यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

3 अप्रैल/जन्म-दिवस, श्री स्वामी नारायण

 3 अप्रैल/जन्म-दिवस


          श्री स्वामी नारायण


भारत में अनेक महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिनकी महानता के कारण लोग उन्हें साक्षात परमेश्वर या परमेश्वर का अवतार मानते हैं। श्री स्वामी नारायण ऐसे ही एक महामानव थे। दिनांक तीन अप्रैल, 1781 (चैत्र शुक्ल 9, वि0संवत 1837) को श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या के पास स्थित ग्राम छपिया में उनका जन्म हुआ। 


रामनवमी होने से सम्पूर्ण क्षेत्र में पर्व का माहौल था। पिता श्री हरिप्रसाद व माता भक्तिदेवी ने उसका नाम घनश्याम रखा। बालक के हाथ में  पद्म और पैर में वज्र, ऊध्र्वरेखा तथा कमल का चिन्ह देखकर ज्योतिषियों ने कह दिया कि यह बालक लाखों लोगों के जीवन को सही दिशा देगा।


पांच वर्ष की अवस्था में बालक को अक्षरज्ञान दिया गया। आठ वर्ष का होने पर उसका जनेऊ संस्कार हुआ। छोटी अवस्था में ही उसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। जब वह केवल 11 वर्ष का था, तो माता व पिताजी का देहांत हो गया। कुछ समय बाद अपने भाई से किसी बात पर विवाद होने पर उन्होंने घर छोड़ दिया और अगले सात साल तक पूरे देश की परिक्रमा की। अब लोग उन्हें नीलकंठवर्णी कहने लगे।


इस दौरान उन्होंने गोपालयोगी से अष्टांग योग सीखा। वे उत्तर में हिमालय, दक्षिण में कांची, श्रीरंगपुर, रामेश्वरम् आदि तक गये। इसके बाद पंढरपुर व नासिक होते हुए वे गुजरात आ गये।


एक दिन नीलकंठवर्णी मांगरोल के पास ‘लोज’ गांव में पहुंचे। वहां उनका परिचय स्वामी मुक्तानंद से हुआ, जो स्वामी रामानंद के शिष्य थे। नीलकंठवर्णी स्वामी रामानंद के दर्शन को उत्सुक थे। उधर रामानंद जी भी प्रायः भक्तों से कहते थे कि असली नट तो अब आएगा, मैं तो उसके आगमन से पूर्व डुगडुगी बजा रहा हूं। भेंट के बाद रामानंद जी ने उन्हें स्वामी मुक्तानंद के साथ ही रहने को कहा। नीलकंठवर्णी ने उनका आदेश शिरोधार्य किया।


उन दिनों स्वामी मुक्तानंद कथा करते थे। उसमें स्त्री तथा पुरुष दोनों ही आते थे। नीलकंठवर्णी ने देखा अनेक श्रोताओं और साधुओं का ध्यान कथा की ओर न होकर महिलाओं की ओर होता है। अतः उन्होंने पुरुषों तथा स्त्रियों के लिए अलग कथा की व्यवस्था की तथा प्रयासपूर्वक महिला कथावाचकों को भी तैयार किया। उनका मत था कि संन्यासी को उसके लिए बनाये गये सभी नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना चाहिए।


कुछ समय बाद स्वामी रामानंद ने नीलकंठवर्णी को पीपलाणा गांव में दीक्षा देकर उनका नाम सहजानंद रख दिया। एक साल बाद जेतपुर में उन्होंने सहजानंद को अपने सम्प्रदाय का आचार्य पद भी दे दिया। इसके कुछ समय बाद स्वामी रामानंद जी का शरीरांत हो गया। अब स्वामी सहजानंद ने गांव-गांव घूमकर सबको स्वामीनारायण मंत्र जपने को कहा। 


उन्होंने निर्धन सेवा को लक्ष्य बनाकर सब वर्गों को अपने साथ जोड़ा। इससे उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी। वे अपने शिष्यों को पांच व्रत लेने को कहते थे। इनमें मांस, मदिरा, चोरी, व्यभिचार का त्याग तथा स्वधर्म के पालन की बात होती थी।


स्वामी जी ने जो नियम बनाये, वे स्वयं भी उनका कठोरता से पालन करते थे। उन्होंने यज्ञ में हिंसा, बलिप्रथा, सतीप्रथा, कन्या हत्या, भूत बाधा जैसी कुरीतियों को बंद कराया। उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः गुजरात रहा। प्राकृतिक आपदा आने पर वे बिना भेदभाव के सबकी सहायता करते थे। इस सेवाभाव को देखकर लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे। स्वामी जी ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया, इनके निर्माण के समय वे स्वयं सबके साथ श्रमदान करते थे।


धर्म के प्रति इसी प्रकार श्रद्धाभाव जगाते हुए स्वामी जी ने 1830 ई0 में देह छोड़ दी। आज उनके अनुयायी विश्व भर में फैले हैं। वे मंदिरों को सेवा व ज्ञान का केन्द्र बनाकर काम करते हैं। गांधीनगर (गुजरात) तथा दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है।

.........................


3 अप्रैल/पुण्य-तिथि


खदान मजदूरों के शुभचिन्तक त्रयम्बकराव जुमड़े


भारत में कोयला तथा अन्य खनिजों का भरपूर भंडार है। इन खदानों के मालिक और ठेकेदार तो मालामाल हो जाते हैं; पर जो मजदूर अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में इन खदानों में काम करते हैं, वे निर्धन ही रहते हैं। ‘भारतीय मजदूर संघ’ के माध्यम से इन खदान मजदूरों का सबल संगठन खड़ा कर, उनके जीवन में सुधार लाने वाले श्री त्रयम्बकराव जुमड़े संघ के वरिष्ठ प्रचारक थे। 


त्रयम्बकराव जुमड़े का जन्म 1915 में सिन्दी (जिला वर्धा, महाराष्ट्र) के एक निर्धन परिवार में हुआ था। सिन्दी का संघ के इतिहास में विशेष स्थान है। यहां डा0 हेडगेवार की उपस्थिति में हुई एक बैठक में संघ की कार्यप्रणाली, प्रार्थना, आज्ञा, गणवेश आदि के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय हुए थे।


त्रयम्बकराव ने मिडिल तक की शिक्षा सिन्दी के मिडिल स्कूल में ही पाई। इसके बाद वे वर्धा आ गये। 1932 तक वहां रहकर उन्होंने मैट्रिक की शिक्षा पूर्ण की। 1926 में जब संघ के संस्थापक डा0 हेडगेवार सिन्दी आये, तो वहां शाखा प्रारम्भ हुई। उसमें त्रयम्बकराव भी बाल स्वयंसेवक के रूप में नियमित रूप से आने लगे। इस प्रकार वे शिशु अवस्था से ही संघ से जुड़ गये। 


आगे चलकर अप्पा जी जोशी के सान्निध्य में उन्होंने 1932, 33 और 34 में संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण वर्गों में भाग लिया। इसके बाद संघ के कार्य में उनकी सक्रियता तथा समर्पण क्रमशः बढ़ता चला गया।


आगामी शिक्षा हेतु महाविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद भी उनका अधिकांश समय संघ शाखाओं के विस्तार में ही लगता था। 1939 में उन्हें अमरावती और फिर 1942 में खंडवा जिले में संघ कार्य करने के लिए भेजा गया। उन दिनों यातायात के साधनों का अभाव था। अतः वे पैदल, साइकिल या बैलगाड़ी से प्रवास करते थे। उनके प्रयत्नों से वहां शाखाओं की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई। नगरों के साथ ही कई छोटे गांवों में भी शाखाएं खुल गयीं। 


1948 में गांधी जी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तो वे भी कारागृह में रहे। प्रतिबंध समाप्ति के बाद 1963 तक मुख्यतः उन्होंने महाकोशल प्रान्त में संघ के विभिन्न दायित्वों पर कार्य किया। 1967 में उन्हें भारतीय मजदूर संघ में मध्य प्रदेश का संगठन मंत्री बनाया गया। कुछ समय बाद उन्हें खदान मजदूरों के बीच संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी दी गयी।


कोयले की खदानें म0प्र0 के साथ ही छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा आदि में भी हैं। यहां काम करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों की समस्याओं का गहन अध्ययन किया तथा फिर उनका सर्वसम्मत समाधान भी निकाला। उनके प्रयास से भारतीय मजदूर संघ की प्रतिष्ठा बढ़ी और देश भर में लाखों लोग इससे जुड़े। उनकी हिसाब-किताब इतना पारदर्शी रहता था कि केवल मजदूर ही नहीं, तो अन्य सब लोग भी उनका सम्मान करते थे।


वृद्धावस्था में उन्हें कई रोगों ने घेर लिया। खदान मालिकों ने कई बार दवा का खर्च और अस्पताल के लिए वाहन की व्यवस्था करने का प्रस्ताव दिया; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक इसे अस्वीकार कर दिया। 1992 में ‘अखिल भारतीय खदान महासंघ’ के अधिवेशन में उन्हें ‘विश्वकर्मा सम्मान’ दिया गया। 14 मार्च, 1997 को कांगे्रस के मजदूर संगठन ‘इंटक’ ने भी उन्हें सम्मानित किया। 


तीन अप्रैल, 1997 को नागपुर के एक चिकित्सालय में वरिष्ठ प्रचारक तथा खदान मजदूरों के सच्चे मित्र त्रयम्बकराव का देहांत हुआ। भारतीय मजदूर संघ आज भारत का सबसे बड़ा मजदूर संगठन है। इसका श्रेय जिन कार्यकर्ताओं को है, उनमें त्रयम्बकराव का नाम भी आदर से लिया जाता है। 


(संदर्भ : साप्ताहिक विवेक, मुंबई द्वारा प्रकाशित संघ गंगोत्री)

1 टिप्पणी: