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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

2021 में कब रखा जाएगा करवा चौथ का व्रत? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, चांद निकलने का समय और सामग्री सूची

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👉🏼 *_2021 में कब रखा जाएगा करवा चौथ का व्रत? शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, चांद निकलने का समय और सामग्री सूची_*


🌐 *_प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन सुहागिन महिलाएं करवा चौथ व्रत रखती है। इस वर्ष करवा चौथ 2021 व्रत 24 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा। यह सौभाग्यवती स्त्रियों का सुन्दर सुहाग पर्व है। इस व्रत में सास अपनी बहू को सरगी देती है। इस सरगी को लेकर बहुएं अपने व्रत की शुरुआत करती हैं। यह व्रत सूर्योदय से पहले शुरू होता है जिसे चांद निकलने तक रखा जाता है। सुहागन स्त्रियों इस दिन निर्जला व्रत रखकर, रात में चांद देखने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। पति की दीर्घायु, यश-कीर्ति और सौभाग्य में वृद्धि के लिए इस व्रत को विशेष फलदायी माना गया है।_*


 🧾 *_हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ पर्व मनाया जाता है। करवा चौथ का व्रत सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत खास होता है। मान्यतानुसार इस दिन अगर सुहागिन महिलाएं व्रत-उपवास रखें तो उनके पति की आयु लंबी होती है और गृहस्थ जीवन सुखी रहता है। चांद निकलने के बाद महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और अपने पति के हाथ से पानी पीकर व्रत को संपन्न करती हैं। इस व्रत में सायंकाल के समय शुभ मुहूर्त में चांद निकलने से पहले पूरे शिव परिवार की पूजा की जाती है।_*

 

💮 *_पूजा विधि-_*

 

*_सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाएं। सरगी के रूप में मिला हुआ भोजन करें पानी पीएं और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।_*

 

*_करवा चौथ में महिलाएं पूरे दिन जल-अन्न कुछ ग्रहण नहीं करतीं फिर शाम के समय चांद को देखने के बाद दर्शन कर व्रत खोलती हैं।_*

 

*_पूजा के लिए शाम के समय एक मिट्टी की वेदी पर सभी देवताओं की स्थापना कर इसमें करवे रखें।_*

 

*_एक थाली में धूप, दीप, चंदन, रोली, सिन्दूर रखें और घी का दीपक जलाएं।_*

 

*_पूजा चांद निकलने के एक घंटे पहले शुरू कर देनी चाहिए। इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं।_*

 

*_पूजन के समय करवा चौथ कथा जरूर सुनें या सुनाएं।_*

 

*_चांद को छलनी से देखने के बाद अर्घ्य देकर चंद्रमा की पूजा करनी चाहिए।_*

 

*_चांद को देखने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलना चाहिए।_*

 

*_इस दिन बहुएं अपनी सास को थाली में मिठाई, फल, मेवे, रुपए आदि देकर उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद लेती हैं।_*


🌙 *_चंद्रमा को अर्घ्य देने का मंत्र-_*

 

*_करकं क्षीरसंपूर्णा तोयपूर्णमयापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥_*

*_इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे। सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।।_*

*_एवं व्रतंया कुरूते नारी सौभाग्य काम्यया। सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभते सुस्थिरां श्रियम्।।_*


🏉 *_करवा चौथ 2021 पूजन के शुभ मुहूर्त-_*

 

*_इस बार करवा चौथ 24 अक्टूबर, दिन रविवार को सुबह 03.01 मिनट से चतुर्थी तिथि प्रारंभ होकर सोमवार, 25 अक्टूबर 2021 को सुबह 05.43 मिनट पर चतुर्थी तिथि समाप्त होगी। इस दिन करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त 24 अक्टूबर को शाम 5.43 मिनट से 6.59 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को बेहद शुभ माना जाता है और इस वर्ष शुभ संयोग बन रहा है क्योंकि करवा चौथ का चांद रोहिणी नक्षत्र में निकलेगा।_*

 

🙏 *_करवा चौथ व्रत पारण और चंद्रोदय टाइम- अलग-अलग शहरों में चांद निकलने के समय में बदलाव हो सकता है। इस दिन 08.07 मिनट पर चांद के दर्शन हो सकते हैं। उसके बाद करवा चौथ व्रत का पारण किया जाएगा।_*

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि

 सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि 


सोलह सोमवार व्रत विशेष रूप से विवाहित जीवन में परेशानियों का सामना करने वाले लोगों के लिए है। यह व्रत अच्छे एवं मनोवांछित जीवन साथी को पाने के लिए भी किया जाता है। सोलह सोमवार व्रत का प्रारम्भ करने वाली माँ पार्वती स्वयं हैं। एक बार जब उन्होंने इस धरती पर अवतार लिया था तो वह एक बार पुनः भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए सोमवार व्रत की कठिन तपस्या और शिव पूजन का आयोजन किया।


सोलह सोमवार व्रत को सम्भव हो सके तो , श्रावण मास से ही शुरू करना चाहिए और लगातार 16 सोमवार तक इस व्रत को करते है। सोमवार के दिन प्रात:काल उठकर नित्य-क्रम कर स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को स्वच्छ कर शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर लें। शिव भगवान की प्रतिमा के सामने आसन पर बैठ जायें।


सोलह सोमवार व्रत पूजा सामग्री 


शिव जी की मूर्ति, भांग, बेलपत्र, जल,  धूप, दीप, गंगाजल, धतूरा, इत्र, सफेद चंदन, रोली, अष्टगंध, सफेद वस्त्र, नैवेद्य जिसे आधा सेर गेहूं के आँटे को घी में भून कर गुड़ मिला कर बना लें।


व्रत पूजा संकल्प 


किसी भी पूजा या व्रत को आरम्भ करने के लिये सर्व प्रथम संकल्प करना चाहिये। व्रत के पहले दिन संकल्प किया जाता है। उसके बाद आप नियमित पूजा और व्रत करें। सबसे पहले हाथ में जल, अक्षत, पान का पत्ता, सुपारी और कुछ सिक्के लेकर निम्न मंत्र के साथ संकल्प करें।


ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं अमुक कार्यसिद्धियार्थ सोलह सोमवार व्रत प्रारम्भ करिष्ये ।


सभी वस्तुएँ श्री शिव भगवान के पास छोड़ दें। अब दोनों हाथ जोड़कर शिव भगवान का ध्यान करें....


आवाहन 


हाथ में अक्षत तथा फूल लेकर दोनों हाथ जोड़ लें और भगवान शिव का आवाहन करें। 


ऊँ शिवशंकरमीशानं द्वादशार्द्धं त्रिलोचनम्।

उमासहितं देवं शिवं आवाहयाम्यहम्॥


• हाथ में लिये हुए फूल और अक्षत शिव भगवान को समर्पित करें।

• सबसे पहले भगवान शिव पर जल समर्पित करें।

• जल के बाद सफेद वस्त्र समर्पित करें।

• सफेद चंदन से भगवान को तिलक लगायें एवं तिलक पर अक्षत लगायें।

• सफेद पुष्प, धतुरा, बेल-पत्र, भांग एवं पुष्पमाला अर्पित करें।

• अष्टगंध, धूप अर्पित कर, दीप दिखायें।

• भगवान को भोग के रूप में ऋतु फल या बेल और नैवेद्य अर्पित करें।


इसके बाद सोमवार व्रत कथा को पढ़े अथवा सुने। ध्यान रखें कम-से-कम एक व्यक्ति इस कथा को अवश्य सुने। कथा सुनने वाला भी शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल के पास बैठे। तत्पश्चात शिव जी की आरती करें। दीप आरती के बाद कर्पूर जलाकर कर्पूरगौरं मंत्र से भी आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें और स्वयं भी आरती लें। इस दिन भगवान की महिमा का गुणगान सुनना और सुनाना अत्यंत लाभदायक है इसलिये सामर्थ्य अनुसार शिव स्टीटर चालीसा, शिवपुराण आदि का पाठ करें। सोलह सोमवार के दिन भक्तिपूर्वक व्रत करें। आधा सेर गेहूं का आटा को घी में भून कर गुड़ मिला कर अंगा बना लें । इसे तीन भाग में बाँट लें। अब दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करें। एक अंगा भगवान शिव को अर्पण करें। दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें, और स्वयं भी ग्रहण करें। सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर, घी और गुड़ बनाकर चूरमा बनायें. भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें।


सोलह सोमवार व्रत कथा


एक बार शिवजी और माता पार्वती मृत्यु लोक पर घूम रहे थे। घूमते घूमते वो विदर्भ देश के अमरावती नामक नगर में आये। उस नगर में एक सुंदर शिव मन्दिर था इसलिए महादेवजी  पार्वतीजी के साथ वहा रहने लग गये। एक दिन बातों बातोंं में पार्वतीजी ने शिवजी को चौसर खेलने को कहा। शिवजी राजी हो गये और चौसर खेलने लग गये।


उसी समय मंदिर का पुजारी दैनिक आरती के लिए आया पार्वती ने पुजारी से पूछा “बताओ हम दोनों में चौसर में कौन जीतेगा ” वो पुजारी भगवान शिव का भक्त था और उसके मुह से तुरन्त निकल पड़ा “महादेव जी जीतेंगे”। चौसर का खेल खत्म होने पर पार्वती जी जीत गयी और शिवजी हार गये। पार्वती जी ने क्रोधित होकर उस पुजारी को श्राप देना चाहा तभी शिवजी ने उन्हें रोक दिया और कहा कि ये तो भाग्य का खेल है उसकी कोई गलती नही है फिर भी माता पार्वती ने उस कोढ़ी होने का श्राप दे दिया और उसे कोढ़ हो गया। काफी समय तक वो कोढ़ से पीड़ित रहा। एक दिन एक अप्सरा उस मंदिर में शिवजी की आराधना के लिए आयी और उसने उस पुजारी के कोढ को देखा। अप्सरा ने उस पुजारी को कोढ़ का कारण पूछा तो उसने सारी घटना उसे सुना दी। अप्सरा ने उस पुजारी को कहा “तुम्हे इस कोढ़ से मुक्ति पाने के लिए सोलह सोमवार व्रत करना चाहिए ” उस पुजारी ने व्रत करने की विधि पूछी। अप्सरा ने बताया “सोमवार के दिन नहा धोकर साफ़ कपड़े पहन लेना और आधा किलो आटे से पंजीरी बना देना, उस पंजीरी के तीन भाग करना, प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करना, इस पंजीरी के एक तिहाई हिस्से को आरती में आने वाले लोगो को प्रसाद के रूप में देना, इस तरह सोलह सोमवार तक यही विधि अपनाना, 17 वे सोमवार को एक चौथाई गेहू के आटे से चूरमा बना देना और शिवजी को अर्पित कर लोगो में बाट देना, इससे तुम्हारा कोढ़ दूर हो जायेगा। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने से उसका कोढ़ दूर हो गया और वो खुशी खुशी रहने लगा।


एक दिन शिवजी और पार्वती जी दुबारा उस मंदिर में लौटे और उस पुजारी को एकदम स्वस्थ देखा। पार्वती जी ने उस पुजारी से स्वास्थ्य लाभ होने का राज पूछा। उस पुजारी ने कहा उसने 16 सोमवार व्रत किये जिससे उसका कोढ़ दूर हो गया। पार्वती जी इस व्रत के बारे में सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने भी ये व्रत किया और इससे उनका पुत्र वापस घर लौट आया और आज्ञाकारी बन गया। कार्तिकेय ने अपनी माता से उनके मानसिक परविर्तन का कारण पूछा जिससे वो वापस घर लौट आये पार्वती ने उन्हें इन सब के पीछे सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया कार्तिकेय यह सुनकर बहुत खुश हुए।


कार्तिकेय ने अपने विदेश गये ब्राह्मण मित्र से मिलने के लिए उस व्रत को किया और सोलह सोमवार होने पर उनका मित्र उनसे मिलने विदेश से वापस लौट आया। उनके मित्र ने इस राज का कारण पूछा तो कार्तिकेय ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई यह सुनकर उस ब्राह्मण मित्र ने भी विवाह के लिए सोलह सोमवार व्रत रखने के लिए विचार किया। एक दिन राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था। कई राजकुमार राजा की पुत्री से विवाह करने के लिए आये। राजा ने एक शर्त रखी कि जिस भी व्यक्ति के गले में हथिनी वरमाला डालेगी उसके साथ ही उसकी पुत्री का विवाह होगा। वो ब्राह्मण भी वही था और भाग्य से उस हथिनी ने उस ब्राह्मण के गले में वरमाला डाल दी और शर्त के अनुसार राजा ने उस ब्राह्मण से अपनी पुत्री का विवाह करा दिया।


एक दिन राजकुमारी ने ब्राह्मण से पूछा आपने ऐसा क्या पुण्य किया जो हथिनी ने दुसरे सभी राजकुमारों को छोडकर आपके गले में वरमाला डाली। उसने कहा “प्रिये मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के कहने पर सोलह सोमवार व्रत किये थे उसी के परिणामस्वरुप तुम लक्ष्मी जैसी दुल्हन मुझे मिली ” राजकुमारी यह सुनकर बहुत प्रभावित हुई और उसने भी पुत्र प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार व्रत रखा फलस्वरूप उसके एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और जब पुत्र बड़ा हुआ तो पुत्र ने पूछा “माँ आपने ऐसा क्या किया जो आपको मेरे जैसा पुत्र मिला ” उसने भी पुत्र को सोलह सोमवार व्रत की महिमा बतायी।


यह सुनकर उसने भी राजपाट की इच्छा के लिए ये व्रत रखा। उसी समय एक राजा अपनी पुत्री के विवाह के लिए वर तलाश कर रहा था तो लोगो ने उस बालक को विवाह के लिए उचित बताया। राजा को इसकी सूचना मिलते ही उसने अपनी पुत्री का विवाह उस बालक के साथ कर दिया। कुछ सालो बाद जब राजा की मृत्यु हुयी तो वो राजा बन गया क्योंकि उस राजा के कोई पुत्र नही था।राजपाट मिलने के बाद भी वो सोमवार व्रत करता रहा। एक दिन 17 वे सोमवार व्रत पर उसकी पत्नी को भी पूजा के लिए शिव मंदिर आने को कहा लेकिन उसने खुद आने के बजाय दासी को भेज दिया। ब्राह्मण पुत्र के पूजा खत्म होने के बाद आकाशवाणी हुयी “तुम अपनी पत्नी को अपने महल से दूर रखो, वरना तुम्हारा विनाश हो जाएगा ” ब्राह्मण पुत्र ये सुनकर बहुत आश्चर्यचकित हुआ।


महल वापस लौटने पर उसने अपने दरबारियों को भी ये बात बताई तो दरबारियों ने कहा कि जिसकी वजह से ही उसे राजपाट मिला है वो उसी को महल से बाहर निकालेगा। लेकिन उस ब्राह्मण पुत्र ने उसे महल से बाहर निकल दिया। वो राजकुमारी भूखी प्यासी एक अनजान नगर में आयी। वहा पर एक बुढी औरत धागा बेचने बाजार जा रही थी। जैसे ही उसने राजकुमारी को देखा तो उसने उसकी मदद करते हुए उसके साथ व्यापार में मदद करने को कहा।राजकुमारी ने भी एक टोकरी अपने सर पर रख ली। कुछ दूरी पर चलने के बाद एक तूफान आया और वो टोकरी उडकर चली गयी अब वो बुढी औरत रोने लग गयी और उसने राजकुमारी को मनहूस मानते हुए चले जाने को कहा।


उसके बाद वो एक तेली के घर पहुची उसके वहा पहुचते ही सारे तेल के घड़े फूट गये और तेल बहने लग गया। उस तेली ने भी उसे मनहूस मानकर उसको वहा से भगा दिया। उसके बाद वो एक सुंदर तालाब के पास पहुची और जैसे ही पानी पीने लगी उस पानी में कीड़े चलने लगे और सारा पानी धुंधला हो गया। अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए उसने गंदा पानी पी लिया और पेड़ के नीचे सो गयी जैसे ही वो पेड़ के नीचे सोयी उस पेड़ की सारी पत्तियाँ झड़ गयी। अब वो जिस पेड़ के पास जाती उसकी पत्तियाँँ गिर जाती थी।


ऐसा देखकर वहाँ के लोग मंदिर के पुजारी के पास गये। उस पुजारी ने उस राजकुमारी का दर्द समझते हुए उससे कहा - बेटी तुम मेरे परिवार के साथ रहो, मै तुम्हे अपनी बेटी की तरह रखूंगा, तुम्हे मेरे आश्रम में कोई तकलीफ नही होगी ।” इस तरह वह आश्रम में रहने लग गयी अब वो जो भी खाना बनाती या पानी लाती उसमे कीड़े पड़ जाते। ऐसा देखकर वो पुजारी आश्चर्यचकित होकर उससे बोला “बेटी तुम पर ये कैसा कोप है जो तुम्हारी ऐसी हालत है ” उसने वही शिवपूजा में ना जाने वाली कहानी सुनाई।उस पुजारी ने शिवजी की आराधना की और उसको सोलह सोमवार व्रत करने को कहा जिससे उसे जरुर राहत मिलेगी।


उसने सोलह सोमवार व्रत किया और 17 वे सोमवार पर ब्राह्मण पुत्र उसके बारे में सोचने लगा “वह कहाँ होगी, मुझे उसकी तलाश करनी चाहिये ।” इसलिए उसने अपने आदमी भेजकर अपनी पत्नी को ढूंढने को कहा उसके आदमी ढूंढते ढूंढते उस पुजारी के घर पहुच गये और उन्हें वहा राजकुमारी का पता चल गया। उन्होंने पुजारी से राजकुमारी को घर ले जाने को कहा लेकिन पुजारी ने मना करते हुए कहा “अपने राजा को कहो कि खुद आकर इसे ले जाए ।” राजा खुद वहाँ पर आया और राजकुमारी को वापस अपने महल लेकर आया। इस तरह जो भी यह सोलह सोमवार व्रत करता है उसकी सभी मनोकामनाए पूरी होती हैं।



16 सोमवार व्रत उद्यापन विधि 


उद्यापन 16 सोमवार व्रत की संख्या पूरी होने पर 17 वें सोमवार को किया जाता है। श्रावण मास के प्रथम या तृतीय सोमवार को करना सबसे अच्छा माना जाता है। वैसे कार्तिक, श्रावण, ज्येष्ठ, वैशाख या मार्गशीर्ष मास के किसी भी सोमवार को व्रत का उद्यापन कर सकते हैं। सोमवार व्रत के उद्यापन में उमा-महेश और चन्द्रदेव का संयुक्त रूप से पूजन और हवन किया जाता है।


इस व्रत के उद्यापन के लिए सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें, और आराधना हेतु चार द्वारो का मंडप तैयार करें। वेदी बनाकर देवताओ का आह्वान करें, और कलश की स्थापना करें।


इसके बाद उसमे पानी से भरे हुए पात्र को रखें। पंचाक्षर मंत्र (ऊँ नमः शिवाय) से भगवान् शिव जी को वहाँ स्थापित करें। गंध, पुष्प, धप, नैवेद्य, फल, दक्षिणा, ताम्बूल, फूल, दर्पण, आदि देवताओ को अर्पित करें। इसके बाद आप शिव जी को पञ्च तत्वो से स्नान कराएं, और हवन आरम्भ करें। हवन की समाप्ति पर दक्षिणा, और भूषण देकर आचार्य को गो का दान दें। पूजा का सभी सामान भी उन्हें दें और बाद में उन्हें अच्छे से भोजन कराकर भेजे और आप भी भोजन ग्रहण करें।


महादेव जी की आरती


ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।

त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर...॥


कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।


गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥

कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।


रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर...॥


तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।

तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥


क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्‌।


इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्‌ ॥ हर...॥


बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।

किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥


धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।

क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर...॥


रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।


चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥


तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।

अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर...॥


कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्‌।

त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्‌॥


सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्‌।

डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्‌ ॥ हर...॥


मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्‌।


वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्‌॥


सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्‌।

इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर...॥


शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।

नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥


अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।


अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर...॥

ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।


रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥

संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।


शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर...॥



त्रिदेवो की आरती


ॐ जय शिव ओंकारा....

एकानन चतुरानन पंचांनन राजे।

हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें।

तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी।

चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा....

श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें।

सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें।।

ॐ जय शिव ओंकारा...

कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता।

जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी।

नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें|

कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा।


रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र


जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥


जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥


धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥


जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥


सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥


ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥


कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥


नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ 


प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥


अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥


जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥


दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥


कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥


प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥


पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥


॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥ 



धनदायक शिव कुबेर मंत्र


मन्त्र :- ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम :


इस मन्त्र का प्रयोग व्रत के दिन सुविधा अनुसार समय निकालकर करना चाहिये सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहर्त में करना अधिक फलप्रद है। इस प्रयोग से पूर्व व्यक्ति स्नान आदि करे एवं स्वच्छ वस्त्र पहन कर ही मंदिर में प्रवेश करे। भगवान शिव के मंदिर में इस मन्त्र का उच्चारण करे। यदि यह प्रयोग आप बिल्व वृक्ष के जड़ो के समीप बैठकर करे तो यह मन्त्र और अधिक शीघ्र प्रभाव में आता है. इस मन्त्र का एक हजार जप व्यक्ति को हर आर्थिक समस्याओ से मुक्ति दिला देगा तथा व्यक्ति के घर की सभी दरिद्रता चली जायेगी व व्यक्ति को शीघ्र अपार धन की प्राप्ति होगी।


एक और आवश्यक बात जब भी आप इन मंत्रो का जाप करे तो भगवान शिव को अपने ध्यान में रखे। ऐसा इसलिए क्योकि कुबेर देव भगवान शिव को अपना गुरु मानते थे । शास्त्रो के अनुसार कुबेर देव को प्रसन्न करने के लिए अनेक उपाय बतलाये गए है जिनमे मन्त्र साधना द्वारा एक ऐसा उपाय है जिससे कुबेर देव अति शीघ्र प्रसन्न होता है।


थर्मल पावर प्लाट,भारत बनेगा विश्वगुरु

 #भारत_बनेगा_विश्वगुरु 😊


पिछले कुछ दिनो से कोयले की हो रही कमी की वजह से पूरा विश्व परेशान है। दरअसल अब तक लगभग विश्व के सभी देश "थर्मल पावर प्लाट" के जरिये से ही उर्जा का उत्पादन करते थे। जो कि कोयले पर ही निर्भर रहता है।


अब जब कोयले की प्रतिदिन ही कमी हो रही है तो सबको थोरियम पर निर्भर होकर तरल फ्लोराइड थोरियम रिएक्टर के क्षेत्र मे काम करना होगा। मतलब की अब लगभग सभी देशों को थोरियम से ही उर्जा का उत्पादन करने के क्षेत्र में काम करना होगा।


खुशी की बात यह है कि पूरे विश्व का 33% थोरियम सिर्फ भारत के पास है। परमाणु ऊर्जा विभाग के मुताबिक भारत में एक करोड टन 'मोनाजाइट' है जिसमें करीब 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड भरा हुआ है।


कहने का मतलब ये है कि अब लगभग विश्व के सभी देशों को भारत पर निर्भर रहना पडेगा। इससे भारत की आर्थिक स्थिति और भी बेहतर होगी।


जानकारी के लिये आपको ये बता दें कि एक किलो कोयले से सिर्फ तीन यूनिट बिजली बनती है। 1 किलो थोरियम से लगभग 6 करोड यूनिट बिजली बनती है। ✍️


विजय दशमी,महत्व,पूजा

 *विजय दशमी पर प्रत्येक हिंदू को शस्त्र पूजा करनी है! और अपनी तस्वीर सोशियल मीडिया पर पोस्ट करनी है! ये शस्त्र सूक्तियां आज ध्यान में ले लें!*


*शस्त्र निष्क्रिय होते हुए भी, सक्रिय होता है! यानि अगर वो कहीं किसी आलमारी में पड़ा पड़ा जंग खा रहा हो, तो भी अपना काम करता रहता है! उसकी हयाती ही शत्रुओं के बूरे और कुत्सित विचारों को नष्ट करने के लिए परयाप्त होती है!*


*विश्व में अशांति इसलिए है, कि सज्जनों ने शस्त्रों का त्याग कर दिया है, और दुर्जन सदैव की तरह शस्त्रों से लैस हैं! यही कारण है, कि दुर्जन हावी हैं, और धरती पर अनाचार फैलता जा रहा है!*


*विश्व को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है - एक जिनके पास शस्त्र होता है, और दूसरा जिनके पास शस्त्र नहीं होता है!*


*जिनके पास शस्त्र होता है, वो सदैव निडर और वीर बने रहते हैं! और जिनके पास शस्त्र नहीं होते हैं, और वो सदैव भयभीत होते हैं और कायर पुरुष बने रहते हैं!*


*जिस घर में अस्त्र-शस्त्र होते हैं, उस घर की स्त्रियों पर कभी किसी की कुदृष्टि डालने की हिम्मत भी नहीं होती है, और जिनके घर में अस्त्र-शस्त्र नहीं होते हैं, उनकी स्त्रियों के साथ, राह चलते छेड़खानी होती है, लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं, और वो सदैव थाने के चक्कर ही लगाते रह जाते हैं! उन्हें बदनामी के सिवाय कभी कुछ हासिल नहीं होता है!*


*सत्यमेव जयते... यानी सत्य का ही विजय होता है! इस तरह की सूक्तियों के भरोसे बैठने से कोई लाभ नहीं है! सत्य तो हिंदुओं के साथ ही है! फिर उनका पलायन क्यों हो रहा है?* 


*सत्य तो युद्धिष्ठिर के साथ था, लेकिन फिर भी वन वन भटकते रहे! जब युद्धिष्ठिर ने शस्त्र उठाया, तभी सत्यमेव जयते हुआ!*


*इसीलिए अब कहावतें बदल गई हैं! ये कलियुग है, और कलियुग में सदैव शस्त्र मेव जयते होता है! यानी जिसके पास शस्त्र होगा, उसी का विजय होगा! इसलिए शस्त्र को अपनाओ! अपने पास शस्त्र सदैव रखो!*


*ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से भी ध्यान दें! शस्त्र का अर्थ है मंगल ग्रह! अगर आपके पास शस्त्र है, तो आपका मंगल मजबूत है! और अगर आपका मंगल मजबूत है, तो आप शत्रुओं पर सदैव विजय प्राप्त करते रहेंगे! इसलिए अपनी भुजाओं को शस्त्रों से बलवान करें!*


*एक बार अपने हाथ में शस्त्र लेकर देखो! तब आपको ये अनुभव होगा, कि देशद्रोही शत्रु चींटियों के समान हैं! शस्त्र का होना ही  आत्मविश्वास वर्धक महान मानसिक औषधि है! इसका नित्य सेवन करते रहो!*


*राष्ट्र के शत्रुओं की संख्या गिनकर चिंता में मत पड़ो! चिंता सदैव इस बात की करो, कि तुम्हारे पास कितने अस्त्र आधुनिक और भयंकर शस्त्र है!*


*सदैव सुनिश्चित करो, कि तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रों की संख्या तुम्हारे शत्रुओं की संख्या से अधिक तथा तीव्र और शक्तिशाली हो!*

 

*जैसा को तैसा उत्तर देना सीखो! शिकायत मत करो! शिकायत लेकर किसके पास जा रहे हो? ये संविधान, कानून, प्रशासन और व्यवस्था केवल उनके लिए है, जो शक्तिशाली हैं!*


*कायर लोगों का साथ तो भगवान भी नहीं देता! कायर लोग केवल शिकायत करते रह जाते हैंं!*


*इतने दिनों में आपको ये अवश्य अनुभव हुआ होगा, कि प्रशासन भी सदैव अत्याचार करने वाले शक्तिशालियों का साथ ही देता है!*


*अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी स्वयं लो! कोई सेना, कोई सरकार तुमको बचाने नहीं आएगी! जब तुम पर संकट आएगा, तो उस समय तुम, और केवल तुमको ही उसका सामना करना होगा! तुम्हारे सिवाय कोई तुम्हारी प्राण रक्षा नहीं कर सकेगा!*


*इसीलिए, नियमानुसार शस्त्रों का संचय करो! सदैव पराक्रमी बनो! सज्जन बनो, लेकिन कायर नहीं! शस्त्र धारण करके, सज्जन बनो! तभी तुम्हारी सज्जनता सुशोभित होगी!*


*इस सूक्ति का नित्य पठन करते रहें - “कोई सिंह को, वन के राजा के रूप में अभिषेक या संस्कार नहीं करता है! अपने पराक्रम के बल पर, सिंह स्वयं जंगल का राजा बन जाता है!”*



इतिहास से हमें सीखना होगा



*इतिहास से हमें सीखना होगा―*


हमारी कुछ भूलें थीं जिनके कारण शिवाजी का महान हिंदू साम्राज्य के बाद भी भारत ईसाइयों के कब्जे में चला गया था और दुर्भाग्य से उन्हीं भूलों को हम आज भी दोहरा रहे हैं।


सन् 1802 तक भारत के 80% हिस्से पर शासन करने वाला साम्राज्य 1818 तक बिखर जाता है और कारण सिर्फ एक *आपसी फूट* यदि मराठा साम्राज्य का पतन नहीं होता तो अंग्रेज भारत में कभी नहीन घुस पाते और यह देश आज भी सोने की चिड़िया होता।


हर साम्राज्य का एक दस्तूर होता है कि पहले तो समाज एकजुट होकर बुराई से लड़ता है *बुराई हार जाती है और वह समाज राष्ट्र का निर्माण करता है इसके बाद वही समाज आपस में बैर रखना शुरू कर देता है जिसके नतीजे में राष्ट्र का पतन हो जाता है*। 


सन् 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदुराष्ट्र की पुनः स्थापना के लिए मराठा साम्राज्य की नींव रखी, 1757 में मुगल सल्तनत खत्म हो गयी और मराठा साम्राज्य में उसका विलय हो गया, 1775 में अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा करने के लिए युद्ध किया और मराठाओं ने उन्हें भी पराजित कर दिया *अंग्रेजों को हराकर मराठा साम्राज्य एशिया में सबसे बड़ी ताकत बना*।


उस समय मराठा साम्राज्य में भी 2 सबसे बड़ी शक्तियां थी ग्वालियर के महाराज महादजी सिंधिया और इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर मगर 1801 तक स्थिति बदल गयी महादजी सिंधिया की मृत्यु हो चुकी थी और उनके 22 वर्षीय पुत्र दौलतराव राजा थे इसके अतिरिक्त इंदौर में भी अहिल्याबाई की जगह 23 वर्षीय यशवंत राव होल्कर राज कर रहे थे।


उस समय 25 वर्षीय बाजीराव द्वितीय पेशवा थे *पेशवा को कैसे शासन करना चाहिए इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं था* इसके पूर्व जितने भी पेशवा रहे वे सब कमाल के रणनीतिकार थे *मगर बाजीराव द्वितीय अयोग्य थे*।


राजपूताने को लेकर सिंधिया और होल्कर एक दूसरे से भीड़ गए *सिंधिया ने पेशवा को अपनी मुट्ठी में करके होल्कर वंश के खास सदस्य को मरवा दिया* यह हत्या मराठा साम्राज्य के साथ साथ भारत को भी ले डूबी, 1802 में यशवंत राव होल्कर ने सिंधिया को उज्जैन में पराजित किया और पुणे आकर पेशवा को भी हरा दिया।


*पेशवा घबराकर अंग्रेजों के पास जा पहुँचा और बस यही भारत का बना बनाया इतिहास कचरा हो गया* पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों को कई जागीरे देने का आश्वासन दिया बदले में अंग्रेजों ने उसे वापस पुणे ले जाकर पेशवा बनाने का वादा किया। 


होल्कर और सिंधिया को अपनी गलती का आभास हुआ और वे देश के लिए एकजुट हो गए लेकिन इन्हें झटका तब लगा जब बड़ौदा के राजा आनंद राव गायकवाड़ ने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया, *पेशवा*, *होल्कर*, *सिंधिया* और *भौसले भी नए थे* युद्धों का अनुभव *सिर्फ गायकवाड़ को था*।


फिर भी ये तीनों अंग्रेजों से जा भिड़े और इस तरह दूसरे आंग्ल मराठा युद्ध की शुरुआत हुई *इस युद्ध मे भी मराठे* अंग्रेजों से ज्यादा ताकतवर थे और उन्हें हर मोर्चे पर मात दे रहे थे लेकिन अनुभव की कमी मराठो को ले डूबी *मराठे थोड़े राजपूताने को छोड़कर पूरे उत्तर भारत से समाप्त हो गए* बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने फिर से पेशवा बना दिया।


बाजीराव द्वितीय जब बड़ा हुआ तो उसे अहसास हुआ कि उसने पेशवाई का सम्मान मिट्टी में मिला दिया है उसका राष्ट्रवाद जागा और 1817 में उसने दोबारा होल्कर, सिंधिया तथा भौसले की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, इंदौर में यशवंत राव होल्कर चल बसे थे और उनके 10 वर्ष के बालक इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, सिंधिया उत्तर भारत में अकेले घिरे हुए थे और किसी तरह दिल्ली को दोबारा जीतने का असफल प्रयास कर रहे थे।


अंग्रेजों और मराठो के बीच तीसरा युद्ध हुआ इसमें मराठो की न सिर्फ पराजय हुई बल्कि साम्राज्य का पतन भी हो गया और बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने पुणे से निकालकर बिठूर में 8 लाख रुपये सालाना की जागीर दे दी, पेशवाई और मराठा साम्राज्य जैसे ही समाप्त हुए भारत माता एक बार फिर 130 वर्षो के लिए गुलामी की जंजीरों में जकड़ दी गयी। 


*अब आप खुद अंदाज लगाए सन् 1800 तक पूरे भारत पर राज कर रहा एक साम्राज्य 1818 में कैसे समाप्त हो गया???*


*पहला कारण* था मराठा राजाओं ने राजपूताने से संबंध अच्छे नहीं रखे, मराठा राजपूतों से चौथ वसूल रहे थे मगर उनके राज्य के हितों को लेकर सजग नहीं थे ना ही उन्हें अपने बराबर मानते थे, राजपूत मराठो की तुलना में कम शक्ति सम्पन्न होंगे मगर वे वीर थे, मराठे यदि अंग्रेजों के विरुद्ध उन्हें साथ लेते तो क्या आज इतिहास कुछ और नहीं होता???


*दूसरी कमजोरी* थी जरूरत से ज्यादा जोश, यशवंतराव होल्कर अपने अपमान को लेकर इतने उत्तेजित हो गए कि मराठा राजधानी पुणे पर ही धावा बोल दिया, उनकी इस कार्रवाई के कारण इंदौर का खजाना खाली हो गया और हजारों मराठा सैनिक भी मारे गए इसके अलावा मराठो की आपसी फूट लंदन तक पहुँच गयी।


मराठाओ की *तीसरी गलती* थी अनुशासनहीनता, प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध में मराठे बहुत अनुशासन से लड़े जबकि दूसरे युद्ध में वे हर किसी मोर्चे पर भीड़ रहे थे *वे दिल्ली*, *पुणे*, *गुजरात* और *राजपूताने में एक साथ अंग्रेजो से लड़ रहे थे* नतीजा विजय कहीं भी नहीं मिली।


मराठाओ के पतन का *चौथा कारण* स्वयं नियति थी सारे योद्धा अनुभवहीन थे और अनुभवी योद्धा गायकवाड़ अंग्रेजों के साथ थे *संभाजी महाराज*, *पेशवा बाजीराव प्रथम* और *महादजी सिंधिया जैसे महानुभव मराठो को छोड़कर जा चुके थे* नतीजा यह हुआ कि मराठे मरने मारने से अधिक कोई रणनीति नहीं बना सके और अपने अंत तक स्वयं पहुँच गए।


*ये थे वे चार आधार स्तंभ जिन्होंने मराठा साम्राज्य को गिराने में अहम भूमिका निभाई* आज यही चार कारण किसी न किसी रूप में भारत के पतन में लगे हुए है *मराठाओ की जो दास्तान लिखी गयी है वह मात्र 200 वर्ष पुरानी है इसलिए अपने इतिहास को इतना जल्दी न भुलाए की इतिहास हमें ही भुला बैठे*।



शरद पूर्णिमा/कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा का महत्व, पूजा विधि,र्वत कथा


शरद पूर्णिमा/कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा का महत्व, पूजा विधि,र्वत कथा



शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को कहते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है।


हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।


पुराणों में इस व्रत की कथा इस प्रकार है---

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।


उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है।


“उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।"

इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे।

धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।

इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

राहुल भैया : जय और मौसी संवाद

         राहुल  भैया : जय और मौसी संवाद 

 

*जय :*  .. मौसी  इस  बार  हमारे  *राहुल  भैया*  को ही  वोट  दीजियेगा.


*मौसी :*  .. देखो  बेटा,  वोट  देना  है  तो  कुछ  तो  पूछना  पड़ेगा. कुछ  कमाता  है  या फ़िर  गरीबों  के  घर ही  खाना  खाता  है . .


*जय :*  .. अरे  नहीँ  मौसी,  जब  शादी  हो  जायेगी  तो कमाने  भी  लगेगा और  घर  पर  खायेगा  भी .



*मौसी :*  मतलब  50 के  ऊपर  का  हो  गया  और  शादी  भी  नहीं  हुई . *कोई  उसे  अपनी  बेटी  भी  नहीं  दे  रहा  और.... मैं  अपना  कीमती  वोट  दे  दूं .*


*जय :*  .. अरे  नहीं  नहीं मौसी, उसकी  उम्र  भले  ही  50  के  ऊपर  हो  गईं  हैं  . . . लेकिन  दिमाग़  अभी  भी  10 - 15 साल  के  बच्चे  का  ही  है .


*मौसी :* . मतलब मंद बुद्धि  भी  है .


*जय :*  . . अरे  नहीं  मौसी  . .थोड़ी  संगत जरुर चापलुसो  कीं  हैं पर जैसे  ही  संगत  छूटेगी, अपने  दिमाग़  का भी इस्तेमाल  करने  लगेगा. और  धीरेधीरे  बड़ा  भी  हो जायेगा .



*मौसी:* हाय दैया, अब ये न कह देना कि कहीं नैन मटक्का भी करता है ?


*जय :* अरे मौसी, एक दो बार संसद में आंख मार दी तो इसमें कौन सा भूचाल आ गया ?


*मौसी:* हे भगवान, चोरी, बेईमानी रह गई है, बेटा वो भी हो तो बता दो ।


*जय :* अरे मौसी, कोई छुटपुट चोर थोड़े ही है, अब एक मुकद्दमा है, केवल पांच हजार करोड़ का नेशनल हेराल्ड का, वो भी खत्म हो जाएगा जब उनकी सरकार आ जाएगी ।


*मौसी :* वाह बेटा वाह, पक्के कांग्रेसी हो, सारे अवगुण हैं तुम्हारे राहुल भैया में पर जो मजाल है कि तुम उसे बुरा कह दो... तुम्हारे.. *राहुल भइया ~  नकारा  है. मंद बुद्धि  है. और  संगत  भी  अच्छी  नहीं  है. ..  चोर भी है फिर  भी  वोट  उन्हीं  को  दूं ..*!

*भारत की नागरिक हूं, कोई चीन पाकिस्तान की नहीं, जो  इस नासपीटे को वोट दे दूं ।*

ये तो.. मुश्किल  ही नहीं, नामुमकिन है  बेटा !!


*जय :* ठीक है। मेरे इतने समझाने पर भी आपने इन्कार कर दिया।

बेचारा राहुल भैया।😀😂🤣👌

                                    लेखक:- देवेन्द्र कुमार शर्मा 

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप,सिद्धियां,पूजा विधि,ध्यान मंत्र

 नवरात्री के नवें दिन आदि शक्ति माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की उपासना विधि


माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप


नवरात्र-पूजन के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं उन्हें नवमी के दिन इनका पूजन अवश्य करना चाहिए।


सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है। नवरात्र के नौवें दिन जीवन में यश बल और धन की प्राप्ति हेतु इनकी पूजा की जाती है। तथा नवरात्रों का की नौ रात्रियों का समापन होता है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं, इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का होता है। देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है, मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है। प्रसन्न होने पर माँ सिद्धिदात्री सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं।


माँ की सिद्धियां


मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। वे सिद्धिदात्री, सिंह वाहिनी, चतुर्भुजा तथा प्रसन्नवदना हैं। मार्कंडेय पुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व- ये आठ सिद्धियां बतलाई गई हैं। इन सभी सिद्धियों को देने वाली सिद्धिदात्री मां हैं। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें अज्ञान, तमस, असंतोष आदि से निकालकर स्वाध्याय, उद्यम, उत्साह, क‌र्त्तव्यनिष्ठा की ओर ले जाता है और नैतिक व चारित्रिक रूप से सबल बनाता है। हमारी तृष्णाओं व वासनाओं को नियंत्रित करके हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करते हुए हमें स्वयं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है। देवी पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने इन्हीं शक्तिस्वरूपा देवी जी की उपासना करके सभी सिद्धियां प्राप्त की थीं, जिसके प्रभाव से शिव जी का स्वरूप अ‌र्द्धनारीश्वर का हो गया था।


इसके अलावा ब्रह्ववैवर्त पुराण में अनेक सिद्धियों का वर्णन है 

जैसे 

1. सर्वकामावसायिता 

2. सर्वज्ञत्व 

3. दूरश्रवण 

4. परकायप्रवेशन 

5. वाक्‌सिद्धि 

6. कल्पवृक्षत्व 

7. सृष्टि 

8. संहारकरणसामर्थ्य 

9. अमरत्व 

10 सर्वन्यायकत्व।

कुल मिलाकर 18 प्रकार की सिद्धियों का हमारे शास्त्रों में वर्णन मिलता है। यह देवी इन सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं। इनकी पूजा से भक्तों को ये सिद्धियां प्राप्त होती हैं।


माँ सिद्धिदात्री की पूजा विधि


सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं। उन्हें नवमी के दिन निर्वाण चक्र का भेदन करना चाहिए। दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। हवन से पूर्व सभी देवी दवाताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए. बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार अहुति दें।


माँ सिद्धिदात्री का ध्यान मंत्र


वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।

शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।

कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥


माँ सिद्धिदात्री का स्तोत्र पाठ


कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।

स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।

नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।

विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।

भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।

मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥


  माँ सिद्धिदात्री कवच


ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।

हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥

ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।

कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥


उपाय


मेहनत और परिश्रम के उपरांत भी धन लाभ नहीं हो रहा, मां लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो यह उपाय करें


मां भगवती सिद्घदात्री को हर रोज भगवती का ध्यान करते हुए पीले पुष्प अर्पित करें। मोती चूर के लड्डुओं का भोग लगाएं ओर श्री विग्रह के सामने घी का दीपक जलाएं। ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै: ऊँ सिद्घिदात्री विच्चै: नम:। मंत्र का जाप करें। धन की कमी नहीं रहेगी। धन लाभ के लिए मां भगवती के मंदिर में गुलाब की सुगंधित धूपबत्ती शुक्रवार के दिन दान करें। प्रत्येक शुक्लपक्ष की नवमी को 7 मुट्ठी काले तिल पारिवारिक सदस्यों के ऊपर से 7 बार उसार कर उत्तर दिशा में फेंक दे। धन हानि नहीं होगी।


माँ सिद्धिदात्री जी की आरती


जै सिद्धि दात्री मां तूं है सिद्धि की दाता|

तूं भक्तों की रक्षक तूं दासों की माता||


तेरा नाम लेटे ही मिलती है सिद्धि|

तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि||


कठिन काम सिद्ध करती हो तुम|

जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम||


तेरी पूजा में तो न कोई विधि है|

तूं जगदम्बे दाती तूं सर्व सिद्धि है||


रविवार को तेरा सुमिरन करे जो|

तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो||


तूं सब काज उसके करती हो पूरे|

कभी काम उसके रहे न अधूरे||


तुम्हारी दया और तुम्हारी है माया|

रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया||


सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्य शाली|

जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली

रविवार, 10 अक्टूबर 2021

_कुंभ और मकर राशि वाले क्यों करें शनि की उपासना, जानिए 10 बड़े कारण

 .......... ✦•••  *_जय श्री हरि_*  •••✦ ........

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🔮 *_कुंभ और मकर राशि वाले क्यों करें शनि की उपासना, जानिए 10 बड़े कारण_*


*_शनि ग्रह एक राशि में ढाई वर्ष रहता है। साल 2021 में वह एक राशि में पिछले साल से ही गोचर कर रहा है जिसके कारण चार राशियों पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है। आओ जानते हैं कि कुंभ और मकर राशि वालों को क्यों करना चाहिए शनिदेव की उपासना।_*

 

👉🏼 *_1. कुंभ और मकर राशि का स्वामी शनि ग्रह है।_*

 

⌛ *_2. वर्तमान में मकर राशि में ही शनि ग्रह विराजमान है जो 29 अप्रैल साल 2022 तक रहेंगे।_*

 

➡️ *_3. धनु, मकर और कुंभ राशि पर साल 2021 में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या रहेगी। वर्तमान में शनि ग्रह के मकर राशि में रहने के कारण वर्ष 2021 में धनु, मकर और कुंभ इन तीन राशियों पर साल 2021 में शनि की साढ़ेसाती  चल रही है जबकि मिथुन और कन्या पर ढैय्या चल रही है।_*

 

👺 *_4. शनि 29 अप्रैल साल 2022 को मकर से निकलकर कुंभ में जाएंगे। शनि का कुंभ राशि में प्रवेश से मीन, कुंभ और मकर राशि पर शनि की साढ़ेसाती तथा कर्क और वृश्चिक राशि पर शनि की ढैय्या लगेगी।_*


🗣️ *_5. कहते हैं कि शनि की साढ़ेसाती के पहले चरण में शनि जातक की आर्थिक स्थिति पर, दूसरे चरण में पारिवारिक जीवन और तीसरे चरण में सेहत पर सबसे ज्‍यादा असर डालता है। ढाई-ढाई साल के इन 3 चरणों में से दूसरा चरण सबसे भारी पड़ता है। अत: कुंभ और मकर राशि वालों को शनिदेव की पूजा जरूर करना चाहिए।_*

 

⚱️ *_6. कुंभ राशि के जातकों के लिए वर्ष 2021-22 कई संभावनाओं से भरा वर्ष होगा। इस वर्ष के प्रारंभ में आपको सेहत और कार्यक्षेत्र संबंधी कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है। आप अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखें, डॉक्टर से सलाह लें और कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारी और गंभीरता कार्य करें।_*

 

🐊 *_7. मकर राशि में पहले ही शनिदेव विराजमान है। पिछले वर्ष 2020 की तुलना में यह वर्ष 2021 ज्यादा महत्वपूर्ण जा रहा है। आप अपने लक्ष्य पर ही फोकस रखेंगे तो सफल होने से आपको कोई नहीं रोक सकता। इसके परिणाम स्वरूप आप सामाजिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र या कार्यस्थल, सभी जगहों पर बेहद बुद्धिमानी और चतुराई के साथ आगे बढ़ने में सक्षम होंगे।_*

 

🌍 *_8. पृथ्वी तत्व प्रधान मकर राशि का स्वामी शनि है और इसके कारक ग्रह बुध, शुक्र और शनि माने गए हैं। भाग चर है और मकर लग्न की बाधक राशि वृश्चिक तथा बाधक ग्रह मंगल है। दशम भाव में मकर राशि मानी गई है जिसके शनि का पक्का घर 8 और 10 माना जाता है। 8 मौत का और 10 कर्म या कार्यक्षत्र का घर है। अत: शनिदेवी पूजा इनके लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।_*

 

🌊 *_9. वायु तत्व प्रधान कुंभ राशि का स्वामी स्वामी शनि है और इसके कारक ग्रह गुरु, शुक्र और शनि माने गए हैं। भाग चर है और कुंभ लग्न की बाधक राशि सिंह तथा बाधक ग्रह सूर्य है। ग्यारवें भाव में कुंभ राशि मानी गई है जिसके शनि का पक्का घर 8 और 10 माना जाता है। अर्थात 8, 10 और 11 भाव को शनिदेव की संचालित करते हैं। 11वां भाव आय और लाभ का है। अत: शनिदेवी पूजा इनके लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।_*

 

⚱️ *_10. कुंभ राशि वालों पर शनि की साढ़ेसाती 24 जनवरी 2020 से शुरू हुई थी। इससे मुक्ति 3 जून 2027 को मिलेगी, परंतु शनि की महादशा से कुंभ राशि वालों को 23 फरवरी 2028 को शनि के मार्गी होने पर छुटकारा मिलेगा। वहीं मकर राशि वालों पर शनि की साढ़े साती 26 जनवरी 2017 से शुरू हुई थी। यह 29 मार्च 2025 को समाप्त होगी।_*


     

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

क्या ये ही जिन्दगी है ?

          क्या ये ही जिन्दगी है ? 


जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते 2 3 नोकरियाँ छोड़ते एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।


फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 25 हो गयी।


और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक 2 साल नर्म, गुलाबी, रसीले, सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।


और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार ।


समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।

इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।


बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी, मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी


इतने में मैं 35 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।


इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब 10वि आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही चालीस बयालीस के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।


एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"


उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि "तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है ।"

कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।


तो फिर आया पैंतालिसवा साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।


बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।


उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।


दोनों पचपन से साठ की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।


अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।


एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।


उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।


मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी "चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं "

वो तुरंत बोली " अभी आई"।


मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए !!


उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी "बोलो क्या बोल रहे थे?"


लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।


क्षण भर को वो शून्य हो गयी।

" क्या करू ? "


उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।


मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली

"चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ?" बोलो !!


ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......

वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।


क्या ये ही जिन्दगी है ? नहीं ??



आस्था और भक्ति

      *आस्था और भक्ति *


*एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे।  लोग  आते  और  आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू  करने से पहले  "आइए  हनुमंत  जी  बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।*


*एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई।*


 *उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे!*


*अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं।*


 *हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं?*


*साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।*


*वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी।*

*हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए ।*


*आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।*


*महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।*


*लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।*


*इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।*

 *मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर साधु महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।*


*कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।*


*जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।*

*कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा*

*मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।*


*यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।*


*महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?.... यह तो सत्य की परीक्षा है।*


 *वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा।*


 *आप पराजित हो गए तो क्या करोगे?*

*साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।*


*अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।*

*काफी भीड़ हो गई।* *पंडाल भर गया। श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।*


*साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे... गद्दी रखी गई।*


*महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे ।*


 *मन ही मन साधु बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है।*

 *मैं तो एक साधारण जन हूँ।*

 *मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।*


*https://chat.whatsapp.com/FT4ybi1qAm3H2oY81xIDah*


*फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए।*


*लोगों की आँखे जम गईं ।*

*वकील साहब खड़ेे हुए।*

*उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !*


*जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।*


*महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके।*

 *तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।*


 *वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।*


*अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं।*

 *कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।*


*प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है।*


*पवन तनय संकट हरन,*

*मंगल मूरति रुप।*

*राम लखन सीता सहित,*

*हृदय बसहु सुर भूप॥

 

*पोस्ट अच्छी लगी हो तो शेयर जरूर करे*



शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

शारदीय नवरात्रि, महत्व, पुजाविधि

 

 💥 *विशेष - द्वितीया को बृहती (छोटा  बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*


         *शारदीय नवरात्रि*

 शारदीय नवरात्रि, महत्व, पुजाविधि


🙏🏻 *अश्विन मास के नवरात्रि  का आरंभ 07 अक्टूबर, गुरुवार से हो गया है। मान्यता है कि नवरात्रि में रोज देवी को अलग-अलग भोग लगाने से तथा बाद में इन चीजों का दान करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। जानिए नवरात्रि में किस तिथि को देवी को क्या भोग लगाएं-*

🙏🏻  *नवरात्रि की द्वितीया तिथि यानी दूसरे दिन माता दुर्गा को शक्कर का भोग लगाएं ।इससे उम्र लंबी होती है ।*


🌷 *शारदीय नवरात्रि* 🌷

🙏🏻 *अश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस बार शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ 07 अक्टूबर, गुरुवार से हो गया है, धर्म ग्रंथों के अनुसार, नवरात्रि में हर तिथि पर माता के एक विशेष रूप का पूजन करने से भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है। जानिए नवरात्रि में किस दिन देवी के कौन से स्वरूप की पूजा करें-*

🌷 *तप की शक्ति का प्रतीक है मां ब्रह्मचारिणी*

🙏🏻 *नवरात्रि की द्वितीया तिथि पर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानी तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही, सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं।*

🙏🏻 *मां ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती है कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योगशास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।*


          🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷 *नवरात्रि  में त्रिदेवी आराधना* 🌷

🙏🏻 *नवरात्रि  में 9 तिथियों को 3-3-3 तिथि में बांटा गया है। प्रथम 3 तिथि माँ दुर्गा की पूजा (तमस को जीतने की आराधना), बीच की तीन तिथि माँ लक्ष्मी की पूजा (रजस को जीतने की आराधना) तथा अंतिम तीन तिथि  माँ सरस्वती की पूजा (सत्व को जीतने की आराधना) विशेष रूप से की जाती है।*

🙏🏻 *दुर्गा की पूजा करके प्रथम तीन दिनों में मनुष्य अपने अंदर उपस्थित दैत्य, अपने विघ्न, रोग, पाप तथा शत्रु का नाश कर डालता है। उसके बाद अगले तीन दिन सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। अंत में आध्यात्मिक ज्ञान के उद्देश्य से कला तथा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना करता है ।*

👉🏻 *अब मैं तीनों शक्तियों की आराधना के मूल मंत्रों का वर्णन करता हूँ। नवरात्र में इनका यथासंभव जप करना चाहिए।*

🙏🏻 *१. दुर्गाजी का उत्तमोत्तम नवार्ण मंत्र महामंत्र है। इसको मंत्रराज कहा गया है। नवार्ण मंत्र की साधना धन-धान्य, सुख-समृद्धि आदि सहित सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है।*

🌷 *“ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”*

🙏🏻 *२. लक्ष्मी जी का मूल मंत्र जिसके द्वारा कुबेर ने परमऐश्वर्य प्राप्त किया था ।*

🌷 *“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा”*

🙏🏻 *३. सरस्वती जी का वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र जिसे भगवान शिव ने कणादमुनि तथा गौतम को, श्रीनारायण ने वाल्मीकि को, ब्रह्मा जी ने भृगु को, भृगुमुनि ने शुक्राचार्य को, कश्यप ने बृहस्पति को दिया था जिसको सिद्ध करने से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है ।*

🌷 *“श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा”*


📖 *हिन्दू पंचांग 

सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान (Uttar Pradesh Hindi Sansthan) ने वर्ष 2020 के पुरस्कारों की घोषणा

 भारत-भारती सम्मान शशिभूषण 'शीतांशु' को, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कारों का ऐलान


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान (Uttar Pradesh Hindi Sansthan) ने वर्ष 2020 के पुरस्कारों की घोषणा कर दी है. हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. सदानन्द गुप्त की अध्यक्षता में हुई पुरस्कार समिति की बैठक में सर्वोच्च भारत भारती सम्मान के लिए पांडेय शशिभूषण शीतांशु (Pandey Shashi Bhushan Sitanshu) को चुना गया.


भारत भारती सम्मान (Bharat Bharti Samman) उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सर्वोच्च सम्मान है. इस सम्मान से सम्मानित साहित्यकार को 8 लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किया जाता है.


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने लोहिया साहित्य सम्मान (Lohia Sahitya Samman) के लिए लखनऊ के डॉ. रामकठिन सिंह, हिंदी गौरव सम्मान के लिए गाजियाबाद के भगवान सिंह, महात्मा गांधी साहित्य सम्मान के लिए मुजफ्फरपुर (बिहार) के डॉ. महेंद्र मधुकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान के लिए भोपाल के डॉ. देवेंद्र दीपक, अवंतीबाई साहित्य सम्मान के लिए नोएडा के डॉ. सीतेश आलोक, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन सम्मान के लिए गुजरात प्रांतीय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के नाम का चयन हुआ. इन सभी सम्मनों की सम्मान राशि 5-5 लाख रुपये है.



साहित्यभूषण सम्मान (Sahitya Bhushan Samman)

साहित्य भूषण सम्मान के लिए 20 लेखकों का चयन हुआ है, इनमें बाराबंकी के मो. मूसा खान (अशान्त बाराबंकी), आगरा के डॉ. शशि गोयल, प्रयागराज के डॉ. अरविन्द कुमार राम, लखनऊ के दयानन्द जड़िया ‘अबोध’ और धीरेन्द्र वर्मा, लखनऊ के ही डॉ. मंजु शुक्ल, गोण्डा के शिवाकान्त मिश्र ‘विद्रोही’, आगरा के प्रो. हरिमोहन, बरेली के सुधीर विद्यार्थी, ठाणे (महाराष्ट्र) के डॉ. सुधाकर मिश्र, पिलखुवा के डॉ. चन्द्रपाल शर्मा, कानुपर के डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल ‘अमिय’, रायबरेली के केशव प्रसाद वाजपेयी, सुल्तानपुर के डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’, नई दिल्ली के बीएल गौड़, जबलपुर से डॉ. त्रिभुवननाथ शुक्ल, गोण्डा से सतीश आर्य, बहराइज से रामकरन मिश्र सैलानी, भागलपुर से डॉ. तपेश्वरनाथ और कानपुर से हरीलाल ‘मिलन’शामिल हैं.


सभी सम्मानित लेखकों को पुरस्कार स्वरूप ढाई-ढाई लाख रुपये की नकद राशि प्रदान की जाएगी.


विविध पुरस्कार

बैठक में लोक भूषण सम्मान वाराणसी के डॉ. जयप्रकाश मिश्र, कला भूषण सम्मान लखनऊ के सुशील कुमार सिंह, विद्या भूषण सम्मान गाजियाबाद के गिरीश्वर मिश्र, विज्ञान भूषण सम्मान राजस्थान जोधपुर के डॉ. दुर्गादत्त ओझा, पत्रकारिता भूषण सम्मान नई दिल्ली के रामबहादुर राय, प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण सम्मान नीदरलैंड्स के पुष्पिता अवस्थी, हिंदी विदेश प्रसार सम्मान सिडनी की रेखा राजवंशी, बाल साहित्य भारती सम्मान मुरादाबाद के डॉ. राकेश चक्र और गुरुग्राम के घमंडी लाल अग्रवाल को देने का फैसला किया गया.


‘अगर मुझे कायरता और हिंसा के बीच में चुनाव करना हो तो मैं हिंसा को चुनूंगा’ – महात्मा गांधी


मधुलिमये साहित्य सम्मान अमरकंटक के डॉ. दिलीप सिंह को, पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी साहित्य सम्मान गाजियाबाद के सुभाष चंदर को, विधि भूषण सम्मान दिल्ली की सन्तोष खन्ना को दिया जाएगा.


सौहार्द सम्मान

अलग-अलग भाषाओं के लिए दिए जाने वाले सौहार्द सम्मान के लिए कुल 14 नामों का चयन हुआ.


– असमिया भाषा के लिए रुनू शर्मा बरुवा (असम)– ओड़िआ भाषा के लिए डॉ. लक्ष्मीधर दाश (पुरी)– उर्दू के लिए अनीस अंसारी (लखनऊ)– कन्नड़ भाषा के लिए डॉ. धरणेन्द्र कुरकुरी (शिरसी- कर्नाटक)– कश्मीरी भाषा के लिए महाराज कृष्ण संतोषी (जम्मू)– गुजराती भाषा के लिए डॉ. जशभाई नारणभाई पटेल (गांधीनगर)– डोंगरी भाषा के लिए डॉ. भारत भूषण शर्मा (जम्मू)– तमिल के लिए डॉ. पी.आर. वासुदेवन ‘शेष’(चेन्नई)– तेलुगु के लिए डॉ. सुमन लता रुद्रावझला ( हैदराबाद)– पंजाबी के लिए राकेश प्रेम उर्फ राकेश मेहरा (अमृतसर)– मराठी भाषा के लिए डॉ. केशव सिंह ‘प्रथमवीर’ (पुणे)– मलयालम के लिए प्रो. डी. तंकप्पन नायर ( तिरुवनन्तपुरम्)– संस्कृत के लिए प्रो. हरिदत्त शर्मा (प्रयागराज)– सिंधी भाषा के लिए सुन्दरदास (कानुपर)


सौहार्द सम्मान से सम्मानित विद्वानों को 2.50-2.50 लाख रुपये सम्मान राशि भेंट की जाएगी.


कुंवर नारायण- ‘लड़ाई आज भी जारी है, लोग आज भी लड़ मर रहे हैं, ईश्वर साथी है’


मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालयस्तरीय सम्मान आजमगढ़ की डॉ. गीता सिंह और लखनऊ के डॉ. रामकृष्ण को दिया जाएगा.


उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुस्तक सम्मान– तुलसी पुरस्कार ‘कुरुवंशी महान’ (विनोद शंकर शुक्ल ‘विनोद’-लखनऊ)– जयशंकर प्रसाद पुरस्कार ‘सरयू-शतक’ (डॉ. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’-लखनऊ)– श्रीधर पाठक पुरस्कार ‘गौरय्या का ट्वीट’ (सुश्री मोनिका- बरेली)– निराला पुरस्कार ‘पल-पल निखरे रूप’ (डॉ. स्वदेश मल्होत्रा ‘रश्मि’- अयोध्या)– दुष्यंत कुमार पुरस्कार ‘हर क़िस्सा अधूरा है’ (राज कुमार सिंह- लखनऊ)– महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार ‘मनवा रे…!’ (ज्योत्स्ना प्रवाह-वाराणसी)– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार ‘क्रान्तिपथ और कालापानी’ (ललित सिंह पोखरिया- लखनऊ)– प्रेमचन्द पुरस्कार ‘बल्लव’ (दिनेश प्रताप सिंह- प्रतापगढ़)– यशपाल पुरस्कार ‘बनारस का एक दिन एवं अन्य कहानियाँ’ (डॉ. प्रदीप कुमार ‘नैमिष’- लखनऊ)– रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार ‘प्रसाद के नाटक: सृजन का द्वन्द्व’ (विनोद कुमार द्विवेदी- लखनऊ)– सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ पुरस्कार ‘मेरे ईश’ (अशोक कुमार धमेंनियाँ ‘अशोक’-भोपाल)– पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ पुरस्कार ‘सरयूपार के युगपुरुष’ (डॉ. कृष्ण कुमार पाण्डेय- गोरखपुर)– हरिशंकर परसाई पुरस्कार ‘व्हाट्सअप के पढ़े-लिखे’ (डॉ. आलोक पुराणिक- गाजियाबाद)– मलिक मुहम्मद जायसी पुरस्कार ‘अवधी चरनवाँ कै धूर’ (शिवपूजन शुक्ल- गोण्डा)– जगन्नाथदास रत्नाकर पुरस्कार ‘ब्रजभाषा मोरछल’ (नवीन सी. चतुर्वेदी- मुम्बई)– राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार ‘अरज निहोरा’ (प्रकाश उदय- वाराणसी)– मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ‘बुन्देली काव्य कुंज’ (सुकदेव कुमार व्यास- झांसी)– सूर पुरस्कार बाल साहित्य ‘श्रीराम कथामृतम्’ (किरण सिंह- बलिया)– कबीर पुरस्कार ‘हिन्दी कविता का आधुनिक परिदृश्य एवं राष्ट्रीय चेतना’ (डॉ. राधेश्याम मौर्य- प्रतापगढ़)– सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार ‘मेघदूत’ (डॉ. चन्द्रभाल सुकुमार श्रीवास्तव- वाराणसी)– बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार ‘सही भाषा सरल सम्पादन’ (आदर्श प्रकाश सिंह- लखनऊ)– सरस्वती पुरस्कार ‘नूतन कहानिया’ (मासिक) (सम्पा. सुरेंद्र अग्निहोत्री- लखनऊ)– भगवानदास पुरस्कार ‘गीता सुधा संगम’ (रघोत्तम शुक्ल एवं शारदा शुक्ला- लखनऊ)– हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार ‘मन मानस में राम’ (प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी-अमरकंटक, म.प्र.)– पं. रामनरेश त्रिपाठी पुरस्कार ‘कजली साहित्य का इतिहास’ (हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’-वाराणसी)– गिरिजादेवी पुरस्कार ‘ठुमरी एवं कथक’ (विधि नागर- वाराणसी)– बाबू श्याम सुन्दरदास पुरस्कार ‘बौद्ध दर्शन एवं प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति’ (डॉ. राजेश चन्द्र गुप्ता- गोरखपुर)– सम्पूर्णानन्द पुरस्कार प्रविधि ‘विज्ञान की नई दिशाएं’ (डॉ. दीपक कोहली- लखनऊ)– बीरबल साहनी पुरस्कार ‘पर्यावरण संरक्षण’ (योगेन्द्र शर्मा- लखनऊ)– पं. सत्यनारायण शास्त्राी पुरस्कार ‘मिर्गी रोग: दवा एवं दायित्व’ (डॉ. अतुल अग्रवाल- लखनऊ)– आचार्य नरेन्द्र देव पुरस्कार ‘इतिहास के आईने में आज़मगढ़’ (प्रताप गोपेन्द्र यादव- आजमगढ़)– डॉ. भीमराव अम्बेडकर पुरस्कार ‘भारतीय कानून में महिलाओं के अधिकार'(सत्या सिंह-लखनऊ)– बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ‘नित्य कात्यायनी’ (कृष्ण चन्द पाण्डेय-वर्धा, महाराष्ट्र)– महादेवी वर्मा पुरस्कार ‘आँगन का शजर’ (ममता किरण- दिल्ली)

4 अक्टूबरको जन्मे व्यक्ति,निधन,अवसर एवं उत्सव

 *👉🏻4 अक्टूबर को जन्मे व्यक्ति*


🪴‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ में भारत की दूसरी महिला अधिकारी तथा मध्य प्रदेश की भूतपूर्व 


🪴राज्यपाल सरला ग्रेवाल का जन्म 1927 में हुआ।


🪴बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 में हुआ।


🪴प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं लेखक श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 1857 में हुआ।


🪴हिंदी और बांग्ला पार्श्व गायिका संध्या मुखोपाध्याय का जन्म 1931 में हुआ।


🪴हैती के 41वें राष्ट्रपति और नेता जीन क्लाउड दुवेलियर का जन्म 2014 में हुआ।



*🛖4 अक्टूबर को हुए निधन*


🌺भारतीय फिल्म निर्देशक एवं निर्माता इदिदा नागेश्वर राव का निधन 2015 में हुआ।


🌺भारतीय सेना का एक सैनिक बाबा हरभजन सिंह का निधन 1968 में हुआ।



*🪁4 अक्टूबर के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव*


👉🏻विश्व पशु कल्याण दिवस


👉🏻राष्ट्रीय अखंडता दिवस

 

4 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

 *4 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ*

🎯खलीफा अल-आदिल की हत्या 1227 में हुई।


🎯बैजेंटाइन साम्राज्य तथा वेनिस गणराज्य के बीच एक शांति समझौता 1302 में हुआ।


🎯मेक्सिको 1824 में एक गणराज्य बना।


🎯नीदरलैंड से अलग होकर 1830 में बेल्जियम साम्राज्य बना।


🎯यूएस ने 1943 में जापानियों से सॉलोमन पर कब्जा कर लिया।


🎯सोवियत संघ ने 1957 में पहला उपग्रह स्पुतनिक सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में भेजा।


🎯क्यूबा और हैती में 1963 को चक्रवाती तूफान ‘फ्लोरा’ से छह हजार लोग मरे।


🎯भारत ने 1974 में दक्षिण अफ्रिका की सरकार की रंभेदी नीति का प्रतिरोध करने के लिए वहाँ जाकर डेविस कप में भाग लेने से इनकार कर दिया।


🎯भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक को हिंदी में संबोधित किया। हिंदी में दिया गया यह पहला संबोधन था।


🎯पाकिस्तान के 16 वर्षीय बल्लेबाज़ शाहिद अफ़रीदी ने 1996 में एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच में 37 गेंदों में शतक बनाकर विश्व कीर्तिमान रचा।


🎯चांग चून शियुंग 2000 में ताइवान के नये प्रधानमंत्री बने।


🎯पाकिस्तान में शाहीन प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण 2002 में किया गया।


🎯बाली बम कांड में 2005 को दो संदिग्ध व्यक्ति गिरफ़्तार।


🎯जूलियन असांजे ने विकीलीक्स की स्थापना 2006 को की।


🎯अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस 2008 में एक दिन के लिए भारत यात्रा पर रहीं।


🎯अमेरिका ने 2011 में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के मुखिया अबू बकर अल बगदादी को वैश्विक आतंकवादी के रूप में चिन्हित किया और साथ ही उस पर एक करोड़ डॉलर का ईनाम भी रखा।


🎯नोबेल पुरस्कार समिति ने 2011 को भौतिकी के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए अमेरिका के सॉल पर्लमटर और एडम रीस तथा अमेरिकी मूल के आस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रायन श्मिट को वर्ष 2011 का नोबेल पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की।


🎯अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई की भारत यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बैठक में सामरिक मामले, खनिज संपदा की साझेदारी और तेल और गैस की खोज पर साझेदारी संबंधी तीन समझौतों पर 2011 को हस्ताक्षर किए गए।


🎯सोमालिया की राजधानी मोगादिशु में मंगलवार को शिक्षा मंत्रालय के समीप 2011 को हुए एक आत्मघाती कार बम विस्फोट में कम से कम 65 लोग मारे गए।


🎯अलग तेलंगाना राज्य के लिए 2011 को आंध्रप्रदेश में 22वें दिन भी हड़ताल जारी रही।


🎯दक्षिण पश्चिम पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा के अख्तराबाद इलाके में 2011 को शिया मुस्लिम समुदाय के 12 व्यक्तियों को हथियारबंद लोगों ने उनकी गाड़ी से उतारकर हत्या कर दी।


🎯भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की यात्रा के दौरान भारत और स्विट्जरलैंड ने 2011 को वित्तीय क्षेत्र में सहयोग के लिए द्विपक्षीय समझौता किया गया जिससे आयकर विभाग के बीच सहयोग बढने और स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों का पता लगाने में मदद मिलेगी।


🎯रोजगार की तलाश में 2011 को ब्रिटेन आने वाले विदेशी चिकित्सकों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में काम करने के लिए एक अंग्रेजी परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया गया।


🎯कुवैत के सबसे बड़े तेलशोधक कारखाने मीना अल-अहमदी में 2011 को हुए विस्फोट में तमिलनाडु के चार मजदूरों की मौत हो गई।


🎯चीन में 2012 को आये भूस्खलन के बाद 19 लोग दबकर मरे।


🎯फॉर्मूला वन के बादशाह माइकल शूमाकर ने 2012 को संन्यास लिया। 

4 अक्तूबर,जयमंगल पांडे और नादिर अली का बलिदान

 4 अक्तूबर/बलिदान-दिवस


जयमंगल पांडे और नादिर अली का बलिदान


1857 के स्वाधीनता संग्राम की ज्योति को अपने बलिदान से जलाने वाले मंगल पाण्डे को तो सब जानते हैं; पर उनके नाम से काफी मिलते-जुलते बिहार निवासी जयमंगल पाण्डे का नाम कम ही प्रचलित है।


बैरकपुर छावनी में हुए विद्रोह के बाद देश की अन्य छावनियों में भी क्रान्ति-ज्वाल सुलगने लगी। बिहार में सैनिक क्रोध से जल रहे थे। 13 जुलाई को दानापुर छावनी में सैनिकों ने क्रान्ति का बिगुल बजाया, तो 30 जुलाई को रामगढ़ बटालियन की आठवीं नेटिव इन्फैण्ट्री के जवानों ने हथियार उठा लिये। भारत माता को दासता की जंजीरों से मुक्त करने की चाहत हर जवान के दिल में घर कर चुकी थी। बस, सब अवसर की तलाश में थे।


सूबेदार जयमंगल पाण्डे उन दिनों रामगढ़ छावनी में तैनात थे। उन्होंने अपने साथी नादिर अली को तैयार किया और फिर वे दोनों 150 सैनिकों को साथ लेकर राँची की ओर कूच कर गये। वयोवृद्ध बाबू कुँवरसिंह जगदीशपुर में अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। इस अवस्था में भी उनका जीवट देखकर सब क्रान्तिकारियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया था। जयमंगल पाण्डे और नादिर अली भी उनके दर्शन को व्याकुल थे। 11 सितम्बर, 1857 को ये दोनों अपने जवानों के साथ जगदीशपुर की ओर चल दिये।


वे कुडू, चन्दवा, बालूमारथ होते हुए चतरा पहुँचे। उस समय चतरा का डिप्टी कमिश्नर सिम्पसन था। उसे यह समाचार मिल गया था कि ये दोनों अपने क्रान्तिकारी सैनिकों के साथ फरार हो चुके हैं। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी बाबू कुँवरसिंह से बहुत परेशान थे। उन्हें लगा कि इन दोनों को यदि अभी न रोका गया, तो आगे चलकर ये भी सिरदर्द बन जाएंगे। अतः उसने मेजर इंगलिश के नेतृत्व में सैनिकों का एक दल भेजा। उसमें 53 वें पैदल दस्ते के 150 सैनिकों के साथ सिख दस्ते ओर 170 वें बंगाल दस्ते के सैनिक भी थे। इतना ही नहीं, तो उनके पास आधुनिक शस्त्रों का बड़ा जखीरा भी था।


इधर वीर जयमंगल पाण्डे और नादिर अली को भी सूचना मिल गयी कि मेजर इंगलिश अपने भारी दल के साथ उनका पीछा कर रहा है। अतः उन्होंने चतरा में जेल के पश्चिमी छोर पर मोर्चा लगा लिया। वह दो अक्तूबर, 1857 का दिन था। थोड़ी देर में ही अंग्रेज सेना आ पहुँची।


जयमंगल पाण्डे के निर्देश पर सब सैनिक मर मिटने का संकल्प लेकर टूट पड़े; पर इधर संख्या और अस्त्र शस्त्र दोनों ही कम थे, जबकि दूसरी ओर ये पर्याप्त मात्रा में थे। फिर भी दिन भर चले संघर्ष में 58 अंग्रेज सैनिक मारे गये। उन्हें कैथोलिक आश्रम के कुँए में हथियारों सहित फेंक दिया गया। बाद में शासन ने इस कुएँ को ही कब्रगाह बना दिया।


इधर क्रान्तिवीरों की भी काफी क्षति हुई। अधिकांश सैनिकों ने वीरगति पायी। तीन अक्तूबर को जयमंगल पाण्डे और नादिर अली पकड़े गये। अंग्रेज अधिकारी जनता में आतंक फैलाना चाहते थे। इसलिए अगले दिन चार अक्तूबर को पन्सीहारी तालाब के पास एक आम के पेड़ पर दोनों को खुलेआम फाँसी दे दी गयी। बाद में इस तालाब को फाँसी तालाब, मंगल तालाब, हरजीवन तालाब आदि अनेक नामों से पुकारा जाने लगा। स्वतन्त्रता के बाद वहाँ एक स्मारक बनाया गया। उस पर लिखा है -


जयमंगल पाण्डेय नादिर अली दोनों सूबेदार रे

दोनों मिलकर फाँसी चढ़े हरजीवन तालाब रे।।