21 मार्च/जन्म-दिवस
रूसी रामभक्त अकादमिक वरान्निकोव
रूसी नागरिकों को श्रीरामकथा का रसास्वादन कराने वाले श्री अलेक्जैंडर पेत्राविच का जन्म 21 मार्च, 1890 को उक्रोइन के जोलोतोनोशा कस्बे में एक गरीब बढ़ई प्योत्र इवानोविच के घर में हुआ था। वे नौ भाई-बहिन थे। उनकी मां घर में छलनियां बनाती थीं। बच्चे भी उनकी सहायता करते थे। अलेक्से को पढ़ने का बहुत शौक था। पांच वर्ष की अवस्था में वे बड़े भाई के साथ स्कूल जाने लगे; पर एक दिन अध्यापक ने छोटा कहकर उन्हें भगा दिया। इस पर उनके पिता ने उन्हें दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया। अलेक्से को किताबों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तक पढ़ने या प्राप्त करने के लिए लोगों के कुछ काम कर देते थे। मेधावी होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती थी। इस प्रकार वे पढ़ते रहे।
विश्वविद्यालय में श्री श्चेरवात्सकी और श्री ओल्देन बुर्ग के सान्निध्य में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू आदि भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने अध्यापन को अपनी आजीविका बनाया। 1917 में वे पेत्रोशाद वि.वि. में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष बने। इसे अब लेनिनग्राद वि.वि. कहते हैं। उन्होंने भारत के प्रमुख गद्य एवं पद्यकारों के साहित्य का अनुवाद किया। इसी दौरान उनका परिचय श्रीरामकथा से हुआ। 1936 में उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस’ का गद्य में अनुवाद किया। इसी वर्ष उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च ‘लेनिन पदक’ से विभूषित किया गया।
इसके बाद दस साल के परिश्रम से उन्होंने मानस का काव्यानुवाद किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया; पर उनके काम के महत्व को देखते हुए सरकार ने उन्हें कजाकिस्तान में एक सुरक्षित जगह भेज दिया। वहां बीमार पड़ने पर भी वे काम करते रहे। इसके प्रकाशित होते ही हजारों प्रतियां तुरंत बिक गयीं। इसके बाद उन्होंने हिन्दी, उर्दू और रूसी कोष का निर्माण किया। वे फारसी और जर्मन भाषा के भी विद्वान थे। फारसी के प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘जेन्दावेस्ता’ का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। 1939 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘रूसी अकादमी’ का सदस्य बनाया गया। इससे वे ‘अकादमी वरान्निकोव’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। 1949 में उनकी कृति ‘प्रेमचंद’ को सोवियत संघ में बहुत प्रसिद्धि एवं सम्मान मिला। श्रीरामचरितमानस की एक प्रति उनकी मेज पर सदा रखी रहती थी। वे तुलसीदास की तरह अपने में मगन रहकर ‘स्वान्तः सुखाय’ काम करने में विश्वास रखते थे।
श्री वरान्निकोव का मानना था कि किसी देश को जानने का सबसे अच्छा साधन वहां की भाषा, साहित्य, संस्कृति और इतिहास को जानना है। भारत को इसी तरह जानने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। उनकी पत्नी तथा सभी बच्चे भारत और भारतीयता के प्रेमी बने। उनके पुत्र पेत्रोविच वरान्निकोव अनुवाद कार्य में अपने पिता का सहयोग करते थे। वे कई बार भारत आये। भारत से कोई भी साहित्यकार रूस जाता था, तो वे उसका हृदय से स्वागत करते थे। यदि संभव हो, तो वे उन्हें अपने घर भी ले जाते थे। वहां उन्होंने भारत से संबंधित पुस्तक, चित्र एवं कलाकृतियों का एक संग्रहालय बना रखा था। उसे वे सबको बड़ी रुचि से दिखाते थे। उन्होंने अपने एक पुत्र का नाम ‘चंद्र’ रखा।
यद्यपि श्री वरान्निकोव भारतप्रेमी थे; पर दुर्भाग्यवश वे कभी भारतभूमि के दर्शन नहीं कर सके। 1946 में दिल्ली में गांधीजी ने ‘एशियायी सम्मेलन’ के उद्घाटन में कई विदेशी विद्वानों को बुलाया था। वे भी उसमें आना चाहते थे; पर बीमारी के कारण चिकित्सकों ने अनुमति नहीं दी। सात सितम्बर, 1952 को उनका निधन हुआ। उनकी समाधि पर देवनागरी लिपि में तुलसीदास के एक दोहे की अर्धाली ‘भलो भलाइंहि वै लहै’ अंकित है, जो उन्हें बहुत प्रिय थी। इसका अर्थ है कि भला आदमी किसी भी परिस्थिति में भलाई करने से पीछे नहीं हटता। रामभक्त श्री वरान्निकोव ऐसे ही भले आदमी थे।
(राष्ट्रधर्म, अपै्रल-मई 2020, शंभुनाथ टंडन)
nice
जवाब देंहटाएं