहती थी; पर जनता का आग्रह वे टाल नहीं सकीं। वे विदा लेने के लिए रणछोड़ मन्दिर में गयीं; पर पूजा में वे इतनी तल्लीन हो गयीं कि वहीं उनका शरीर छूट गया। इस प्रकार 1573 ई0 में द्वारका में ही श्रीकृष्ण की दीवानी मीरा ने अपनी देहलीला समाप्त की।

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23 मार्च/बलिदान-दिवस इन्कलाब जिन्दाबाद के उद्घोषक भगतसिंह

 23 मार्च/बलिदान-दिवस


      इन्कलाब जिन्दाबाद के उद्घोषक भगतसिंह


क्रान्तिवीर भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को ग्राम बंगा, (जिला लायलपुर, पंजाब) में हुआ था। उसके जन्म के कुछ समय पूर्व ही उसके पिता किशनसिंह और चाचा अजीतसिंह जेल से छूटे थे। अतः उसे भागों वाला अर्थात भाग्यवान माना गया। घर में हर समय स्वाधीनता आन्दोलन की चर्चा होती रहती थी। इसका प्रभाव भगतसिंह के मन पर गहराई से पड़ा। 


13 अपै्रल 1919 को जलियाँवाला बाग, अमृतसर में क्रूर पुलिस अधिकारी डायर ने गोली चलाकर हजारों नागरिकों को मार डाला। यह सुनकर बालक भगतसिंह वहाँ गया और खून में सनी मिट्टी को एक बोतल में भर लाया। वह प्रतिदिन उसकी पूजा कर उसे माथे से लगाता था। 


भगतसिंह का विचार था कि धूर्त अंग्रेज अहिंसक आन्दोलन से नहीं भागेंगे। अतः उन्होंने आयरलैण्ड, इटली, रूस आदि के क्रान्तिकारी आन्दोलनों का गहन अध्ययन किया। वे भारत में भी ऐसा ही संगठन खड़ा करना चाहते थे। विवाह का दबाव पड़ने पर उन्होंने घर छोड़ दिया और कानपुर में स्वतन्त्रता सेनानी गणेशशंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र ‘प्रताप’ में काम करने लगे। 


कुछ समय बाद वे लाहौर पहुँच गये और ‘नौजवान भारत सभा’ बनायी। भगतसिंह ने कई स्थानों का प्रवास भी किया। इसमें उनकी भेंट चन्द्रशेखर आजाद जैसे साथियों से हुई। उन्होंने कोलकाता जाकर बम बनाना भी सीखा। 


1928 में ब्रिटेन से लार्ड साइमन के नेतृत्व में एक दल स्वतन्त्रता की स्थिति के अध्ययन के लिए भारत आया। लाहौर में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में इसके विरुद्ध बड़ा प्रदर्शन हुआ। इससे बौखलाकर पुलिस अधिकारी स्काॅट तथा सांडर्स ने लाठीचार्ज करा दिया। वयोवृद्ध लाला जी के सिर पर इससे भारी चोट आयी और वे कुछ दिन बाद चल बसे।


इस घटना से क्रान्तिवीरों का खून खौल उठा। उन्होंने कुछ दिन बाद सांडर्स को पुलिस कार्यालय के सामने ही गोलियों से भून दिया। पुलिस ने बहुत प्रयास किया; पर सब क्रान्तिकारी वेश बदलकर लाहौर से बाहर निकल गये। कुछ समय बाद दिल्ली में केन्द्रीय धारासभा का अधिवेशन होने वाला था। क्रान्तिवीरों ने वहाँ धमाका करने का निश्चय किया। इसके लिए भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त चुने गये। 


निर्धारित दिन ये दोनों बम और पर्चे लेकर दर्शक दीर्घा में जा पहुँचे। भारत विरोधी प्रस्तावों पर चर्चा शुरू होते ही दोनों ने खड़े होकर सदन मे बम फंेक दिया। उन्होंने ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के नारे लगाते हुए पर्चे फंेके, जिन पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का उद्देश्य लिखा था।


पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया। न्यायालय में भगतसिंह ने जो बयान दिये, उससे सारे विश्व में उनकी प्रशंसा हुई। भगतसिंह पर सांडर्स की हत्या का भी आरोप था। उस काण्ड में कई अन्य क्रान्तिकारी भी शामिल थे; जिनमें से सुखदेव और राजगुरु को पुलिस पकड़ चुकी थी। इन तीनों को 24 मार्च, 1931 को फाँसी देने का आदेश जारी कर दिया गया।


भगतसिंह की फाँसी का देश भर में व्यापक विरोध हो रहा था। इससे डरकर धूर्त अंग्रेजों ने एक दिन पूर्व 23 मार्च की शाम को इन्हेंे फाँसी दे दी और इनके शवों को परिवारजनों की अनुपस्थिति में जला दिया; पर इस बलिदान ने देश में क्रान्ति की ज्वाला को और धधका दिया। उनका नारा ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ आज भी सभा-सम्मेलनों में ऊर्जा का संचार कर देता है।

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(संदर्भ : श्री गोपीरंजन से वार्ता, 1.12.2015 तथा अन्य सूत्र      

22 मार्च/पुण्य-तिथि,धर्मग्रन्थों के प्रसारक भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार

 22 मार्च/पुण्य-तिथि



धर्मग्रन्थों के प्रसारक भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार

भारत ही नहीं, तो विश्व भर में हिन्दू धर्मग्रन्थों को शुद्ध पाठ एवं छपाई में बहुत कम मूल्य पर पहुँचाने का श्रेय जिस विभूति को है, उन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाई जी) का जन्म शिलांग में 17 सितम्बर, 1892 को हुआ था। उनके पिता श्री भीमराज तथा माता श्रीमती रिखीबाई थीं। दो वर्ष की अवस्था में ही इनकी माता जी का देहान्त हो गया। 

केवल 13 वर्ष की अवस्था में भाई जी ने बंग-भंग से प्रेरित होकर स्वदेशी व्रत लिया और फिर जीवन भर उसका पालन किया। केवल उन्होंने ही नहीं, तो उनकी पत्नी ने भी इस व्रत को निभाया और घर की सब विदेशी वस्तुओं की होली जला दी। भाई जी के तीन विवाह हुए। प्रथम दो पत्नियांे का जीवन अधिक नहीं रहा; पर तीसरी पत्नी ने उनका जीवन भर साथ दिया।

1912 में वे अपना पुश्तैनी कारोबार सँभालने के लिए कोलकाता आ गये। 1914 में उनका सम्पर्क महामना मदनमोहन मालवीय जी से हुआ और वे हिन्दू महासभा में सक्रिय हो गये। 1915 में वे हिन्दू महासभा के मन्त्री बने। 

कोलकाता में उनका सम्पर्क पंडित गोविन्द नारायण मिश्र, बालमुकुन्द गुप्त, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, झाबरमल शर्मा, लक्ष्मण नारायण गर्दे, बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे सम्पादक एवं विद्वान साहित्यकारों से हुआ। अनुशीलन समिति के सदस्य के नाते उनके सम्बन्ध डा. हेडगेवार, अरविन्द घोष, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, विपिनचन्द्र पाल, ब्रह्मबान्धव उपाध्याय आदि स्वन्तत्रता सेनानियों तथा क्रान्तिकारियों से लगातार बना रहता था। जब वे रोडा कम्पनी में कार्यरत थे, तो उन्होंने विदेशों से आयी रिवाल्वरों की एक पूरी खेप क्रान्तिकारियों को सौंप दी। इस पर उन्हें राजद्रोह के आरोप में दो साल के लिए अलीपुर जेल में बन्द कर दिया गया।

1918 में भाई जी व्यापार के लिए मुम्बई आ गये। यहाँ सेठ जयदयाल गोयन्दका के सहयोग से अगस्त, 1926 में धर्मप्रधान विचारों पर आधारित ‘कल्याण’ नामक मासिक पत्रिका प्रारम्भ की। कुछ वर्ष बाद गोरखपुर आकर उन्होंने गीताप्रेस की स्थापना की। इसके बाद ‘कल्याण’ का प्रकाशन गोरखपुर से होने लगा। 1933 में श्री चिम्मनलाल गोस्वामी के सम्पादन में अंग्रेजी में ‘कल्याण कल्पतरू’ मासिक पत्रिका प्रारम्भ हुई।

ये सभी पत्रिकाएँ आज भी बिना विज्ञापन के निकल रही हैं। गीताप्रेस ने बच्चों, युवाओं, महिलाओं, वृद्धों आदि के लिए बहुत कम कीमत पर संस्कारक्षम साहित्य प्रकाशित कर नया उदाहरण प्रस्तुत किया। 

हिन्दू धर्मग्रन्थों में पाठ भेद तथा त्रुटियों से भाई जी को बहुत कष्ट होता था। अतः उन्होंने तुलसीकृत श्री रामचरितमानस की जितनी हस्तलिखित प्रतियाँ मिल सकीं, एकत्र कीं और विद्वानों को बैठाकर ‘मानस पीयूष’ नामक उनका शुद्ध पाठ, भावार्थ एवं टीकाएँ तैयार करायीं। फिर इन्हें कई आकारों में प्रकाशित किया, जिससे हर कोई उससे लाभान्वित हो सके। मुद्रण की भूल को कलम से शुद्ध करने की परम्परा भी उन्होंने गीता प्रेस से प्रारम्भ की।

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के भी अनेक संस्करण निकाले। इसके साथ ही 11 उपनिषदों के शंकर भाष्य, वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि धर्मग्रन्थों को लागत मूल्य पर छापकर उन्होंने हिन्दू समाज की अनुपम सेवा की। वे ऐसी व्यवस्था भी कर गये, जिससे उनके बाद भी यह कार्य चलता रहे। 22 मार्च, 1971 को उनका शरीरान्त हुआ।

शनिवार, 20 मार्च 2021

21 मार्च,रूसी रामभक्त अकादमिक वरान्निकोव

 21 मार्च/जन्म-दिवस


         रूसी रामभक्त अकादमिक वरान्निकोव


रूसी नागरिकों को श्रीरामकथा का रसास्वादन कराने वाले श्री अलेक्जैंडर पेत्राविच का जन्म 21 मार्च, 1890 को उक्रोइन के जोलोतोनोशा कस्बे में एक गरीब बढ़ई प्योत्र इवानोविच के घर में हुआ था। वे नौ भाई-बहिन थे। उनकी मां घर में छलनियां बनाती थीं। बच्चे भी उनकी सहायता करते थे। अलेक्से को पढ़ने का बहुत शौक था। पांच वर्ष की अवस्था में वे बड़े भाई के साथ स्कूल जाने लगे; पर एक दिन अध्यापक ने छोटा कहकर उन्हें भगा दिया। इस पर उनके पिता ने उन्हें दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया। अलेक्से को किताबों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तक पढ़ने या प्राप्त करने के लिए लोगों के कुछ काम कर देते थे। मेधावी होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती थी। इस प्रकार वे पढ़ते रहे। 

विश्वविद्यालय में श्री श्चेरवात्सकी और श्री ओल्देन बुर्ग के सान्निध्य में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू आदि भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने अध्यापन को अपनी आजीविका बनाया। 1917 में वे पेत्रोशाद वि.वि. में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष बने। इसे अब लेनिनग्राद वि.वि. कहते हैं। उन्होंने भारत के प्रमुख गद्य एवं पद्यकारों के साहित्य का अनुवाद किया। इसी दौरान उनका परिचय श्रीरामकथा से हुआ। 1936 में उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस’ का गद्य में अनुवाद किया। इसी वर्ष उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च ‘लेनिन पदक’ से विभूषित किया गया।

इसके बाद दस साल के परिश्रम से उन्होंने मानस का काव्यानुवाद किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया; पर उनके काम के महत्व को देखते हुए सरकार ने उन्हें कजाकिस्तान में एक सुरक्षित जगह भेज दिया। वहां बीमार पड़ने पर भी वे काम करते रहे। इसके प्रकाशित होते ही हजारों प्रतियां तुरंत बिक गयीं। इसके बाद उन्होंने हिन्दी, उर्दू और रूसी कोष का निर्माण किया। वे फारसी और जर्मन भाषा के भी विद्वान थे। फारसी के प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘जेन्दावेस्ता’ का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। 1939 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘रूसी अकादमी’ का सदस्य बनाया गया। इससे वे ‘अकादमी वरान्निकोव’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। 1949 में उनकी कृति ‘प्रेमचंद’ को सोवियत संघ में बहुत प्रसिद्धि एवं सम्मान मिला। श्रीरामचरितमानस की एक प्रति उनकी मेज पर सदा रखी रहती थी। वे तुलसीदास की तरह अपने में मगन रहकर ‘स्वान्तः सुखाय’ काम करने में विश्वास रखते थे।

श्री वरान्निकोव का मानना था कि किसी देश को जानने का सबसे अच्छा साधन वहां की भाषा, साहित्य, संस्कृति और इतिहास को जानना है। भारत को इसी तरह जानने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। उनकी पत्नी तथा सभी बच्चे भारत और भारतीयता के प्रेमी बने। उनके पुत्र पेत्रोविच वरान्निकोव अनुवाद कार्य में अपने पिता का सहयोग करते थे। वे कई बार भारत आये। भारत से कोई भी साहित्यकार रूस जाता था, तो वे उसका हृदय से स्वागत करते थे। यदि संभव हो, तो वे उन्हें अपने घर भी ले जाते थे। वहां उन्होंने भारत से संबंधित पुस्तक, चित्र एवं कलाकृतियों का एक संग्रहालय बना रखा था। उसे वे सबको बड़ी रुचि से दिखाते थे। उन्होंने अपने एक पुत्र का नाम ‘चंद्र’ रखा। 

यद्यपि श्री वरान्निकोव भारतप्रेमी थे; पर दुर्भाग्यवश वे कभी भारतभूमि के दर्शन नहीं कर सके। 1946 में दिल्ली में गांधीजी ने ‘एशियायी सम्मेलन’ के उद्घाटन में कई विदेशी विद्वानों को बुलाया था। वे भी उसमें आना चाहते थे; पर बीमारी के कारण चिकित्सकों ने अनुमति नहीं दी। सात सितम्बर, 1952 को उनका निधन हुआ। उनकी समाधि पर देवनागरी लिपि में तुलसीदास के एक दोहे की अर्धाली ‘भलो भलाइंहि वै लहै’ अंकित है, जो उन्हें बहुत प्रिय थी। इसका अर्थ है कि भला आदमी किसी भी परिस्थिति में भलाई करने से पीछे नहीं हटता। रामभक्त श्री वरान्निकोव ऐसे ही भले आदमी थे। 


(राष्ट्रधर्म, अपै्रल-मई 2020, शंभुनाथ टंडन)

21 मार्च/जन्म-दिवस,विश्वनाथ के आराधक बिस्मिल्ला खां

 21 मार्च/जन्म-दिवस


            विश्वनाथ के आराधक बिस्मिल्ला खां


भगवान विश्वनाथ के त्रिशूल पर बसी तीन लोक से न्यारी काशी में गंगा के घाट पर सुबह-सवेरे शहनाई के सुर बिखरने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को ग्राम डुमराँव, जिला भोजपुर, बिहार में हुआ था। बचपन में इनका नाम कमरुद्दीन था। इनके पिता पैगम्बर बख्श भी संगीत के साधक थे। वे डुमराँव के रजवाड़ों के खानदानी शहनाईवादक थे। इसलिए कमरुद्दीन का बचपन शहनाई की मधुर तान सुनते हुए ही बीता।

जब कमरुद्दीन केवल चार वर्ष के ही थे, तो इनकी माता मिट्ठन का देहान्त हो गया। इस पर वे अपने मामा अल्लाबख्श के साथ काशी आ गये और फिर सदा-सदा के लिए काशी के ही होकर रह गये। उनके मामा विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई बजाते थे। धीरे-धीरे बिस्मिल्ला भी उनका साथ देने लगे। काशी के विशाल घाटों पर मन्द-मन्द बहती हुई गंगा की निर्मल धारा के सम्मुख शहनाई बजाने में युवा बिस्मिल्ला को अतीव सुख मिलता था। वे घण्टों वहां बैठकर संगीत की साधना करते थे। 

बिस्मिल्ला खाँ यों तो शहनाई पर प्रायः सभी प्रसिद्ध राग बजा लेते थे; पर ठुमरी, चैती और कजरी पर उनकी विशेष पकड़ थी। इन रागों को बजाते समय वे ही नहीं, तो सामने उपस्थित सभी श्रोता एक अद्भुत तरंग में डूब जाते थे। जब बिस्मिल्ला खाँ अपना कार्यक्रम समाप्त करते, तो सब होश में आते थे। 15 अगस्त 1947 को जब लालकिले पर स्वतन्त्र भारत का तिरंगा झण्डा फहराया, तो उसका स्वागत बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई बजाकर किया।

धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ने लगी। केवल देश ही नहीं, तो विदेशों से भी उनको निमन्त्रण मिलने लगे। बिस्मिल्ला खाँ के मन में काशी, गंगा और भगवान विश्वनाथ के प्रति अत्यधिक अनुराग था। एक बार अमरीका में बसे धनी भारतीयों ने उन्हें अमरीका में ही सपरिवार बस जाने को कहा। वे उनके लिए सब व्यवस्था करने को तैयार थे; पर बिस्मिल्ला खाँ ने स्पष्ट कहा कि इसके लिए आपको माँ गंगा और भगवान् विश्वनाथ को भी काशी से अमरीका लाना पड़ेगा। वे धनी भारतीय चुप रह गये।

बिस्मिल्ला खाँ संगीत की उन ऊँचाइयों पर पहुँच गये थे, जहाँ हर सम्मान और पुरस्कार उनके लिए छोटा पड़ता था। भारत का शायद ही कोई मान-सम्मान हो, जो उन्हें न दिया गया हो। 11 अपै्रल, 1956 को राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें हिन्दुस्तानी संगीत सम्मान प्रदान किया। 

27 अपै्रल, 1961 को पद्मश्री, 16 अपै्रल, 1968 को पद्मभूषण, 22 मई, 1980 को पद्म विभूषण और फिर 4 मई, 2001 को राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

इतनी ख्याति एवं प्रतिष्ठा पाकर भी उन्होंने सदा सादा जीवन जिया। काशी की सुहाग गली वाले घर के एक साधारण कमरे में वे सदा चारपाई पर बैठे मिलते थे। बीमार होने पर भी वे अस्पताल नहीं जाते थे। उनकी इच्छा थी कि वे दिल्ली में इण्डिया गेट पर शहनाई बजायें। शासन ने इसके लिए उन्हें आमन्त्रित भी किया; पर तब तक उनकी काया अत्यधिक जर्जर हो चुकी थी।

21 अगस्त, 2006 को भोर होने से पहले ही उनके प्राण पखेरु उड़ गये। देहान्त से कुछ घण्टे पहले उन्होंने अपने पुत्र एवं शिष्य नैयर हुसेन को राग अहीर भैरवी की बारीकियाँ समझायीं। इस प्रकार अन्तिम साँस तक वे संगीत की साधना में रत रहे।

21 मार्च, विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट



21 मार्च/जन्म-दिवस

             विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट


खगोलशास्त्र का अर्थ है ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति एवं गति के आधार पर प॰चांग का निर्माण, जिससे शुभ कार्यों के लिए उचित मुहूर्त निकाला जा सके। इस क्षेत्र में भारत का लोहा दुनिया को मनवाने वाले वैज्ञानिक आर्यभट के समय में अंग्रेजी तिथियाँ प्रचलित नहीं थीं। 

अपने एक ग्रन्थ में उन्होंने कलियुग के 3,600 वर्ष बाद की मध्यम मेष संक्रान्ति को अपनी आयु 23 वर्ष बतायी है। इस आधार पर विद्वान् उनकी जन्मतिथि 21 मार्च, 476 ई. मानते हैं। उनके जन्मस्थान के बारे में भी विद्वानों एवं इतिहासकारों में मतभेद हैं। उन्होंने स्वयं अपना जन्मस्थान कुसुमपुर बताया है। कुसुमपुर का अर्थ है फूलों का नगर। इसे विद्वान् लोग आजकल पाटलिपुत्र या पटना बताते हैं। 973 ई0 में भारत आये पर्शिया के विद्वान अलबेरूनी ने भी अपने यात्रा वर्णन में ‘कुसुमपुर के आर्यभट’ की चर्चा अनेक स्थानों पर की है। 

कुछ विद्वानों का मत है कि उनके पंचांगों का प्रचलन उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है, इसलिए कुसुमपुर कोई दक्षिण भारतीय नगर होगा। कुछ लोग इसे विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहने वाली नर्मदा और गोदावरी के बीच का कोई स्थान बताते हैं। कुछ विद्वान आर्यभट को केरल निवासी मानते हैं।

यद्यपि आर्यभट गणित, खगोल या ज्योतिष के क्षेत्र में पहले भारतीय वैज्ञानिक नहीं थे; पर उनके समय तक पुरानी अधिकांश गणनाएँ एवं मान्यताएँ विफल हो चुकी थीं। पैतामह सिद्धान्त, सौर सिद्धान्त, वसिष्ठ सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त और पौलिष सिद्धान्त, यह पाँचों सिद्धान्त पुराने पड़ चुके थे। इनके आधार पर बतायी गयी ग्रहों की स्थिति तथा ग्रहण के समय आदि की प्रत्यक्ष स्थिति में काफी अन्तर मिलता था। इस कारण भारतीय ज्योतिष पर से लोगों का विश्वास उठ गया। ऐसे में लोग इन्हें अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण मानकर विदेशी एवं विधर्मी पंचांगों की ओर झुकने लगे थे।

आर्यभट ने इस स्थिति का समझकर इस शास्त्र का गहन अध्ययन किया और उसकी कमियों को दूरकर नये प्रकार से जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की अपनी धुरी तथा सूर्य के आसपास घूमने की गति के आधार पर अपनी गणनाएँ कीं। 

इससे लोगों का विश्वास फिर से भारतीय खगोलविद्या एवं ज्योतिष पर जम गया। इसी कारण लोग उन्हें भारतीय खगोलशास्त्र का प्रवर्तक भी मानते हैं। उन्होंने एक स्थान पर स्वयं को 'कुलप आर्यभट' कहा है। इसका अर्थ कुछ विद्वान् यह लगाते हैं कि वे नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। 

उनके ग्रन्थ ‘आर्यभटीयम्’ से हमें उनकी महत्वपूर्ण खोज एवं शोध की जानकारी मिलती है। इसमें कुल 121 श्लोक हैं, जिन्हें गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलापाद नामक चार भागों में बाँटा है। 

वृत्त की परिधि और उसके व्यास के संबंध को ‘पाई’ कहते हैं। आर्यभट द्वारा बताये गये इसके मान को ही आज भी गणित में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी, चन्द्रमा आदि ग्रहों के प्रकाश का रहस्य, छाया का मापन, कालगणना, बीजगणित, त्रिकोणमिति, व्यस्तविधि, मूल-ब्याज, सूर्योदय व सूर्यास्त के बारे में भी उन्होंने निश्चित सिद्धान्त बताये।

आर्यभट की इन खोजों से गणित एवं खगोल का परिदृश्य बदल गया। उनके योगदान को सदा स्मरण रखने के लिए 19 अपै्रल, 1975 को अन्तरिक्ष में स्थापित कियेे गये भारत में ही निर्मित प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।