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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

14 अप्रैल/इतिहास-स्मृति,मोइरांग, जहां नेताजी ने तिरंगा फहराया, अली अकबर खान


14 अप्रैल/इतिहास-स्मृति


मोइरांग, जहां नेताजी ने तिरंगा फहराया


सुन्दर पर्वतमालाओं से घिरे मणिपुर की राजधानी इम्फाल से 45 कि.मी दक्षिण में लोकताक झील के किनारे मोइरांग नामक छोटा सा नगर बसा है। भारतीय स्वाधीनता समर में इसका विशेष महत्व है। यहीं पर 14 अप्रैल, 1944 को आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेता जी सुभाषचन्द्र बोस ने सर्वप्रथम तिरंगा झण्डा फहराया था। उन्होंने मोइरांग पर कब्जा कर यहाँ के डाक बंगले को आजाद हिन्द फौज का मुख्यालय बना लिया था। 


इस घटना की स्मृति में मोइरांग में ‘आई.एन.ए. युद्ध संग्रहालय’ बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही बायीं ओर सैन्य वेश में नेता जी भव्य मूर्ति स्थापित है। इसे देखकर लगता है कि वे स्वाधीनता संघर्ष के मुख्य सेनापति थे। यह बात दूसरी है कि गांधी जी व प्रधानमन्त्री नेहरु से वैचारिक मतभेद होने के कारण भारतीय इतिहास में उन्हें समुचित स्थान नहीं मिल सका।


संग्रहालय में दायीं ओर संगमरमर पत्थर से निर्मित एक चबूतरा है। उस पर अंग्रेजी में लिखा है - वह स्थल, जहाँ सुभाषचन्द्र बोस ने सर्वप्रथम तिरंगा फहराया था। उससे कुछ दूरी पर संगमरमर से ही बना एक स्मृति स्तम्भ और है, जिस पर आजाद हिन्द फौज के तीन आदर्श - अवसर, विश्वास और बलिदान उत्कीर्ण हैं। यह उस स्तम्भ की प्रतिकृति है, जिसे नेताजी ने 8 जुलाई, 1945 को आजाद हिन्द सरकार की स्मृति में सिंगापुर में बनाया था।


सिंगापुर जब फिर से अंग्रेजों के कब्जे में आया, तो उन्होंने उस स्मारक को तोड़ दिया; पर नेताजी के वीर सैनिकों के मन में बसे स्मारक को वे नहीं तोड़ सके। अतः सैनिकों ने वैसा ही स्मारक मोइरांग में फिर से बना लिया। उस पर लिखा है - आजाद हिन्द फौज के बलिदानियों की स्मृति में इस स्मारक की नींव नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 8 जुलाई, 1945 को रखी। 


इसका उद्घाटन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 23 सितम्बर, 1969 को किया था। बंगाल शासन द्वारा प्रदत्त नेताजी की प्रतिमा का विधिवत अनावरण 21 अक्तूबर, 1970 को किया गया था।


संग्रहालय की अलमारियों में नेताजी द्वारा मोइरांग के लिए लड़े गये निर्णायक युद्ध के अनेक दुर्लभ चित्र लगाये गये हैं। समय-समय पर उनके द्वारा कहे गये प्रेरक वाक्य तथा आजादी का घोषणा पत्र भी वहाँ सुसज्जित है। यहाँ आजाद हिन्द फौज के अन्तर्गत काम करने वाली ‘रानी झाँसी रेजिमेण्ट’ के भी अनेक चित्र हैं। 


कुछ चित्रों में नेताजी सलामी ले रहे हैं, तो कहीं वे टैंक ब्रिगेड का निरीक्षण कर रहे हैं। आग उगलते युद्धक्षेत्र के अग्रिम मोर्चे पर उन्हें सैनिकों का उत्साह बढ़ाते देखकर रक्त का संचार तेज हो जाता है। एक चित्र में वे स्वयं कार्बाइन हाथ में लिये युद्ध की मुद्रा में खड़े हैं। 


इन चित्रों और युद्ध के नक्शों को देखकर स्पष्ट होता है कि स्वाधीनता संग्राम में जहाँ तथाकथित बड़े कांग्रेसी नेता सुविधा सम्पन्न बंगलों में नजरबन्दी का सुख भोग रहे थे, वहाँ नेताजी जंगलों और पहाड़ों में ठोकरें खाकर लोगों को संगठित कर रहे थे। वे जनता को खून के बदले आजादी देने का आश्वासन भी दे रहे थे। 


मोइरांग से 30 कि.मी. की दूरी पर ‘खूनी पर्वत’ है। यहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान और ब्रिटिश सेनाओं में घमासान हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में दोनों ओर के सैनिक मारे गये थे। मोइरांग हमारी स्वाधीनता के सशस्त्र संग्राम का एक तीर्थस्थल है, जिसकी ओर न जाने क्यों शासन का ध्यान कम ही है।

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14 अप्रैल/जन्म-दिवस


सरोद के साधक अली अकबर खान


भारतीय संगीत को विश्व में ख्याति दिलाने का जिन संगीतकारों को श्रेय है, उनमें सरोद के साधक अली अकबर खान का नाम विशेष है। उनका जन्म 14 अप्रैल, 1922 को शिवपुर (कोमिल्ला, त्रिपुरा) में हुआ था। इनके पिता प्रख्यात संगीतकार उस्ताद अलाउद्दीन खां थे। 


मूलतः यह परिवार हिन्दू था; पर किसी समय उस्ताद सूफी मोहम्मद गौस ने इनके एक पूर्वज सदानंद देवशर्मा को संगीत सिखाना प्रारम्भ करते समय अपना झूठा पान खिलाकर उनका नाम अताह अली खान रख दिया। हिन्दू परम्पराओं और नामों के बाद भी तब से यह परिवार मुसलमान माना जाने लगा। अली अकबर के संगीतकार बेटे आशीष ने फिर से हिन्दू धर्म अपनाकर नाम आशीष देवशर्मा रखा है।


अली अकबर के पिता उस्ताद अलाउद्दीन खान (प्रसन्न बाबा) ने मेहर घराने की नींव रखी, जहां सरस्वती व काली की पूजा होती है। अली अकबर अपने पिता के ही शिष्य थे। उनका मानना था कि दस साल के रियाज (अभ्यास) से खुद को, बीस साल के रियाज से श्रोताओं को और तीस साल के रियाज से अपने गुरु को प्रसन्न कर सकते हैं। इस नाते अली अकबर ने सरोद में वैश्विक ख्याति पा लेने पर भी रियाज करना नहीं छोड़ा। वे दो घंटे से लेकर 18 घंटे तक प्रतिदिन रियाज करते थे।


संगीत सीखने का प्रारम्भ उन्होंने खेलने की अवस्था में ही तबले से किया; पर फिर सरोद की ओर मुड़ गये। बाबा ने उन्हें 200 बंदिशों का घोटा लगवाया। इसी के साथ धु्रपद, धमार, खयाल, तराना, टप्पा आदि को गहराई से सिखाया गया। 


संगीत को जीवनयापन का साधन बनाने पर वे आर्थिक रूप से परेशान रहे। उन्होंने 1956 में कोलकाता संगीत महाविद्यालय शुरू किया; पर फिर वे अमरीका में बस गये। वहां भी लम्बे संघर्ष के बाद सान राफेल नगर में संगीत की एक संस्था खोली। इन दिनों वहां 5,000 छात्र भारतीय संगीत सीखते हैं। इसकी शाखा कैलिफोर्निया और स्विटजरलैंड में भी है।


उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आये। एक समय उन्होंने जोधपुर के महाराजा हिम्मत सिंह के दरबार में नौकरी की। महाराज की इच्छा वहां एक संगीत विद्यालय चलाने की थी; पर उनकी अचानक मृत्यु से यह योजना पूरी न हो सकी। 


अली अकबर रहते भले ही अमरीका में थे; पर मन से वे भारतीय थे। जब भी उन्हें भारत आने का न्यौता मिलता, वे प्रयासपूर्वक यहां आकर कुछ दिन अपनी साधना स्थली मैहर में अवश्य बिताते। 13 साल की अवस्था में उन्होंने अपना पहला कार्यक्रम प्रयाग में प्रस्तुत किया था। 1953 में उन्होंने फिल्म ‘आंधियां’ के लिए संगीत भी दिया था।


उस्ताद अली अकबर खान ने संगीत में अनेक नये प्रयोग किये। प्रख्यात वायलिनवादक यहूदी मेनुइन ने उन्हें भारतीय संगीत का बेताज बादशाह कहा था। उन्होंने 1955 में अली अकबर का पहला कार्यक्रम न्यूयार्क के आधुनिक कला संग्रहालय में आयोजित किया था। अमरीका के मैकआर्थर फाउंडेशन की ओर से सम्मानित होने वाले वे पहले भारतीय संगीतकार थे। 


1997 में उन्हें पारम्परिक कला की सेवा एवं विकास के लिए अमरीका का सर्वोच्च सम्मान ‘नैशनल हैरिटेज फैलोशिप’ दिया गया। पांच बार उनका नामांकन गे्रमी अवार्ड के लिए भी हुआ; पर वे अपने पिता और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खान द्वारा दी गयी ‘स्वर सम्राट’ की उपाधि को सर्वश्रेष्ठ मानते थे।


पद्मविभूषण और पद्मभूषण से सम्मानित अली अकबर का 19 जून,  2009 को सैन फ्रांसिस्को में यकृत की बीमारी से निधन हुआ।


(संदर्भ : रा.सहारा 21.6.09/जनसत्ता 22.6.09/अन्य)

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