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बुधवार, 30 जून 2021

उच्चारण के स्थान पर व्यंजनो के प्रकार

 

उच्चारण के स्थान पर व्यंजनो के प्रकार

*आज के छात्रों को भी नहीं पता होगा कि भारतीय भाषाओं की #वर्णमाला विज्ञान से भरी है। वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है। इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य #विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है। जैसे देखे*


 *क ख ग घ ड़* - पांच के इस समूह को "#कण्ठव्य" *कंठवय* कहा जाता है क्योंकि इस का उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है। उच्चारण का प्रयास करें।


 *च छ ज झ ञ* - इन पाँचों को "तालव्य" *#तालु* कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ तालू महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।


 *ट ठ ड ढ ण*  - इन पांचों को "मूर्धन्य" *मुर्धन्य* कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ #मुर्धन्य (ऊपर उठी हुई) महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।


 *त थ द ध न* - पांच के इस समूह को *#दन्तवय* कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है। उच्चारण का प्रयास करें।


 *प फ ब भ म* - पांच के इस समूह को कहा जाता है *#ओष्ठव्य* क्योंकि दोनों होठ इस उच्चारण के लिए मिलते हैं। उच्चारण का प्रयास करें।


 दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में ऐसा #वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है! निःसंदेह, हमें अपनी ऐसी भारतीय भाषा पर गर्व होना चहिए.

गंगोत्री धाम कथा एवं महत्व

  गंगोत्री धाम की कथा

 श्रद्धालु यहां गंगा स्नान करके मां के दर्शन और पव‌ित्र भाव से केदारनाथ को अर्प‌ित करने ल‌िए जल लेते हैं।  गंगोत्री समुद्र तल से ९,९८० (३,१४० मी.) फीट की ऊंचाई पर स्थित है। गंगोत् से ही भागीरथी नदी निकलती है। गंगोत्री भारत के पवित्र और आध्‍यात्मिक रूप से महत्‍वपूर्ण नदी गंगा का उद्गगम स्‍थल भी है। 


गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ के नाम पर इस नदी का नाम भागीरथी रखा गया। कथाओं में यह भी कहा गया है कि राजा भागीरथ ने ही तपस्‍या करके गंगा को पृथ्‍वी पर लाए थे। गंगा नदी गोमुख से निकलती है।


पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि सूर्यवंशी राजा सागर ने अश्‍वमेध यज्ञ कराने का फैसला किया। इसमें इनका घोड़ा जहां-जहां गया उनके ६०,००० बेटों ने उन जगहों को अपने आधिपत्‍य में लेता गया। इससे देवताओं के राजा इंद्र चिंतित हो गए।


 ऐसे में उन्‍होंने इस घोड़े को पकड़कर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सागर के बेटों ने मुनिवर का अनादर करते हुए घोड़े को छुड़ा ले गए। इससे कपिल मुनि को काफी दुख पहुंचा। उन्‍होंने राजा सागर के सभी बेटों को शाप दे दिया जिससे वे राख में तब्‍दील हो गए।


 राजा सागर के क्षमा याचना करने पर कपिल मुनि द्रवित हो गए और उन्‍होंने राजा सागर को कहा कि अगर स्‍वर्ग में प्रवाहित होने वाली नदी पृथ्‍वी पर आ जाए और उसके पावन जल का स्‍पर्श इस राख से हो जाए तो उनका पुत्र जीवित हो जाएगा। लेकिन राजा सागर गंगा को जमीन पर लाने में असफल रहे। बाद में राजा सागर के पुत्र भागीरथ ने गंगा को स्‍वर्ग से पृथ्‍वी पर लाने में सफलता प्राप्‍त की। 


गंगा के तेज प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए भागीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया। फलत: भगवान शिव ने गंगा को अपने जटा में लेकर उसके प्रवाह को नियंत्रित किया। इसके उपरांत गंगा जल के स्‍पर्श से राजा सागर के पुत्र जीवित हुए।


ऐसा माना जाता है कि १८वीं शताबादि में गोरखा कैप्‍टन अमर सिंह थापा ने आदि शंकराचार्य के सम्‍मान में गंगोत्री मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित सफेद पत्‍थरों से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग २० फीट है। मंदिर बनने के बाद राजा माधोसिंह ने १९३५ में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया।


 फलस्‍वरूप मंदिर की बनावट में राजस्‍थानी शैली की झलक मिल जाती है। मंदिर के समीप 'भागीरथ शिला' है जिसपर बैठकर उन्‍होंने गंगा को पृथ्‍वी पर लाने के लिए कठोर तपस्‍या की थी। इस मंदिर में देवी गंगा के अलावा यमुना, भगवान शिव, देवी सरस्‍वती, अन्‍नपुर्णा और महादुर्गा की भी पूजा की जाती है।


हिंदू धर्म में गंगोत्री को मोक्षप्रदायनी माना गया है। यही वजह है कि हिंदू धर्म के लोग चंद्र पंचांग के अनुसार अपने पुर्वजों का श्राद्ध और पिण्‍ड दान करते हैं। मंदिर में प्रार्थना और पूजा आदि करने के बाद श्रद्धालु भगीरथी नदी के किनारे बने घाटों पर स्‍नान आदि के लिए जाते हैं।


 तीर्थयात्री भागीरथी नदी के पवित्र जल को अपने साथ घर ले जाते हैं। इस जल को पवित्र माना जाता है तथा शुभ कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। गंगोत्री से लिया गया गंगा जल केदारनाथ और रामेश्‍वरम के मंदिरों में भी अर्पित की जाती है।


मंदिर का समय: सुबह 6.15 से 2 बजे दोपहर तक और अपराह्न 3 से 9.30 तक (गर्मियों में)। सुबह 6.45 से 2 बजे दोपहर तक और अपराह्न 3 से 7 बजे तक (सर्दियों में)।


मंदिर अक्षय तृतीया (मई) को खुलती है और यामा द्वितीया को बंद होती है। मंदिर की गतिविधि तड़के चार बजे से शुरू हो जाती है। सबसे पहले 'उठन' (जागना) और 'श्रृंगार' की विधि होती है जो आम लोगों के लिए खुला नहीं होता है। 


सुबह 6 बजे की मंगल आरती भी बंद दरवाजे में की जाती है। 9 बजे मंदिर के पट को 'राजभोग' के लिए 10 मिनट तक बंद रखा जाता है। सायं 6.30 बजे श्रृंगार हेतु पट को 10 मिनट के लिए एक बार फिर बंद कर दिया जाता है। इसके उपरांत शाम 8 बजे राजभोग के लिए मंदिर के द्वार को 5 मिनट तक बंद रखा जाता है।


 ऐसे तो संध्‍या आरती शाम को 7.45 बजे होती है लेकिन सर्दियों में 7 बजे ही आरती करा दी जाती है। तीर्थयात्रियों के लिए राजभोग, जो मीठे चावल से बना होता है, उपलब्‍ध रहता है (उपयुक्‍त शुल्‍क अदा करने के बाद)।


तीर्थयात्री प्राय: गनगनानी के रास्‍ते गंगोत्री जाते हैं। यह वही मार्ग है जिसपर पराशर मुनि का आश्रम था जहां वे गर्म पानी के सोते में स्‍नान करते थे। गंगा के पृथ्‍वी आगमन पर (गंगा सप्‍तमी) वैसाख (अप्रैल) में विशेष श्रृंगार का आयोजन किया जाता है। 


पौराणिक कथाओं के अनुसार जिस दिन भगवान शिव ने भागिरथी नदी को भागीरथ को प्र‍स्‍तुत किया था उस दिन को (ज्‍येष्‍ठ, मई) गंगा दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा जन्‍माष्‍टमि, विजयादशमी और दिपावली को भी गंगोत्री में विशेष रूप से मनाया जाता है।

मंगलवार, 29 जून 2021

राष्ट्रवाद क्या है

 * राष्ट्रवाद क्या है ??*

🔥 _जननी-जन्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी यही भाव राष्ट्रवाद है।_ 

🔥 __भारत भूमि  के ऋषि-मुनियों और महान पुरुषों का सम्मान ही हिंदुत्व और राष्ट्रवाद है।_ 

🔥 _यही धरती हमारी मां है, और धरती में रहने वाले मनुष्य हमारे भाई बांधव यही भाव हिंदुत्व है।_

🔥 _राष्ट्र के भूगोल, पशु, नदियों और वृक्षों का संरक्षण ही राष्ट्रवाद है।_

🔥 _राष्ट्रवाद हमें अनेकता में एकता यह भाव प्रदान करता है।_

🔥 _हमें हमारे राष्ट्र में राष्ट्र के कल्याण और विकास के लिए बोलनें की अभिव्यक्ति हो रही तो राष्ट्रवाद है।_

🔥 _भारत की भूमि में जन्में प्रत्येक मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार ही राष्ट्रवाद है।_

🔥 _भारत का अन्न खाने वाला प्रत्येक व्यक्ति मां भारती की वंदना करें यही राष्ट्रवाद है, क्यूं जन्म भी यहीं लिया और मरना भी यहीं हैं।_

🔥 _राष्ट्र के सभी लोगों का कल्याण का भाव रखकर उस की दिशा में कार्य करना ही राष्ट्रवाद है और राष्ट्रवादी होना भी चाहिए।_

🔥 _राष्ट्र की संस्कृति और धरोहर संरक्षित हो यह भावना और इस भावना के लिए किया गया प्रयास ही राष्ट्र वाद है।_

🔥 _मेरे राष्ट्र के नागरिक प्रसन्न हो मेरे राष्ट्र के जीव सुखी हों यह सुखमय भावना ही राष्ट्रवाद है।_

🔥 _राष्ट्र के प्रति अन्तर्मन से निकले करुणा के भाव ही राष्ट्र वाद हैं।_

🔥 _वंदेमातरम् अर्थात हे जन्म देने वाली जन्म भूमि मैं तेरी वंदना करता हूं यह आत्मिक भाव ही राष्ट्र वाद है।_

🔥 _राष्ट्र के संत और राष्ट्र का कल्याण चाहने वाले अभय और निर्भय रहें यही राष्ट्रवाद है, और राष्ट्र को तोडने वाली शक्तियों की बुद्धि का सर्वनाश हो यह भाव त्वं और विचार ही राष्ट्र वाद है।_

🔥 _जाति और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर जो कुछ भी राष्ट के लिए आपके मन में विचार हैं, उनका अनुसरण ही राष्ट्र वाद हैं।_ 

🔥 _एक परिपक्व राष्ट्र का निर्माण जिसमें गौ-नारी, कन्या गुरु और ज्ञानियों का सम्मान हो एसे वातावरण को जन्म देनें के लिए किया गया प्रयास ही राष्ट्र वाद है।_ 

🔥 _राष्ट्रवाद राष्ट्र के लिए कुछ श्रेष्ठ करनें का प्रयास है।_ 

🔥 _भारत भूमि में जन्में जन-जन के मन में राष्ट्रवाद का बीज बोना ही राष्ट्रवाद है।_ 

🔥 _हम सभी राष्ट्रवादी राष्ट्र के लिए मिलकर और मिलकर राष्ट्र का कल्याण करें यही जन जागृति ही राष्ट्रवाद है।_ 

 

                         

महाभारत सार

 **यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है :-*


*1. संतानों की गलत माँग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे-*  *कौरवों को देख ले*


*2. आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो, आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा -*    *कर्ण को देख ले*


*3. संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे-*  *अश्वत्थामा को देख ले*


*4. कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े -*  *भीष्म पितामह को देख ले*


*5. संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है -*   *दुर्योधन को देख ले*


*6. मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह, काम और अंधव्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है -*  *धृतराष्ट्र को देख ले*


*7. यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बँधी हो तो विजय अवश्य मिलती है -* *अर्जुन को ही देख ले*


*8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते -* *शकुनि को देख ले*


*9. यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती -*   *युधिष्ठिर को देख ले*

रविवार, 27 जून 2021

गैर संवैधानिक निकायों की सूची


 गैर संवैधानिक निकायों की सूची


गैर-संवैधानिक या अतिरिक्त-संवैधानिक निकाय एक संसदीय कानून पारित होने के बाद स्थापित किए गए निकाय हैं। तात्पर्य यह है कि हमारे संविधान में इन संस्थानों का उल्लेख नहीं है।


➤योजना आयोग


1. इस आयोग को के.सी. नियोगी की अध्यक्षता में 1946 में गठित योजना सलाहकार बोर्ड की संस्तुति पर भारत सरकार (अर्थात् केंद्रीय मंत्रिमंडल) के एक कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा मार्च, 1950 में स्थापित किया गया है, इस प्रकार, योजना आयोग न तो एक वैधानिक संस्थान और न ही एक संवैधानिक संस्थान हैI अन्य शब्दों में, यह एक गैर-संवैधानिक या अतिरिक्त-संवैधानिक निकाय (अर्थात् संविधान द्वारा निर्मित नहीं) और एक गैर-वैधानिक निकाय (अर्थात् संसद के एक अधिनियम द्वारा निर्मित नहीं) हैI भारत में, यह सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजना का सर्वोच्च अंग हैI अब, 1 जनवरी, 2015 से इसे एक अन्य निकाय नीति आयोग द्वारा प्रतिस्थापित किया गया हैI


2. भारत का प्रधानमंत्री आयोग का पदेन अध्‍यक्ष होता हैI वह आयोग की बैठकों की अध्यक्ष्यता करते हैंI


3. आयोग का एक उपाध्यक्ष होता हैI वह आयोग का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (अर्थात् पूर्ण कालिक कार्यकारी प्रमुख) होता हैI वह केन्द्रीय मंत्रिमंडल के समकक्ष पंचवर्षीय मसौदे के सूत्रीकरण और उसे प्रस्तुत करने के लिए जिम्मेदार होता हैI इसे केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा निर्धारित समय के लिए नियुक्त किया जाता है और उसका रैंक कैबिनेट मंत्री के समान होता हैI यद्दपि वह कैबिनेट का सदस्य नहीं है, फिर भी उसे कैबिनेट की सभी बैठकों में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया जाता है (वोटिंग के अधिकार के बिना)


➤नीति (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) आयोग




1. यह योजना आयोग (जो शीर्ष-डाउन मॉडल पर आधारित था) को बदलने के लिए सरकार द्वारा 2015 में स्थापित किया गया है।


2. यह डाउन-अप मॉडल पर आधारित है।


3. यह संपूर्ण भारत के लिए नीति बनाने वाली संस्था है


4. आयोग के अध्यक्ष प्रधान मंत्री हैं।


5. वर्तमान उपाध्यक्ष राजीव कुमार हैं।


6. संचालन परिषद के स्थायी सदस्य-

(ए) सभी राज्य के मुख्यमंत्री

(बी) दिल्ली और पुडुचेरी के मुख्यमंत्री

(सी) अंडमान और निकोबार के लेफ्टिनेंट गवर्नर

(डी) प्रधान मंत्री द्वारा नामित उपाध्यक्ष


➤राष्ट्रीय विकास परिषद


1. राष्ट्रीय विकास परिषद (एन.डी.सी) को पहली पंचवर्षीय योजना (मसौदा रूपरेखा) की संस्तुति पर भारत सरकार के एक कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा अगस्त, 1952 में स्‍थापित किया गया थाI योजना आयोग की तरह, यह न तो एक संवैधानिक निकाय है और न ही एक वैधानिक निकायI


2. एनडीसी में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैंI

A. भारत के प्रधानमंत्री (जो इसके अध्‍यक्ष/प्रमुख होते हैं)I

B. केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल के सभी मंत्री (1967 से)I

C. सभी राज्यों के मुख्य मंत्रीI

D. सभी संघ शासित प्रदेशों के मुख्य मंत्री/ प्रशासकI

E. योजना आयोग के सदस्यI


➤राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग


1. एन.एच.आर.सी एक वैधानिक (संवैधानिक नहीं) निकाय हैI इसे संसद द्वारा अधिनियमित एक अधिनियम अर्थात् मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत 1993 में स्‍थापित किया गया था। इस अधिनियम को 2006 में संशोधित किया गया थाI


2. यह आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें एक अध्‍यक्ष और चार सदस्य शामिल होते हैंI अध्‍यक्ष भारत का सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश होना चाहिएI


3. अध्‍यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा छह सदस्यीय समिति जिसमें प्रधानमंत्री इसके प्रमुख, लोक सभा के सभापति, राज्य सभा के उपाध्‍यक्ष, संसद के दोनों सदनों में विपक्षी दलों के नेता और केन्द्रीय गृह मंत्री शामिल होते हैं, की संस्तुति पर की जाती हैI इसके आलावा, भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ विचार-विमर्श करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को भी नियुक्त किया जा सकता हैI


4. अध्‍यक्ष और सदस्‍य 5 वर्ष की अवधि के लिए या 70 वर्ष की आयु पूरी होने, जो भी पहले लागू होता हो, तक पद पर रह सकते हैंI वे इसके बाद केंद्र या राज्य सरकार के तहत किसी भी रोजगार के लिए पात्र नहीं होते हैंI


➤केन्द्रीय सूचना आयोग (सी.आई.सी)


1. सी.आई.सी को 2005 में केंद्र सरकार द्वारा स्‍थापित किया गया थाI इसे सूचना का अधिकार (2005) के प्रावधानों के तहत आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना के माध्‍यम से गठित किया गया थाI अतः, यह एक संवैधानिक निकाय नहीं हैI


2. आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और 10 से अधिक सूचना आयुक्त शामिल नहीं होते हैंI


3. उनकी नियुक्‍त एक समिति जिसमें प्रधानमंत्री, अध्‍यक्ष के तौर पर और लोक सभा में विपक्षी दलों के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल का मंत्री शामिल होता है, की संस्तुति पर राष्‍ट्रपति द्वारा की जाती हैI


4. वे सामाजिक सेवा, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, मास मीडिया, प्रबंधन, पत्रकारिता, कानून या प्रशासनिक और शासन में व्‍यापक ज्ञान और अनुभाव के साथ सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित व्‍यक्ति होने चाहिए।


5. वे किसी भी राज्य या संघ शासित प्रदेश के सांसद या विधायक नहीं होने चाहिएI वे किसी भी अन्य लाभ के पद पर या किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े हुए या किसी भी प्रकार का व्यावसाय या किसी पेशे से जुड़े हुए नहीं होने चाहिएI


6. उनके पद का कार्यकाल 5 वर्ष की अवधि/ या सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष पूर्ण होने तक होता है जो भी पहले लागू होता होI वे पुनः नियुक्ति‍ के लिए पात्र नहीं होते हैंI


7. उन्‍हें एन.एच.आर.सी के मामले में उल्लिखित स्थितियों के अनुसार केवल राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता हैI


➤केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सी.वी.सी)


1. CVC (सी.वी.सी) केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मुख्य एजेंसी हैI इसे केंद्र सरकार के एक कार्यकारी प्रस्‍ताव द्वारा 1964 में स्‍थापित किया गया था। इसकी स्थापना भ्रष्टाचार निरोध पर संथानम समिति (1962–64) की संस्‍तुति पर की गई थीI


2. इस प्रकार, वास्ताव में CVC न तो एक संवैधानिक निकाय था और ना ही एक वैधानिक निकायI सितम्बर, 2003 में, संसद द्वारा अधिनियमित एक कानून के तहत सी.वी.सी को वैधानिक निकाय का दर्जा दिया गयाI


3. CVC (सी.वी.सी) एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें एक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (अध्‍यक्ष) और दो से अधिक सतर्कता आयुक्त शामिल नहीं होते हैंI


4. इनकी नियुक्ति तीन सदस्यीय समिति जिसमें प्रधानमंत्री प्रमुख के तौर पर और गृह मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री और लोक सभा में विपक्षी दलों के नेता शामिल होते हैं, की संस्तुति पर राष्‍ट्रपति द्वारा हस्‍ताक्षर तथा मोहर सहित जारी अधिपत्र द्वारा की जाती हैI


5. उनका कार्यकाल 4 वर्ष या 65 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक होता है जो भी पहले लागू होता होI उनके कार्यकाल के बाद, वे केंद्र सरकार या राज्य सरकार के तहत किसी भी रोजगार के लिए पात्र नहीं होते हैंI


 


 

भारत में पायलट्स के लिए ट्रेनिंग कोर्सेज और करियर स्कोप

 भारत में पायलट्स के लिए ट्रेनिंग कोर्सेज और करियर स्कोप



पायलट्स देश-दुनिया की एविएशन इंडस्ट्री की बैकबोन होते हैं. ये प्रोफेशनल्स एयरोप्लेन/ एयरक्राफ्ट के संचालन और इंटरनल सिस्टम्स के प्रबंधन और रखरखाव के लिए जिम्मेदार हैं. ये पायलट्स आमतौर पर यात्रियों और सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए उड़ान भरते हैं. इसी तरह, पायलट्स कॉकपिट के प्रबंधन की जांच करने, एयर रेगुलेशन पर गहरी नज़र रखने, उड़ानों की योजना बनाने और आवश्यकता पड़ने पर हवाई यातायात की जांच करने के लिए भी जिम्मेदार होते हैं.


अगर आप भारत में एक पायलट के तौर पर अपना करियर शुरू करना चाहते हैं, तो इसके बारे में सारी जरुरी जानकारी हासिल करने के लिए इस आर्टिकल को बड़े गौर से पढ़ें.



भारत में पायलट्स के लिए एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया

हमारे देश में पायलट बनने के लिए एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया निम्नलिखित है:


•    आपने अपनी 12वीं क्लास या समान परीक्षा कम से कम 50 फीसदी मार्क्स के साथ पास की हो.

•    आपने अपनी 12वीं क्लास में साइंस स्ट्रीम में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स विषय जरुर पढ़े हों. 

•    आपकी न्यूनतम आयु 17 वर्ष होनी चाहिए. 


भारत में पायलट्स के लिए ट्रेनिंग कोर्सेज

अगर आप ट्रेनिंग कोर्सेज करने के बाद, केवल एक को-पायलट के तौर पर उड़ान भर सकते हैं लेकिन, अगर आप भारत में एक कैप्टेन के तौर पर हवाई जहाज उड़ाना चाहते हैं तो आपको एयर लाइन ट्रांसपोर्ट पायलट’स लाइसेंस लेना होगा. भारत में पायलट्स के लिए ट्रेनिंग कोर्सेज निम्नलिखित हैं:



स्टूडेंट पायलट लाइसेंस: इस कोर्स की अवधि 06 माह की है.

प्राइवेट पायलट लाइसेंस: यह 01 वर्ष की अवधि का कोर्स है.

कमर्शियल पायलट लाइसेंस: यह 03 वर्ष की अवधि का कोर्स है.

भारत में प्रमुख ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स

अगर आप हमारे देश में कोई सूटेबल पायलट ट्रेनिंग कोर्स ज्वाइन करना चाहते हैं तो निम्नलिखित प्रमुख इंस्टीट्यूट्स में अप्लाई कर सकते हैं:


इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी, राय बरेली

राजीव गांधी नेशनल फ्लाइट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट

इंस्टीट्यूट ऑफ़ एविएशन एंड एविएशन सेफ्टी

गवर्नमेंट एविएशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, भुबनेश्वर

गवर्नमेंट फ्लाइंग क्लब, लखनऊ

ओरिएंट फ्लाइट स्कूल, चेन्नई

पुडुचेरी ठाकुर कॉलेज ऑफ़ एविएशन

आस्पिरेंट पायलट्स के लिए महत्त्वपूर्ण जानकारी

एक पायलट के तौर पर अपना करियर शुरू करने के लिए आप भारत के किसी प्रमुख ट्रेनिग इंस्टीट्यूट में सीधा एडमिशन ले सकते हैं बशर्ते, आप भारत की एविएशन इंडस्ट्री के मानकों के मुताबिक शारीरिक तौर पर पूरी तरह फिट हों और आपने एंट्रेंस एग्जाम पास कर लिया हो. डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ सिविल एविएशन (DGCA) नेशनल लेवल पर हरेक वर्ष आस्पिरेंट पायलट्स के लिए एंट्रेंस एग्जाम आयोजित करता है जिसे IGRUA एंट्रेंस टेस्ट के तौर पर जाना जाता है. इसी तरह, पायलट्स ATPL, इंस्टीट्यूशन्स एग्जाम्स भी दे सकते हैं.



भारत में पायलट्स के लिए प्रमुख जॉब प्रोफाइल्स

हमारे देश में पायलट्स के लिए निम्नलिखित प्रमुख जॉब प्रोफाइल्स उपलब्ध हैं:


कमर्शियल पायलट्स - पैसेंजर पायलट्स, कार्गो पायलट्स और एरोस्पोर्ट्स पायलट्स

मिलिट्री पायलट्स - एयरफोर्स पायलट्स, आर्मी पायलट्स और नेवी पायलट्स

प्राइवेट पायलट्स - प्राइवेट जेट्स/ हेलिकॉप्टर पायलट्स (कॉर्पोरेट/ पर्सनल नीड्स के मुताबिक)

इसके अलावा, हमारे देश में पायलट्स के लिए कुछ अन्य जॉब प्रोफाइल्स निम्नलिखित हैं:


को-पायलट

चीफ पायलट

कैप्टेन

फर्स्ट ऑफिसर

एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट

कम्यूटर पायलट

एयरलाइन पायलट

भारत में पायलट्स का सैलरी पैकेज

हमारे देश में पायलट्स के ट्रेनिंग सर्टिफिकेट्स और उड़ान के घंटों के आधार पर सैलरी पैकेज ऑफर किया जाता है. भारत में कमर्शियल पायलट्स को औसतन 02 लाख - 01 करोड़ रुपये का सालाना सैलरी पैकेज ऑफर किया जाता है. मिलिट्री पायलट्स को 07 लाख - 20 लाख रुपये का सैलरी पैकेज मिलता है और प्राइवेट पायलट्स को भी औसतन 02 लाख - 20 लाख का सैलरी पैकेज ऑफर किया जाता है.



भारत में पायलट्स के लिए टॉप रिक्रूटिंग कंपनीज़

हमारे देश में पायलट्स निम्नलिखित प्रमुख एविएशन कंपनीज़ में अप्लाई कर सकते हैं:  


सिविल एविएशन डिपार्टमेंट

इंडियन आर्म्ड फोर्सेज

इंडियन नेवी

एयर इंडिया

स्पाइस जेट

विस्तारा

एयर एशिया

इंडिगो

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स प्राइवेट लिमिटेड

स्काईवर्ल्ड चार्टर सर्विसेज

अन्य महत्त्वपूर्ण लिंक


ड्रोन पायलट: भारत में उपलब्ध कोर्स और करियर ऑप्शन्स


एस्ट्रोनॉमी: इंडियन स्पेस साइंस में हैं कई शानदार करियर ऑप्शन्स


एस्ट्रोफिजिक्स के फ्री ऑनलाइन कोर्सेज ज्वाइन करके बनें एस्ट्रो एक्सपर्ट

शनिवार, 26 जून 2021

प्राचीन भारत का इतिहास : चंद्रगुप्त मौर्य



प्राचीन भारत का इतिहास : चंद्रगुप्त मौर्य


➤मौर्य साम्राज्‍य का उदय


मौर्य साम्राज्‍य का प्रारंभ चंद्रगुप्‍त मौर्य द्वारा 321 ईसा पूर्व में मगध से हुआ। विशाखादत्‍त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में चाणक्‍य की मदद से चंद्रगुप्‍त मौर्य के उदय का सुदंरता से चित्रण किया गया है। चंद्रगुप्‍त मौर्य जैनधर्म का अनुयायी था। पाटलिपुत्र, आधुनिक पटना मौर्य साम्राज्‍य की राजधानी थी।


पडीफ डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें


➤मौर्य साम्राज्‍य का विस्‍तार


मौर्य साम्राज्‍य उस समय के सबसे बड़े साम्राज्‍यों में से एक था और 5,000,000 वर्ग कि.मी से भी अधिक क्षेत्रफल में विस्‍तारित था। उत्‍तर-पूर्व भारत के हिस्‍सों, केरल और तमिलनाडु को छोड़कर मौर्यों ने शेष भारतीय उप-महाद्वीपों पर शासन किया था।



➤राजव्‍यवस्‍था


1. मेगस्‍थनीज़ की पुस्‍तक इंडिका और अर्थशास्‍त्र (कौटिल्‍य द्वारा लिखित) के विवरणों में मौर्य प्रशासन, समाज और अर्थव्‍यवस्‍था का विस्‍तृत वर्णन किया गया है।


2. साम्राज्‍य प्रांतों में विभाजित था, जिसका शासन राजकुमारों के हाथ में था। इसके साथ, 12 विभागों, सैन्‍य बलों में छह शाखाओं का भी उल्‍लेख किया गया है। चंद्रगुप्‍त ने एक सुव्‍यवस्थित प्रशासनिक तंत्र को स्‍थापित किया और एक ठोस वित्‍तीय आधार प्रदान किया।


➤बिंदुसार (298 – 273 ईसापूर्व)


ग्रीक में इसे अमित्रघात के नाम से जाना जाता था और यह आजीवक सम्‍प्रदाय का अनुयायी था।


➤अशोक


1. अशोक 273 ईसापूर्व में सिंहासन पर बैठा और 232 ईसापूर्व तक शासन किया। इसे ‘देवप्रिय प्रियदर्शी’ के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ था, ईश्‍वर का प्‍यारा।


2. अशोक ने 261 ईसापूर्व में कलिंग का युद्ध लड़ा। कलिंग आधुनिक उड़ीसा में है।


3. अशोक के शिलालेखों को सबसे पहले जेम्‍स प्रिंसेप ने पढ़ा था।


4. कलिंग के युद्ध के पश्‍चात, अशोक बौद्ध हो गया, युद्ध के आंतक से विचलित होकर, उसने बेरीघोष की जगह धम्‍मघोष मार्ग अपनाया।


5. अशोक को बौद्ध धर्म का ज्ञान बुद्ध के एक शिष्‍य उपगुप्‍त या निग्रोध ने दिया था।


6. बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्ममहामात्रों को नियुक्‍त किया।


➤अशोक के शिलालेख


1. अशोक के शिलालेखों में राज आज्ञा थी जिसके जरिए वह जनता से सीधे संपर्क करने में सक्षम था। ये शिलालेख और स्‍तंभलेख थे जिन्‍हें दीर्घ और लघु में बांटा गया था।


2. अशोक के 14 मुख्‍य शिलालेख धर्म सिद्धांत के बारे में बताते हैं।


3. कलिंग शिलालेख कलिंग युद्ध के बाद प्रशासन के सिद्धांत की व्‍याख्‍या करता है। अपने कलिंग शिलालेख में, इसने जिक्र किया है ‘सभी मनुष्‍य मेरे बच्‍चे हैं’।


4. अशोक के मुख्‍य शिलालेख XII में कलिंग युद्ध का जिक्र किया गया है।


5. ‘अशोक’ का सर्वप्रथम उल्‍लेख केवल मास्‍की लघु शिलालेख में हुआ है।



➤अशोक और बौद्ध धर्म


• अशोक ने 250 ईसापूर्व में अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में मोगलीपुत्‍त तिस्‍स की अध्‍यक्षता में तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन किया।


• उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्‍द्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।


• अशोक ने श्रीलंका और नेपाल में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसे बौद्ध धर्म के कोंसटेटाइन कहा जाता है।


• श्रीलंका के शासक देवमप्रिय तिस्‍स अशोक के प्रथम बौद्ध धर्म धर्मांतरण थे।


• अशोक की धम्‍म नीति का व्‍यापक उद्देश्‍य सामाजिक व्‍यवस्‍था को बनाए रखना था।


• अशोक ने 40 वर्षों तक शासन किया और 232 ईसापूर्व में इसकी मृत्‍यु हो गई।


➤मौर्य प्रशासन


अत्‍यधिक केन्‍द्रीयकृत प्रशासनिक ढांचा। चाणक्‍य ने प्रशासन में सप्‍तांग सिद्धांत के 7 तत्‍वों का जिक्र किया है। राजा को मंत्रिपरिषद द्वारा सलाह दी जाती थी। विभिन्‍न प्रशासनिक क्रियाकलापों के लिए महत्‍वपूर्ण अधिकारी नियुक्‍त किए जाते थे।


प्रशासन चार इकाईयों में विभाजित था


• चक्र या प्रांत


• अहर या जिला


• संघ्राहाना या गांवों का समूह


• गांव


नगरीय प्रशासन के अध्‍यक्षता करने वाले नगरक का उल्‍लेख अर्थशास्‍त्र में भी पाया जाता था।


➤मौर्य कला


1) शाही कला – राजमहल, स्‍तंभ, गुफाएं, स्‍तूप आदि


2) लोकप्रिय कला – चित्रण मूर्तियां, टेराकोटा वस्‍तुएं आदि


भारतीय गणराज्‍य के प्रतीक को अशोक स्‍तंभ के चार शेरों से लिया गया है, जो सारनाथ में स्थित है। सांची से अन्‍य चार शेर, रामपुरवा और लौरिया नन्‍दनगढ़ से एक शेर और रामपुरवा से एक बैल और धौली में नक्‍काशीदार हाथी पाए जाते हैं।


मौर्यों ने व्‍यापक स्‍तर पर पत्‍थर राजगिरी की शुरुआत की थी। इन्‍होंने चट्टानों को खोदकर गुफाएं बनाने की शुरूआत की और बुद्ध और बोधिसत्‍व के पुरावशेष संग्रहित करने के लिए स्‍तूपों का निर्माण किया जिसका बाद में गुप्‍त वंश द्वारा विस्‍तार किया गया था।



➤पतन का कारण


• अत्‍यधिक केन्‍द्रीयकृत मौर्य प्रशासन


• अशोक की मृत्‍यु के बाद विभाजन ने साम्राज्‍य की एकता में फूट डाल दी


• उत्‍तरवर्ती कमजोर मौर्य शासक भी इस साम्राज्‍य के पतन के कारण थे



मंगलवार, 22 जून 2021

हुंकार रामधारी सिंह "दिनकर"

                    हुंकार  

                           रामधारी सिंह "दिनकर"



सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं

स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शून्य की झनकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखुरी पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं

जलन हूँ, दर्द हूँ, दिल की कसक हूँ,
किसी का हाय, खोया प्यार हूँ मैं।
गिरा हूँ भूमि पर नन्दन-विपिन से,
अमर-तरु का सुमन सुकुमार हूँ मैं।

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं

न देखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धूलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बँधा तूफ़ान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं

(१९३५ ई०)

मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा और गुरुकुल खत्म

 यह लेख भारतीय शिक्षा नीति और अंग्रेजी शिक्षा नीति की संपन्नता को लेकर लिखा गया है जिसमें भारतीय शिक्षा का विलोपन किस प्रकार से हुआ है और उसके क्या कारण रहे है इसका ज़िक्र इसमें किया गया है साथ ही मैकाले की शिक्षा नीति का प्रभाव भी भारत पर क्या पड़ा है  इसलिए पूरा लेख अवश्य पढ़ें .

*गुरुकुल कैसे खत्म हो गये*❓

आपको पहले ये बता दे कि हमारे सनातन संस्कृति परम्परा के गुरुकुल मे क्या क्या पढाई होती थी ! आर्यावर्त के गुरुकुल के बाद ऋषिकुल में क्या पढ़ाई होती थी ये जान लेना आवश्यक है । इस शिक्षा को लेकर अपने विचारों में परिवर्तन लायें और प्रचलित भ्रांतियां दूर करें !


01 अग्नि विद्या (Metallurgy)

02 वायु विद्या (Flight) 

03 जल विद्या (Navigation) 

04 अंतरिक्ष विद्या (Space Science) 

05 पृथ्वी विद्या (Environment)

06 सूर्य विद्या (Solar Study) 

07 चन्द्र व लोक विद्या (Lunar Study) 

08 मेघ विद्या (Weather Forecast) 

09 पदार्थ विद्युत विद्या (Battery) 

10 सौर ऊर्जा विद्या (Solar Energy) 

11 दिन रात्रि विद्या 

12 सृष्टि विद्या (Space Research) 

13 खगोल विद्या (Astronomy) 

14 भूगोल विद्या (Geography) 

15 काल विद्या (Time) 

16 भूगर्भ विद्या (Geology Mining) 

17 रत्न व धातु विद्या (Gems & Metals)

18 आकर्षण विद्या (Gravity) 

19 प्रकाश विद्या (Solar Energy) 

20 तार विद्या (Communication) 

21 विमान विद्या (Plane)

22 जलयान विद्या (Water Vessels) 

23 अग्नेय अस्त्र विद्या

(Arms & Ammunition)

24 जीव जंतु विज्ञान विद्या

(Zoology Botany) 

25 यज्ञ विद्या (Material Sic)


*ये तो बात हुई वैज्ञानिक विद्याओं की । अब बात करते है व्यावसायिक और तकनीकी विद्या की !*


26 वाणिज्य (Commerce)

27 कृषि (Agriculture)

28 पशुपालन (Animal Husbandry) 

29 पक्षिपलन (Bird Keeping) 

30 पशु प्रशिक्षण (Animal Training) 

31 यान यन्त्रकार (Mechanics) 

32 रथकार (Vehicle Designing) 

33 रतन्कार (Gems) 

34 सुवर्णकार (Jewellery Designing)

35 वस्त्रकार (Textile) 

36 कुम्भकार (Pottery) 

37 लोहकार (Metallurgy)

38 तक्षक

39 रंगसाज (Dying) 

40 खटवाकर 

41 रज्जुकर (Logistics)

42 वास्तुकार (Architect)

43 पाकविद्या (Cooking)

44 सारथ्य (Driving)

45 नदी प्रबन्धक (Water Management)

46 सुचिकार (Data Entry)

47 गोशाला प्रबन्धक

(Animal Husbandry)

48 उद्यान पाल (Horticulture)

49 वन पाल (Horticulture)

50 नापित (Paramedical)


यह सब विद्या गुरुकुल में सिखाई जाती थी पर समय के साथ गुरुकुल लुप्त हुए तो यह विद्या भी लुप्त होती गयी ! आज मैकाले पद्धति से हमारे देश के युवाओं का भविष्य नष्ट हो रहा तब ऐसे समय में गुरुकुल के पुनः उद्धार की आवश्यकता है।


भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ? कॉन्वेंट स्कूलों ने किया बर्बाद । 1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग ‘लोर्ड मैकाले’ ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Luther और दूसरा था Thomas Munro ! दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। Luther, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है ।


मैकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे । 


मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है - “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।” इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया | जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी | फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया | उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा- पीटा, जेल में डाला। 

1850 तक इस देश में ’7 लाख 32 हजार’ गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे ’7 लाख 50 हजार’ । मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में ‘Higher Learning Institute’ हुआ करते थे । उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलके चलाते थे न कि राजा, महाराजा।


गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया । उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था । इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी, ये तीनों गुलामी ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी देश में हैं !


मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि: “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा । इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है । अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा । हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। 


लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है । दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी भाषा सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है ॽ  शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी । समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। 


संयुक्तराष्टसंघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी ! जिसमे लगभग वो विजय पा चुके क्योंकि आज का युवा भारत को कम यूरोप को ज्यादा जानता है । भारतीय संस्कृति को ढकोसला समझता है लेकिन पाश्चात्य देशों को नकल करता है । सनातन धर्म की प्रमुखता और विशेषता को न जानते हुए भी वामपंथियों का समर्थन करता है?

अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी

 आप के नाम में छुपा है राम का नाम!

 अद्भुत गणित 

अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?

तुलसीदास बोले :- " हां "

भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???

तुलसीदास :- " हां अवश्य " ....तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए  !!!

तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है  !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""

हर नाम के अंत में राम का ही नाम है।


इसे समझने के लिए तुम्हे एक "सूत्रश्लोक " बताता हूँ।

यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!

भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?"


तुलसीदास :- यह सूत्र है ...

||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "


 इस सूत्र के अनुसार 

अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें..

1)उस गिनती को (चतुर्गुण) 4 से गुणाकार करें

2) उसमें (पंचतत्व मिलन) 5 मिला लें

3) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें

4)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) 8 से विभाजित करें ।

"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!!  ...

यह 2 ही "राम" है। यह 2 अंक ही " राम " अक्षर हैं।.


विश्वास नहीं हों रहा है ना???

चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ...

आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों  !!!

उदा. ..निरंजन... 4 अक्षर 

1) 4 से गुणा करिए  4x4=16

2)5 जोड़िए  16+5=21

3) दुगने करिए 21×2=42

4)8 से विभाजन करने पर  42÷8= 5 पूर्ण अंक , शेष 2 !!!

शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे 2 अर्थात्  - "राम" !!!


विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!

1) चतुर्गुण अर्थात् 4 पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!

2) पंचतत्व अर्थात् 5 पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!

3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् 2 माया व ब्रह्म !!!

4) अष्ट सो भागे अर्थात् 8  आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग

लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति।


अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष 2 ही प्राप्त होगा ...!!

इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की  बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

1857 का विद्रोह संपूर्ण अवलोकन



भारतीय इतिहास : 1857 का विद्रोह संपूर्ण अवलोकन 


1857 की क्रांति : कारण एवं नेता


➤क्रांति की प्रकृति


• 1857 की क्रांति की शुरुआत सिपाही विद्रोह से हुई थी लेकिन अंततः इसने लोगों को भी जोड़ लिया।


• वी.डी. सावरकर ने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी।


• डॉ. एस. एन. सेन ने इसका वर्णन “ऐसी लड़ाई जो धर्म के लिए शुरु हुई थी लेकिन स्वतंत्रता के युद्ध पर जाकर समाप्त हुई” के रूप में किया है।


• डॉ. आर. सी. मजूमदार ने इसे न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता का युद्ध माना है।


• कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों के अनुसार, यह मात्र एक किसान सिपाही बगावत था।


➤क्रांति का कारण


(i) आर्थिक कारण


1. अत्यधिक अप्रिय राजस्व व्यवस्था


2. अधिक कराधान – इसके कारण किसानों को अत्यधिक ब्याज दरों पर साहूकारों से धन उधार लेना पड़ता था।


3. ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय हथकरघा उद्योग को नुकसान पहुंचाया जिन्हें आधुनिक उद्योगों के साथ-साथ विकसित नहीं किया गया था।


4. अंग्रेजों का अत्यधिक हस्तक्षेप : जमींदारों की घटती स्थिति


(ii) राजनैतिक कारण:


1. सहायक संधि – लॉर्ड वेलेजली


2. व्यगपत सिद्धांत – लॉर्ड डलहौजी


3. धार्मिक अयोग्यता अधिनियम, 1856 – धर्म परिवर्तन बच्चे को संपत्ति का वारिस बनने से नहीं रोकेगा।


(iii) प्रशासनिक कारण:


1. कंपनी के प्रशासन में भयंकर भ्रष्टाचार – खासकर निचले स्तर (पुलिस, निचले अधिकारियों) में।


2. भारतीय विकास पर कोई ध्यान नहीं।


(iv) सामाजिक आर्थिक कारण:


1. अंग्रेजों के स्वयं को श्रेष्ठ मानने का रवैया।


2. इसाई मिशनरियों की गतिविधियां।


3. सामाजिक-धार्मिक सुधारों जैसे सति प्रथा का अंत, विधवा पुनर्विवाह का प्रयास, महिलाओँ की शिक्षा का प्रयास आदि।


4. मस्जिदों और मंदिरों की भूमि पर कर।


(v) तात्कालिक कारण:


1. सामान्य सेवा प्रवर्तन अधिनियम – भविष्य की भर्तियों को कहीं भी कार्य करने यहां तक की समुद्र पार कार्य करने का आदेश।


2. ब्रिटिश समकक्षों की तुलना में भारतीयों को निम्न वेतन


3. गेंहू के आटे में हड्डी का चूरा मिलाने की ख़बर


4. एनफील्ड राइफल की कार्टिज गाय और सुअर की चर्बी से बनी थी।


➤समकालिक घटनाओं का प्रभाव


1. प्रथम अफ़गान युद्ध (सन् 1838-42)


2. पंजाब युद्ध (सन् 1845-49)


3. क्रीमिया का युद्ध (सन् 1854-46)


4. संथाल विद्रोह (सन् 1855-57)


➤क्रांति के महत्वपूर्ण तथ्य


• मेरठ घटना – 19वीं बैरकपुर नेटिव इन्फ्रैंटरी ने नई शामिल की गई एनफील्ड राइफल उपयोग करने से मना कर दिया, बगावत फरवरी 1857 में फैल गयी, जोकि मार्च 1857 में भंग हो गयी।


• 34वीं नेटिव इन्फैंटरी के एक युवा सिपाही ने बैरकपुर में अपनी यूनिट के सार्जेन्ट मेजर पर गोली चला दी।


• 7वीं अवध रेजीमेंट को भी भंग कर दिया गया।


• मेरठ में 10 मई को विद्रोह हो गया, विद्रोहियों ने अपने बंदी साथियों को आजाद किया, उनके अधिकारियों को मार दिया और सूर्यास्त के बाद दिल्ली कूच कर गए।


• दिल्ली – महान क्रांति का केन्द्र


➤क्रांति के नेता :


• दिल्ली में क्रांति के प्रतीकात्मक नेता मुगल शासक बहादुरशाह जफ़र थे, लेकिन वास्तविक शक्ति सेनापति बख्त खां के हाथों में थी।


• कानपुर में नाना साहेब, तात्या टोपे, अजिमुल्लाह खान के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। सर हुग व्हीलर स्टेशन कंनाडर थे, इन्होंने समर्पण किया। नाना साहेब ने खुद को पेशवा और बहादुर शाह को भारत का सम्राट घोषित किया।


• लखनऊ में बेगम हजरत महल ने मोर्चा संभाला और अपने पुत्र बिरजिस कादिर को नबाव घोषित कर दिया। अंग्रेज नागरिक हेनरी लारेंस की हत्या कर दी गई। शेष यूरोपीय नागरिकों को नए कमांडर-इन-चीफ़ सर कोलिन कैम्पबेल ने सुरक्षित निकाला।


• बरेली में खान बहादुर, बिहार में कुंवर सिंह, जगदीशपुर के जमींदार और फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह ने अपने क्षेत्रों में क्रांति का नेतृत्व किया।


• रानी लक्ष्मीबाई, जोकि क्रांति की सबसे असाधारण नेता थीं, को गवर्नर लॉर्ड डलहौडी के व्यगपत सिद्धांत के कारण झांसी से बेदखल कर दिया गया था, क्योंकि जनरल ने उनके दत्तक पुत्र को सिंहासन का उत्तराधिकारी स्वीकारने से मना कर दिया था।



➤क्रांति का दमन


• 20 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। जॉन निकोलसन इस घेरेबंदी के नेता थे, बाद में वे चोटिल हो गए थे।


• बाहदुर शाह को बंदी बनाकर रंगून भेज दिया गया जहां सन् 1862 में उनकी मौत हो गयी। लेफ्टिनेंट हडसन द्वारा शाही राजकुमारी की माथे पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। दिल्ली के हारने के बाद, सभी स्थानीय क्रांतियों का दमन होता चला गया।


• सर कोलिन कैम्पबेल ने कानपुर और लखनऊ पर दुबारा कब्जा कर लिया।


• बनारस में, कर्नल नील द्वारा विद्रोह का निर्दयतापूर्वक दमन किया गया।


➤क्रांति के असफल होने के कारण


• बाहदुरशाह जफ़र वृद्ध और कमजोर हो चुके थे, इसलिए क्रांति का नेतृत्व करने में असमर्थ थे।


• सीमित क्षेत्रीय विस्तार था।


• भारत का अधिकांश भाग लगभग अप्रभावित रहा।


• कई बड़े जमींदारों ने अंग्रेजों का समर्थन किया।


• आधुनिक शिक्षित भारतीयों ने क्रांति को विरोध के रूप में देखा।


• भारतीय सिपाहियों के पास हथियार खराब थे।


• किसी केन्द्रीय नेतृत्व अथवा सम्नव्य के अभाव में क्रांति को खराब रूप से संगठित किया गया था।


• क्रांति में अंग्रेजी शासन तंत्र की स्पष्ट समझ का अभाव था और क्रांति की तैयारियां भी अधूरी थी।


गुरुवार, 17 जून 2021

शिव खोड़ी की गुफाएं

                शिव खोड़ी की गुफाएं


शिव खोड़ी शिवालिक पर्वत शृंखला में एक प्राकृतिक गुफा है, जिसमें प्रकृति-निर्मित शिव-लिंग विद्यमान है। 


शिव खोड़ी तीर्थ स्थल पर महाशिवरात्रि के दिन बहुत बड़ा मेला आयोजित होता है जिसमें हजारों की संख्या में लोग दूर-दूर से यहां आकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और आयोजित इस मेले में शामिल होते हैं। शिव खोड़ी की यात्रा बारह महीने चलती है। अति प्राचीन मंदिरों के कई अवशेष अब भी इस क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं। शिव खोड़ी शिवभक्तों के लिए एक महान तीर्थ स्थल है।


शिव खोड़ी शिव तीर्थ का कोई प्रामाणिक इतिहास आज तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। लोक श्रुतियों में कहा गया है कि स्यालकोट (वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है) के राजा सालवाहन ने शिव खोड़ी में शिवलिंग के दर्शन किए थे और इस क्षेत्र में कई मंदिर भी निर्माण करवाए थे, जो बाद में सालवाहन मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुए।


इस गुफा में दो कक्ष हैं। बाहरी कक्ष कुछ बड़ा है, लेकिन भीतरी कक्ष छोटा है। बाहर वाले कक्ष से भीतरी कक्ष में जाने का रास्ता कुछ तंग और कम ऊंचाई वाला है जहां से झुक कर गुजरना पड़ता है। 

आगे चलकर यह रास्ता दो हिस्सों में बंट जाता है, जिसमें से एक के विषय में ऐसा विश्वास है कि यह कश्मीर जाता है। यह रास्ता अब बंद कर दिया गया है। दूसरा मार्ग गुफा की ओर जाता है, जहां स्वयंभू शिव की मूर्ति है। गुफा की छत पर सर्पाकृति चित्रकला है, जहां से दूध युक्त जल शिवलिंग पर टपकता रहता है।


यह स्थान रियासी-राजोरी सड़कमार्ग पर है, जो पौनी गांव से दस मील की दूरी पर स्थित है। शिवालिक पर्वत शृंखलाओं में अनेक गुफाएं हैं।


 ये गुफाएं प्राकृतिक हैं। कई गुफाओं के भीतर अनेक देवी-देवताओं के नाम की प्रतिमाएं अथवा पिंडियां हैं। उनमें कई प्रतिमाएं अथवा पिंडियां प्राकृतिक भी हैं। देव पिंडियों से संबंधित होने के कारण ये गुफाएं भी पवित्र मानी जाती हैं। डुग्गर प्रांत की पवित्र गुफाओं में शिव खोड़ी का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है।


 यह गुफा तहसील रियासी के अंतर्गत पौनी भारख क्षेत्र के रणसू स्थान के नजदीक स्थित है। जम्मू से रणसू नामक स्थान लगभग एक सौ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए जम्मू से बस मिल जाती है। यहां के लोग कटरा, रियासी, अखनूर, कालाकोट से भी बस द्वारा रणसू पहुंचते रहते हैं।


 रणसू से शिव खोड़ी छह किलोमीटर दूरी पर है। यह एक छोटा-सा पर्वतीय आंचलिक गांव है। इस गांव की आबादी तीन सौ के करीब है। यहां कई जलकुंड भी हैं। यात्री जलकुंडों में स्नान के बाद देव स्थान की ओर आगे बढ़ते हैं। देव स्थान तक सड़क बनाने की परियोजना चल रही है। रणसू से दो किलोमीटर सड़क मार्ग तैयार है।


 यात्री सड़क को छोड़ कर आगे पर्वतीय पगडंडी की ओर बढ़ते हैं। पर्वतीय यात्रा तो बड़ी ही हृदयाकर्षक होती है। यहां का मार्ग समृद्ध प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है। सहजगति से बहते जलस्त्रोत, छायादार वृक्ष, बहुरंगी पक्षी समूह पर्यटक यात्रियों का मन बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं। 


चार किलोमीटर टेढ़ी-मेढ़ी पर्वतीय पगडंडी पर चलते हुए यात्री गुफा के बाहरी भाग में पहुंचते हैं। गुफा का बाह्‌य भाग बड़ा ही विस्तृत है। इस भाग में हजारों यात्री एक साथ खड़े हो सकते हैं। बाह्‌य भाग के बाद गुफा का भीतरी भाग आरंभ होता है।

 यह बड़ा ही संकीर्ण है। यात्री सरक-सरक कर आगे बढ़ते जाते हैं। कई स्थानों पर घुटनों के बल भी चलना पड़ता है। गुफा के भीतर भी गुफाएं हैं, इसलिए पथ प्रदर्शक के बिना गुफा के भीतर प्रवेश करना उचित नहीं है। गुफा के भीतर दिन के समय भी अंधकार रहता है। 


अत: यात्री अपने साथ टॉर्च या मोमबत्ती जलाकर ले जाते हैं। गुफा के भीतर एक स्थान पर सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं, तदुपरांत थोड़ी सी चढ़ाई के बाद शिवलिंग के दर्शन होते हैं। शिवलिंग गुफा की प्राचीर के साथ ही बना है। यह प्राकृतिक लिंग है। इसकी ऊंचाई लगभग एक मीटर है।


 शिवलिंग के आसपास गुफा की छत से पानी टपकता रहता है। यह पानी दुधिया रंग का है। उस दुधिया पानी के जम जाने से गुफा के भीतर तथा बाहर सर्पाकार कई छोटी-मोटी रेखाएं बनी हुई हैं, जो बड़ी ही विलक्षण किंतु बेहद आकर्षक लगती हैं। 


गुफा की छत पर एक स्थान पर गाय के स्तन जैसे बने हैं, जिनसे दुधिया पानी टपक कर शिवलिंग पर गिरता है। शिवलिंग के आगे एक और भी गुफा है। यह गुफा बड़ी लंबी है। इसके मार्ग में कई अवरोधक हैं। लोक श्रुति है कि यह गुफा अमरनाथ स्वामी तक जाती है l

बुधवार, 16 जून 2021

मानव धर्म क्या है?


मानव धर्म क्या है?


*मित्रों* मेरे विचार से मानव होने का अर्थ है ऐसा मनुष्य जो सारी उम्र मानवता की सेवा करे सम्पूर्ण जीवन अपनी सुख-सुविधाओं को पाने के लिए प्रयत्न करना मानव का धर्म नहीं है *मानव का जन्म मानवता की सेवा के लिए हुआ है* प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनि सेवा करने पर ज़ोर देते रहें हैं सेवा ऐसा भाव है जिसे करने वाला भी सुख पाता है और जिसकी की जाती है वह भी सुख पाता है *...*…


*सेवा से किसी का अहित नहीं होता बल्कि प्रेम के बंधन में बंध जाते हैं* मनुष्य सारी उम्र अपनी सुख-सुविधा के लिए प्रयासरत् रहता है इस प्रकार वह स्वार्थी हो जाता है ऐसे मनुष्य को मनुष्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता *जो मनुष्य दूसरे के दुःखों को दूर करने के उपाय किया करता है* वही सच्चा मनुष्य कहलाने का अधिकारी है वही जीवन सही अर्थों में मानव जीवन को सार्थकता देता है परोपकार, सेवाभाव, प्रेम, कर्मठता, दृढ़ निश्चयी एक मानव के जीवन को सार्थक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं *...*…


*मित्रों* इसीलिये हमें चाहिए कि इन गुणों को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बनायें और मानवता का कल्याण करें *असल में एकता और मेल के बिना संसार का काम चल नहीं सकता* हम पद-पद पर इस ऐक्य की तलाश में है और इसके बिना अनेक कष्टों का अनुभव करते हैं फिर वह संसार चाहे राजनीति का हो या धर्मनीति, समाजनीति, अर्थनीति का *...*…


यदि ऐक्य यानि एकता का लोप हो जाये तो प्रलय हो जायेगा संसार के बनाने वाले परमाणुओं, गुणों, तत्वों का एक दूसरे से अलग हो जाना ही तो प्रलय कहा जाता है कारण, उस दशा में कोई चीज ठहर सकती ही नहीं *यही कारण है कि विवेकी लोग शुरू से ही ऐक्य की तलाश में पड़े हैं और वह अंवेषण बराबर जारी है ...*… 


अनेक ने स्थूल, पृथ्वी आदि को परमाणुओं से या तो किसी ने समस्त स्थूल जगत को सत्त्व, रजस, तमस इन तीन गुणों से जोड़ दिया और कह दिया कि इनसे सम्यक कोई चीज नहीं *सूक्ष्म जगत में* मन व बुद्धि को इन्हीं तीन गुणों में मिला दिया ईश्वर और जीव के बारे में किसी ने सामीप्य और सान्निध्यक का भाव कायम किया तो किसी ने ईश्वर को जीव में ही मिला दिया और उसकी सत्ता ही मिटा डाली *...*…


इस प्रकार परमाणुओं से आरंभ कर प्रकृति (त्रिगुण) और पुरुष (जीव) इन दो को ही माना और शेष संसार का पर्यवसान इन्हीं में कर दिया *अंत में अद्वैतवाद का दर्शन आया* उसने प्रकृति और जीव का भी भेद मिटा दिया और दोनों को ही एक करके ब्रह्म के साथ मिलाया जब एकता का सूत्रपात हुआ तो उसका चरम पर्यवसान भी होना ही चाहिए जब तक दो पदार्थ रह जायेंगे दिक्कत बनी ही रहेगी उपनिषदों ने जो कहा है कि *द्वितीया द्वै भयं भवति* दो के रहने से ही सारी तकलीफें होती है *या???*


यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: l

तत्र को मोह: क: शोक एकत्वमनुपश्यत: ll


जब सभी एक हो गए तो डर किसका? उसका मतलब यही है प्रतिद्वंद्वी को कायम करके चैन? *यदि आप संसार में प्रेम का पूरा प्रसार अबाध रूप से चाहते हैं तो मिलना ही होगा* क्योंकि अपने-आपसे जितना ही अंतर किसी वस्तु का होगा प्रेम में उतनी ही कमी होगी परमात्मा में यदि हम परम प्रेमरूपा भक्ति चाहते हैं तो उसे भी अपने से अभिन्न करना ही होगा नहीं तो स्वभावत: जितना प्रेम अपने-आप (आत्मा) में है उतना उसमें कदापि न होगा *...*…


*सज्जनों* इसीलिए तो कहा है *आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति* यदि निकट जाना है तो दूरी कम करो और वास्तविक सान्निध्य तभी होगा जब दूरी विलुप्त हो जाये यही अद्वैतवाद का रहस्य है और यही वेदांत है हम *वसुधैव कुटुंबकम्* चाहते हैं और चाहते हैं मानव मात्र का कल्याण *जो वास्तविक सर्वाधिक है* इसके लिये आवश्यक है कि हमें *आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पंडित:* को चरितार्थ करना होगा *...*…


जब तक गैरों के सुख-दु:ख को हम स्वयं अनुभव नहीं करेंगे तो उनके लिए मर मिटने को तैयार कैसे होंगे? लेकिन जब तक वे हमसे भिन्न हैं तब तक हजार कोशिश करने पर भी उनकी व्यथा का अनुभव हम नहीं कर सकते *उसे जान लें* जानना और अनुभव करने में बड़ा अंतर है अनुभव के लिए उसके साथ या अन्य के साथ हमको अपने तादात्म्य का ज्वलंत और जीवंत ज्ञान होना चाहिये *बिना इसके काम चल नहीं सकता* मानव मात्र के प्रति भ्रातृ भाव और सद्भाव यही सच्ची सेवा है *यही भगवान की सेवा हैं* और यही मानव धर्म हैं lllllllll


शुक्रवार, 11 जून 2021

भारतीय नोट पर कितनी भाषाएं छपी होती हैं?

 क्‍या आप जानते हैं? भारतीय नोट पर कितनी भाषाएं छपी होती हैं?

15 अगस्‍त 1947 को देश आजाद हुआ और सन् 1950 में भारत एक गणतंत्र बना. भारत में आज जो रुपए का डिजाइन है वो एक रुपए के सिक्‍के से प्रभावित है. जो प्रतीक नोट के लिए चुना गया वो सारनाथ स्थित चार मुंह वाले शेर से लिया गया है.

आपके घर में 100 रुपए, 500 रुपए या फिर 2000 रुपए का नोट तो होगा ही. क्‍या आपने कभी अपने पास रखे इस नोट को ध्‍यान से देखा है. इस नोट पर क्‍या-क्‍या होता है कभी आपने जानने की कोशिश की है. शायद आपको ये मालूम भी हो कि भारतीय नोट पर क्‍या-क्‍या छपा होता है. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि आपके नोट पर कितनी भाषाएं हैं और वो भाषाएं क्‍यों हैं? चलिए आज आपको बताते हैं कि भारतीय नोट पर कितनी भाषाएं प्रिंट होती हैं और इतनी भाषाओं को छापने की वजह क्‍या है.


नोट पर होती हैं 17 भाषाएं

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की वेबसाइट के मुताबिक एक भारतीय नोट पर 17 भाषाएं प्रिंट होती हैं. इंग्लिश और हिंदी सामने की तरफ होती हैं तो नोट के पीछे की तरफ 15 भाषाएं प्रिंट होती हैं. भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्‍ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं मिला और देश में 22 भाषाएं बोली जाती हैं. ऐसे में इन सभी भाषाओं को नोट पर प्राथमिकता दी गई है.


जो भाषाएं नोट पर प्रिंट होती हैं उनमें हिंदी और अंग्रेजी के अलावा असमी, बंगाली, गुजराती, कन्‍नड़, कश्‍मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़‍िया, पंजाबी, संस्‍कृति, तमिल, तेलगु और उर्दू शामिल हैं. इसके साथ ही 2000 रुपए के नोट पर ब्रेल लिपि भी छपी होती है जिससे उन लोगों को आसानी हो जो देख नहीं सकते हैं.


आजाद भारत का पहला नोट

15 अगस्‍त 1947 को देश आजाद हुआ और सन् 1950 में भारत एक गणतंत्र बना. भारत में आज जो रुपए का डिजाइन है वो एक रुपए के सिक्‍के से प्रभावित है. जो प्रतीक नोट के लिए चुना गया वो सारनाथ स्थित चार मुंह वाले शेर से लिया गया है. इसके साथ ही जॉर्ज पंचम की सीरिज वाले नोट देश में बंद हो गए थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने आजाद भारत में पहला नोट एक रुपए का था. 30 नवंबर 1917 को एक रुपए का नोट ब्रिटिश शासन काल में आया था.


क्‍या थी अंग्रेजों के समय स्थिति

प्रथम विश्‍व युद्ध में अंग्रेजों का दबदबा था और उस समय एक रुपए का सिक्‍का चांदी के सिक्‍के के तौर पर चलन में था. लेकिन युद्ध की वजह से जब स्थितियां खराब हो गईं तो चांदी के सिक्‍के को ढालना मुश्किल हो गया था. इस वजह से पहली बार लोगों के सामने एक रुपए का नोट आया जिस पर जॉर्ज पंचम की फोटो लगी थी. इस नोट को इंग्‍लैंड में प्रिंट किया गया था और एक रुपए के नोट की वैल्‍यू बाकी मुद्रा की तुलना में बहुत कम थी.


जब हैदराबाद के निजाम को मिला विशेष अधिकार

वर्ष 1969 में आरबीआई ने 5 और 10 रुपयों के नोट पर महात्मा गांधी की 100वीं जयंती के मौके पर स्मारक डिजाइन वाली सीरिज जारी की थी. आपको जानकर हैरानी होगी कि चलती नाव की फोटो 10 रुपए के नोट पर 40 से भी अधिक सालों तक कायम रही थी. साल 1959 में भारत के हज यात्रियों के लिए दस और 100 रुपए के खास नोट जारी किए गए ताकि तीर्थयात्री सउदी अरब की लोकल करेंसी के मुताबिक इसे एक्‍सचेंज कर सकें. सन् 1917-1918 में हैदराबाद के निजाम को खुद की करेंसी प्रिंट करने और उसे जारी करने का विशेषाधिकार दिया गया था.

गुरुवार, 10 जून 2021

शनि देव की जन्म कथा

 शनि देव की जन्म कथा

स्कंदपुराण के काशीखंड के अनुसार शनि देव भगवान सूर्य के पुत्र है। कथा के अनुसार सूर्य का विवाह प्रजापति की पुत्री संज्ञा से हुआ। संज्ञा अपने पति से बेहद स्नेह करती थी और अज्ञानता के कारण सदैव उनके तेज अर्थात अग्नि को कम करने के लिए प्रयासरत रहती थी। समय बीतने के साथ संज्ञा को तीन संतानों की प्राप्ति हुई। जिन्हें हम वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना के नाम से जानते है। इन सब के बावजूद भी संज्ञा के मन में सूर्य की अग्नि को कम करने की तीव्र इच्छी थी। एक दिन उन्होंने तप कर सूर्य देव की अग्नि को कम करने का निश्चय कर लिया।  उनके सामने पत्नी धर्म और बच्चों के पालन पोषण का सवाल था, इसलिए संज्ञा ने अपने तप से अपनी एक हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा।काम्या 


माता संज्ञा ने अपने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को सौंप कर कहा कि अब मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन पोषण करते हुए नारीधर्म का पालन करो, लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिए। जिसके बाद संज्ञा वहां से अपने पिता के घर पहुंची और अपनी परेशानी बताई, लेकिन पिता ने उन्हें समझाकर वापस अपने पति के पास जाने को कहा।  संज्ञा ने वहां से वन में जाकर कठोर तप करने का निश्चय किया। संज्ञा ने वन में एक घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या प्रारंभ कर दी। वहीं सूर्यदेव को इस बात का जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ संज्ञा नहीं अपितु छाया संवर्णा रह रही है। संवर्णा पति धर्म का पालन करते हुए गर्भवती हुई और उन्होंने तीन संतानों मनु, शनिदेव और भद्रा को जन्म दिया। इस प्रकार शनि देव का जन्म सूर्य और छाया संवर्णा की दूसरी संतान के रूप में हुआ. 

शनि जयंती : पूजा विधि, महत्व एवं सटीक उपाय

 शनि जयंती : पूजा विधि, महत्व एवं सटीक उपाय::- 


हिंदू महीने ज्येष्ठ की अमावस्या को शनि जयंती मनाई जाती है। माना जाता है इस दिन शनिदेव अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। शनि की साढ़े साती, ढैय्या या शनि की महादशा से गुजर रहे भक्तों के लिए यह दिन विशेष फल देने वाला है। इस साल यानी 2021 में शनि जयंती 10 जून को है।आज हम आपको बता रहे हैं शनि जंयती पर की जाने वाली विशेष पूजा जो तुरंत फलदायक होगी।


 ध्यान रखें शनि के दर्शन उनकी मूर्ति के ठीक सामने खड़े होकर नहीं करना चाहिए। उनकी मूर्ति की आंखों में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनके चरणों में देखने का विधान है।


शनि जयंती पर शनि देव की पूजा विधि


शनि जयंती इस बार गुरुवार को आने वाली है। इस दिन शनि देव के साथ भगवान शिव और विष्णु की उपासना से कई गुना फल मिलते हैं।


– सुबह शुद्ध होकर आप शनि मंदिर जाकर शनि देव का तेल से अभिषेक करें।


– शनि देव की प्रसन्नता के लिए गरीबों को दान दिया जा सकता है।


– शनि जंयती पर झूठ बोलना, गरीबों को नुकसान पहुंचाना या किसी के साथ धोखा करने वालों को शनि क्षमा नहीं करते हैं, इसलिए ऐसा कोई काम ना करें।


-शनि के तंत्रोक्त मंत्र ||ओम प्रां प्रीं प्रौं स: शन्यै नम:||


  या फिर


|| ओम शं शनैश्चराय नम:||

 मंत्र की एक, पांच या ग्यारह माला के जाप जरूर करें। कई विशेषज्ञ शनि मंत्रों का जाप मंदिर या घर के बाहर करने की सलाह देते हैं।


–  तिल का तेल, काले तिल, काले उड़द या लौहे की कोई वस्तु जरूर दान करें।


शनि देव की पूजा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है, क्योंकि शनि देव अनुशासन और कठिन परिश्रम पसंद करते हैं इसलिए उन्हें अपनी पूजा में किसी भी प्रकार की कोताही पसंद नहीं है। माना जाता है यदि शनि देव क्रोधित हो जाते है तो घर की सुख शांति भंग हो सकती है।


शनि जयंती के दिन प्रातः स्नानादि नित्य क्रियाओं से निवृत होकर घर पर या मंदिर में भगवान शनि देव की आराधना करनी चाहिए। प्रभु की प्रतिमा के दोनों ओर शुद्ध तेल के दीपक जलाने चाहिए और धूप ध्यान करना चाहिए। प्रभु पर नैवेद्य चढ़ाने से पहले उन पर अबीर, सिंदूर, कुंकुम और गुलाल चढ़ाकर उन्हे नीले फूल अर्पित करने चाहिए। इसके बाद उन्हे भोग लगाने के लिए मौसमी फल और श्रीफल अर्पित करने चाहिए। पूजा विधि के दौरान मन में लगातार शनि के किसी एक मंत्र का जाप करना चाहिए।


 शनि का यह मंत्र भी है उन्हें प्रिय- 


||ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||


शनि जयंती पूजा समय:

अमावस्या तिथि प्रारंभ: – 9 जून 2021 – दोपहर 1.35 PM


अमावस्या तिथि समाप्त: – 10 जून 2021- शाम 4.22 PM


इस दिन सुबह 6.00 बजे से  7.30 और सुबह 11 बजे से दोपहर 2.15 तक की समय शनि पूजा के लिए एकदम उचित समय है।


ज्योतिष में शनि देव का महत्व

ज्योतिष में शनि देव का विशेष महत्व है। हालांकि ज्योतिष में शनि को अशुभ ग्रह की संज्ञा दी गई है। इनके पास तीसरी, सातवीं और दसवीं दृष्टि है। खास बात यह है कि शनि न्याय प्रिय देव है। वे किसी के साथ ना तो अन्याय करते हैं और ना ही अन्याय होने देते हैं। इसलिए अन्याय करने वालों को तुरंत दंड देते हैं। कई लोग शनि को काले और कई जगह नीले रंग से वर्णित किया गया है। उनकी पूजा में नीले रंग के पुष्प ही चढ़ाना चाहिए। शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहते हैं और कर्म के अनुसार धीरे-धीरे फल देने वाले हैं। शनि परम शिव भक्त हैं, इसलिए शनि को दोषों से दूर रहने के लिए हनुमानजी के साथ शिवजी की उपासना का भी महत्व है।


शनि जयंती पर शनि देव की पूजा विधि:-


शनि जयंती इस बार गुरुवार को आने वाली है। इस दिन शनि देव के साथ भगवान शिव और विष्णु की उपासना से कई गुना फल मिलने वाले हैं।


– सुबह शुद्ध होकर आप शनि मंदिर जाकर शनि देव का तेल से अभिषेक करें।


– शनि देव की प्रसन्नता के लिए गरीबों को दान दिया जा सकता है।

प्रतिदिन लें शनि के दस नाम


शनिदेव के दस नाम प्रतिदिन लेने से होती है सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे श्लोक के रूप में जप सकते हैं। यदि ऐसा नहीं कर सकें, तो हर नाम के साथ ओम  और नम:  का उच्चारण जरूर करें।


जैसे- 

||ओम कोणस्थ नम:||


कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।


सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।


अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन 10 नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं।


शनि दोष दूर करने के उपाय::-


– दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।


– अपने माता-पिता की सेवा करें। बुजुर्गों का अपमान नहीं करें।


– शनिवार को तिल के तेल का दीपक जलाएं।


–  तिल के तेल से भगवान शनि का अभिषेक करें।


– काले उड़द, काले तिल या काले चने सामर्थ्य अनुसार दान करें।


– शनिवार का व्रत करके शनि व्रत कथा का पाठ करें।


–  आलस्य नहीं करें और दूसरों का मन ना दुखाएं।