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रविवार, 13 फ़रवरी 2022

वैलेंटाइन डे नहीं,मातृ–पितृ पूजन दिवस’ शुभ ज्योतिष की दृष्टि से

वैलेंटाइन डे नहीं,मातृ–पितृ पूजन दिवस’ शुभ ज्योतिष की दृष्टि से


       🙏🏻 *अपने माता पिता का आदर करते  और वेलेंटाईन डे का कचरा दिमाग में न रखें  .....कि ये लोग मानते हैं  तो हम भी मनाये... नहीं  !! अपने माता पिता का पूजन करें.... बापूजी ने सहज में ऐसी सुन्दर सीख दी ।  हर साल जो 14 फरवरी को वेलेंटाईन डे मनाते हैं न ....मूर्ख लोग.... पर*


       🙏🏻 *14 फरवरी के दिन अधिकांशतः सूर्य भगवान कुम्भ राशि पे होतें है । बिलकुल कोई पंडित इसको नकार नहीं सकता, लगभग अधिकांश 14 फरवरी को सूर्य भगवान कुम्भ राशि पे होतें हैं और कुम्भ राशि के स्वामी कौन हैं ? शनि देव । कुम्भ राशि के स्वामी शनि, शनि देव सूर्य भगवान के बेटे हैं । तो वो अपने पिता का खूब आदर करते और पिता की परिक्रमा करते हैं । तो जो 14 फरवरी के दिन वेलेंटाईन डे मनाते हैं  न उनपे सूर्य भगवान और शनि देव दोनों नाराज़ होतें है भयंकर और 14 फरवरी के दिन बापूजी के कहे अनुसार जो माता पिता का पूजन करते हैं उनपे सूर्य भगवान और शनि देव दोनों खुश होते हैं .... क्यो कि उस दिन शनि देवता भी सूर्य भगवान की पूजा करते हैं और सूर्य भगवान की परिक्रमा करते हैं ।*🙏🏻

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

वैलेंटाइन डे नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाना चाहिए, वैज्ञानिकों ने क्या कहा?


 वैलेंटाइन डे नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस  मनाना चाहिए, वैज्ञानिकों ने कहा?


      *माता-पिता ने हमसे अधिक वर्ष दुनिया में गुजारे हैं, उनका अनुभव हमसे अधिक है और सद्गुरु ने जो महान अनुभव किया है उसकी तो हमारे छोटे अनुभव से तुलना ही नहीं हो सकती। इन तीनों के आदर से उनका अनुभव हमें सहज में ही मिलता है। अतः जो भी व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उस सज्जन को माता-पिता और सद्गुरु का आदर, पूजन, आज्ञापालन तो करना चाहिए, चाहिए और चाहिए ही!*


       14 फरवरी को ʹवेलेंटाइन डेʹ मनाकर युवक-युवतियाँ प्रेमी-प्रेमिका के संबंध में फँसते हैं। वासना के कारण उनका ओज-तेज दिन दहाड़े नीचे के केन्द्रों में आकर नष्ट होता है। उस दिन ʹमातृ-पितृ पूजनʹ काम-विकार की बुराई व दुश्चरित्रता की दलदल से ऊपर उठाकर उज्ज्वल भविष्य, सच्चरित्रता, सदाचारी जीवन की ओर ले जायेगा।


       *अनादिकाल से महापुरुषों ने अपने जीवन में माता-पिता और सद्गुरु का आदर-सम्मान किया है।*


       कोई हिन्दू, ईसाई, मुसलमान, यहूदी नहीं चाहते कि हमारे बच्चे विकारों में खोखले हो जायें, माता-पिता व समाज की अवज्ञा करके विकारी और स्वार्थी जीवन जीकर तुच्छ हो जायें और बुढ़ापे में कराहते रहें। बच्चे माता-पिता व गुरुजन का सम्मान करें तो उनके हृदय से विशेष मंगलकारी आशीर्वाद उभरेगा, जो देश के इन भावी कर्णधारों को ʹवेलेन्टाइन डेʹ जैसे विकारों से बचाकर गणेशजी की नाईं इंद्रिय-संयम व आत्मसामर्थ्य विकसित करने में मददरूप होगा।


       *माता, पिता एवं गुरुजनों का आदर करना हमारी संस्कृति की शोभा है। माता-पिता इतना आग्रह नहीं रखते कि संतानें उनका सम्मान-पूजन करें परंतु बुद्धिमान, शिष्ट संतानें माता-पिता का आदर पूजन करके उनके शुभ संकल्पमय आशीर्वाद से लाभ उठाती हैं।*


       14 विकसित और विकासशील देशों के बच्चों व युवाओं पर किये गये सर्वेक्षण में भारतीय बच्चे व युवक सबसे अधिक सुखी और स्नेही पाये गये। लंदन व न्यूयार्क में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका एक बड़ा कारण है- भारतीय लोगों का पारिवारिक स्नेह एवं निष्ठा! भारतीय युवाओं ने कहा, ʹउनकी जीवन में प्रसन्नता लाने तथा समस्याओं को सुलझाने में उनके माता-पिता का सर्वाधिक योगदान है।ʹ


       *भारत में माता-पिता हर प्रकार से अपने बच्चों का पोषण करते हैं और माता-पिताओं का पोषण संतजनों से होता है। माता-पिता, बच्चे-युवक सभी को पोषित करने वाला हिंदू संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है।*


#आधुनिक वैज्ञानिकों का मत


       माता-पिता के पूजने से अच्छी पढाई का क्या संबंध- ऐसा सोचने वालों को अमेरिका की ʹयूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनियाʹ के सर्जन व क्लिनिकल असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सू किम और ʹचिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया, पेंसिल्वेनियाʹ के एटर्नी एवं इमिग्रेशन स्पेशलिस्ट जेन किम के शोधपत्र के निष्कर्ष पर ध्यान देना चाहिए।


       *अमेरिका में एशियन मूल के विद्यार्थी क्यों पढ़ाई में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हैं? इस विषय पर शोध करते हुए उन्होंने यह पाया कि वे अपने बड़ों का आदर करते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं तथा उज्ज्वल भविष्य-निर्माण के लिए गम्भीरता से श्रेष्ठ परिणाम पाने हेतु अध्ययन करते हैं।*


      भारतीय संस्कृति के शास्त्रों और संतों में श्रद्धा न रखने वालों को भी अब उनकी इस बात को स्वीकार करके पाश्चात्य विद्यार्थियों को सिखाना पड़ता है कि माता-पिता का आदर करने वाले विद्यार्थी पढ़ाई में श्रेष्ठ परिणाम पा सकते हैं।


       *जो विद्यार्थी माता-पिता का आदर करेंगे वे ʹवेलेन्टाइन डेʹ मनाकर अपना चरित्र भ्रष्ट नहीं कर सकते। संयम से उनके ब्रह्मचर्य की रक्षा होने से उनकी बुद्धिशक्ति विकसित होगी, जिससे उनकी पढ़ाई के परिणाम अच्छे आयेंगे। 


संदर्भ

आशारामजी बापू के प्रवचन से


शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

जया एकादशी व्रत, महत्व और व्रत कथा



जया एकादशी व्रत, महत्व और व्रत कथा


*जया एकादशी व्रत का महत्व:-*

       इंद्रलोक की अप्सरा को श्राप के कारण पिशाच योनि में जन्म लेना पड़ा, उससे मुक्ति के लिए उसने जया एकादशी व्रत किया. भगवान विष्णु की कृपा से वह पिशाच योनि से मुक्त हो गई और फिर से उसे इंद्रलोक में स्थान प्राप्त हो गया. भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को जया एकादशी के पुण्य के बारे में बताया था.


*जया एकादशी व्रत कथा:-*


       *एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से माघ शुक्ल एकादशी व्रत की महत्ता के बारे में बताने को कहा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे जया एकादशी व्रत की कथा सुनाई:-*


      एक समय की बात है नंदन वन में उत्सव हो रहा था, जिसमें देवी-देवता, संत आदि उपस्थित थे. उत्सव में संगीत एवं नृत्य भी हो रहा था. गंधर्व माल्यवान एवं पुष्यवती भी नृत्य कर रहे थे. दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गए और सभी की उपस्थिति में इस प्रकार से नृत्य करने लगे कि वे मार्यादाएं भूल गए.

      उनके इस व्यवहार से इंद्र देव कुपित हो गए और उन्होंने दोनों को स्वर्ग लोक से निष्कासित करके मृत्यु लोक यानी पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दे दिया. श्राप के कारण पुष्यवती एवं माल्यवान को पिशाच योनि में जीवन प्राप्त हुआ.

       वे दोनों हिमालय पर एक वृक्ष पर अपना आश्रय लिए थे. उनकी जीवन बड़ा ही कष्टमय था. उस वर्ष माघ शुक्ल एकादशी को उन दोनों ने भोजन नहीं किया, फलाहार किया. सर्दी के कारण नींद नहीं आई, तो उन दोनों ने रात्रि जागरण किया. भयंकर सर्दी के कारण उन दोनों की मृत्यु हो गई.

      पुष्यवती एवं माल्यवान ने अनजाने में ही जया एकादशी व्रत कर लिया था. भगवान विष्णु की दृष्टि उन दोनों पर पड़ी, तो उन्होंने प्रेत योनि से दोनों को मुक्ति प्रदान कर दी. जया एकादशी व्रत के प्रभाव से दोनों पहले से भी अधिक रूपवान हो गए और फिर से स्वर्ग लोक पहुंच गए

      पुष्यवती एवं माल्यवान को देखकर इंद्रदेव हैरान रह गए. तब उन दोनों ने देवराज इंद्र से जया एकादशी व्रत के महत्व और भगवान विष्णु की महिमा के बारे में बताया. यह जानकर इंद्रदेव भी खुश हो गए और दोनों को फिर से स्वर्ग लोक में रहने के लिए अपनी अनुमति दे दिए.



*इस प्रकार से जो भी जया एकादशी व्रत रखता है, उसे नीच योनि से मुक्ति मिलती है और उसके दुखों का नाश होता है.*


गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

वेलेंटाइन डे के बाद लड़कियों में कैंसर व बांझपन


वेलेंटाइन डे के बाद लड़कियों में कैंसर व बांझपन


सावधान- वेलेंटाइन डे के बाद लाखों लड़कियों में कैंसर व बांझपन पाया गया!



         पश्चिमी देशों में 14 फरवरी को युवक-युवतियाँ एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फूल आदि देकर वेलेन्टाइन डे मनाते हैं। यौन जीवन संबंधी परम्परागत नैतिक मूल्यों का त्याग करने वाले देशों की चारित्रिक सम्पदा नष्ट होने का मुख्य कारण ऐसे वेलेन्टाइन डे हैं जो लोगों को अनैतिक जीवन जीने को प्रोत्साहित करते हैं। इससे उन देशों का अधःपतन हुआ है। इससे जो समस्याएँ पैदा हुईं, उनको मिटाने के लिए वहाँ की सरकारों को स्कूलों में केवल संयम अभियानों पर करोड़ों डालर खर्च करने पर भी सफलता नहीं मिलती। अब यह कुप्रथा हमारे भारत में भी पैर जमा रही है। हमें अपने परम्परागत नैतिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए ऐसे वेलेन्टाइन डे का बहिष्कार करना चाहिए। इन सभी से बचने के लिए हिंदू संत आसाराम बापू ने एक नयी पहल की है- 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' मनाने की।


पिछले साल वेलेंटाइन डे से बर्बादी


           *Panchtatv.org पर लिखा है कि वेलेंटाइन डे के बाद मुश्किल से 10 दिन के अंदर गायनेकोलोजिस्टों के पास लड़कियों की भीड़ लग जाती है और टीवी पर ऐड आता है- सिर्फ एक कैप्सूल से 72 घंटों के अंदर अनचाही प्रेगनेंसी से छुटकारा और बिना दिमाग की लड़कियां ऐसी गोलियां, जिनका न कम्पोजिशन पता होता है न कॉन्सेप्ट, बस निगल लेती हैं।*


       इन फेक गोलियों में आर्सेनिक भरा होता है जो 72 घंटों के अंदर सिर्फ बनने वाले भ्रूण को खत्म नहीं करता, बल्कि पूरा का पूरा fertility system ही करप्ट कर देता है!


      *शुरू में तो गोलियां खाकर सती-सावित्री बन जाती हैं लेकिन शादी के बाद पता चलता है- वे अब माँ नहीं बन सकतीं।*


       पिछले साल के डाटा अनुसार 43 लाख लड़कियों में बांझपन और 30 लाख में कैंसर पाया गया।


       तो सबको पता चल जाता है इनका भूतकाल कैसा रहा है, पर कोई बोलता नहीं; जिन्दगी खुद अभिशाप बन जाती है।*


       सरकार हर साल मातृत्व-सुरक्षा, जननी सुरक्षा, 'बेटी बचाओ' जैसी योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपए फूंक देती है।


       आज हालत ये है कि 13-14 साल की कुछ बच्चियांँ बैग में i-pill लेकर घूम रही हैं। ये ऐसी जहरीली चीज़ें valentine पर medical mafia भारतीय बाजारों में जानबूझकर उतारता है।*


       क्योंकि सबको पता है, भारत में बुद्धिजीवी वर्ग का कोई मान नहीं होता। पहले ये लड़कियों को जहर खिलाकर बीमारी देते हैं...फिर उसकी दवाई बेचकर अरबों रूपये कमाते हैं... जिसमें समाज नेता भी कमाई करते हैं... क्योंकि ऐसे जहर को बेचने का परमिट और उनकी चेकिंग न करवाने का काम नेता ही कर सकते हैं।


      *बेटी आपकी, तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी! इस valentine उसके पीछे और कोई ही नहीं बल्कि आप खुद सजग रहोगे, गलत देखने पर विरोध करोगे।*

      *समय है- वेलेंटाइन जैसे कुकर्म को बढ़ावा देने वाली घटिया मानसिकता का त्याग कर अपने माता पिता का पूजन कर देश की युवा पीढी को सुदृढ़ बनाने का।*

      *या फिर अगर चाहते हो- आपकी बेटियां जमके अय्याशी करें और बाद में कैंसर, बांझपन की वजह से मर जाएं और आपका बोझ हल्का हो...


       समस्या आपके बेटी की अय्याशी और उसके मरने से नहीं, समस्या होती है, जो दवाइयां बेचकर विदेशी कम्पनियां हर साल हमारे देश का अरबों रुपया लुट लेती हैं उससे है।



वेलेंटाइन डे नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस


      *इस वेलेंटाइन डे को रोकने के लिए 'संत आशाराम' बापू ने बताया कि तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, अपने माता-पिता का सम्मान करो और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें।*


       मेरे प्यारे युवक-युवतियों भाईयों- बहनो और उनके माता-पिता! आप भारतवासी हैं। दूरदृष्टि के धनी ऋषि-मुनियों की संतान हैं। प्रेमदिवस (वेलेन्टाइन डे) के नाम पर बच्चों, युवान-युवतियों के ओज-तेज का नाश होता है , ऐसे दिवस का त्याग करके माता-पिता आपकी संतानों का नाश होने से बचाएँ! संतानों को सत्कर्म करने में लगाएं ताकि उनका उद्धार हो सके वह पाश्चात्य संस्कारों से मुक्त होकर, अपने अच्छे बुरे का  ध्यान कर सके साथ ही जीवन  के सुंदर रसों का पान करें!


*मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। बालिकादेवो भव। कन्यादेवो भव। पुत्रदेवो भव।*


*माता पिता का पूजन करने से काम राम में बदलेगा, अहंकार प्रेम में बदलेगा, माता-पिता के आशीर्वाद से बच्चों का मंगल होगा।*🙏🏻


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सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

भीष्म अष्टमी का रहस्य और भीष्म पितामह का इच्छा मृत्यु वरदान

 8 फरवरी भीष्म अष्टमी 2022


भीष्म अष्टमी का रहस्य और भीष्म पितामह का इच्छा मृत्यु वरदान

भीष्म महाभारत कथा:-


 *_इस कथा के अनुसार भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था। वे हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पटरानी गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे। एक समय की बात है। राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा तट के पार चले गए। वहां से लौटते वक्त उनकी भेंट हरिदास केवट की पुत्री मत्स्यगंधा (सत्यवती) से हुई।_*


*_मत्स्यगंधा बहुत ही रूपवान थी। उसे देखकर शांतनु उसके लावण्य पर मोहित हो गए। एक दिन राजा शांतनु हरिदास के पास जाकर उनकी पुत्री सत्यवाती का हाथ मांगते है, परंतु वह राजा के प्रस्ताव को ठुकरा देता है और कहता है कि- महाराज! आपका ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत है। जो आपके राज्य का उत्तराधिकारी है, यदि आप मेरी कन्या के पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा करें तो मैं मत्स्यगंधा का हाथ आपके हाथ में देने को तैयार हूं। परंतु राजा शांतनु इस बात को मानने से इनकार कर देते है।_*

 

*_ऐसे ही कुछ समय बीत जाता है, लेकिन वे सत्यवती को भूला नहीं पाते हैं और दिन-रात उसकी याद में व्याकुल रहने ललते हैं। यह सब देख एक दिन देवव्रत ने अपने पिता से उनकी व्याकुलता का कारण पूछा। सारा वृतांत जानने पर देवव्रत स्वयं केवट हरिदास के पास गए और उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए गंगा जल हाथ में लेकर शपथ ली कि 'मैं आजीवन अविवाहित ही रहूंगा'।_*

 

*_देवव्रत की इसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पितामह पड़ा। तब राजा शांतनु ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र को इच्छित मृत्यु का वरदान दिया। महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर जब सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तब भीष्म पितामह ने अपना शरीर त्याग दिया। इसीलिए माघ शुक्ल अष्टमी को उनका निर्वाण दिवस मनाया जाता है।_*


*_मान्यतानुसार इसी दिन व्रत रखकर जो व्यक्ति अपने पित्तरों के निमित्त जल, कुश और तिल के साथ श्रद्धापूर्वक तर्पण करता है, उसे संतान तथा मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है तथा उनके पितरों को भी वैकुंठ प्राप्त होता है। इस दिन भीष्म पितामह की स्मृति में श्राद्ध भी किया जाता है।_*


          

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

उत्तम चरित्र

                     

                                              उत्तम चरित्र


 उत्तम चरित्र व्यक्ति की सबसे बड़ी संपदा है। चरित्र से ही व्यक्तित्व आकार पाता है। चरित्र मन को उज्ज्वल करता है। जीवन को संवारता है। चरित्र के प्रभाव से ही लोग मित्र बनते हैं और सुख संपत्ति के मार्ग खुलते हैं। संसार में मनुष्य के पास यदि सभी साधन हैं, परंतु आदर्श चरित्र नहीं है तो सब व्यर्थ।


 एक बौद्ध कहावत है कि-विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है, आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है और चरित्र से आपके प्रारब्ध/कर्म फल की उत्पत्ति होती है।व्यक्ति को योग्यता की वजह से सफलता मिलती है और चरित्र से ही उस सफलता का संरक्षण संभव है। जो सफल व्यक्ति अपने चरित्र को नहीं निखारते उनकी सफलता स्थायी नहीं रहती। 


                 रावण और कंस आदि पराक्रमियों के पास अपार शक्ति थी, परंतु उनका चरित्र आदर्श नहीं था। इसी कारण समाज उनका तिरस्कार करता है। वस्तुत: धन बल और बाहुबल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है चरित्रवान बनना। इसलिए जीवन में चरित्र को सुधारना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। हम चाहे किसी भी क्षेत्र में सक्रिय हों, हमें चरित्र को बनाकर और बचाकर रखना चाहिए।

               निष्कलंक चरित्र निर्माण के लिए नम्रता, अहिंसा, क्षमाशीलता, गुरुसेवा, शुचिता, आत्मसंयम, विषयों के प्रति अनासक्ति, निर्भयता, दानशीलता, स्वाध्याय, तपस्या और त्याग-परायणता जैसे गुण विकसित करने चाहिए।

               ज्ञान के बिना चरित्र का निर्माण नहीं हो सकता। इसलिए शिक्षा के साथ-साथ युवा शक्ति का चरित्र निर्माण आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। चरित्र के निर्माण में परिवार की अहम भूमिका होती है। माता-पिता जैसा करते हैं, वैसा ही बच्चे सीखते हैं।चरित्र को अधिक प्रभावित करने में परिवार के बाद विद्यालय का परिवेश, सामाजिक रहन-सहन, व्यवहार व वातावरण भी विशिष्ट स्थान रखते हैं। ऐसे में कह सकते हैं एक कच्चे घड़े की तरह युवा पौधों को संस्कारित करना पूरे समाज का दायित्व है।


                                                                                                           देवेन्द्र कुमार शर्मा

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

चंदन को कोयले में मत बदलो, मित्रों !

 चंदन को कोयले में मत बदलो, मित्रों !


सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा - हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरुस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा - बहुत अच्छा।


इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा - मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था।


राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि - इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ? अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान (बाग) उसको सौंप दिया,लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।


यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा, थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।


राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया कि, चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आयें, चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा, यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला। उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है, दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा, राजा ने आते ही कहा - भाई! यह तूने क्या किया ?


लकड़हारा बोला - आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया, आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया, कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो, शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।


 राजा मुस्कुराया और कहा - अच्छा, मैं यहीं खड़ा हुआ हूँ, तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ, लकड़हारे ने दो गज (लगभग पौने दो मीटर) की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया, लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे, लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आया और जोर-जोर से रोता हुआ, अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा, हाय अनजाने में, मैंने ये क्या कर डाला ?


इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक श्वास चन्दन का वृक्ष है, पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में परिवर्तित कर रहे हैं।


राग, द्वेष और मोह की अग्नि में, हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं।


जब अंत में श्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे, तब अहसास होगा कि, व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को, इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे।


अभी भी देर नहीं हुई है, हमारे पास जो भी श्वास रूपी चंदन के पेड़ शेष हैं, उसी के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।