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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में प्रभु श्रीराम और नारदजी का संवाद



श्रीरामचरितमानसके अरण्यकांड में प्रभु श्रीराम और नारदजीका संवाद है।यह बहुत बहुत ज्ञानवर्धक संवाद है। पठनीय है।


संदर्भ :- यह प्रसंग उस समय का है, जब माता सीता का हरण हो जाता है, और प्रभुश्रीराम अपने अनुज लक्ष्मन के साथ वन में माता सीता की खोज के लिये भटक रहे थे,जब नारदजी यह सब देखते हैं,आगे क्या हुआ स्वयं पढें,,,,,


बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥

मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥


भावार्थ:- भगवान्‌ को विरहयुक्त देखकर नारदजी के मन में विशेष रूप से सोच हुआ। उन्होंने विचार किया कि मेरे ही शाप को स्वीकार करके श्री रामजी नाना प्रकार के दुःखों का भार सह रहे हैं (दुःख उठा रहे हैं)॥


* ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥

यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥


भावार्थ:- ऐसे (भक्त वत्सल) प्रभु को जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचार कर नारदजी हाथ में वीणा लिए हुए वहाँ गए, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे॥


*गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥

करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥


भावार्थ:- वे कोमल वाणी से प्रेम के साथ बहुत प्रकार से बखान-बखान कर रामचरित का गान कर (ते हुए चले आ) रहे थे। दण्डवत्‌ करते देखकर श्री रामचंद्रजी ने नारदजी को उठा लिया और बहुत देर तक हृदय से लगाए रखा॥


* स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥


भावार्थ:- फिर स्वागत (कुशल) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजी ने आदर के साथ उनके चरण धोए॥


* नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।

नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥


भावार्थ:- बहुत प्रकार से विनती करके और प्रभु को मन में प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमल के समान हाथों को जोड़कर वचन बोले-॥


* सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥

देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥


भावार्थ:- हे स्वभाव से ही उदार श्री रघुनाथजी! सुनिए। आप सुंदर अगम और सुगम वर के देने वाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिए, यद्यपि आप अंतर्यामी होने के नाते सब जानते ही हैं॥


* जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करऊँ दुराऊ॥

कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहुँ तुम्ह मागी॥


भावार्थ:- (श्री रामजी ने कहा-) हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ! तुम नहीं माँग सकते?॥


* जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥

तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥


भावार्थ:- मुझे भक्त के लिए कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले- मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ-॥


* जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥

राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥


भावार्थ:- यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के समूह के लिए यह वधिक के समान हो॥


* राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।

अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम॥


भावार्थ:-आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात्रि है, उसमें 'राम' नाम यही पूर्ण चंद्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में निवास करें॥


* एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।

तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥


भावार्थ:-कृपा सागर श्री रघुनाथजी ने मुनि से 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदजी ने मन में अत्यंत हर्षित होकर प्रभु के चरणों में मस्तक नवाया॥


* अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥

राम जबहिं प्रेरेउ निज माया मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥


भावार्थ:- श्री रघुनाथजी को अत्यंत प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले- हे रामजी! हे रघुनाथजी! सुनिए, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था,॥


* तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥


भावार्थ:- तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? (प्रभु बोले-) हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं,॥


* करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥

गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥


भावार्थ:- मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है, तो वहाँ माता उसे (अपने हाथों) अलग करके बचा लेती है॥


* प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥

मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥


भावार्थ:- सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात्‌ मातृ परायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिंता नहीं करती, क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्र के समान है और (तुम्हारे जैसा) अपने बल का मान न करने वाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है॥


* जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥

यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥


भावार्थ:- मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानी को) अपना बल होता है। पर काम-क्रोध रूपी शत्रु तो दोनों के लिए हैं।(भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेवारी मुझ पर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है, परन्तु अपने बल को मानने वाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है।) ऐसा विचार कर पंडितजन (बुद्धिमान लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते॥


* काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।

तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥


भावार्थ:- काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी (माया की साक्षात्‌ मूर्ति) स्त्री तो अत्यंत दारुण दुःख देने वाली है॥


* सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥

जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥


भावार्थ:- हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोह रूपी वन (को विकसित करने) के लिए स्त्री वसंत ऋतु के समान है। जप, तप, नियम रूपी संपूर्ण जल के स्थानों को स्त्री ग्रीष्म रूप होकर सर्वथा सोख लेती है॥


काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥

दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥


भावार्थ:- काम, क्रोध, मद और मत्सर (डाह) आदि मेंढक हैं। इनको वर्षा ऋतु होकर हर्ष प्रदान करने वाली एकमात्र यही (स्त्री) है। बुरी वासनाएँ कुमुदों के समूह हैं। उनको सदैव सुख देने वाली यह शरद् ऋतु है॥


* धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥

पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥


भावार्थ:- समस्त धर्म कमलों के झुंड हैं। यह नीच (विषयजन्य) सुख देने वाली स्त्री हिमऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवास का समूह (वन) स्त्री रूपी शिशिर ऋतु को पाकर हरा-भरा हो जाता है॥


* पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधियारी॥

बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥


भावार्थ:- पाप रूपी उल्लुओं के समूह के लिए यह स्त्री सुख देने वाली घोर अंधकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य- ये सब मछलियाँ हैं और उन (को फँसाकर नष्ट करने) के लिए स्त्री बंसी के समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं॥


* अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।

ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥


भावार्थ:- युवती स्त्री अवगुणों की मूल, पीड़ा देने वाली और सब दुःखों की खान है, इसलिए हे मुनि! मैंने जी में ऐसा जानकर तुमको विवाह करने से रोका था॥


* सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥

कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥


भावार्थ:- श्री रघुनाथजी के सुंदर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो गया और नेत्र (प्रेमाश्रुओं के जल से) भर आए। (वे मन ही मन कहने लगे-) कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीती है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और प्रेम हो॥

लियुकोरिया क्या है इसके उपाय,घरेलू उपाय

 *महिलाएं ध्यान रखें,*

*छिपाने से लियुकोरिया ठीक नहीं हो सकता..!*

स्त्रियों को बात छिपाने में महारथ हासिल होती हैं, वो बात चाहे किसी रोग से सम्बन्धित ही क्यों न हो।

ऐसे अनेक रोग हैं जिन्हें स्त्रियां अपने पति तक से छिपाये रखती है।

इसका मुख्य कारण यह है कि वे अपनी अज्ञानतावश उन रोगों को अधिक महत्व नहीं देती पर वही रोग धीरे धीरे उन्हें अंदर से खोखला कर देते हैं।

इन रोगों में से सबसे भयंकर है स्वेत प्रदर, जिसे ल्यूकोरिया या सफ़ेद पानी आना आदि नामो से जानते हैं।

●प्रायः 80 प्रतिशत स्त्रियां आज स्वेत प्रदर या ल्यूकोरिया से परेशान है।यह रोग स्त्रियों के स्वास्थ्य और शक्ति को घुन की तरह खा जाता हैं, शरीर को सुखा देता हैं तथा सुंदरता में कमी लाता हैँ।

●पढ़ी लिखी स्त्रियां इसे सफ़ेद पानी आना और ग्रामीण स्त्रियां इसे कपडे में दाग लगना कहती हैँ।

इसकी वजह से स्त्रियां परेशान तो बहुत रहती है मगर किसी से कुछ कह नहीं पाती हैं।


*●●लक्षण●●*

●सर्दी का लगना।

●पेट में कीड़े (कृमियो) का होना।

● प्राइवेट स्थान में खुजली।

●अंगों में गंदगी रहना।

●खून की कमी होना।

●अत्यधिक आलस्य होना।

●बार बार गर्भस्राव।

●खून की कमी होना।

●किसी काम में दिल न लगना।

●स्वभाव में चिड़चिड़ापन होना।

●जल्दी गुस्सा होना।

●भूख का ना लगना।

●चेहरे पर पीलापन छा जाता है।

●सिर, पीठ, पेट व् कमर में दर्द रहना इत्यादि इसके मुख्य लक्षण है।


*●●उपचार●●*

*आवश्यक सामिग्री*

1. कमरकस- 75 ग्राम

2. दक्षिण सुपारी- 75 ग्राम

3. गोंद कीकर- 75 ग्राम

4. मोचरस- 75 ग्राम

5. माजूफल- 40 ग्राम

6. कलमी तज- 75 ग्राम

7. पिली सतावर-150 ग्राम

8. सूखा सिंघाड़ा- 50 ग्राम घी में भूना हुआ

9. उस्तेखदुद्- 50 ग्राम

10. अशोकछाल- 50 ग्राम

11. रूमी मस्तगी- 5 मासा

12. आँवला गुठली रहित- 75ग्राम


सभी जड़ी बूटियों का चूर्ण बनाले और फिर सभी वस्तुओं को बराबर मात्रा में मिलाकर इसमें पिसी हुई मिस्री मिला दे।

फिर् इसमें शुद्ध रसौत और शुद्व धोया हुआ सफ़ेद कत्था 50-50 ग्रांम मिलाये।

फिर सुबह शाम शरीर की प्रकृति व मौसम के अनुसार दूध की कच्ची लस्सी से ले।

इसके साथ अशोकारिस्ट सीरप 20ml सुबह शाम समभाग गुनगुना पानी मिलाकर दे।

फिटकरी से गुप्तांगों को इन्फेक्शन से बचने के लिये धोना चाहिये।

पैंटी का नम्बर सातवें दिन आना चाहिए।


*●निषेध●*

किसी भी गर्भवती स्त्री को इसे प्रयोग नही करना है।


इतना ही पर्याप्त है, ज्यादा जानकारी के लिए फोन न करे क्योंकि ये सब करियाने की दुकान में मिल जाएँगी।


नेचुरोपैथ कौशल

9215522667

क्या आप प्रदूषण से बचना चाहते हैं:

 *क्या आप प्रदूषण से बचना चाहते हैं.?*

*तो बचिये इससे, अन्यथा बीमार कर देगी ये जहरीली प्रदूषित हवा.!* 

 अपनाइये ये 8 घरेलू नुस्खे....

(1). खाना खाने के बाद थोड़ा सा गुड़ जरूर खाएं गुड़ खून साफ करता है। इससे आप प्रदूषण से बचे रहेंगे।


 (2). फेफड़ों को धूल के कणों से बचाने के लिए आप रोजाना एक गिलास गर्म दूध जरूर पियें।


(3). अदरक का रस और सरसों का तेल नाक में बूंद-बूंद कर डालने से भी आप हानिकारक धूल कणों से भी बचे रहेंगे।


(4). खुद को प्रदूषण के प्रभाव से बचाने के लिए आप ज्यादा से ज्यादा पानी का सेवन करें।


 (5). शहद में काली मिर्च मिलाकर खाएं, आपके फेफड़े में जमी कफ और गंदगी बाहर निकल जाएगी।


 (6). अजवायन की पत्तियों का पानी पीने से भी व्यक्ति का खून साफ होने के साथ शरीर के भीतर मौजूद दूषित तत्व बाहर निकल जाते हैं।


(7). तुलसी प्रदुषण से आपकी रक्षा करती है, इसलिए रोजाना तुलसी के पत्तों का पानी पीने से आप स्वस्थ बने रहेंगे।


(8). ठंडे पानी की जगह गर्म पानी का सेवन करना शुरू कर दें।


स्त्री रोग (ल्यूकेरिया) रक्त प्रदर, श्वेत प्रदर के सफल कुदरती उपचार

 *स्त्री रोग (ल्यूकेरिया) रक्त प्रदर, श्वेत प्रदर के सफल कुदरती उपचार*

*छिपाने से कुछ नहीं होगा.!*

(1) शतावर जड  100 gms

(2) आंवला        50 gms

(3) अशोकछाल  30 gms

(4) ईलायची       30 gms

(5) फूली फिटकरी 10 gms

 

*■बनाने की विधि■*

उपर बताई हुई औषधियां पंसारी से लाकर कूटकर मिक्स कर ले। और चूरन बनाकर कांच की बोतल मे भर लें. 


*■खूराक मात्रा■*

रोज सूबह-शाम 1-1 चमच हल्के गरम दूध के साथ खूराक 2-3 महीना प्रयोग करे।


*■ फायदे ■*

स्त्री मे होने वाले रोग

● रक्त प्रदर दूर होता है।

● श्वेत प्रदर दूर होता है।

● कमजोरी दूर होती है।


*■ ज़रूरी ■*

प्रतिदिन रात को एक कप दूध में एक चम्मच हल्दी पॉवडर सोते समय अवश्य लें।

अस्थमा (दमा) के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार

 *अस्थमा (दमा) के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार...*


अस्थमा एक फेफड़े की बीमारी है जो साँस लेने में कठिनाई का कारण बनता है।

फेफड़ों में हवा के प्रवाह में रुकावट होने पर अस्थमा अटैक होता है।


*अस्थमा के कारण:-*

(1). एलर्जी

(2). वायु प्रदूषण

(3). धूम्रपान और तंबाकू

(4). श्वसन संक्रमण

(5). जेनेटिक्स (आनुवांशिक)

(6). मौसम के कारण

(7). मोटापा

(8). तनाव


*अस्थमा (दमा) के लक्षण:-*

(1). साँस लेने में तकलीफ

(2). सीने में जकड़न या दर्द

(3). खाँसी

(4). घरघराहट

(5). लगातार सर्दी और खांसी

(6). नींद में बेचैनी

(7). थकान


*अस्थमा निवारण के 10 अद्भुत घरेलू नुस्खे:-*


(1). अदरक का रस, अनार का रस और शहद को बराबर मात्रा में मिलाएं।


इस मिश्रण का एक चम्मच दिन में दो या तीन बार सेवन करें।


(2). नींबू में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता हैं जो अस्थमा के इलाज में सहायक होता है।


एक गिलास पानी में आधा नींबू का रस निचोड़ लें और उसमें अपने स्वाद के अनुसार चीनी मिलाकर पीयें।


(3). आंवला दमा के उपचार के लिए एक अच्छा उपाय है। आंवला को कुचलकर उसमें थोड़ा सा शहद मिलाएं और सेवन करें।


(4). तीन सूखे अंजीर को धो लें और रात भर एक कप पानी में भिगोएँ।

सुबह में खाली पेट अंजीर खा लें और अंजीर का पानी पीयें।


(5). एक चम्मच शहद में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर रात में सोने से पहले सेवन करें।

यह गले से कफ को निकालने में मदद करता है और इससे अच्छी नींद आती है।


(6). प्याज में मौजूद एंटी इंफ्लेमेटरी गुण दमा के इलाज में मदद करता है।

प्याज को सलाद के रूप में या सब्जियों में पकाकर खा सकते है।


(7). एक गिलास गर्म दूध में जैतून का तेल और शहद को बराबर मात्रा में मिलाएं।

इसमें कुछ लहसुन की कली डालकर नाश्ता करने से पहले सेवन करें।


(8). संतरा, पपीता, ब्लूबेरी और स्ट्रॉबेरी भी अस्थमा के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं।


(9). पानी में एक चम्मच अजवाइन डालकर उबाल लें और इसका भाप लें।

आप चाहे तो इसे पी भी सकते है।


(10). अपने आहार में अधिक ताजा फल और सब्जियों को शामिल करें।

बुधवार, 30 मार्च 2022

प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा (कविता)

 प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना  होगा (कविता)


जीवन के अनुबंधों की,

तिलांजलि संबंधों की,

टूटे मन के तारो की,

फिर से नई कड़ी गढ़ना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


बेटी का धर्म निभाने को,

पत्नी का मर्म सिखाने को,

भाई का प्रेम बताने को,

हर चौपाई दोहा सुनना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


लक्ष्मण से सेवा त्याग सीखना,

श्री भरत से राज विराग सीखना,

प्रभु का सबसे अनुराग सीखना,

फिर माता सीता को गुनना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


केवट की भक्ति भरी गगरी,

फल मीठे बेर लिए शबरी,

है धन्य अयोध्या की नगरी,

अवसादों में जब घिरना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा ।।*


न्याय नीति पर राम अड़े,

संग सखा वीर हनुमान खड़े,

पशु-पक्षी तक हैं युद्ध लड़े,

धन्य हुआ उनका तरना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


जो राम नाम रघुराई  है,

जीवन की मूल दवाई है,

हर महामंत्र चौपाई है,

सियाराम नाम जपते रहना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


जगती में मूल तत्व क्या है?

राम नाम का महत्व क्या है?

संघर्ष में राम रामत्व क्या है?

संकट में जब तुम फंसना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


हर समाधान मिल जाता है,

कोई प्रश्न ठहर नहीं  पाता है,

बस राम ही राम सुहाता है

श्री राम है वाणी का गहना,

*प्रिय तुम्हे रामचरितमानस पढ़ना होगा।।*


हजारो साल पुराना इतिहास : विभिन्न जाति भेद षडयंत्र

2  अप्रैल*नववर्ष की अनंत शुभकामनाए 2079*                                    चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। 


*सम्राट शांतनु* ने विवाह किया एक *मछवारे की पुत्री सत्यवती* से ।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।


सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए *भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?*


महाभारत लिखने वाले *वेद व्यास भी मछवारे थे*, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।


*विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे*, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।


*भीम ने वनवासी हिडिम्बा* से विवाह किया।


*श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय* करने वालों के परिवार से थे, 


उनके भाई *बलराम खेती करते थे*, हमेशा हल साथ रखते थे।


*यादव क्षत्रिय* रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।


*राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे*।


उनके पुत्र *लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल* में पढ़े जो *वन के वासी थे।


तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।


*वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे*, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।


प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस *नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे* । 


नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, *बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये*।


उसके बाद *मौर्य वंश* का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत *चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे* और एक *ब्राह्मण चाणक्य ने* उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।


फिर *गुप्त वंश* का राज हुआ, जो कि *घोड़े का अस्तबल चलाते थे* और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।


केवल *पुष्यमित्र शुंग* के 36 साल के राज को छोड़ कर *92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का  रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया*? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।


फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।


अंत में *मराठों* का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने *गाय चराने वाले गायकवाड़* को गुजरात का राजा बनाया, *चरवाहा जाति के होलकर* को मालवा का राजा बनाया।


*अहिल्या बाई होलकर* खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। 


*मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे* और *रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद* थे|।


यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।


*मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई* और यहां से *पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह* जैसी चीजें शुरू होती हैं।


*1800-1947 तक अंग्रेजो के शासन* रहा और यहीं से *जातिवाद* शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। 


अंग्रेज अधिकारी *निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड"* में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।


इन हजारों सालों के इतिहास में *देश में कई विदेशी आये* जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि *मेगास्थनीज* ने इंडिका लिखी, *फाहियान*,  *ह्यू सांग* और *अलबरूनी* जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।


*योगी आदित्यनाथ* जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत  हैं, पिछड़ी जाति की *उमा भारती* महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।


इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्र से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं ।


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