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शनिवार, 20 मार्च 2021

21 मार्च,रूसी रामभक्त अकादमिक वरान्निकोव

 21 मार्च/जन्म-दिवस


         रूसी रामभक्त अकादमिक वरान्निकोव


रूसी नागरिकों को श्रीरामकथा का रसास्वादन कराने वाले श्री अलेक्जैंडर पेत्राविच का जन्म 21 मार्च, 1890 को उक्रोइन के जोलोतोनोशा कस्बे में एक गरीब बढ़ई प्योत्र इवानोविच के घर में हुआ था। वे नौ भाई-बहिन थे। उनकी मां घर में छलनियां बनाती थीं। बच्चे भी उनकी सहायता करते थे। अलेक्से को पढ़ने का बहुत शौक था। पांच वर्ष की अवस्था में वे बड़े भाई के साथ स्कूल जाने लगे; पर एक दिन अध्यापक ने छोटा कहकर उन्हें भगा दिया। इस पर उनके पिता ने उन्हें दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया। अलेक्से को किताबों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तक पढ़ने या प्राप्त करने के लिए लोगों के कुछ काम कर देते थे। मेधावी होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती थी। इस प्रकार वे पढ़ते रहे। 

विश्वविद्यालय में श्री श्चेरवात्सकी और श्री ओल्देन बुर्ग के सान्निध्य में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू आदि भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने अध्यापन को अपनी आजीविका बनाया। 1917 में वे पेत्रोशाद वि.वि. में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष बने। इसे अब लेनिनग्राद वि.वि. कहते हैं। उन्होंने भारत के प्रमुख गद्य एवं पद्यकारों के साहित्य का अनुवाद किया। इसी दौरान उनका परिचय श्रीरामकथा से हुआ। 1936 में उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस’ का गद्य में अनुवाद किया। इसी वर्ष उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च ‘लेनिन पदक’ से विभूषित किया गया।

इसके बाद दस साल के परिश्रम से उन्होंने मानस का काव्यानुवाद किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया; पर उनके काम के महत्व को देखते हुए सरकार ने उन्हें कजाकिस्तान में एक सुरक्षित जगह भेज दिया। वहां बीमार पड़ने पर भी वे काम करते रहे। इसके प्रकाशित होते ही हजारों प्रतियां तुरंत बिक गयीं। इसके बाद उन्होंने हिन्दी, उर्दू और रूसी कोष का निर्माण किया। वे फारसी और जर्मन भाषा के भी विद्वान थे। फारसी के प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘जेन्दावेस्ता’ का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। 1939 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘रूसी अकादमी’ का सदस्य बनाया गया। इससे वे ‘अकादमी वरान्निकोव’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। 1949 में उनकी कृति ‘प्रेमचंद’ को सोवियत संघ में बहुत प्रसिद्धि एवं सम्मान मिला। श्रीरामचरितमानस की एक प्रति उनकी मेज पर सदा रखी रहती थी। वे तुलसीदास की तरह अपने में मगन रहकर ‘स्वान्तः सुखाय’ काम करने में विश्वास रखते थे।

श्री वरान्निकोव का मानना था कि किसी देश को जानने का सबसे अच्छा साधन वहां की भाषा, साहित्य, संस्कृति और इतिहास को जानना है। भारत को इसी तरह जानने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। उनकी पत्नी तथा सभी बच्चे भारत और भारतीयता के प्रेमी बने। उनके पुत्र पेत्रोविच वरान्निकोव अनुवाद कार्य में अपने पिता का सहयोग करते थे। वे कई बार भारत आये। भारत से कोई भी साहित्यकार रूस जाता था, तो वे उसका हृदय से स्वागत करते थे। यदि संभव हो, तो वे उन्हें अपने घर भी ले जाते थे। वहां उन्होंने भारत से संबंधित पुस्तक, चित्र एवं कलाकृतियों का एक संग्रहालय बना रखा था। उसे वे सबको बड़ी रुचि से दिखाते थे। उन्होंने अपने एक पुत्र का नाम ‘चंद्र’ रखा। 

यद्यपि श्री वरान्निकोव भारतप्रेमी थे; पर दुर्भाग्यवश वे कभी भारतभूमि के दर्शन नहीं कर सके। 1946 में दिल्ली में गांधीजी ने ‘एशियायी सम्मेलन’ के उद्घाटन में कई विदेशी विद्वानों को बुलाया था। वे भी उसमें आना चाहते थे; पर बीमारी के कारण चिकित्सकों ने अनुमति नहीं दी। सात सितम्बर, 1952 को उनका निधन हुआ। उनकी समाधि पर देवनागरी लिपि में तुलसीदास के एक दोहे की अर्धाली ‘भलो भलाइंहि वै लहै’ अंकित है, जो उन्हें बहुत प्रिय थी। इसका अर्थ है कि भला आदमी किसी भी परिस्थिति में भलाई करने से पीछे नहीं हटता। रामभक्त श्री वरान्निकोव ऐसे ही भले आदमी थे। 


(राष्ट्रधर्म, अपै्रल-मई 2020, शंभुनाथ टंडन)

21 मार्च/जन्म-दिवस,विश्वनाथ के आराधक बिस्मिल्ला खां

 21 मार्च/जन्म-दिवस


            विश्वनाथ के आराधक बिस्मिल्ला खां


भगवान विश्वनाथ के त्रिशूल पर बसी तीन लोक से न्यारी काशी में गंगा के घाट पर सुबह-सवेरे शहनाई के सुर बिखरने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को ग्राम डुमराँव, जिला भोजपुर, बिहार में हुआ था। बचपन में इनका नाम कमरुद्दीन था। इनके पिता पैगम्बर बख्श भी संगीत के साधक थे। वे डुमराँव के रजवाड़ों के खानदानी शहनाईवादक थे। इसलिए कमरुद्दीन का बचपन शहनाई की मधुर तान सुनते हुए ही बीता।

जब कमरुद्दीन केवल चार वर्ष के ही थे, तो इनकी माता मिट्ठन का देहान्त हो गया। इस पर वे अपने मामा अल्लाबख्श के साथ काशी आ गये और फिर सदा-सदा के लिए काशी के ही होकर रह गये। उनके मामा विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई बजाते थे। धीरे-धीरे बिस्मिल्ला भी उनका साथ देने लगे। काशी के विशाल घाटों पर मन्द-मन्द बहती हुई गंगा की निर्मल धारा के सम्मुख शहनाई बजाने में युवा बिस्मिल्ला को अतीव सुख मिलता था। वे घण्टों वहां बैठकर संगीत की साधना करते थे। 

बिस्मिल्ला खाँ यों तो शहनाई पर प्रायः सभी प्रसिद्ध राग बजा लेते थे; पर ठुमरी, चैती और कजरी पर उनकी विशेष पकड़ थी। इन रागों को बजाते समय वे ही नहीं, तो सामने उपस्थित सभी श्रोता एक अद्भुत तरंग में डूब जाते थे। जब बिस्मिल्ला खाँ अपना कार्यक्रम समाप्त करते, तो सब होश में आते थे। 15 अगस्त 1947 को जब लालकिले पर स्वतन्त्र भारत का तिरंगा झण्डा फहराया, तो उसका स्वागत बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई बजाकर किया।

धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ने लगी। केवल देश ही नहीं, तो विदेशों से भी उनको निमन्त्रण मिलने लगे। बिस्मिल्ला खाँ के मन में काशी, गंगा और भगवान विश्वनाथ के प्रति अत्यधिक अनुराग था। एक बार अमरीका में बसे धनी भारतीयों ने उन्हें अमरीका में ही सपरिवार बस जाने को कहा। वे उनके लिए सब व्यवस्था करने को तैयार थे; पर बिस्मिल्ला खाँ ने स्पष्ट कहा कि इसके लिए आपको माँ गंगा और भगवान् विश्वनाथ को भी काशी से अमरीका लाना पड़ेगा। वे धनी भारतीय चुप रह गये।

बिस्मिल्ला खाँ संगीत की उन ऊँचाइयों पर पहुँच गये थे, जहाँ हर सम्मान और पुरस्कार उनके लिए छोटा पड़ता था। भारत का शायद ही कोई मान-सम्मान हो, जो उन्हें न दिया गया हो। 11 अपै्रल, 1956 को राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें हिन्दुस्तानी संगीत सम्मान प्रदान किया। 

27 अपै्रल, 1961 को पद्मश्री, 16 अपै्रल, 1968 को पद्मभूषण, 22 मई, 1980 को पद्म विभूषण और फिर 4 मई, 2001 को राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

इतनी ख्याति एवं प्रतिष्ठा पाकर भी उन्होंने सदा सादा जीवन जिया। काशी की सुहाग गली वाले घर के एक साधारण कमरे में वे सदा चारपाई पर बैठे मिलते थे। बीमार होने पर भी वे अस्पताल नहीं जाते थे। उनकी इच्छा थी कि वे दिल्ली में इण्डिया गेट पर शहनाई बजायें। शासन ने इसके लिए उन्हें आमन्त्रित भी किया; पर तब तक उनकी काया अत्यधिक जर्जर हो चुकी थी।

21 अगस्त, 2006 को भोर होने से पहले ही उनके प्राण पखेरु उड़ गये। देहान्त से कुछ घण्टे पहले उन्होंने अपने पुत्र एवं शिष्य नैयर हुसेन को राग अहीर भैरवी की बारीकियाँ समझायीं। इस प्रकार अन्तिम साँस तक वे संगीत की साधना में रत रहे।

21 मार्च, विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट



21 मार्च/जन्म-दिवस

             विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट


खगोलशास्त्र का अर्थ है ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति एवं गति के आधार पर प॰चांग का निर्माण, जिससे शुभ कार्यों के लिए उचित मुहूर्त निकाला जा सके। इस क्षेत्र में भारत का लोहा दुनिया को मनवाने वाले वैज्ञानिक आर्यभट के समय में अंग्रेजी तिथियाँ प्रचलित नहीं थीं। 

अपने एक ग्रन्थ में उन्होंने कलियुग के 3,600 वर्ष बाद की मध्यम मेष संक्रान्ति को अपनी आयु 23 वर्ष बतायी है। इस आधार पर विद्वान् उनकी जन्मतिथि 21 मार्च, 476 ई. मानते हैं। उनके जन्मस्थान के बारे में भी विद्वानों एवं इतिहासकारों में मतभेद हैं। उन्होंने स्वयं अपना जन्मस्थान कुसुमपुर बताया है। कुसुमपुर का अर्थ है फूलों का नगर। इसे विद्वान् लोग आजकल पाटलिपुत्र या पटना बताते हैं। 973 ई0 में भारत आये पर्शिया के विद्वान अलबेरूनी ने भी अपने यात्रा वर्णन में ‘कुसुमपुर के आर्यभट’ की चर्चा अनेक स्थानों पर की है। 

कुछ विद्वानों का मत है कि उनके पंचांगों का प्रचलन उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है, इसलिए कुसुमपुर कोई दक्षिण भारतीय नगर होगा। कुछ लोग इसे विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहने वाली नर्मदा और गोदावरी के बीच का कोई स्थान बताते हैं। कुछ विद्वान आर्यभट को केरल निवासी मानते हैं।

यद्यपि आर्यभट गणित, खगोल या ज्योतिष के क्षेत्र में पहले भारतीय वैज्ञानिक नहीं थे; पर उनके समय तक पुरानी अधिकांश गणनाएँ एवं मान्यताएँ विफल हो चुकी थीं। पैतामह सिद्धान्त, सौर सिद्धान्त, वसिष्ठ सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त और पौलिष सिद्धान्त, यह पाँचों सिद्धान्त पुराने पड़ चुके थे। इनके आधार पर बतायी गयी ग्रहों की स्थिति तथा ग्रहण के समय आदि की प्रत्यक्ष स्थिति में काफी अन्तर मिलता था। इस कारण भारतीय ज्योतिष पर से लोगों का विश्वास उठ गया। ऐसे में लोग इन्हें अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण मानकर विदेशी एवं विधर्मी पंचांगों की ओर झुकने लगे थे।

आर्यभट ने इस स्थिति का समझकर इस शास्त्र का गहन अध्ययन किया और उसकी कमियों को दूरकर नये प्रकार से जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की अपनी धुरी तथा सूर्य के आसपास घूमने की गति के आधार पर अपनी गणनाएँ कीं। 

इससे लोगों का विश्वास फिर से भारतीय खगोलविद्या एवं ज्योतिष पर जम गया। इसी कारण लोग उन्हें भारतीय खगोलशास्त्र का प्रवर्तक भी मानते हैं। उन्होंने एक स्थान पर स्वयं को 'कुलप आर्यभट' कहा है। इसका अर्थ कुछ विद्वान् यह लगाते हैं कि वे नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। 

उनके ग्रन्थ ‘आर्यभटीयम्’ से हमें उनकी महत्वपूर्ण खोज एवं शोध की जानकारी मिलती है। इसमें कुल 121 श्लोक हैं, जिन्हें गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलापाद नामक चार भागों में बाँटा है। 

वृत्त की परिधि और उसके व्यास के संबंध को ‘पाई’ कहते हैं। आर्यभट द्वारा बताये गये इसके मान को ही आज भी गणित में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी, चन्द्रमा आदि ग्रहों के प्रकाश का रहस्य, छाया का मापन, कालगणना, बीजगणित, त्रिकोणमिति, व्यस्तविधि, मूल-ब्याज, सूर्योदय व सूर्यास्त के बारे में भी उन्होंने निश्चित सिद्धान्त बताये।

आर्यभट की इन खोजों से गणित एवं खगोल का परिदृश्य बदल गया। उनके योगदान को सदा स्मरण रखने के लिए 19 अपै्रल, 1975 को अन्तरिक्ष में स्थापित कियेे गये भारत में ही निर्मित प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।