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सोमवार, 19 अप्रैल 2021

19 अप्रैलतपस्वी शिक्षाविद महात्मा हंसराज,युवा बलिदानी अनन्त कान्हेरे

 19 अप्रैल/जन्म-दिवस



            तपस्वी शिक्षाविद महात्मा हंसराज

भारत के शैक्षिक जगत में डी.ए.वी. विद्यालयों का बहुत बड़ा योगदान है। विद्यालयों की इस शृंखला के संस्थापक हंसराज जी का जन्म महान संगीतकार बैजू बावरा के जन्म से धन्य हुए ग्राम बैजवाड़ा (जिला होशियारपुर, पंजाब) में 19 अप्रैल, 1864 को हुआ था। बचपन से ही शिक्षा के प्रति इनके मन में बहुत अनुराग था; पर विद्यालय न होने के कारण हजारों बच्चे अनपढ़ रह जाते थे। इससे ये बहुत दुःखी रहते थे।

महर्षि दयानन्द सरस्वती के देहावसान के बाद लाहौर के आर्यभक्त उनकी स्मृति में कुछ काम करना चाहते थे, तो अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति की शिक्षा देने वाले विद्यालय खोलने की चर्चा चली। 22 वर्षीय हंसराज जी ने एक साहसिक निर्णय लेकर इस कार्य हेतु अपनी सेवाएँ निःशुल्क समर्पित कर दीं। इस व्रत को उन्होंने आजीवन निभाया।

हंसराज जी के समर्पण को देखकर उनके बड़े भाई मुलकराज जी ने उन्हें 40 रु0 प्रतिमाह देने का वचन दिया। अगले 25 साल हंसराज जी डी.ए.वी. स्कूल एवं काॅलेज, लाहौर के अवैतनिक प्राचार्य रहे। 

उन्होंने जीवन भर कोई पैसा नहीं कमाया। कोई भूमि उन्होंने अपने लिए नहीं खरीदी, तो मकान बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। पैतृक सम्पत्ति के रूप में जो मकान मिला था, धन के अभाव में उसकी वे कभी मरम्मत भी नहीं करा सके। 

उनके इस समर्पण को देखकर यदि कोई व्यक्ति उन्हें कुछ नकद राशि या वस्तु भेंट करता, तो वे उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर देते थे। संस्था के कार्य से यदि वे कहीं बाहर जाते, तो वहाँ केवल भोजन करते थे। शेष व्यय वे अपनी जेब से करते थे। इस प्रकार मात्र 40 रु0 में उन्होंने अपनी माता, पत्नी, दो पुत्र और तीन पुत्रियों के परिवार का खर्च चलाया। आगे चलकर उनके पुत्र बलराज ने उन्हें सहायता देने का क्रम जारी रखा।

इतने कठिन परिश्रम और साधारण भोजन से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। एक बार तो उन्हें क्षय रोग हो गया। लोगों ने उन्हें अंग्रेजी दवाएँ लेने की सलाह दी; पर उन्होंने आयुर्वेदिक दवाएँ ही लीं तथा उसी से वे ठीक हुए। 

उन्होंने इस दौरान तीन माह तक केवल गुड़, जौ का सत्तू और पानी का ही सेवन किया। धनाभाव के कारण उनकी आँखों की रोशनी बहुत कम हो गयी। एक आँख तो फिर ठीक ही नहीं हुई; पर वे विद्यालयों के प्रचार-प्रसार में लगे रहे। उनकी यह लगन देखकर लोगों ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी।

समाज सेवा में अपना जीवन समर्पित करने के बाद भी वे बहुत विनम्र थे। यदि उनसे मिलने कोई धर्मोपदेशक आता, तो वे खड़े होकर उसका स्वागत करते थे। वे सदा राजनीति से दूर रहे। उन्हें बस वेद-प्रचार की ही लगन थी। 

उन्होंने लाहौर में डी.ए.वी. स्कूल, डी.ए.वी. काॅलेज, दयानन्द ब्रह्म विद्यालय, आयुर्वेदिक काॅलेज, महिला महाविद्यालय, औद्योगिक स्कूल, आर्य समाज अनारकली एवं बच्छोवाली, आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा एवं हरिद्वार में वैदिक मोहन आश्रम की स्थापना की।

देश, धर्म और आर्य समाज की सेवा करते हुए 15 नवम्बर, 1938 को महात्मा हंसराज जी ने अन्तिम साँस ली। उनके पढ़ाये छात्रों तथा अन्य प्रेमीजनों ने उनकी स्मृति में लाहौर, दिल्ली, अमृतसर, भटिंडा, मुम्बई, जालन्धर आदि में अनेक भवन एवं संस्थाएँ बनायीं, जो आज भी उस अखंड कर्मयोगी का स्मरण दिला रही हैं।
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19 अप्रैल/बलिदान-दिवस

                  युवा बलिदानी अनन्त कान्हेरे


भारत माँ की कोख कभी सपूतों से खाली नहीं रही। ऐसा ही एक सपूत थे अनन्त लक्ष्मण कान्हेरे, जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए केवल 19 साल की युवावस्था में ही फाँसी के फन्दे को चूम लिया।

महाराष्ट्र के नासिक नगर में उन दिनों जैक्सन नामक अंग्रेज जिलाधीश कार्यरत था। उसने मराठी और संस्कृत सीखकर अनेक लोगों को प्रभावित कर लिया था; पर उसके मन में भारत के प्रति घृणा भरी थी। वह नासिक के पवित्र रामकुंड में घोड़े पर चढ़कर घूमता था; पर भयवश कोई बोलता नहीं था। 

उन दिनों नासिक में वीर सावरकर की ‘अभिनव भारत’ नामक संस्था सक्रिय थी। लोकमान्य तिलक के प्रभाव के कारण गणेशोत्सव और शिवाजी जयन्ती आदि कार्यक्रम भी पूरे उत्साह से मनाये जाते थे। इन सबमें स्थानीय युवक बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। 

विजयादशमी पर नासिक के लोग नगर की सीमा से बाहर कालिका मन्दिर पर पूजा करने जाते थे। युवकों ने योजना बनायी कि सब लोग इस बार वन्देमातरम् का उद्घोष करते हुए मन्दिर चलेंगे। जब जैक्सन को यह पता लगा, तो उसने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

नासिक के वकील वामन सखाराम खेर स्वतन्त्रता सेनानियों के मुकदमे निःशुल्क लड़ते थे। जैक्सन ने उनकी डिग्री जब्त कर उन्हें जेल में डाल दिया। उसने ताम्बे शास्त्री नामक विद्वान के प्रवचनों पर रोक लगा दी; क्योंकि वे कथा में अंग्रेजों की तुलना रावण और कंस जैसे अत्याचारी शासकों से करते थे। बाबाराव सावरकर ने वीरतापूर्ण गीतों की एक पुस्तक प्रकाशित की थी। इस पर उन्हें कालेपानी की सजा देकर अन्दमान भेज दिया गया।

जैक्सन की इन करतूतों से युवकों का खून खौलने लगा। वे उसे ठिकाने लगाने की सोचने लगे। अनन्त कान्हेरे भी इन्हीं में से एक थे। कोंकण निवासी अनन्त अपने मामा के पास औरंगाबाद में रहकर पढ़ रहे थे। वह और उनका मित्र गंगाराम देश के लिए मरने की बात करते रहते थे। एक बार गंगाराम ने उनकी परीक्षा लेने के लिए लैम्प की गरम चिमनी पकड़ने को कहा। अनन्त की उँगलियाँ जल गयीं; पर उन्होंने चिमनी को नहीं छोड़ा।

यह देखकर गंगाराम ने अनन्त को विनायक देशपांडे, गणू वैद्य, दत्तू जोशी, अण्णा कर्वे आदि से मिलवाया। देशपांडे ने अनन्त को एक पिस्तौल दी। अनन्त ने कई दिन जंगल में जाकर निशानेबाजी का अभ्यास किया। अब उन्हें तलाश थी, तो सही अवसर की। वह जानते थे कि जैक्सन के वध के बाद उन्हें निश्चित ही फाँसी होगी। उन्होंने बलिपथ पर जाने की तैयारी कर ली और एक चित्र खिंचवाकर स्मृति स्वरूप अपने घर भेज दिया।

अन्ततः वह शुभ दिन आ गया। जैक्सन का स्थानान्तरण मुम्बई के लिए हो गया था। उसके समर्थकों ने विजयानन्द नाटकशाला में विदाई कार्यक्रम का आयोजन किया। अनन्त भी वहाँ पहुँच गये। जैसे ही जैक्सन ने प्रवेश किया, अनन्त ने चार गोली उसके सीने में दाग दी। जैक्सन हाय कह कर वहीं ढेर हो गया। उस दिन देशपांडे और कर्वे भी पिस्तौल लेकर वहाँ आये थे, जिससे अनन्त से बच जाने पर वे जैक्सन को ढेर कर सकें।

अनन्त को पकड़ लिया गया। उन्होंने किसी वकील की सहायता लेने से मना कर दिया। इस कांड में अनेक लोग पकड़े गये। अनन्त के साथ ही विनायक देशपांडे और अण्णा कर्वे को 19 अप्रैल, 1910 को प्रातः ठाणे के कारागार में फाँसी दे दी गयी।

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