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रविवार, 2 मई 2021

" द होप एक्सपेरिमेंट" कर्ट रिचट्टर

" द होप एक्सपेरिमेंट"  कर्ट रिचट्टर    


 1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबोगरीब शोध किया था। कर्ड ने एक जार को पानी से भर दिया और उसमें एक चूहे को फेंक दिया। 

पानी से भरे जार में गिरते ही चूहा हड़बड़ाने लगा। 

जार से बाहर निकलने के लिये ज़ोर लगाने लगा। 

 चंद मिनट फड़फड़ाने के पश्चात चूहे ने हथियार डाल दिये और वह उस जार में डूब गया। 

कर्ट ने उस समय अपने शोध में थोड़ा सा बदलाव किया। उन्होंने एक चूहे को पानी से भरे जार में डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा। जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था......उसी समय कर्ड ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। कर्ड ने चूहे को ठीक उसी क्षण जार से बाहर निकाल लिया जब वह डूबने की कगार पर था। 

चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया ......कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एक दम से उसे पुनः जार में फेंक दिया। 

पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की जद्दोजेहद शुरू कर दी। 

लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी हैरान रह गये। 

कर्ट सोच रहे थे के चूहा बमुश्किल 15 - 20 मिनट संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा। 


लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 


चूहा जार में तैरता रहा। 

जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा। 


60 घँटे .......जी हाँ .....60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा। 

कर्ट यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये। जो चूहा 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था ........वही चूहा 60 घँटे से परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था। 


कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था......." The HOPE experiment".....! 


Hope........यानि आशा। 


कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा के जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया .....वह डूबने की कगार पर पहुंच गया .....उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया। 


उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ के एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है। 


जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा.......वजह था वह हाथ......वजह थी वह आशा ......वजह थी वह उम्मीद। 


इस परीक्षा की घड़ी में उम्मीद बनाये रखिये। 

सँघर्षरत रहिये। 

सांसे टूटने मत दीजिये।

मन को हारने मत दीजिये। 

जिसने हाथ ने हमें इस पानी के जार में फेंका है वही हाथ हमें इस पानी के जार से सकुशल वापिस निकाल लेगा। 


उस हाथ पर विश्वास रखिये।

तीर्थों का महत्त्व क्यों?

 तीर्थों का महत्त्व क्यों?

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शास्त्रकार ने कहा है- तारयितुं समर्थः इति तीर्थ । अर्थात् जो तार देने, पार कर देने में समर्थ होता है, वह तीर्थ कहलाता है। तरना सद्विचारों, सत्कर्मों एवं संतों के सत्संग से ही हो सकता है। जिन स्थानों में देवी-देवताओं की शक्तियों का प्रभाव, प्राकृतिक सौंदर्य, विशेष तेजोमय जल, संतों, महात्माओं का सत्संग आदि प्राप्त होते हैं, उन्हें ही तीर्थस्थान कहा जाता है। तीर्थयात्रा के पुण्यफल का उल्लेख धर्मशास्त्रों में अनेक बार हुआ है। शिवपुराण, पद्मपुराण व स्कंदपुराण का बहुत बड़ा भाग तीर्थ माहात्म्य से ही भरा पड़ा है। महाभारत, वेदों, पुराणों, उपपुराणों में तीर्थ करने से पापों से निवृत्ति, पुण्य संचय, मुक्ति और स्वर्ग की प्राप्ति, देवताओं की अनुकंपा, आत्मशांति, मनोकामनाओं की पूर्ति जैसे लाभ गिनाए गए हैं, जिन्हें पढ़कर धर्म प्रेमी सहज ही श्रद्धापूर्वक तीर्थयात्राएं करते हैं। महाभारत/बनपर्व में कहा गया है कि जो पुण्य अग्निष्टोम जैसे विशाल यज्ञों से उपलब्ध नहीं हो सकता, वह तीर्थ यात्रा से, तीर्थ सेवन से सहज सुलभ हो जाता है। अश्रद्धा युक्त मात्र पर्यटन और मनोरंजन के लिए इधर-उधर परिभ्रमण करने वाले संशयात्मा व्यक्ति इस पुण्य-फल को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। तीर्थ यात्रा का उद्देश्य है-अंतःकरण की शुद्धि और आत्म

कल्याण। अतः आत्म कल्याण के इच्छुक को तीर्थयात्रा का पुण्य लाभ लेना चाहिए।


पुलस्त्य ऋषि ने कहा है -


पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गंगायां मगधेषु च।

स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्त सप्तावरांस्तथा ॥ 


-महाभारत बनपर्व 85/92


अर्थात् पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा और मगध देशीय तीर्थों में स्नान करने वाला मनुष्य अपनी सात पीछे की और सात आगे की पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। देवीभागवत में कहा गया है कि जिस प्रकार कृषि का फल अन्न उत्पादन है, उसी प्रकार निष्पाप बनना ही तीर्थयात्रा का प्रतिफल है।


अथर्ववेद 18/4/7 में कहा गया है कि तीर्थयात्रा करने वाले तीर्थयात्री तीर्थादि द्वारा बड़े-बड़े पापों और आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करते हैं।


शास्त्रकारों ने कहा है कि तीर्थ में जिसकी जैसी और जितनी श्रद्धा होती है, उसे वैसा ही फल मिलता हैं। 'जो यथोक्त विधि से तीर्थ यात्रा करते हैं, संपूर्ण द्वदों को सहन करने वाले हैं, वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं, ऐसा नारदपुराण में लिखा है


कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्वमाविशेत् । 

न तेन किंचिदप्राप्तं तीर्वाभिगमनाद् भवेत् ॥


नारदपुराण


अर्थात् जो काम, क्रोध और लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थयात्रा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है।


स्कंदपुराण में तीर्थ फल के संबंध में लिखा है।


यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् । निर्विकाराः क्रियाः सर्वा स तीर्थफलमश्नुते ॥


अर्थात् जिसके हाथ, पैर और मन भली-भांति संयम में हों तथा जिसकी सभी क्रियाएं निर्विकार भाव से संपन्न होती हों, वही तीर्थ का पूरा फल प्राप्त करता है। स्कंदपुराण में तीर्थ के संबंध में कहा गया है कि सत्य तीर्थ है। क्षमा करना तीर्थ के समान फलदायक है। इंद्रियों पर नियंत्रण करना तीर्थ के समान उपकारी है। सब प्राणियों पर दया करना तीर्थ के समान पुण्य देने वाला है और सरल जीवन भी तीर्थ ही समझना चाहिए। तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ है अंतःकरण की अत्यंत विशुद्धि ।


यस्य हस्तौ च पादौ च वाड्मनस्तु सुसंयते। 

विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्रुते ॥ अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकोऽच्छिसंशयः। 

हेतुनिष्टाश्च पंचेते न तीर्वफलभागिनः ॥


-भविष्यपुराण / उत्तराखंड 122 7-8


अर्थात् जिसके हाथ, पैर, मन और वाणी सुसंयत हैं तथा जिसकी विद्या, कीर्ति और तपस्या पूरी है, उसे ही तीर्थ का फल मिलता है। श्रद्धारहित, पापी, संशयग्रस्त, नास्तिक और तार्किक-इन पांच प्रकार के लोगों को तीर्थ का फल नहीं मिलता ।


पद्मपुराण में कहा गया है कि तीर्थों में ब्रह्मपरायण, साधु-सज्जन मिलते हैं। उनका दर्शन मनुष्यों की पाप राशि को जला डालने के लिए अग्नि के समान है ।


तीर्थ के संबंध में शास्त्रकारों का यह भी कहना है कि काम, क्रोध, लोम, मोह, मद ये सब मन के मैल हैं। मन का निर्मल रहना परम तीर्थ है। महाभारत समाप्त होने के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर ने तीर्थयात्रा करने का निश्चय किया साथ में चारों भाई अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी भी थी। प्रस्थान करने के पूर्व वे भगवान् श्रीकृष्ण के पास गए, तो उन्होंने अपना कमंडलु देते हुए कहा-जहां-जहां तीर्थ स्थानों, नदियों और सरोवरों में आपको स्नान करने का अवसर मिले, वहां-वहां इसे भी डुबो देना। काफी दिनों बाद जब वे लौटे, तो उन्होंने कमंडलु लौटाते हुए श्रीकृष्ण को बताया कि उसे सभी स्नान के स्थानों पर डुबोया गया है। इस पर कृष्ण ने उसे जमीन पर पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और प्रसाद के रूप में उपस्थित लोगों में वितरित कर दिया। जिसने भी प्रसाद चखा, मुंह कड़वा हो गया। लोगों को यूकते और मुंह बनाते देख श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से पूछा-'यह इतने तीर्थों में घूमकर आ रहा है और स्नान भी कर आया है फिर भी इसका कड़वापन दूर क्यों नहीं हुआ ?'


धर्मराज ने कहा-'आप भी कैसी बात करते हैं, कहीं धोने मात्र से कमंडलु का कड़वापन निकल सकता है ? भगवान् कृष्ण ने समाधान करते हुए कहा-'यदि ऐसा है तो तीर्थ स्नान का बाह्योपचार करने मात्र से अंतः का परिष्कार, धुलाई, मार्जन कैसे हो सकता है ?' धर्मराज ने अपनी गलती सुधारी और आत्मशोधन की गरिमा को जाना।

भारतीय संस्कृति में में तीर्थो का महत्व अतुलनीय हैं और इसे सर्वोपरि माना गया है !

                                        

जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा

 जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा

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सनातन धर्म के अनुसार घरों में धूनी (धूप) देने की परंपरा काफी प्राचीन है। धूप देने से मन को शांति और प्रसन्नता मिलती है। साथ ही, मानसिक तनाव दूर करने में भी इससे बहुत लाभ मिलता है। घरों में धूनी देने के लिए कई तरह की चीज़ें आती है। आइए जानते है किस चीज़ की धूनी करने से क्या फायदे होते है।


1- कर्पूर और लौंग

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रोज़ाना सुबह और शाम घर में कर्पूर और लौंग जरूर जलाएं। आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेनी चाहिए। इससे घर के वास्तुदोष ख़त्म होते हैं। साथ ही पैसों की कमी नहीं होती।


2- गुग्गल की धूनी

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हफ्ते में 1 बार किसी भी दिन घर में कंडे जलाकर गुग्गल की धूनी देने से गृहकलह शांत होता है। गुग्गल सुगंधित होने के साथ ही दिमाग के रोगों के लिए भी लाभदायक है।


3- पीली सरसों

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पीली सरसों, गुग्गल, लोबान, गौघृत को मिलाकर सूर्यास्त के समय उपले (कंडे) जलाकर उस पर ये सारी सामग्री डाल दें। नकारात्मकता दूर हो जाएगी।


4- धूपबत्ती

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घर में पैसा नहीं टिकता हो तो रोज़ाना महाकाली के आगे एक धूपबत्ती लगाएं। हर शुक्रवार को काली के मंदिर में जाकर पूजा करें।


5- नीम के पत्ते

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घर में सप्ताह में एक या दो बार नीम के पत्ते की धूनी जलाएं। इससे जहां एक और सभी तरह के जीवाणु नष्ट हो जाएंगे। वही वास्तुदोष भी समाप्त हो जाएगा।


6- षोडशांग धूप

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अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागर, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गल, ये सोलह तरह के धूप माने गए हैं। इनकी धूनी से आकस्मिक दुर्घटना नहीं होती है।


7- लोबान धूनी

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लोबान को सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है, लेकिन लोबान को जलाने के नियम होते हैं इसको जलाने से पारलौकिक शक्तियां आकर्षित होती है। इसलिए बिना विशेषज्ञ से पूछे इसे न जलाएं।


8- दशांग धूप

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चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं। इससे घर में शांति रहती है।


9- गायत्री केसर

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घर पर यदि किसी ने कुछ तंत्र कर रखा है तो जावित्री, गायत्री केसर लाकर उसे कूटकर मिला लें। इसके बाद उसमें उचित मात्रा में गुग्गल मिला लें। अब इस मिश्रण की धुप रोज़ाना शाम को दें। ऐसा 21 दिन तक करें।

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कामुकता और प्रेम मे सम्बंध

 कामुकता और प्रेम मे सम्बंध


कामुकता विदा हो सकती है लेकिन स्त्री आकर्षण विदा नही होता है| आकर्षण जीवन के अंत तक रहता है | वासना नही जाती सिर्फ वासना परिवर्तन होती है जिसे प्रेम कहते है |वासना का ही दूसरा रूप प्रेम है| वासना और प्रेम अलग अलग नही है| वासना की शुद्तं अवस्था प्रेम है ! 


कोई भी पुरुष सीधा स्त्री की ओर आकर्षित होगा प्रथम उसका काम केंद्र जागेगा उर्जा काम के रूप में प्रकट होती है | लेकिन कामुकता जागते ही हम ध्यानी या द्रष्टा बन जाय तब जागी हुई काम उर्जा , ध्यान से प्रेम में परिवर्तन होती है .लेकिन तुम चाहते हो की काम बिलकुल पैदा ही न हो तब प्रेम का अस्तित्व भी सम्भव नही है | स्त्री में सीधा प्रेम उठता है क्योकि उसका मूल उर्जा केंद्र हदय स्थित है लेकिन पुरुष में सीधा प्रेम नही उठता है पुरुष की स्थति एक कुए जैसी है कुए रूपी मूलाधार में दुबकी लगाकर वापस ह्दय में उर्जा को लाना पड़ता है, तब काम उर्जा प्रेम बन जाती है| फिर वहा से वह उर्जा बहती है तब वह अन्यो के ह्दय भी जगाती है .काम से सिर्फ स्त्री का गर्भ केंद्र जगाया जा सकता है |जिससे संसार जन्मता है |उर्जा एक ही है उससे स्त्री का गर्भ केंद्र जगाओ या स्त्री का ह्दय जगाओ |पुरुष प्रथम काम क्रिया सभाविक है वह प्रक्रतिक है लेकिन उस उर्जा को हदय में ले जाना परिश्रम है पुरुषार्थ है .ध्यान .है तप है |


स्त्री की मांग सदा प्रेम की होती है वह काम में इसलिए जाती है क्योकि काम पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी है इस कमजोरी से वह पुरुष के साथ काम में रस लेती है |गहरे अर्थो में स्त्री काम नही चाहती वह पुरुष की काम की मांग से पुरुष का मन चाहा उपयोग करती है ! जब तक परुष स्त्री को प्रेम नही मिलता है वहा तक स्त्री को पुरुष के साथ काम में रस रहता है | जब स्त्री को परुष से प्रेम मिलना आरम्भ हो जाता है तब स्त्री भी पुरुष से काम नही चाहती है | तब वह से दोनों को ब्रह्मचर्य फलित होता है , वह सन्यास है ,वह तन्त्र योग है ,जहा तक पुरुष प्रेम की कला नही सीखता है वहा तक वह स्त्री ( पत्नी) का गुलाम बना रहता है |


ओशो

भगवान दत्तात्रेय और उनके 24 गुरु

 भगवान दत्तात्रेय और उनके 24 गुरु 


जीवन में गुरु की अपनी एक विशेष जगह है। कहते है बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता। सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए आपको किसी न किसी को गुरु बनाना पड़ता है चाहे फिर वो एकलव्य की तरह मिट्टी की मूरत ही क्यों ना हों। गुरु की इसी महता को प्रमाणित करते है भगवान दत्तात्रेय जो की स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे फिर भी उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए जिसमे कीट, पक्षी और जानवर तक शामिल है। उन्होंने जिससे भी कुछ सीखा उसे अपना गुरु माना।

कौन है भगवान दत्तात्रेय

भगवान दत्तात्रेय ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि अत्रि के पुत्र हैं। इनकी माता का नाम अनुसूइया था। कई ग्रंथों यह बताया गया है कि ऋषि अत्रि और अनुसूइया के तीन पुत्र हुए। ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, शिवजी के अंश से दुर्वासा ऋषि, भगवान विष्णु के अंश दत्तात्रेय का जन्म हुआ। कहीं-कहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि भगवान दत्तात्रेय ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार हैं। ( भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा यहाँ पढ़े – कथा अनुसुइया की जिसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बना दिया था बालक )

भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु :

पृथ्वी- सहनशीलता व परोपकार की भावना सीख सकते हैं। पृथ्वी पर लोग कई प्रकार के आघात करते हैं, कई प्रकार के उत्पात होते हैं, कई प्रकार खनन कार्य होते हैं, लेकिन पृथ्वी हर आघात को परोपकार का भावना से सहन करती है।

खाली पेट दो चम्मच खाने से वज़न घटता है| १० दिनों मे १८ किलो वज़न घटा! क्लिक करेखाली पेट दो चम्मच खाने से वज़न घटता है| १० दीनो मे १८ किलो वज़न घटा! क्लिक करे घर पर तुरंत वजन कम करें! रोज ढाई किलो वजन कम करें खाली पेट में यह पीकर...घर पर तुरंत वजन कम करें! रोज ढाई किलो वजन कम करें खाली पेट में यह पीकर... मोटे से मोटे का भी पेट १५-२० दिन में कम हो जाता है! इसे एक ग्लास पानी में मिलाएंमोटे से मोटे का भी पेट १५-२० दिन में कम हो जाता है! इसे एक ग्लास पानी में मिलाएं

पिंगला वेश्या- पिंगला नाम की वेश्या से दत्तात्रेय ने सबक लिया कि केवल पैसों के लिए जीना नहीं चाहिए। वह वेश्या सिर्फ पैसा पाने के लिए किसी भी पुरुष की ओर इसी नजर से देखती थी वह धनी है और उससे धन प्राप्त होगा। धन की कामना में वह सो नहीं पाती थी। जब एक दिन पिंगला वेश्या के मन में वैराग्य जागा तब उसे समझ आया कि पैसों में नहीं बल्कि परमात्मा के ध्यान में ही असली सुख है, तब उसे सुख की नींद आई।

कबूतर- कबूतर का जोड़ा जाल में फंसे बच्चों को देखकर खुद भी जाल में जा फंसता है। इनसे यह सबक लिया जा सकता है कि किसी से बहुत ज्यादा स्नेह दु:ख ही वजह होता है।

सूर्य- सूर्य से दत्तात्रेय ने सीखा कि जिस तरह एक ही होने पर भी सूर्य अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग दिखाई देता है। आत्मा भी एक ही है, लेकिन कई रूपों में दिखाई देती है।

वायु- जिस प्रकार अच्छी या बुरी जगह पर जाने के बाद वायु का मूल रूप स्वच्छता ही है। उसी तरह अच्छे या बुरे लोगों के साथ रहने पर भी हमें अपनी अच्छाइयों को छोडऩा नहीं चाहिए।

हिरण- हिरण उछल-कूद, संगीत, मौज-मस्ती में इतना खो जाता है कि उसे अपने आसपास शेर या अन्य किसी हिसंक जानवर के होने का आभास ही नहीं होता है और वह मारा जाता है। इससे यह सीखा जा सकता है कि हमें कभी भी मौज-मस्ती में इतना लापरवाह नहीं होना चाहिए।

समुद्र- जीवन के उतार-चढ़ाव में भी खुश और गतिशील रहना चाहिए।

पतंगा- जिस प्रकार पतंगा आग की ओर आकर्षित होकर जल जाता है। उसी प्रकार रूप-रंग के आकर्षण और झूठे मोह में उलझना नहीं चाहिए।

हाथी- हाथी हथिनी के संपर्क में आते ही उसके प्रति आसक्त हो जाता है। अत: हाथी से सीखा जा सकता है कि संयासी और तपस्वी पुरुष को स्त्री से बहुत दूर रहना चाहिए।

आकाश- दत्तात्रेय ने आकाश से सीखा कि हर देश, काल, परिस्थिति में लगाव से दूर रहना चाहिए।

जल- दत्तात्रेय ने जल से सीखा कि हमें सदैव पवित्र रहना चाहिए।

मधुमक्खी – मधुमक्खियां शहद इकट्ठा करती है और एक दिन छत्ते से शहद निकालने वाला सारा शहद ले जाता है। इस बात से ये सीखा जा सकता है कि आवश्यकता से अधिक चीजों को एकत्र करके नहीं रखना चाहिए।

मछली- हमें स्वाद का लोभी नहीं होना चाहिए। मछली किसी कांटे में फंसे मांस के टुकड़े को खाने के लिए चली जाती है और अंत में प्राण गंवा देती है। हमें स्वाद को इतना अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, ऐसा ही भोजन करें जो सेहत के लिए अच्छा हो।

कुरर पक्षी- कुरर पक्षी से सीखना चाहिए कि चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ देना चाहिए। कुरर पक्षी मांस के टुकड़े को चोंच में दबाए रहता है, लेकिन उसे खाता है। जब दूसरे बलवान पक्षी उस मांस के टुकड़े को देखते हैं तो वे कुरर से उसे छिन लेते हैं। मांस का टुकड़ा छोड़ने के बाद ही कुरर को शांति मिलती है।

बालक- छोटे बच्चे से सीखा कि हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न रहना चाहिए।

आग- आग से दत्तात्रेय ने सीखा कि कैसे भी हालात हों, हमें उन हालातों में ढल जाना चाहिए। जिस प्रकार आग अलग-अलग लकडिय़ों के बीच रहने के बाद भी एक जैसी ही नजर आती है।

चन्द्रमा- आत्मा लाभ-हानि से परे है। वैसे ही जैसे घटने-बढऩे से भी चंद्रमा की चमक और शीतलता बदलती नहीं है, हमेशा एक-जैसे रहती है। आत्मा भी किसी भी प्रकार के लाभ-हानि से बदलती नहीं है।

कुमारी कन्या- कुमारी कन्या से सीखना चाहिए कि अकेले रहकर भी काम करते रहना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए। दत्तात्रेय ने एक कुमारी कन्या देखी जो धान कूट रही थी। धान कूटते समय उस कन्या की चूडिय़ां आवाज कर रही थी। बाहर मेहमान बैठे थे, जिन्हें चूडिय़ों की आवाज से परेशानी हो रही थी। तब उस कन्या ने चूडिय़ों आवाज बंद करने के लिए चूडिय़ां ही तोड़ दी। दोनों हाथों में बस एक-एक चूड़ी ही रहने दी। इसके बाद उस कन्या ने बिना शोर किए धान कूट लिया। अत: हमें ही एक चूड़ी की भांति अकेले ही रहना चाहिए।

शरकृत या तीर बनाने वाला- अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना चाहिए। दत्तात्रेय ने एक तीर बनाने वाला देखा जो तीर बनाने में इतना मग्न था कि उसके पास से राजा की सवारी निकल गई, पर उसका ध्यान भंग नहीं हुआ।

सांप- दत्तात्रेय ने सांप से सीखा कि किसी भी संयासी को अकेले ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। साथ ही, कभी भी एक स्थान पर रुककर नहीं रहना चाहिए। जगह-जगह ज्ञान बांटते रहना चाहिए।

मकड़ी- मकड़ी से दत्तात्रेय ने सीखा कि भगवान भी माय जाल रचते हैं और उसे मिटा देते हैं। जिस प्रकार मकड़ी स्वयं जाल बनाती है, उसमें विचरण करती है और अंत में पूरे जाल को खुद ही निगल लेती है, ठीक इसी प्रकार भगवान भी माया से सृष्टि की रचना करते हैं और अंत में उसे समेट लेते हैं।

भृंगी कीड़ा- इस कीड़े से दत्तात्रेय ने सीखा कि अच्छी हो या बुरी, जहां जैसी सोच में मन लगाएंगे मन वैसा ही हो जाता है।

भौंरा – भौरें से दत्तात्रेय ने सीखा कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस प्रकार भौरें अलग-अलग फूलों से पराग ले लेती है।

अजगर- अजगर से सीखा कि हमें जीवन में संतोषी बनना चाहिए। जो मिल जाए, उसे ही खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना चाहिए


      

चिंता 'चिता' समान और चिंतन 'अमृत' की तरह

चिंता 'चिता' समान और चिंतन 'अमृत' की तरह


आयुर्वेद में दो प्रकार के रोग बताए गए हैं। पहला, शारीरिक रोग और दूसरा, मानसिक रोग। जब शरीर का रोग होता है, तो मन पर और मन के रोग का शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। शरीर और मन का गहरा संबंध है।


काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंधकार, ईर्ष्‍या, द्वेष आदि मनोविकार हैं। ये मन के रोग हैं। इन मनोविकारों में एक विकार है-चिंता। यह मन का बड़ा विकार है और महारोग भी है।


जब आदमी को चिंता का रोग लग जाता है तो यह मनुष्य को धीरे-धीरे मारता हुआ आदमी को खोखला करता रहता है। चिंता को चिता के समान बताया गया है, अंतर केवल इतना है चिंता आदमी को बार-बार जलाती है और चिता आदमी को एक बार।


शारीरिक रोगों की चिकित्सा वैद्य, हकीम व डॉक्टर कर देते हैं, लेकिन मानसिक रोगों का इलाज करना इन लोगों द्वारा भी मुश्किल हो जाता है। मन के रोगों में जब कोई भी चिकित्सा काम नहीं करती है, तो उस समय धर्म शास्त्रों की चिकित्सा काम देती है।


चिंता के इलाज के लिए शास्त्र बताते हैं कि मनुष्य को चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। जब भी चिंता सताती है, तब-तब मनुष्य को भगवान का चिंतन करना चाहिए।


चिंता से घिरा जो भी आदमी चिंता का भार भगवान पर छोड़ निश्चित होने का अभ्यास करेगा उसको चिंता का रोग भी नहीं लगता और उसकी समस्याओं के समाधान भगवद्कृपा से स्वत: निकलते रहते हैं। चिंता करने वाले व्यक्ति के लिए एक दरवाजा ऐसा है जो उसके लिए कभी भी बंद नहीं होता। वह है भगवान का दरवाजा।


चारों तरफ से घिरे इंसान को भगवान का दरवाजा पार निकालता है। गीता में कहा गया है कि जो भक्त अपने को भगवान के प्रति समर्पित करता हुआ अपना भार भगवान पर छोड़ देता है तो भगवान उसके भार को वहन करते हैं।


जो चिंता करता रहता है उसका चेहरा बुझता-मुरझाता रहता है और जो परमात्मा का चिंतन करता है उसका चेहरा चमकता है।


इसलिए गीता में बताया गया है कि आदमी अभ्यास व वैराग्य से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। स्पष्ट है कि चिंता के संबंध में भी आदमी को परमात्मा पर पूरा भरोसा करके अभ्यास के द्वारा अपने स्वभाव में परिवर्तन करते हुए चिंता मुक्ति और सुखमय जीवन जीने का प्रयत्न करना चाहिए।

शनिवार, 1 मई 2021

जानिये क्या संकेत देता है तुलसी का मुरझाया पौधा?

 जानिये क्या संकेत देता है तुलसी का मुरझाया पौधा?

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👉 प्रकृति की खासियत

प्रकृति की अपनी एक अलग खासियत है। इसने अपनी हर एक रचना को बड़ी ही खूबी और विशिष्ट नेमत बख्शी है। इंसान तो वैसे भी प्रकृति की उम्दा रचनाओं में से एक है जो समझदारी और सूझबूझ से काम लेता है। इसके अलावा जानवरों की खूबी ये है कि वे आने वाले खतरे, मसलन भूकंप, सुनामी, पारलौकिक ताकतों आदि को पहले ही भांप सकने में सक्षम होते हैं। लेकिन बहुत ही कम लोग यह बात जानते हैं कि पौधों के भीतर भी ऐसी ही अलग विशेषता है, जिसे अगर समझ लिया जाए तो घर के सदस्यों पर आने वाले कष्टों को पहले ही टाला जा सकता है।


👉क्यों मुरझाता है तुलसी का पौधा

शायद कभी किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि चाहे तुलसी के पौधे पर कितना ही पानी क्यों ना डाला जाए, उसकी कितनी ही देखभाल क्यों ना की जाए, वह अचानक मुरझाने या सूखने क्यों लगता है?


👉क्या बताना चाहता है

आपको यकीन नहीं होगा लेकिन तुलसी का मुरझाया हुआ पौधा आपको यह बताने की कोशिश कर रहा होता है कि जल्द ही परिवार पर किसी विपत्ति का साया मंडरा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि अगर परिवार के किसी भी सदस्य पर कोई मुश्किल आने वाली है तो उसकी सबसे पहली नजर घर में मौजूद तुलसी के पौधे पर पड़ती है।


👉हिन्दू शास्त्र 

शास्त्रों में यह बात भली प्रकार से उल्लिखित है कि अगर घर पर कोई संकट आने वाला है तो सबसे पहले उस घर से लक्ष्मी यानि तुलसी चली जाती है और वहां दरिद्रता का वास होने लगता है।


👉बुध ग्रह 

जहां दरिद्रता, अशांति और कलह का वातावरण होता है वहां कभी भी लक्ष्मी का वास नहीं होता। ज्योतिष के अनुसार ऐसा बुध ग्रह की वजह से होता है क्योंकि बुध का रंग हरा होता है और वह पेड़-पौधों का भी कारक माना जाता है।


👉लाल किताब

ज्योतिष शास्त्र से संबंधित लाल किताब के अनुसार बुध को एक ऐसा ग्रह माना गया है जो अन्य ग्रहों के अच्छे-बुरे प्रभाव को व्यक्ति तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो उसका असर बुध ग्रह से संबंधित वस्तुओं पर भी होगा और अगर कोई अच्छा फल मिलने वाला है तो उसका असर भी बुध ग्रह से जुड़ी चीजों पर दिखाई देगा।


👉अच्छा और बुरा प्रभाव

अच्छे प्रभाव में पेड़-पौधे फलने-फूलने लगते हैं और बुरे प्रभाव में मुरझाकर अपनी दुर्दशा बयां कर देते हैं।


👉विभिन्न प्रकार की तुलसी

शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधों का जिक्र मिलता है, जिनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से उल्लिखित हैं। इन सभी के गुण अलग-अलग और विशिष्ट हैं। तुलसी मानव शरीर में कान, वायु, कफ, ज्वर, खांसी और दिल की बीमारियों के लिए खासी उपयोगी है।


👉वास्तुशास्त्र में तुलसी

वास्तुशास्त्र में भी तुलसी को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वास्तु के अनुसार तुलसी को किसी भी प्रकार के दोष से मुक्त रखने के लिए उसे दक्षिण-पूर्व से लेकर उत्तर-पश्चिम, किसी भी स्थान तक लगा सकते हैं। अगर तुलसी के गमले को रसोई के पास रखा जाए तो किसी भी प्रकार की कलह से मुक्ति पाई जा सकती है। जिद्दी पुत्र का हठ दूर करने के लिए पूर्व दिशा में लगी खिड़की के सामने रखें।


👉संतान में सुधार

नियंत्रण या मर्यादा से बाहर निकल चुकी संतान को पूर्व दिशा से रखी गई तुलसी के तीन पत्तों को किसी ना किसी रूप में खिलाने पर वह आपकी आज्ञा का पालन करने लगती है।


👉कारोबार में वृद्धि

कारोबार की चिंता सताने लगी है, घर में आय के साधन कम होते जा रहे हैं तो दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखी तुलसी पर हर शुक्रवार कच्चा दूध और मिठाई का भोग लगाने के बाद उसे किसी सुहागिन स्त्री को दे दें। इससे व्यवसाय में सफलता मिलती है।


👉नौकरी पेशा

अगर आप नौकरी पेशा हैं और ऑफिस में आपका कोई सीनियर परेशान कर रहा है तो ऑफिस की खाली जमीन पर या किसी गमले में, सोमवार के दिन तुलसी के सोलह बीज किसी सफेद कपड़े में बांध कर ऑफिस जाते ही दबा दीजिए। इससे ऑफिस में आपका सम्मान बढ़ेगा।


👉शालिग्राम का अभिषेक

घर की महिलाएं रोजाना पंचामृत बनाकर शालिग्राम का अभिषेक करती हैं तो घर में कभी भी वास्तुदोष की हालत नहीं आएगी।


👉शारीरिक फायदे

ज्योतिष के अलावा शारीरिक तौर पर भी तुलसी के बड़े फायदे देखे गए हैं। सुबह के समय खाली पेट ग्रहण करने से डायबिटीज, रक्त की परेशानी, वात, पित्त आदि जैसे रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। प्रतिदिन अगर तुलसी के सामने कुछ समय के लिए बैठा जाए तो अस्थमा आदि जैसे श्वास के रोगों से जल्दी छुटकारा मिलता है।


👉 वैद्य का दर्जा

शास्त्रों में तुलसी को एक वैद्य का दर्जा भी दिया गया है, जिसका घर में रहना अत्यंत लाभकारी है। मनुष्य को अपने जीवन के प्रत्येक चरण में तुलसी की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही आधुनिक रसायन शास्त्र भी यह बात स्वीकारता है कि तुलसी का सेवन, इसका स्पर्श, दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध होता है।