20 अप्रैल/जन्म-दिवस
सदा आज्ञाकारी विपिन बिहारी पाराशर
वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशानुसार संघ, जनसंघ और वनवासियों के बीच काम करने वाले वरिष्ठ प्रचारक श्री विपिन बिहारी पाराशर का जन्म मैलानी (जिला लखीमपुर खीरी, उ.प्र.) में 20 अपै्रल, 1925 (श्रीरामनवमी) को हुआ था। उनके पिता श्री प्रभुदयाल पाराशर उन दिनों वहां रेलवे स्टेशन पर तारबाबू थे। विपिन जी के अतिरिक्त उनके चार पुत्र और एक कन्या भी थी। वैसे यह परिवार बरेली जिले के आंवला नामक स्थान का निवासी था।
मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर विपिन जी भारत छोड़ो आंदोलन तथा सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर स्वाधीनता संग्राम में कूद गये। इससे उनकी पढ़ाई छूट गयी। 1943-44 में स्वयंसेवक बनने के बाद उनकी जीवन यात्रा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही आगे बढ़ती रही। 1945 में प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लेकर वे प्रचारक बने। उन्हें नैनीताल जिले में काशीपुर, रामनगर, जसपुर आदि स्थानों पर भेजा गया।
1947 में उन्होंने फगवाड़ा से द्वितीय वर्ष किया। 1948 में गांधी जी की हत्या तथा संघ पर प्रतिबंध के बाद उन्होंने बदायूं में सत्याग्रह का संचालन किया। कुछ समय बाद वे स्वयं भी बन्दी बना लिये गये। उन्हें मुरादाबाद जेल में रखा गया। वहां उनके साथ वैद्य गुरुदत्त तथा उनके पुत्र योगेन्द्र जी भी थे। पुलिस और जेल प्रशासन ने उनसे क्षमापत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। अतः प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद ही वे जेल से छूटे।
प्रतिबंध समाप्ति के बाद दीनदयाल जी ने उन्हें मुरादाबाद जिले में ही काम करने को कहा। जनसंघ की स्थापना होने पर उन्होंने बरेली और मुरादाबाद जिले में जनसंघ के संगठन को सुदृढ़ किया। 1961 में उन्हें बिहार भेजा गया। वहां उन्होंने जनसंघ के साथ ही राष्ट्रधर्म और पांचजन्य जैसे पत्रों का विस्तार भी किया। वहां उनकी क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त से घनिष्ठ मित्रता हो गयी।
1970 में वरिष्ठ प्रचारक श्री सभापति सिंह चिकित्सा हेतु मुंबई गये। उनके साथ सहयोगी के नाते विपिन जी को भी भेजा गया। मुंबई में रहते हुए उन्होंने उत्तर भारतीयों को जनसंघ से जोड़ा। मुंबई से आकर वे उ.प्र. में जनसंघ के काम में लगे। आपातकाल में पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। आपातकाल के बाद विपिन जी ने बरेली जिले में संघ का काम किया।
उन दिनों पूर्वोत्तर भारत में बड़ी विकट परिस्थिति थी। देश भर से कई प्रचारकों को वहां भेजा गया। विपिन जी भी उनमें से एक थे। वहां की भाषा, मौसम, भोजन आदि भिन्नताओं से समरस होते हुए वे कारबियांगलांग, डिबू्रगढ़ व तिनसुकिया में जिला व विभाग प्रचारक रहे। फिर उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद के संगठन मंत्री तथा ‘आलोक’ साप्ताहिक के प्रबंध संपादक के नाते भी काम किया। उनके परिवार में प्याज-लहसुन का भी प्रयोग नहीं होता था; पर पूर्वोत्तर में उन्हें सब कुछ खाना पड़ा। यद्यपि विपिन जी के सभी परिजन संघ से जुड़े हैं। फिर भी इससे उनके बड़े भाई बहुत नाराज हुए।
‘विद्या भारती’ तथा ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ द्वारा पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के लिए कई छात्रावास देश के विभिन्न स्थानों पर चलाये जा रहे हैं। पश्चिमी उ.प्र. में भी ऐसे कई छात्रावास हैं। वृद्धावस्था के कारण जब प्रवास कठिन हो गया, तो वर्ष 2004 से विपिन जी उ.प्र. में वृन्दावन के ‘केशवधाम’ में रहते हुए इनकी देखरेख करने लगे।
हिन्दी, अंग्रेजी तथा पूर्वोत्तर की कई भाषाओं के ज्ञाता विपिन जी ने पूर्वोत्तर भारत के अज्ञात स्वाधीनता सेनानियों के बारे में कई लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराए। संगठन की आज्ञा को सर्वोपरि मानने वाले विपिन जी का 26 जनवरी, 2014 को केशवधाम में ही निधन हुआ।
(संदर्भ : विपिन जी का हस्तलिखित पत्र)
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