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रविवार, 31 जनवरी 2021

30 जनवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

              30 जनवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ 

डेनमार्क और ल्यूबेक के बीच 1522 में युद्ध।

पुर्तग़ाल ने मलक्का की खाड़ी को 1641 में मलाया डचों को सौंप दी।

हॉलैंड और स्पेन के बीच 1648 में शांति समझौता हुआ।

इंग्लैंड के सम्राट ‘चार्ल्स प्रथम’ को 1649 में फ़ांसी दी गई।

ब्रिटेन के राजकुमार’ चार्ल्स एडवर्ड स्टुअर्ट’ की 1788 में रोम में मौत हो गयी।

लाइफ़बोट के तौर पर निर्मित पहली नाव का 1790 में टायन नदी में परीक्षण।

कोरिया और चीन की स्वतंत्रता के बारे में 1902 में जापान और ब्रिटेन के बीच पहली ‘आंग्ल-जापानी संधि’ पर लंदन में हस्ताक्षर हुए।
लॉर्ड कर्ज़न ने 1903 में मेटकाफ़ हॉल में ‘इंपीरियल लाइब्रेरी’ का उद्घाटन किया।

‘कैनेडियन नेवल सर्विस’ का नाम 1911 में बदलकर ‘रॉयल कैनेडियन नेवी’ किया गया।

‘हाउस आफ़ लॉर्ड्स’ ने 1913 में आइरिश होम रूल बिल को ख़ारिज किया।

एडॉल्फ़ हिटलर ने 1933 में आधिकारिक रूप से जर्मनी के चांसलर की कमान सम्भाली।

सोवियत संघ की एक पनडुब्बी में 30 जनवरी, 1941 को जर्मनी का एक पोत डूब गया, जिससे उसमें सवार करीब 9 हजार लोगों की जान चली गई।
स्टालिन ग्राफ़ के पास सोवियत फ़ौजों से 1943 में जर्मन सेना हारी।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने 1948 में आज ही के दिन हत्या की थी।

रात्रि एयर मेल सेवा की शुरूआत 1949 में हुई।

दक्षिण वियतनाम में सेना ने 1964 में सत्ता पर कब्ज़ा किया।

दूसरे विश्व युद्ध के समय देश के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल को 30 जनवरी 1965 को ब्रिटेन के लोगों ने अंतिम विदाई दी। आपको बता दें कि विंस्टन चर्चिल एक प्रखर वक्ता ही नहीं बल्कि एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

इंडियन एयरलाइंस के ‘फोकर फ्रेंडशिप विमान’ का 1971 में अपहरण।

अमेरिका ने 30 जनवरी, 1989 को अफगानिस्तान के काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया।

इराकी सेना ने 30 जनवरी 1991 को सउदी अरब की सीमा के पास एक शहर पर कब्जा कर लिया। इस आक्रमण में करीब 12 अमेरिका सैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।
सैंतालिस वर्षों बाद 1997 में महात्मा गांधी की अस्थियाँ संगम में विसर्जित।

वैज्ञानिकों ने 30 जनवरी साल 2004 को मंगल यान पर भेजे गए अंतरिक्ष यान अपोर्चुनिटी को मंगल ग्रह पर आयरन ऑक्साइड की मौजूदगी का एलान किया था।
टाटा ने 2007 में एंग्लो डच स्टील निर्माता कंपनी कोरस ग्रुप को 12 अरब डॉलर से अधिक में ख़रीदा।

चेन्नई की एक विशेष अदालत ने 2008 में बहुचर्चित स्टाम्प घोटाले के मामले के मुख्य आरोपी अब्दुल करीम तेलगी को 10 साल की सज़ा सुनाई।
2009 में हुए आस्ट्रेलिया ओपन के मिक्स्ड डबल मुक़ाबले में सानिया मिर्ज़ा व महेश भूपति की जोड़ी फाइनल में पहुँची।
कोका कोला कंपनी ने 30 जनवरी, साल 2009 को कोका काला क्लासिक का नाम बदलकर कोका कोला करने का ऐलान किया था। आपको बता दें कि साल 1985 में कोका काला के साथ कक्लासिक शब्द को जोड़ा गया था

दक्षिण कोरिया ने 30 जनवरी साल 2013 को अपना पहला कैरियर रॉकेट नारो-1 प्रक्षेपित किया।

*30 जनवरी को जन्मे व्यक्ति --*

इटली के भौतिकशास्त्री और गणितज्ञ लूईची गैलवानी का बोलोनिया नगर में 30 जनवरी, 1737 को जन्म हुआ। आपको बता दें कि इन्होंने सजीवों के शरीर में बिजली होने का पता लगाया था।
संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनेता फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ज का 30 जनवरी 1882 में जन्म हुआ

1890 में प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद का जन्म।

1910 में भारतीय राजनेता, वकील और पूर्व रक्षा मंत्री और जिन्हें चिदंबरम सुब्रमण्यम का जन्म। जिन्हें भारत में “हरित क्रांति के पिता” कहा जाता था।
1913 में प्रसिद्ध भारतीय महिला चित्रकार अमृता शेरगिल का जन्म।

1927 में स्वीडिश सोशल डेमोक्रेटिक राजनेता ओलोफ़ पाल्मे का जन्म।

उज्बेकिस्तान के राजनेता इस्लाम करिमोव का जन्म 30 जनवरी 1938 को हुआ।

ग्रेट ब्रिटेन के खिलाड़ी पीटर क्राउच का 30 जनवरी 1981 को जन्म हुआ।

अभिनेत्री गुरदीप कोहली का 30 जनवरी 1980 को जन्म हुआ।

*30 जनवरी को हुए निधन –*

मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह का 1530 में निधन।

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 1948 में निधन।

हिन्दी साहित्यकार माखन लाल चतुर्वेदी का 1968 में निधन।

प्रसिद्ध लेखक, कवि, भाषाविद और सम्पादक नाथूराम प्रेमी का 1960 में निधन।

भारत के एक अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा का 1960 में निधन।

*30 जनवरी के महत्त्वपूर्ण अवसर :--*

महात्मा गांधी स्मृति दिवस

कुष्ठ निवारण दिवस

31 जनवरी/जन्म-दिवस


                      31 जनवरी/जन्म-दिवस

वनबन्धु मदनलाल अग्रवाला

अपना काम करते हुए समाज सेवा बहुत लोग करते हैं; पर 31 जनवरी, 1923 को झरिया (जिला धनबाद, झारखंड) में जन्मे श्री मदनलाल अग्रवाला सामाजिक कार्य को व्यापार एवं परिवार से भी अधिक महत्व देते थे। उन्होंने अनेक संस्थाएं बनाकर अपने रिश्तेदारों व परिचितों को भी इस हेतु प्रेरित किया। 

यह परिवार जिला झुंझुनु (राजस्थान) के लोयल ग्राम का मूल निवासी था। इनके दादा श्री हरदेव दास 1876 में झरिया आये थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1913-14 में कोयला खानों के ठेकों से इन्हें बहुत लाभ हुआ। समाज सेवा और स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता के कारण इन्हें खूब प्रसिद्धि मिली। दादा जी द्वारा स्थापित डी.ए.वी. विद्यालय में ही मदनबाबू की शिक्षा हुई। 

उन दिनों शासन षड्यन्त्रपूर्वक मुस्लिम अलगाववादियों को शह दे रहा था। मदनबाबू के ताऊ श्री अर्जुन अग्रवाला ने हिन्दु युवकों को लाठी, भाला आदि सिखाने के लिए एक शिक्षक रखा। मदनबाबू भी वहां जाते थे। 1940 में मैट्रिक उत्तीर्ण कर वे डेढ़ माह के प्रशिक्षण हेतु डा. मुंजे द्वारा स्थापित भोंसले मिलट्री स्कूल, नासिक में गये और वहां से आकर 1941 में नवयुवक संघ की स्थापना की। 1944 में संघ के एक कार्यकर्ता झरिया आये और इस प्रकार नवयुवक संघ का कार्य शाखा में बदल गया। 1945 में वे जिला कार्यवाह बने। श्री गुरुजी प्रवास के समय इनके घर पर ही ठहरते थे। 

मदनबाबू मारवाड़ी समाज की गतिविधियों में भी सक्रिय थे। इनका मानना था कि सम्पन्न वर्ग को उस क्षेत्र की सेवा अवश्य करनी चाहिए, जहां से उन्होंने धन कमाया है। शिक्षा को वे सेवा का सर्वोत्तम साधन मानते थे। अतः मारवाड़ी व्यापारियों को प्रेरित कर इन्होंने अनेक शिक्षण संस्थाएं प्रारम्भ कीं। 

वे सामाजिक रूढ़ियों के घोर विरोधी थे। 1947 में उन्होंने एक मारवाड़ी सम्मेलन में पर्दा व दहेज प्रथा का विरोध किया। उनकी मां और पत्नी के नेतृत्व में अनेक महिलाओं ने पर्दा त्याग दिया। मदनबाबू ने समाज में आदर्श स्थापित करते हुए अपने भाइयों और पुत्रों के विवाह बिना दहेज लिये सादगी से किये।

1948-49 में उनके पिताजी बहुत बीमार हुए। मदनबाबू सामाजिक कामों में अधिक समय लगाते थे। इससे व्यापार प्रभावित हो रहा था। यह देखकर मृत्यु शैया पर पड़े पिताजी ने इनसे कहा कि केवल पांच साल तक पूरा समय व्यापार को दो। यदि व्यापार ठीक चला, तो सामाजिक कार्य भी कर सकोगे, अन्यथा हाथ से सब कुछ चला जाएगा। 

मदनबाबू ने तुरंत 26 सामाजिक संस्थाओं की जिम्मेदारियों से त्यागपत्र दे दिया। धीरे-धीरे व्यापार पटरी पर आ गया और 1970 में सब कारोबार भाइयों को सौंपकर वे फिर से संघ और अन्य सामाजिक कार्यों में लग गये। संघ कार्य में मदनबाबू दक्षिण बिहार प्रांत संघचालक और फिर केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। 1948 और 1975 के प्रतिबंध काल में वे जेल भी गये। 

उनके मन में वनवासियों के प्रति अत्यधिक करुणा थी। उनके बच्चों के लिए उन्होंने कई विद्यालय व छात्रावास बनवाये। उनका सबसे विशिष्ट कार्य ‘वनबंधु परिषद’ और ‘एकल विद्यालय योजना’ है। इसमें एक युवा अध्यापक अपने ही गांव के बच्चों को पढ़ाता है। उसके मानदेय का प्रबन्ध सम्पन्न लोगों के सहयोग से किया जाता है। आज ऐसे विद्यालयों की संख्या देश में 35,000 तक पहुंच गयी है। मदनबाबू की देश भ्रमण में बहुत रुचि थी। वे प्रतिवर्ष मा0 रज्जू भैया आदि के साथ 8-10 दिन के लिए घूमने जाते थे। 

निष्ठावान स्वयंसेवक, सक्रिय समाजसेवी तथा वनबन्धुओं के सच्चे मित्र मदनबाबू अग्रवाला का निधन 28 मार्च, 2000 को कोलकाता में हुआ।
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जनवरी/देहावसान
फक्कड़ एवं मस्त गोपीचंद अरोड़ा

राजस्थान में अपना प्रचारक जीवन बिताने वाले श्री गोपीचंद अरोड़ा का जन्म 1923 में अविभाजित पंजाब में हुआ था। वे स्वयंसेवक भी वहीं बने। विभाजन के दौर की कठिनाइयों के कारण उनकी लौकिक शिक्षा बहुत अधिक नहीं हो सकी। भारत में आकर जब परिवार कुछ स्थिर हो गया, तो वे प्रचारक बन गये। 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर प्रचारकों को वापस जाने को कह दिया गया था। गोपीचंद जी ने अपने बड़े भाई के पास अलवर में रहते हुए एक नौकरी कर ली; पर प्रतिबंध समाप्त होते ही वे फिर प्रचारक बन गये। 

प्रचारक जीवन में वे चित्तौड़, बाड़मेर, श्री गंगानगर, अलवर, सिरोही, झुंझनू आदि में विभिन्न दायित्वों पर रहे। 1978 में वे पाली के सह विभाग प्रचारक तथा 1979 में विभाग प्रचारक बने। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका फक्कड़ तथा मस्त स्वभाव था। विभिन्न शिविरों तथा संघ शिक्षा वर्ग आदि में रात में होने वाली विनोद सभा में उनका यह कौशल पूरी तरह प्रकट होता था; पर वे हंसी मजाक करते हुए श्रोताओं को सही दिशा भी दे देते थे। 

वे मानते थे कि तत्वज्ञान की बजाय मित्रता से लोगों को जोड़ना आसान है। वे झुंझनू जिले में बिड़ला परिवार द्वारा संचालित तकनीकी विद्यालय (बिट्स) के छात्रों से लेकर विभिन्न जाति-बिरादरियों के मुखियाओं तक गहरे संबंध बनाकर रखते थे। उन्हें खाना बनाने तथा दूसरों को खिलाने का भी शौक था।

साहसी और जुझारू स्वभाव वाले गोपीचंद का शरीर नाटा और भारी होने पर भी बहुत गठीला और फुर्तीला था। दंडयुद्ध तथा वेत्रचर्म उनके प्रिय विषय थे। एक के विरुद्ध अनेक के संघर्ष में उनका दंड संचालन देखते ही बनता था। इसके साथ ही उनकी घोष विभाग में भी बहुत रुचि थी। राजस्थान में घोष को स्थापित करने का श्रेय उन्हें ही है। सुकंठ गायक होने के कारण पंजाबी और राजस्थानी गीत वे बहुत झूमकर गाते थे। 1975 के प्रतिबंध के समय बाहर ही रहते हुए उन्होंने सत्याग्रह तथा जन जागरण की गतिविधियों का संचालन किया।। 

गोपीचंद जी एक कुशल प्रबंधक भी थे। उनकी हर योजना परिपूर्ण होती थी। झुंझनु के संघ शिक्षा वर्ग में रात में आये भीषण अंधड़ के कारण पंडाल ध्वस्त हो गया; पर सुबह जब लोग उठे, तो वह पंडाल फिर से सिर उठाकर खड़ा था। ऐसा ही एक बार किशनगढ़ में भी हुआ। 

राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर में वे कई वर्ष प्रचारक रहे। 1965 में चोहटन स्टेशन के पास स्थित पैट्रोल पम्प में पाकिस्तानी विमानों के हमले से आग लग गयी। उस समय स्टेशन पर शस्त्रों से लदी गाड़ी भी खड़ी थी। ऐसे में गोपीचंद जी ने सैनिकों के साथ मिलकर आग को काबू किया तथा नागरिकों की प्राणरक्षा की। उनकी जागरूकता से कई घुसपैठिये भी पकड़े गये। 

युद्ध के समय घायल सैनिकों को खून की आवश्यकता होने पर उनके नेतृत्व में स्वयंसेवक तथा नागरिक सैनिक अस्पताल में उमड़ पड़ते थे। उन दिनों युद्ध सामग्री ले जाने वाली रेलगाडि़यां शत्रुओं के निशाने पर रहती थीं। एक बार ऐसे एक चालक ने भयवश गाड़ी ले जाने से मना कर दिया। पता लगने पर गोपीचंद जी ने तुरंत एक पुराने चालक को तैयार कर लिया। यद्यपि बमवर्षा होने से वह चालक मारा गया; पर तब तक शस्त्र सीमा पर पहुंच गये थे।

जनवरी 1981 में सिरोही में संघ के सह सरकार्यवाह श्री यादवराव जोशी का प्रवास था। दिन भर वे उसके लिए भागदौड़ करते रहे। शाम को सार्वजनिक कार्यक्रम और फिर कार्यकर्ता बैठक के बाद रात में उन्हें हृदयाघात हुआ। यह इतना भीषण था कि चिकित्सकीय सहायता के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। इस प्रकार संघ कार्य करते हुए ही उनकी जीवन यात्रा पूरी हुई।

विभिन्न् स्वप्न फल

                           विभिन्न् स्वप्न फल


१.यदि रोगी सिर मुंडाएं ,लाल या काले वस्त्र धारण किए किसी स्त्री या पुरूश को सपने में देखता है या अंग भंग व्यक्ति को देखता है तो रोगी की दशा अच्छी नही है ।

२. यदि रोगी सपने मे किसी ऊँचे स्थान से गिरे या पानी में डूबे या गिर जाए तो समझे कि रोगी का रोग अभी और बड़ सकता है।

३. यदि सपने में ऊठ,शेर या किसी जंगली जानवर की सवारी करे या उस से भयभीत हो तो समझे कि रोगी अभी किसी और रोग से भी ग्र्स्त हो सकता है।

४. यदि रोगी सपने मे किसी ब्राह्मण,देवता राजा गाय,याचक या मित्र को देखे तो समझे कि रोगी जल्दी ही ठीक हो जाएगा ।

५.यदि कोई सपने मे उड़ता है तो इस का अभिप्राय यह लगाया जाता है कि रोगी या सपना देखने वाला चिन्ताओं से मुक्त हो गया है। 

:६.यदि सपने मे कोई मास या अपनी प्राकृति के विरूध भोजन करता है तो ऐसा निरोगी व्यक्ति भी रोगी हो सकता है । 

७,यदि कोई सपने में साँप देखता है तो ऐसा व्यक्ति आने वाले समय मे परेशानी में पड़ सकता है ।या फिर मनौती आदि के पूरा ना करने पर ऐसे सपनें आ सकते हैं।

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

गब्बरसिंह का चरित्र

 परीक्षा में गब्बरसिंह का चरित्र चित्रण करने के लिए कहा गया-😀😁


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दसवीं के एक छात्र ने लिखा-😉

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1. सादगी भरा जीवन-

:- शहर की भीड़ से दूर जंगल में रहते थे,

एक ही कपड़े में कई दिन गुजारा करते थे,

खैनी के बड़े शौकीन थे.😂

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2. अनुशासनप्रिय-

:- कालिया और उसके साथी को प्रोजेक्ट ठीक से न करने पर सीधा गोली मार दिये थे.😂

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3. दयालु प्रकृति-

:- ठाकुर को कब्जे में लेने के बाद ठाकुर के सिर्फ हाथ काटकर छोड़ दिया था, चाहते तो गला भी काट सकते थे😂

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4. नृत्य संगीत प्रेमी-

;- उनके मुख्यालय में नृत्य संगीत के कार्यक्रम चलते रहते थे..

'महबूबा महबूबा',😂

'जब तक है जां जाने जहां'.

बसंती को देखते ही परख गये थे कि कुशल नृत्यांगना है.😂😂

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5. हास्य रस के प्रेमी-

:- कालिया और उसके साथियों को हंसा हंसा कर ही मारे थे. खुद भी ठहाका मारकर हंसते थे, वो इस युग के 'लाफिंग पर्सन' थे.😂

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6. नारी सम्मान-

:- बंसती के अपहरण के बाद सिर्फ उसका नृत्य देखने का अनुरोध किया था,😀😂

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7. भिक्षुक जीवन-

:- उनके आदमी गुजारे के लिए बस  अनाज मांगते थे,

कभी बिरयानी या चिकन टिक्का की मांग नहीं की.. .😂

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8. समाज सेवक-

:- रात को बच्चों को सुलाने का काम भी करते थे ..

सो जा नही तो गब्बर सिंह आ जायेगा

 टीचर ने पढा तो आँख भर आई और बोली सारी गलती जय और वीरू की है!!

सोमवार, 11 जनवरी 2021

हमारे 7 चक्र

 



                              हमारे 7 चक्र


1. मूलाधार चक्र 

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह "आधार चक्र" है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : "लं"






*कैसे जाग्रत करें :*

मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

*प्रभाव :*
इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है





*2. स्वाधिष्ठान चक्र -*
यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : "वं"





*कैसे जाग्रत करें :*
जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

*प्रभाव :*
इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।


*3. मणिपुरक चक्र :
खुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत "मणिपुर" नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंको कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : "रं"





*कैसे जाग्रत करें:*
आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
*प्रभाव :*
इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।


*4. अनाहत चक्र*
हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही "अनाहत चक्र" है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.
मंत्र : "यं"





*कैसे जाग्रत करें :*
हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और "सुषुम्ना" इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।


*प्रभाव :*
इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।



*5. विशुद्धि चक्र:*
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां "विशुद्ध चक्र" है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : "हं"






*कैसे जाग्रत करें :*
कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र Iजाग्रत होने लगता है।

*प्रभाव :*
इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।
*6. आज्ञाचक्र :*
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में "आज्ञा-चक्र" है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। "बौद्धिक सिद्धि" कहते हैं।
मंत्र : "ॐ"

*कैसे जाग्रत करें :*
भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
*प्रभाव :*
यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस "आज्ञा चक्र" का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

6. आज्ञाचक्र :
 
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
 
मंत्र : उ 
आज्ञाचक्र

 
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
 
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

*7. सहस्रार चक्र :*
"सहस्रार" की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
*कैसे जाग्रत करें :*




"मूलाधार" से होते हुए ही "सहस्रार" तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह "चक्र" जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
*प्रभाव :*
शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही "मोक्ष" का द्वार है।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

भारत में 1970 के दशक में छात्र आंदोलन

 

भारत में 1970 के दशक में छात्र आंदोलन

 

भारत में आजादी के बाद कई ऐसे आंदोलन हुए, जब छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर आ धमके। छात्रों के इस जन सैलाब को जनता व राजनेताओं का अपार समर्थन मिला ; जहां उन्होंने छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए आंदोलन को एक नया रूप दिया । जिसने सरकार को हिला कर रख दिया और नया इतिहास रचा। ऐसे छात्र आंदोलनों में 1970 दशक के महत्वपूर्ण रहा है, जहां छात्रों के हितों को केंद्रीय कृत करते हुए, कई छात्र आंदोलनों का जन्म हुआ तो वही नए छात्र संघों और परिषदों का गठन स्थापन भी किया गया।

 

बीसवीं सदी के सातवें दशक में छात्र आंदोलन ने एक नई दिशा को पकड़ा जहां उनका आंदोलन छात्र हितों के साथ राजनीतिक सामाजिक हस्तक्षेप की ओर बढ़ा। इस हस्तक्षेप को स्थानीय स्तर पर राजनेताओं ने राजनीति का हथियार बना दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न छात्र संघों और परिषदों की स्थापना हुई। स्थापना में सर्वप्रथम भारतीय छात्र संघ (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) की स्थापना हुई। इसकी स्थापना का उद्देश्य छात्रों को लोकतंत्र से जोड़ना था ।

भारतीय छात्र संघ 30 दिसंबर 1970 को स्थापित किया गया जिसने युवाओं के लिए एक नया मंच तैयार किया जहां युवा अपनी बातों, विचारों, अवधारणाओं तथा सुझावों को समाज, सरकार तक पहुंचा सके। तो वही लोकतंत्र के नाम पर होने वाली जातीयता की पहचान कर सकें। इस संस्था का उद्देश्य केवल छात्रों के हितों को लेकर है जिसमें शिक्षा के लिए नए नियम तथा सरकार द्वारा दी जा रही शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए आवाज उठाना था । भारतीय छात्र संघ की भूमिका निरंतर बदलती गई है और इसका हस्तक्षेप राजनीति की ओर अधिक होता गया इसकी छात्र राजनेताओं के रूप में उभरे तो वहीं उन्होंने अपना दबदबा राजनीति में भी बनाया। जैसे:- लालू यादव, शरद कुमार, नीतीश यादव, सुशील मोदी इत्यादि।



 

लालू यादव 1970 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव बने और अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके बाद वह 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने। 1974 से 1977 तक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल हुए। यह उस समय का सबसे बड़ा छात्र आंदोलन था यह छात्र आंदोलन और भी ज्यादा जब तीव्र हुआ जब जयप्रकाश नारायण ने कहा कि ‌‌:- भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि ऐसी चीजें हैं, जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती है क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वह तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है ।, जयप्रकाश नारायण के इन विचारों से छात्र आंदोलन में तीव्रता आई और वह आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक शिक्षा तथा आध्यात्मिक शिक्षा की क्रांति की ओर बढ़ा। इसी आंदोलन में लालू यादव ने युवा छात्र नेता की अहम भूमिका निभाई तो वही जेपी आंदोलन से जुड़कर नीतीश कुमार ने भी सियासी करियर शुरू किया।

 

जेपी आंदोलन की दौड़ में सुशील मोदी भी शामिल थे जिसमें लालू पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने उसी समय इन्हें पटना विश्वविद्यालय का महासचिव बनाया गया।

 

18 मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने सरकार के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया। जिसमें आगे चलकर जयप्रकाश नारायण ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हुए, आंदोलन को एक नई दिशा दी। इसलिए कुछ विद्वान इसे जेपी आंदोलन के नाम से भी जानते हैं।  यह आंदोलन कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था इसमें छात्रों ने अपने अधिकार को पाने के आंदोलन का सहारा लिया। इस आंदोलन के केंद्र में छात्रों के रोजगार की मांग तथा भ्रष्टाचार, गलत शिक्षा, वस्तु का बड़ा मूल्य तथा शिक्षा में अवसर इत्यादि को लाना था। जिसको लेकर छात्र निरंतर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अपना आंदोलन कर रहे थे।

 


इतिहास में 18 मार्च 1974 को छात्रों ने राजपाल महोदय की गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए इस दिन उन्होंने राज्यपाल की गाड़ी को रोका; जिससे कि वह दोनों सदनों को संबोधित ना कर सके एवम् वह विधानमंडल समय पर ना पहुंचे। लेकिन पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें रोकने हेतु उन पर कठोरता से लाठीचार्ज किया गया, जिसमें पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष लालू यादव सहित कई बड़े लोग जुड़े हुए थे इनमें से कई छात्रों तथा युवा नेताओं को चोट भी आई तो। इस घटना से आंदोलन में चारों ओर हड़कंप का माहौल बन गया और इस आंदोलन की गंभीरता को ध्यान में रखते, सरकार ने छात्रों की मांग को स्वीकार कर लिया जिसके चलते बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को इस्तीफा देना पड़ा।

 

1973 में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। यह आंदोलन पर्यावरण रक्षा आंदोलन था जिसका शुभारंभ भारत के उत्तराखंड राज्य तब उत्तर प्रदेश का भाग में किसानों द्वारा वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया गया था इस आंदोलन की शुरुआत भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरी देवी के नेतृत्व में हुई थी यह आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा होता गया जिसमें छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही इस आंदोलन में छात्रों ने भारी मात्रा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिससे यह आंदोलन देशव्यापी बन गया।

 


विदर्भ पब्लिकेशन छात्र संघ की स्थापना भगवान बुद्ध द्वारा शुरू की गए मार्ग का अनुसरण करने और अंबेडकर द्वारा दिए गए नैतिक विचारों को अपनाना था। इस संघ का उद्देश्य यह है कि विदर्भ छात्रों के हितों को लेकर निरंतर कार्य करना जिसमें यह बेरोजगारी तथा संसाधनों की समान वितरण एवं अन्य मामले को लेकर छात्रों द्वारा निरंतर आंदोलन किए जाते हैं।

 


अंततः 1970 के दशक के छात्र आंदोलन का मूल उद्देश्य तथा जन्मने का कारण शिक्षा नीति में राजनीतिक हस्तक्षेप एवं छात्रों के अधिकार, छात्रों की बेरोजगारी की समस्या, छात्रों के लिए शिक्षा के अवसर, आध्यात्मिक शिक्षा शैक्षणिक सुधार इत्यादि को ध्यान में रखते हुए इन आंदोलनों का आगाज किया गया।

                                         

                                                            लेखक देवेंद्र कुमार शर्मा