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गुरुवार, 7 जनवरी 2021

भारत में 1970 के दशक में छात्र आंदोलन

 

भारत में 1970 के दशक में छात्र आंदोलन

 

भारत में आजादी के बाद कई ऐसे आंदोलन हुए, जब छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर आ धमके। छात्रों के इस जन सैलाब को जनता व राजनेताओं का अपार समर्थन मिला ; जहां उन्होंने छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए आंदोलन को एक नया रूप दिया । जिसने सरकार को हिला कर रख दिया और नया इतिहास रचा। ऐसे छात्र आंदोलनों में 1970 दशक के महत्वपूर्ण रहा है, जहां छात्रों के हितों को केंद्रीय कृत करते हुए, कई छात्र आंदोलनों का जन्म हुआ तो वही नए छात्र संघों और परिषदों का गठन स्थापन भी किया गया।

 

बीसवीं सदी के सातवें दशक में छात्र आंदोलन ने एक नई दिशा को पकड़ा जहां उनका आंदोलन छात्र हितों के साथ राजनीतिक सामाजिक हस्तक्षेप की ओर बढ़ा। इस हस्तक्षेप को स्थानीय स्तर पर राजनेताओं ने राजनीति का हथियार बना दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न छात्र संघों और परिषदों की स्थापना हुई। स्थापना में सर्वप्रथम भारतीय छात्र संघ (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) की स्थापना हुई। इसकी स्थापना का उद्देश्य छात्रों को लोकतंत्र से जोड़ना था ।

भारतीय छात्र संघ 30 दिसंबर 1970 को स्थापित किया गया जिसने युवाओं के लिए एक नया मंच तैयार किया जहां युवा अपनी बातों, विचारों, अवधारणाओं तथा सुझावों को समाज, सरकार तक पहुंचा सके। तो वही लोकतंत्र के नाम पर होने वाली जातीयता की पहचान कर सकें। इस संस्था का उद्देश्य केवल छात्रों के हितों को लेकर है जिसमें शिक्षा के लिए नए नियम तथा सरकार द्वारा दी जा रही शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए आवाज उठाना था । भारतीय छात्र संघ की भूमिका निरंतर बदलती गई है और इसका हस्तक्षेप राजनीति की ओर अधिक होता गया इसकी छात्र राजनेताओं के रूप में उभरे तो वहीं उन्होंने अपना दबदबा राजनीति में भी बनाया। जैसे:- लालू यादव, शरद कुमार, नीतीश यादव, सुशील मोदी इत्यादि।



 

लालू यादव 1970 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव बने और अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके बाद वह 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने। 1974 से 1977 तक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल हुए। यह उस समय का सबसे बड़ा छात्र आंदोलन था यह छात्र आंदोलन और भी ज्यादा जब तीव्र हुआ जब जयप्रकाश नारायण ने कहा कि ‌‌:- भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि ऐसी चीजें हैं, जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती है क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वह तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है ।, जयप्रकाश नारायण के इन विचारों से छात्र आंदोलन में तीव्रता आई और वह आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक शिक्षा तथा आध्यात्मिक शिक्षा की क्रांति की ओर बढ़ा। इसी आंदोलन में लालू यादव ने युवा छात्र नेता की अहम भूमिका निभाई तो वही जेपी आंदोलन से जुड़कर नीतीश कुमार ने भी सियासी करियर शुरू किया।

 

जेपी आंदोलन की दौड़ में सुशील मोदी भी शामिल थे जिसमें लालू पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने उसी समय इन्हें पटना विश्वविद्यालय का महासचिव बनाया गया।

 

18 मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने सरकार के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया। जिसमें आगे चलकर जयप्रकाश नारायण ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हुए, आंदोलन को एक नई दिशा दी। इसलिए कुछ विद्वान इसे जेपी आंदोलन के नाम से भी जानते हैं।  यह आंदोलन कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था इसमें छात्रों ने अपने अधिकार को पाने के आंदोलन का सहारा लिया। इस आंदोलन के केंद्र में छात्रों के रोजगार की मांग तथा भ्रष्टाचार, गलत शिक्षा, वस्तु का बड़ा मूल्य तथा शिक्षा में अवसर इत्यादि को लाना था। जिसको लेकर छात्र निरंतर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अपना आंदोलन कर रहे थे।

 


इतिहास में 18 मार्च 1974 को छात्रों ने राजपाल महोदय की गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए इस दिन उन्होंने राज्यपाल की गाड़ी को रोका; जिससे कि वह दोनों सदनों को संबोधित ना कर सके एवम् वह विधानमंडल समय पर ना पहुंचे। लेकिन पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें रोकने हेतु उन पर कठोरता से लाठीचार्ज किया गया, जिसमें पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष लालू यादव सहित कई बड़े लोग जुड़े हुए थे इनमें से कई छात्रों तथा युवा नेताओं को चोट भी आई तो। इस घटना से आंदोलन में चारों ओर हड़कंप का माहौल बन गया और इस आंदोलन की गंभीरता को ध्यान में रखते, सरकार ने छात्रों की मांग को स्वीकार कर लिया जिसके चलते बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को इस्तीफा देना पड़ा।

 

1973 में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। यह आंदोलन पर्यावरण रक्षा आंदोलन था जिसका शुभारंभ भारत के उत्तराखंड राज्य तब उत्तर प्रदेश का भाग में किसानों द्वारा वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया गया था इस आंदोलन की शुरुआत भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरी देवी के नेतृत्व में हुई थी यह आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा होता गया जिसमें छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही इस आंदोलन में छात्रों ने भारी मात्रा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिससे यह आंदोलन देशव्यापी बन गया।

 


विदर्भ पब्लिकेशन छात्र संघ की स्थापना भगवान बुद्ध द्वारा शुरू की गए मार्ग का अनुसरण करने और अंबेडकर द्वारा दिए गए नैतिक विचारों को अपनाना था। इस संघ का उद्देश्य यह है कि विदर्भ छात्रों के हितों को लेकर निरंतर कार्य करना जिसमें यह बेरोजगारी तथा संसाधनों की समान वितरण एवं अन्य मामले को लेकर छात्रों द्वारा निरंतर आंदोलन किए जाते हैं।

 


अंततः 1970 के दशक के छात्र आंदोलन का मूल उद्देश्य तथा जन्मने का कारण शिक्षा नीति में राजनीतिक हस्तक्षेप एवं छात्रों के अधिकार, छात्रों की बेरोजगारी की समस्या, छात्रों के लिए शिक्षा के अवसर, आध्यात्मिक शिक्षा शैक्षणिक सुधार इत्यादि को ध्यान में रखते हुए इन आंदोलनों का आगाज किया गया।

                                         

                                                            लेखक देवेंद्र कुमार शर्मा

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