यह ब्लॉग खोजें

मंगलवार, 1 जून 2021

भैरवनाथ' का रहस्य

 'भैरवनाथ' का रहस्य !!!!!!


हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव।


भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। 


भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ाखाल में बटुक भैरव का मंदिर है जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं।

 

मुख्य रूप से आठ भैरव माने गए हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रुद्र भैरव, 3. चंद्र भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव और 8. संहार भैरव।

 

हिन्दू धर्म में भैरव को विशाल आकार के काले शारीरक वर्ण वाले, हाथ में भयानक दंड धारण किए हुए और साथ में काले कुत्ते की सवारी करते हुए वर्णन किया गया है। दक्षिण भारत में ये 'शास्ता' के नाम से तथा माहाराष्ट्र राज्य में ये 'खंडोबा' के नाम से जाने जाते हैं। तामसिक स्वाभाव वाले, ये सभी भैरव तथा भैरवी, मृत्यु या विनाश के कारक हैं, काल के प्रतिक स्वरुप, रोग-व्याधि इत्यादि के रूप में ये ही प्रकट हो, विनाश या मृत्यु की ओर ले जाते हैं।


भैरव उत्पत्ति: - पुराणों में उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पाँचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है। 


काल भैरव :  - काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था। शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। 


अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गाणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे। परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए।


 अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ। तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। 

 

बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। 

ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।'-


 अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।। 


भैरव आराधना : - एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएँ। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दाँत और आँत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है। 

 

भैरव तंत्र : - योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।

 

लोक देवता : - लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।


पालिया महाराज : सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।

 

भैरव चरित्र :  -  भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।


उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी ‍कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है।

 

भैरव मंदिर :  - काशी का काल भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।

श्री भैरव बाबा के ये मुख्य 8 स्वरूप

 श्री भैरव बाबा के ये मुख्य  8 स्वरूप 



1. क्रोध भैरव


क्रोध भैरव गहरे नीले रंग के शरीर वाले हैं। उनकी तीन आंखें हैं  भगवान भैरव के इस रूप का वाहन गरुड़ हैं, और ये दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी माने जाते हैं। क्रोध भैरव की पूजा-अर्चना करने से सभी परेशानियों और बुरे वक्त से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।


2.  कपाल भैरव


   इस रूप में भगवान का शरीर चमकीला है और इस रूप में भगवान की सवारी हाथी है। भगवान भैरव के इस रूप की पूजा-अर्चना करने से कानूनी कारवाइयां  बंद हो जाती हैं। अटके हुए काम पूरे होते हैं और सभी कामों में सफलता मिलती है। कपाल भैरव अपने एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में तलवार, तीसरे में शस्त्र और चौथे में एक पात्र पकड़े हुए हैं।


3. असितांग भैरव


 असितांग भैरव का रूप काला है। उन्होने गले में सफेद कपालो की माला पहन रखी है और हाथ में भी एक कपाल धारण किए हुए हैं। तीन आंखों वाले असितांग भैरव की सवारी हंस है। भगवान भैरव के इस रूप की पूजा-अर्चना करने से मनुष्य में कलात्मक क्षमताएं  बढ़ती हैं।


4. चंदा भैरव


   इस रूप में भगवान का रंग सफेद है और वे मोर की सवारी किए हुए हैं। भगवान की तीन आंखें हैं और एक हाथ में तलवार और दूसरे में एक पात्र, तीसरे हाथ में तीर और चौथे हाथ में धनुष लिए हुए हैं। चंद भैरव की पूजा करने से दुश्मनों पर विजय मिलती है और हर बुरी परिस्थिति से लड़ने की क्षमता आती है।


5. गुरु भैरव


गुरु भैरव हाथ में कपाल, कुल्हाडी, एक पात्र और तलवार पकड़े हुए हैं। यह भगवान का नग्न रूप है और इस रूप में भगवान की सवारी बैल है। गुरु भैरव के शरीर पर सांप लिपटा हुआ है। उनके तीन हाथों में शस्त्र और एक हाथ में पात्र पकड़े हुए हैं। गुरु भैरव की पूजा करने से अच्छी विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है।


6. संहार भैरव


संहार भैरव का रूप बहुत ही अनोखा है। संहार भैरव नग्न रूप में हैं, उनका शरीर लाल रंग का है और उनके सिर पर कपाल स्थापित है, वह भी लाल रंग का है। इनकी 3 आंखें हैं और उनका वाहन कुत्ता है। संहार भैरव की आठ भुजाएं हैं और उनके शरीर पर सांप  लिपटा हुआ है। इसकी पूजा करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते हैं।


7. उन्मत्त भैरव


उन्मत्त भैरव भगवान के शांत स्वभाव का प्रतीक है। उन्मत्त भैरव की पूजा-अर्चना करने से मनुष्य के मन की सारी नकारात्मकता और सारी बुराइयां खत्म हो जाती है। भैरव के इस रूप का स्वरूप भी शांत और सुखद है। उन्मत्त भैरव के शरीर का रंग हल्का पीला है और उनका वाहन घोड़ा है।


8. भीषण भैरव


भीषण भैरव की पूजा-करने से बुरी आत्माओं और भूतों  से छुटकारा मिलता है। भीषण भैरव अपने एक हाथ में कमल, दूसरे में त्रिशूल, तीसरे में तलवार और चौंथे में एक पात्र पकड़े हुए हैं। भीषण भैरव का वाहन शेर है .


रविवार, 23 मई 2021

भगवानशिव महाकाली के पैरों के नीचे?

 क्यों आये भगवानशिव महाकाली के पैरों के नीचे?


भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। 


उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-


दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया।


 देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।


सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी।


 महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। 


जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।


महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया। 


दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था


सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। 


जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है.

भारतीय इतिहास के 2 सबसे बड़े गद्दार जयचन्द्र और राघव चेतन

 *भारतीय इतिहास के 2 सबसे बड़े गद्दार राजा कौन थे जिनकी वजह से भारत मुगलों का गुलाम बन गया?*

भारतीय इतिहास के दो गद्दार राजा ऐसे रहे थे जिनकी वजह से लाखों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी और भारत में मुस्लिम साम्राज्य राज करता हुआ नजर आया है। आज हम आपको इन्हीं दो गद्दारों के बारे में बताने वाले हैं जिनकी वजह से भारत में मुस्लिम शासक और इस्लामिक आक्रमणकारियों की एंट्री हो पाई। जयचन्द्र, राघव चेतन दो गद्दार हैं जिनको कि भारत इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला जाता है। पहला नाम जयचन्द्र है जिसकी वजह से पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी के साथ युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था और मोहम्मद गौरी अपने कई सारे प्रयत्नों के बाद जयचन्द्र की गद्दारी से भारत में एंट्री ले पाया था।

जयचन्द्र


आइए आज हम आपको सबसे पहले जयचन्द्र्र के बारे में बताते हैं।

भारतीय इतिहास के पन्नों में राजा पृथ्वीराज चौहान का नाम काफी स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है पृथ्वीराज चौहान के साथ जयचन्द्र ने गद्दारी की थी और उसी गद्दारी के द्वारा गौरी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हरा पाया था युद्ध जीतने के बाद गौरी ने राजा जयचन्द्र को भी मार दिया था और उसके बाद गौरी ने कन्नौज और दिल्ली समेत कई राज्यों पर कब्जा कर लिया था। पृथ्वीराज चौहान के होते हुए मोहम्मद गौरी कभी भी भारत में प्रवेश नहीं कर सकता था यह बात मोहम्मद गोरी अच्छी तरीके से जानता था।

जयचन्द्र दिल्ली की सत्ता के लालच में मोहम्मद गौरी का साथ दिया और युद्ध में गौरी को अपनी सेना देकर पृथ्वीराज को हरा दिया। मोहम्मद गौरी के पास जो सेना थी वह पृथ्वीराज को हराने के लिए काफी नहीं थी। जयचन्द्र ने अपनी सेना मोहम्मद गौरी को दे दी थी और तब गौरी ने पृथ्वीराज को युद्ध में हरा दिया था और उनको मार दिया था।इसके बाद मोहम्मद गौरी ने जयचन्द्र की हत्या कर दी थी और कन्नौज में और दिल्ली जैसे राज्यों पर कब्जा कर लिया था लेकिन मोहम्मद गौरी अगर भारत में घुस पाया है तो उसके पीछे जयचन्द्र का सबसे बड़ा हाथ है और यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला जा सकता है।


जयचन्द्र कन्नौज साम्राज्य का राजा था। पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता से शादी की थी और इसलिए पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द्र के दामाद बन चुके थे। मोहम्मद गौरी को तराइन के प्रथम युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था और इस हार को मोहम्मद गोरी भूल नहीं पा रहा था। जब राजा जयचन्द्र को पता लगा कि गौरी पृथ्वीराज चौहान से बदला लेना चाहता है तो उसने खुद मोहम्मद गोरी तो कि संदेश पहुंचाया था कि वह अपनी सेना के द्वारा मोहम्मद गोरी की मदद करना चाहता है ताकि गौरी पृथ्वीराज को हरा दे। पृथ्वीराज और गौरी के बीच में तराइन के क्षेत्र में युद्ध हुआ था। पृथ्वीराज की ओर से 3 लाख सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया था। गौरी के पास एक लाख के करीब सैनिक थे लेकिन पृथ्वीराज की सेना ने जब गौरी का साथ दिया तो उस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान हार गया और मोहम्मद गौरी ने दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब के अधिकतर क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। इसलिए जयचन्द्र को भारत देश का सबसे बड़ा गद्दार बोला जा सकता है।

राघव चेतन

दूसरागद्दार राघव चेतन है।मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य पद्मावत में राघव चेतन तांत्रिक के रूप में जाना जाता है।राघव चतन ने ही खिलजी के सामने पद्मावती के रूप का बखान किया था। इसी ने खिलजी को बताया था कि इस महल मे किस तरह से सोने से भरे मंदिर है, भारी संपद है। राघव चेतन की वजह से ही हजारों रानियां चिता मे तब्दील हो गयी थी। राघव चेतन को भारत का दूसरा सबसे बड़ा गद्दार माना जाता है।

इतिहास गवाह है,बिना गद्दारों के कोई भी दुश्मन किसी देश पर राज नही कर सकता।आज जो भारत की स्थिति है वो भी आज हमारे देश के गद्दारों के कारण है जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये, सत्ता के लिये दुश्मन देशों और मुगलोँ के हाथों अपने को बेच रखा है, परन्तु वो ये नही जानते कि जिस दिन इन सबके दुश्मन देशों और मुगलोँ मकसद पूरे हो जायेगे उस दिन इन सभी गद्दारों का भी वही हाल होगा जो जयचंद ,और राघव का किया गया था।

गुरुवार, 20 मई 2021

धारा 370 और आर्टिकल 35A का इतिहास

 धारा 370 और आर्टिकल 35A का इतिहास?

            

 धारा 370 और आर्टिकल 35A के इतिहास को समझेंगे तभी यह समझ पाएंगे कि इसे हटाना कितना मुश्किल या सरल है। दरअसल, जब अंग्रेज अपने उपनिवेशों को छोड़कर जा रहे थे तब उन्होंने भारत के भी दो हिस्से करने का प्लान बनाया और उन्होंने उसे सफलतापूर्वक लागू भी कर दिया।       

 गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 भारतीय संविधान के पहले का संविधान है। इस एक्ट के सेक्शन 311 में भारत की परिभाषा लिखी है। उसमें लिखा है कि ब्रिटिश इंडिया इन्क्लूडिंग प्रिंसली स्टेट्स यानी भारत जो है, वह ब्रिटिश इंडिया और प्रिंसली स्टेट्स को मिलाकर है। मतलब यह कि जब पासपोर्ट बनता था तो आपको ब्रिटिश इंडिया से लेना पड़ता था, भले ही आप किसी रियासत के राजा क्यों न हो।       

 मतलब यह कि जब अंग्रेज यहां से जा रहे थे तो वे भारत छोड़कर जा रहे थे, किसी रियासत को नहीं। स्वाभाविक ही ये सभी रियासतें मिलाकर भारत ही थीं। जब रियासतें भारत में ही थीं तो विलय का कोई मतलब ही नहीं बनता। जब भारत से रियासतें बाहर हैं ही नहीं तो कैसा विलय? लेकिन फिर भी विलय का प्रारूप बनाया गया,क्योंकि भारत के दो टूकड़े किए जा रहे थे। एक का नाम पाकिस्तान और दूसरे का नाम हिंदुस्तान हुआ। ऐसे में विलय पत्र जरूरी था।             

 प्रारूप बनाकर 25 जुलाई 1947 को माउंटबेटन की अध्यक्षता में सभी रियासतों को बुलाया गया। इन सभी रियासतों को बताया गया कि आपको अपना विलय करना है। वह हिन्दुस्तान में करें या पाकिस्तान में, यह आपका निर्णय है। जाहिर सी बात थी कि माउंटबेटन के प्लान में किसी भी राज्य को स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं था। उसे दो में से किसी एक देश को चुनना था। उस विलय पत्र को सभा में बांट दिया गया।        

 यह विलय पत्र सभी रियासतों के लिए एक ही फॉर्मेट में बनाया गया था जिसमें कुछ भी लिखना या काटना संभव नहीं था। 

मंगलवार, 18 मई 2021

गाय के घी के अद्भुत फायदे

गाय के घी के 30 अद्भुत फायदे

1. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।


2. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।


3. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।


4. 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।


5. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।


6. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है।


7. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है।


8. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।


9. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।


10. हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है।


11. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।


12. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।


13. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है.!


14. गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।


15. अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।


16. हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।


17. गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।


18. जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।


19. देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।


20. घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू

खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा गुनगुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है.!


21. फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।


22. गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।


23. सांप के काटने पर 100-150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।


24. दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है।


25. सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।


26. यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन

को संतुलित करता है। यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।


27. एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।


28. गाय के घी को ठंडे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइसिस के लिए भी कारगर है।


29. गाय का घी एक अच्छा कोलेस्ट्रॉलकारक है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है।


30. अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार, नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।


*केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*

 *केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*


भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें।


नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।


नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।


दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।


महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।

〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️