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रविवार, 8 मई 2022

संत सूरदास: एक परिचय

 🌹🌹 *संत सूरदास* 🌹🌹


 *जन्म*              -  सन्‌ 1478 ई.

 *ब्रह्मलोक गमन* - सन्‌ 1573 ई. के लगभग

 

संत सूरदासजी का जन्म मथुरा के रुनकता नाम के गांव में हुआ। सुरदासजी जन्म से ही नेत्र ज्योति से बाधित थे और वे श्रीकृष्‍ण के अनन्न भक्त थे।  इसी संदर्भ में आओ जानते हैं उनके संबंध में अनसुनी रोचक बातें।

 

1. कहते हैं कि द्वापर युग में भी सूरदासजी का जन्म हुआ था। तब भी वे नेत्र ज्योति से बाधित थे और वे प्रभु श्रीहरि की भक्ति में रमकर भजन गाया करते थे। एक बार वे गाते हुए ऋषि गर्ग के आश्रम पहुंच और उन्होंने पूछा कि हे मुनिवर! मैंने सुना है कि मेरे प्रभु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया है। मेरे अंतरमन की आंखें उन्हें देख रही है। क्या मुझे प्रभु के चरणों में मुक्ति मिलेगी।

 

यह सुनकर गर्ग मुनि आंखें बंद करके भविष्य में झांकते हैं। फिर वे आंखें खोलकर कहते हैं कि अभी नहीं कविराज। यह सुनकर कविराज निराश हो जाते हैं। फिर आगे मुनि कहते हैं कि अभी तो आपकी आवश्यकता कलयुग में पड़ेगी। यह सुनकर वह दिव्यांग (नेत्र ज्योति से बाधित) गायक कहता है कलयुग में? मुनि कहते हैं हां, कलयुग में करोड़ों प्राणियों को आपको अपने भक्ति रस में डूबोना है। जब कलयुग में भक्ति का हास होगा तो आपको अपनी दिव्य दृष्टि से प्रभु की लीला दिखाई देने लगेगी और आप उसका वर्णन अपनी वाणी से करेंगे। उस समय भी आपको नैनहिन शरीर की प्राप्त ही होगी। उसी जन्म में आपको मुक्ति भी मिलेगी। यह सुनकर कविराज प्रसन्न होकर वहां से विदा ले लेते हैं।

2. वल्लभाचार्य जब आगरा-मथुरा रोड पर यमुना के किनारे-किनारे वृंदावन की ओर आ रहे थे तभी उन्हें एक नेत्र बाधित दिखाई पड़ा जो बिलख रहा था। वल्लभ ने कहा तुम रिरिया क्यों रहे हो? कृष्ण लीला का गायन क्यों नहीं करते? सूरदास ने कहा- मैं नेत्र बाधित मैं क्या जानूं लीला क्या होती है? तब वल्लभ ने सूरदास के माथे पर हाथ रखा। विवरण मिलता है कि पांच हजार वर्ष पूर्व के ब्रज में चली श्रीकृष्ण की सभी लीला कथाएं सूरदास की बंद आंखों के आकाश पर तैर गईं। अब वल्लभ उन्हें वृंदावन ले लाए और श्रीनाथ मंदिर में होने वाली आरती के क्षणों में हर दिन एक नया पद रचकर गाने का सुझाव दिया।

3. वल्लभ सम्प्रदाय में, जिससे सूरदास सम्बद्ध रहे हैं, यह माना जाता है कि वे अपने गुरु श्री वल्लभाचार्य से केवल दस दिन छोटे थे। गऊघाट में गुरुदीक्षा प्राप्त करने के पश्चात सूरदास ने *'भागवत'* के आधार पर कृष्ण की लीलाओं का गायन करना प्रारंभ कर दिया। इससे पूर्व वे केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्या 'सहस्राधिक' कही जाती है जिनका संग्रहीत रूप *'सूरसागर'* के नाम से विख्यात है। वल्लभाचार्यजी के पुत्र श्री विट्ठलनाथजी ने सूरदास को आठ कवियों के समुच्चय *'अष्टछाप'* में स्थान दिया था और वे उसके सर्वोत्कृष्ट कवि सिद्ध हुए। सूरदास रचित पांच ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें 'सूरसागर' ही सर्वप्रधान और श्रेष्ठ है।

4. कहा जाता है कि वे जन्म से नेत्र बाधित (जन्मांध) थे किन्तु उनकी कविता में प्रकृति तथा दृश्य जगत की अन्य वस्तुओं का इतना सूक्ष्म और अनुभवपूर्ण चित्रण मिलता है कि उनके जन्मांध होने पर विश्वास नहीं होता। पुष्टिमार्ग की उपासना और सेवा-प्रणाली का अनुसरण करते हुए सूरदास ने जीवनपर्यंत पद-रचना की। नरसी, मीरां, विद्यापति, चंडीदास आदि भारतीय साहित्य के अनेक कवियों ने पद-रचना की परंतु गीतिकाव्य में सूरदास का स्थान सर्वोच्च कहा जा सकता है।

5. सूर की काव्य प्रतिभा ने तत्कालीन शासक अकबर को भी आकृष्ट किया था और उसने उनसे आग्रहपूर्वक भेंट की थी जिसका उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है। इसी प्रकार तुलसीदास से भी सूरदास की भेंट का वर्णन प्राप्त होता है जो सर्वथा संभव है।

 

 *संत सूरदासजी के नाम से यह पद या कविता वायरल हो रही है-* 

 

रे मन धीरज क्यों न धरे,

सम्वत दो हजार के ऊपर ऐसा जोग परे।

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण,

चहु दिशा काल फ़िरे।

अकाल मृत्यु जग माही व्यापै,

प्रजा बहुत मरे।

 

सवर्ण फूल वन पृथ्वी फुले,

धर्म की बैल बढ़े।

सहस्र वर्ष लग सतयुग व्यापै,

सुख की दया फिरे।

 

काल जाल से वही बचे,

जो गुरु ध्यान धरे,

सूरदास यह हरि की लीला,

टारे नाहि टरै।।

रे मन धीरज क्यों न धरे

एक सहस्र, नौ सौ के ऊपर

ऐसो योग परे।

शुक्ल पक्ष जय नाम संवत्सर

छट सोमवार परे।

 

हलधर पूत पवार घर उपजे, देहरी क्षेत्र धरे।

मलेच्छ राज्य की सगरी सेना, आप ही आप मरे।

सूर सबहि अनहौनी होई है, जग में अकाल परे।

हिन्दू, मुगल तुरक सब नाशै, कीट पंतंग जरे।

मेघनाद रावण का बेटा, सो पुनि जन्म धरे।

पूरब पश्‍चिम उत्तर दक्खिन, चहु दिशि राज करे।

संवत 2 हजार के उपर छप्पन वर्ष चढ़े।

पूरब पश्‍चिम उत्तर दक्खिन, चहु दिशि काल फिरे।

अकाल मृत्यु जग माहीं ब्यापै, परजा बहुत मरे।

दुष्ट दुष्ट को ऐसा काटे, जैसे कीट जरे।

माघ मास संवत्सर व्यापे, सावन ग्रहण परे।

उड़ि विमान अंबर में जावे, गृह गृह युद्ध करे

मारुत विष में फैंके जग, माहि परजा बहुत मरे।

द्वादश कोस शिखा को जाकी, कंठ सू तेज धरे।

 

सौ पे शुन्न शुन्न भीतर, आगे योग परे।

सहस्र वर्ष लों सतयुग बीते, धर्म की बेल चढ़े।

स्वर्ण फूल पृ‍थ्वी पर फूले पुनि जग दशा फिरे।

सूरदास होनी सो होई, काहे को सोच करे।


 *सभी सुखी हों सब सक्षम हों सबकी मंगल कामना।* 

 *आओ मिलकर सभी करें हम सुन्दर सक्षम साधना।।*

सन्दर्भ ग्रन्थ 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास:- रामचंद्र शुक्ल हिंदी 

हिंदी साहित्य का इतिहास :- डॉ नगेन्र्द

3 सूरदास :- रामचंद्र शुक्ल हिंदी 

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