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शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

तिरंगे की प्रथम निर्माता भीकाजी कामा

 24 सितम्बर/जन्म-दिवस                   


तिरंगे की प्रथम निर्माता भीकाजी कामा


आज स्वतन्त्र भारत के झण्डे के रूप में जिस तिरंगे को हम प्राणों से भी अधिक सम्मान देते हैं, उसका पहला रूप बनाने और उसे जर्मनी में फहराने का श्रेय जिस स्वतन्त्रता सेनानी को है, उन मादाम भीकाजी रुस्तम कामा का जन्म मुम्बई के एक पारसी परिवार में 24 सितम्बर, 1861 को हुआ था। उनके पिता सोराबजी फ्रामजी मुम्बई के सम्पन्न व्यापारी थे। भीकाजी में बचपन से ही देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी।


1885 में भीकाजी का विवाह रुस्तमजी कामा के साथ हुआ; पर यह विवाह सुखद नहीं रहा। रुस्तमजी अंग्रेज शासन को भारत के विकास के लिए वरदान मानते थे, जबकि भीकाजी उसे हटाने के लिए प्रयासरत थीं। 1896 में मुम्बई में भारी हैजा फैला। भीकाजी अपने साथियों के साथ हैजाग्रस्त बस्तियों में जाकर सेवाकार्य में जुट गयीं। उनके पति को यह पसन्द नहीं आया। उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में बिल्कुल नहीं थी। मतभेद बढ़ने पर मादाम कामा ने उनका घर सदा के लिए छोड़ दिया।


अत्यधिक परिश्रम के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। अतः वे इलाज कराने के लिए 1901 में ब्रिटेन चली गयीं। वहाँ प्रारम्भ में उन्होंने दादा भाई नौरोजी के साथ काम किया; पर उनकी अनुनय-विनय की शैली उन्हें पसन्द नहीं आयी। अतः भीकाजी उग्रपन्थी श्यामजी कृष्ण वर्मा और सरदार सिंह राव के साथ भारत की स्वतन्त्रता के प्रयासों में जुट गयीं। लन्दन का ‘इण्डिया हाउस’ तथा ‘इण्डिया होम रूल सोसायटी’ उनकी गतिविधियों का केन्द्र थे। वीर सावरकर, मदनलाल धींगरा आदि क्रान्तिकारी भी इन संस्थाओं से जुड़े थे। 1907 में वे पेरिस आ गयीं।


1907 में जर्मनी के स्टुटगर्ट नगर में एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा था। वहाँ जाकर उन्होंने भारत की स्वतन्त्रता का विषय उठाया। वहाँ सब देशों के झण्डे फहरा रहे थे। लोगों ने मादाम कामा से भारत के झण्डे के विषय में पूछा। वहाँ अधिकांश देशों के झण्डे तीन रंग के थे, अतः उन्होंने अपनी कल्पना से एक तिरंगा झण्डा बनाकर 18 अगस्त, 1907 को वहाँ फहरा दिया।


इसमें सबसे ऊपर हरे रंग की पट्टी में आठ कमल बने थे। ये तत्कालीन भारत के आठ राज्यों के प्रतीक थे। बीच की पीली पट्टी में देवनागरी लिपि में वन्दे मातरम् लिखा था। सबसे नीचे लाल रंग की पट्टी पर बायीं ओर सूर्य तथा दायीं ओर अर्द्धचन्द्र बना था। इस सम्मेलन के बाद वे अमरीका चली गयीं। वहाँ भी वे भारत की स्वतन्त्रता के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए सभाएँ तथा सम्मेलन करती रहीं।


1909 में वे फ्रान्स आ गयीं तथा वहाँ से 'वन्दे मातरम्' नामक समाचार पत्र निकाला। प्रथम विश्व युद्ध के प्रारम्भ होने तक यह पत्र निकलता रहा। इन सब कार्यों से वे ब्रिटिश शासन की निगाहों में आ गयीं। ब्रिटिश खुफिया विभाग उनके पत्रों तथा गतिविधियों पर नजर रखने लगा; पर वे बिना भयभीत हुए विदेशी धरती से चलाये जा रहे स्वतन्त्रता के अभियान में लगी रहीं।


उनकी इच्छा भारत आने की थी; पर उनकी गतिविधियों से भयभीत ब्रिटिश शासन ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। उनकी इच्छा थी कि वे अन्तिम साँस अपनी जन्मभूमि पर ही लें। 1935 में बड़ी कठिनाई से वे भारत आ सकीं। एक वर्ष बाद 30 अगस्त, 1936 को मुम्बई में उनका देहान्त हो गया।

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गुरुवार, 23 सितंबर 2021

23 सितम्बर, नवदधीचि अनंत रामचंद्र गोखले

 23 सितम्बर/जन्म-दिवस


नवदधीचि अनंत रामचंद्र गोखले


अनुशासन के प्रति अत्यन्त कठोर श्री अनंत रामचंद्र गोखले का जन्म 23 सितम्बर, 1918 (अनंत चतुर्दशी) को म.प्र. के खंडवा नगर में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनका हवेली जैसा निवास ‘गोखले बाड़ा’ कहलाता था। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के पिता श्री सदाशिव गोलवलकर जब खंडवा में अध्यापक थे, तब वे इस घर में ही रहते थे। 


नागपुर से इंटर करते समय गोखले जी धंतोली सायं शाखा में जाने लगे। एक सितम्बर, 1938 को वहीं उन्होंने प्रतिज्ञा ली। इंटर की प्रयोगात्मक परीक्षा वाले दिन उन्हें सूचना मिली कि डा. हेडगेवार ने सब स्वयंसेवकों को तुरंत रेशीम बाग बुलाया है। उन दिनों शाखा पर ऐसे आकस्मिक बुलावे (urgent call) के कार्यक्रम भी होते थे। जब गोखले जी वहां पहुंचे, तो डा. जी ने कहा कि तुम्हारी परीक्षा है, इसलिए तुम वापस जाओ। युवा गोखले जी इससे बहुत प्रभावित हुए कि डा. जी जैसे बड़े व्यक्ति को भी उनकी परीक्षा का ध्यान था।


डा. जी के निधन के बाद दिसम्बर, 1940 में नागपुर में अम्बाझरी तालाब के पास तरुण-शिविर लगा था। उसमें श्री गुरुजी ने युवाओं से प्रचारक बनने का आह्नान किया। गोखले जी कानून की प्रथम वर्ष की परीक्षा दे चुके थे; पर पढ़ाई छोड़कर वे प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम उन्हें उ.प्र. के कानपुर नगर में भेजा गया। वहां के बाद उन्होंने उरई, उन्नाव, कन्नौज, फरुखाबाद, बांदा आदि में भी शाखाएं खोलीं। प्रवास और भोजन आदि के व्यय का कुछ भार कानपुर के संघचालक जी वहन करते थे, शेष गोखले जी अपने घर से मंगाते थे।


1948-49 में संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था; पर तब तक ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ का गठन हो चुका था। गोखले जी ने 150 स्वयंसेवकों को परिषद की ओर से ‘साक्षरता प्रसार’ के लिए गांवों में भेजा। ये युवक बालकों को खेल खिलाते थे तथा बुजुर्गो में भजन मंडली चलाते थे। प्रतिबंध हटने पर ये खेलकूद और भजन मंडली ही शाखा में बदल गयीं। इस प्रकार उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से प्रतिबंध काल में भी सैकड़ों शाखाओं की वृद्धि कर दी। 


गोखले जी 1942 से 51 तक कानुपर, 1954 तक लखनऊ, 1955 से 58 तक कटक (उड़ीसा) और फिर 1973 तक दिल्ली में रहे। आपातकाल के दौरान उनका केन्द्र नागपुर रहा। तब उन पर मध्यभारत, महाकौशल और विदर्भ का काम था। आपातकाल के बाद उन पर कुछ समय मध्य भारत प्रांत का काम रहा। इस समय उनका केन्द्र इंदौर था। 1978 में वे फिर उ.प्र. में आ गये और पूर्वी उ.प्र. में जयगोपाल जी के साथ सहप्रांत प्रचारक बनाये गये।


गोखले जी को पढ़ने और पढ़ाने का शौक था। जब प्रवास में कष्ट होने लगा, तो उन्हें लखनऊ में ‘लोकहित प्रकाशन’ का काम दिया गया। उन्होंने इस दौरान 150 नयी पुस्तकें प्रकाशित कीं। तथ्यों की प्रामाणिकता और प्रूफ आदि पर वे बहुत ध्यान देते थे। वर्ष 2002 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली और लखनऊ के ‘भारती भवन’ कार्यालय पर ही रहने लगे। घंटे भर की शाखा के प्रति उनकी श्रद्धा अंत तक बनी रही। चाय, भोजन आदि के लिए समय से पहुंचना उनके स्वभाव में था। अपने कमरे की सफाई और कपड़े धोने से लेकर पौधों की देखभाल तक वे बड़ी रुचि से करते थे। 


1991 में पुश्तैनी सम्पत्ति के बंटवारे से उन्हें जो भूमि मिली, वह उन्होंने संघ को दे दी। कुछ साल बाद प्रशासन ने पुल बनाने के लिए 19 लाख रु. में उसका 40 प्रतिशत भाग ले लिया। उस धन से वहां संघ कार्यालय भी बन गया, जिसका नाम ‘शिवनेरी’ रखा गया है। इसके बाद वहां एक इंटर कॉलिज की स्थापना की गयी, जिसमें दो पालियों में 2,500 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं।



नारियल की तरह ऊपर से कठोर, पर भीतर से मृदुल, सैकड़ों प्रचारक और हजारों कार्यकर्ताओं के निर्माता गोखले जी का 25 मई, 2014 को लखनऊ में ही निधन हुआ।

बहुआयामी व्यक्तित्व : आचार्य तुलसी

 23 सितम्बर/पुण्य-तिथि


बहुआयामी व्यक्तित्व  : आचार्य तुलसी


भारत की पुण्य धरा पर अनेक ऋषियों, सन्तों तथा मनीषियों ने जन्म लेकर अपना तथा समाज का जीवन सार्थक किया है। ऐसे ही एक मनीषी थे आचार्य श्री तुलसी, जिनका जन्म 20 सितम्बर,  1914 को हुआ था। वे महावीर स्वामी द्वारा प्रवर्तित जैन पन्थ की तेरापन्थ शाखा में मात्र 11 वर्ष की अवस्था में दीक्षित हुए और 22 वर्ष में इस धर्मसंघ के नौवें अधिशास्ता बन गये।


आचार्य तुलसी यों तो एक पन्थ के प्रमुख थे; पर उनका व्यक्तित्व सीमातीत था। अपनी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी उनके मन में सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेम था। इसलिए सभी धर्म, मत और पन्थ, सम्प्रदायों के लोग उनका सम्मान करते थे। उनका जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसे पढ़ने के लिए किसी तरह के अक्षरज्ञान की भी आवश्यकता नहीं थी। इतना ही नहीं, उसे जितनी बार पढ़ो, हर बार नये अर्थ उद्घाटित होते थे। श्रद्धालु घण्टों उनके पास बैठकर उनके प्रवचन का आनन्द लेते थे।


आचार्य तुलसी अपने प्रवचन में गूढ़ तथ्यों को इतनी सरलता से समझाते थे कि सामान्य व्यक्ति को भी वे आसानी से समझ में आ जाते थे। यद्यपि उनकी भाषा व भाष्य अत्यन्त शुद्ध होते थे; फिर भी उनके चुम्बकीय आकर्षण से बँधकर लोग बैठे रहते थे। प्रवचन के समय उनकी वाणी ही नहीं, आँखें भी बोलती थीं। आचार्य जी कभी अनावश्यक बात नहीं करते थे; पर उनकी आँखों के संकेत मात्र से ही तेरापन्थ धर्मसंघ का अनुशासन चलता था। यह उनकी प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है।


प्रखर बुद्धि एवं वक्तृत्व कौशल के धनी आचार्य जी आचरण व व्यवहार को भी अध्यात्म जितनी ही प्राथमिकता देते थे। इसलिए उनके प्रवचन एवं वार्तालाप में दैनन्दिन जीवन की समस्याओं एवं उनके समाधान की चर्चा भी होती थी। अपने पन्थ में काम करते हुए भी उनके मन में अनेक नये विषयों पर मन्थन होता रहता था। इसी को व्यवहार रूप देने के लिए दो मार्च, 1949 को राजस्थान के सरदार शहर कस्बे में विशाल जनसमूह के सम्मुख उन्होंने ‘अणुव्रत’ नामक एक नये आन्दोलन की नींव रखी।


अणुव्रत लोगों में नैतिकता जगाने का आन्दोलन था। अणु का अर्थ है छोटा और व्रत अर्थात संकल्प। आचार्य जी का मत था कि हम यदि जीवन में छोटा सा व्रत लेकर उसका निष्ठा से पालन करें, तो न केवल अपना अपितु परिवार एवं आसपास वालों का जीवन भी बदल जाता है। यह विषय इतना आसान था कि इससे जुड़ने वालों की संख्या क्रमशः बढ़ने लगी। लाखों लोगों ने अणुव्रत आन्दोलन से प्रेरित होकर हिंसा, मद्यपान, माँसाहार, झूठ, छल, कपट, फरेब आदि अवगुणों को त्याग दिया।


आचार्य जी जन-जन के कल्याण के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। अणुव्रत को और अधिक सहज बनाने के लिए उन्होंने इसके साथ प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान को प्रचलित किया। प्रेक्षाध्यान के माध्यम से व्यक्ति अन्तर्मुखी होकर स्वयं की अच्छाई एवं कमियों को जानने का प्रयास करता है। इसी प्रकार जीवन विज्ञान के द्वारा वे जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों के पीछे छिपे विज्ञान को सबके सम्मुख लाये।


अणुव्रत के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने व्यापक भ्रमण किया। जैन मत को वे व्यापक हिन्दू धर्म का एक अभिन्न अंग मानते थे। वे विश्व हिन्दू परिषद् के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। जन-जन में जागृति का प्रचार-प्रसार करते हुए 23 सितम्बर, 1999 को उन्होंने सदा के लिए आँखें मूँद लीं।

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बुधवार, 22 सितंबर 2021

एकादशी के दिन श्राद्ध क्यूँ नहीं होता

 🙏 *स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जा सकता क्यूँ * ✍️


*एकादशी के दिन श्राद्ध क्यूँ नही होता*❓


शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने पार्वती जी को स्पष्ट रूप से कहा है, जो एकादशी के दिन श्राद्ध करते हैं तो श्राद्ध को खाने वाला और श्राद्ध को खिलाने वाला और जिस के निमित्त वह श्राद्ध हो रहा है वह पितर, तीनों नर्क गामी होते हैं । उसके लिए ठीक तो यही होगा कि वह उस दिन के निमित्त द्वादशी को श्राद्ध करें।

तो हमारे महापुरुषों का कहना है कि अगर द्वादशी को श्राद्ध नहीं करें और एकादशी को करना चाहें तो पितरों का पूजन कर निर्धन ब्राह्मण को केवल फलाहार करावें । भले ही वह ब्राह्मण एकादशी करता हो या ना करता हो। लेकिन हमें उस दिन उसे फलाहार ही करवाना चाहिए ।


*श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता।* आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया; यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है ।क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी आ जाए उनकी पत्नी आ जाए साथ में बच्चे आ जाएं कोई हर्ज नहीं पर अकेली ब्राह्मणी को भोजन कराना शास्त्र विरुद्ध है।


 *पितरों को पहले थाली नहीं देवें,* 

पित्तृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। वैष्णवों में पहले भोजन बना कर पृथम ठाकुर जी को भोग लगाना चाहिए, और फिर वह प्रसाद पितरों को देना चाहिए, कारण क्या है वैष्णव कभी भी अमनिया वस्तु किसी को नहीं देगा। भगवान का प्रसाद ही अर्पण करेगा और भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि होगी। इसलिए पितरों को प्रसाद अर्पण करना चाहिए । पित्तृ लोक का एक दिन मृत्यु लोक के 1 वर्ष के बराबर होता है । यहां 1 वर्ष बीतता है पितृ लोक में 1 दिन बीतता  है । केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम, श्री महा मंत्र का जप और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है । जब तक यह पंच भौतिक देह है तब तक इस संबंध में जो शास्त्र आज्ञा और उपक्रम है उनका भी निर्वाह करना पड़ेगा | 🚩

सोमवार, 20 सितंबर 2021

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए

                       गजल 

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए                  

           गोपालदास "नीरज"


अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।


जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।


आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।


प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए

हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।


मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।


जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे

मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।


गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी

ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

रविवार, 19 सितंबर 2021

रामायण, “रामायण” क्या है??

 *पढियेगा अवश्य*

“रामायण” क्या है?? 


अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना.......


रामायण का एक छोटा सा वृतांत है,

चलिए उसपर दृष्टिपात किया जाये 


एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। 

नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?


मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।

माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |


श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं


माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? 

क्या नींद नहीं आ रही ?


शत्रुघ्न कहाँ है ?


श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, 

गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।


उफ ! 

कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।


तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए । 

आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, 

माँ चली ।


आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?


अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !! 


माँ सिराहने बैठ गईं, 

बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं, 


माँ !


उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? 

मुझे बुलवा लिया होता ।


माँ ने कहा, 

शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"


शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, 

भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?


माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।


देखो क्या है ये रामकथा...


यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!


यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा...  चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।


"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।


भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!


परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! 

माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. 


परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, 

परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??


क्या बोलूँगा उनसे.?


यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- 


"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"


लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!!


परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!


वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!


लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!


वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!


मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!


तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।


यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!


माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!


मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!


माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?


क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?


हनुमान जी पूछते हैं- देवी! 


आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। 


उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!


उर्मिला बोलीं- "

मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!


रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!


आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!


जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!


यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..


मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..


उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!


और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!


मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!


इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"


राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं... 


कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!


 भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!


जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है... 

कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!


"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,

स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो.. 

नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो, 

चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..

हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो, 

लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो.. 

श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो, 

हनुमत के जैसी, निष्ठा और शक्ति हो... "

ये रामायण है, पुण्य कथा श्री राम की।


कृपया आगे सभी को भेजें।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

हार्ट अटैक, इलाज

          ‼️ *हार्ट अटैक*‼️


*हमारे  देश  भारत  में  3000 साल  पहले  एक  बहुत  बड़े ऋषि  हुये  थे.*

*उनका  नाम  था* *महाऋषि वागवट  जी !!*


*उन्होंने   एक   पुस्तक   लिखी थी*

*जिसका  नाम  है* *अष्टांग* *हृदयम!!*

*(Astang   hrudayam)*


*और  इस  पुस्तक  में  उन्होंने* *बीमारियों  को  ठीक  करने  के* *लिए* *7000* *सूत्र  लिखें   थे !*

*यह  उनमें  से  ही  एक  सूत्र है !!*


*वागवट  जी  लिखते  हैं  कि कभी  भी  हृदय  को  घात  हो रहा  है !* *मतलब  दिल  की  नलियों  मे blockage  होना  शुरू  हो  रहा   है !*


*तो  इसका  मतलब  है  कि रक्त  (blood)  में , acidity (अम्लता )  बढ़ी  हुई  है !*

*अम्लता  आप  समझते  हैं !*

*जिसको  अँग्रेजी  में  कहते  हैं acidity !!*

*अम्लता  दो  तरह  की  होती है !*


👉*एक  होती  है   पेट  की अम्लता !*


👉*और  एक  होती  है  रक्त (blood)  की  अम्लता !!*


*आपके  पेट  में  अम्लता  जब बढ़ती  है !* *तो  आप  कहेंगे* 

✔️*पेट  में जलन सी  हो  रही  है !!*

✔️*खट्टी  खट्टी  डकार  आ रही  हैं !*

✔️*मुंह  से  पानी  निकल  रहा  है !*

*और  अगर  ये  अम्लता (acidity) और  बढ़  जाये !*

*तो  hyperacidity  होगी !*

*और  यही  पेट  की  अम्लता बढ़ते-बढ़ते  जब  रक्त  में  आती  है  तो  रक्त  अम्लता (blood  acidity)  होती है !!*

*और  जब  blood  में  acidity बढ़ती  है  तो  ये  अम्लीय  रक्त (blood)  दिल  की  नलियों  में से  निकल  नहीं  पाती !* *और  नलियों  में  blockage कर  देता  है !*

*तभी  heart  attack  होता है !!  इसके  बिना heart attack  नहीं  होता !!*

*और  ये  आयुर्वेद  का  सबसे बढ़ा  सच  है  जिसको  कोई डाक्टर  आपको  बताता  नहीं !*

*क्योंकि  इसका  इलाज  सबसे सरल  है !!*


*इलाज  क्या  है ??*


*वागवट  जी  लिखते  हैं  कि जब  रक्त  (blood)  में  अम्लता  (acidity)  बढ़  गई है !* *तो  आप  ऐसी  चीजों  का उपयोग  करो  जो  क्षारीय  हैं !*

*आप  जानते  हैं  दो  तरह  की चीजें  होती  हैं !*


*अम्लीय  और  क्षारीय !!*

*acidic  and  alkaline*


*अब  अम्ल  और  क्षार  को मिला  दो  तो  क्या  होता है ! ?????*


*acid  and  alkaline  को मिला  दो  तो  क्या  होता है   ?????*


‼️*neutral*‼️

*होता  है  सब  जानते  हैं !!*


*तो  वागवट  जी  लिखते  हैं !* *कि  रक्त  की  अम्लता  बढ़ी हुई  है  तो  क्षारीय (alkaline) चीजें  खाओ !*

*तो  रक्त  की  अम्लता (acidity)  neutral  हो जाएगी  !!!*


*और  रक्त  में  अम्लता neutral  हो  गई !*

*तो  heart  attack  की जिंदगी  मे  कभी  संभावना  ही नहीं !!*


*ये  है  सारी  कहानी !!*


*अब  आप  पूछेंगे कि  ऐसी कौन  सी  चीजें  हैं  जो  क्षारीय हैं  और  हम  खायें  ?????*


*आपके  रसोई  घर  में  ऐसी बहुत  सी  चीजें  है  जो  क्षारीय हैं !* *जिन्हें  आप  खायें  तो  कभी heart attack  न  आए !*


*और  अगर  आ  गया  है !*

*तो  दुबारा  न  आए !!*


*यह हम सब जानते हैं कि सबसे  ज्यादा  क्षारीय चीज क्या हैं और सब घर मे आसानी से उपलब्ध रहती हैं, तो वह  है लौकी !!*

*जिसे  दुधी  भी  कहते  हैं !!*

*English  में  इसे  कहते  हैं bottle  gourd  !!!*

*जिसे  आप  सब्जी  के  रूप  में खाते  हैं !* *इससे  ज्यादा  कोई  क्षारीय चीज  ही  नहीं  है !*


*तो  आप  रोज  लौकी  का  रस निकाल-निकाल  कर  पियो !!* *या  कच्ची  लौकी  खायो !!*


*वागवट  जी  कहते  हैं  रक्त की  अम्लता  कम  करने  की सबसे  ज्यादा  ताकत  लौकी  में ही  है ! * *तो  आप  लौकी  के  रस  का सेवन  करें !!*


🔴 *कितना   सेवन करें   ?????????*🔴


*रोज  200  से  300  मिलीग्राम   पियो !!*


*कब   पिये ??*


*सुबह  खाली  पेट (toilet जाने के बाद ) पी  सकते  हैं !!* *या  नाश्ते  के  आधे  घंटे  के बाद  पी  सकते  हैं !!*

*इस  लौकी  के  रस  को  आप और  ज्यादा  क्षारीय  बना सकते  हैं !*

*इसमें 7 से 10 पत्ते तुलसी के डाल लो* *तुलसी  बहुत  क्षारीय  है !!* *इसके  साथ  आप  पुदीने  के  7  से 10  पत्ते  मिला  सकते  हैं !* *पुदीना  भी बहुत  क्षारीय  है !* *इसके  साथ  आप  काला नमक  या  सेंधा  नमक  जरूर डाले !*

*ये भी बहुत क्षारीय है !!*


*लेकिन  याद  रखें*

*नमक काला या सेंधा ही डाले !* *वो  दूसरा  आयोडीन  युक्त नमक  कभी  न  डाले !!* *ये  आओडीन  युक्त  नमक अम्लीय  है !!!!*


*तो  मित्रों  आप  इस  लौकी  के जूस  का  सेवन  जरूर  करें !!*


*2  से  3  महीने  की  अवधि में आपकी  सारी  heart  की blockage  को  ठीक  कर देगा !!*


*21  वें  दिन  ही  आपको  बहुत ज्यादा  असर  दिखना  शुरू  हो जाएगा  !!!*


*कोई  आपरेशन  की  आपको जरूरत  नहीं  पड़ेगी !!*


*घर  में  ही  हमारे  भारत  के आयुर्वेद  से  इसका  इलाज  हो जाएगा !!*


*और  आपका  अनमोल  शरीर और  लाखों  रुपए  आपरेशन के  बच  जाएँगे !!*

*आपने  पूरी  पोस्ट  पढ़ी , आपका   बहुत   बहुत धन्यवाद !!*

*यदि  आपको  ठीक  लगता  है  तो आप  ये  जानकारी  अन्य सभी  जनों  तक  पहुचाएँ |